विमर्श से परे: स्त्री और पुरुष-दूसरी किश्त

 सुधा अरोड़ा

सुधा अरोडा


सुधा अरोडा सुप्रसिद्ध कथाकार और विचारक हैं. सम्पर्क : 1702 , सॉलिटेअर , डेल्फी के सामने , हीरानंदानी गार्डेन्स , पवई , मुंबई – 400 076
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( अक्सर देखता हूं कि अपने फेसबुक स्टेट्स में या फिर स्त्रीकाल के पोस्ट
में या किसी सभा में मैं स्त्रीवाद की बात करता हूं , तो पुरुष स्रोता या
पठक पुरुष -विमर्श या पुरुषवाद के आग्रह के साथ उपस्थित होते हैं . सुधा जी
का यह आलेख वैसे आग्रह रखने वाले पुरुष मित्रों को जरूर पढना चाहिए . पढना
उन्हें भी चाहिए , जो दहेज कानून के द्वारा पुरुष -प्रताडना की बात करते
हैं , भारत के न्यायालयों में बैठे मर्द  को भी. साथ ही उन्हें भी जो
स्त्रीवाद को अनिवार्यतः पुरुष -विरोध के रूप में देखते हैं.  इसे हम तीन
किश्तों में प्रकाशित कर रहे हैं . यह दूसरी किश्त है .  पहली किश्त के लिए यहाँ क्लिक करें. )
अब तक का सामाजिक परिदृश्य  यही बताता है कि पुरुष  ने दैहिक हिंसा से कभी परहेज़ नहीं किया और इसे एक तरह से उसके अधिकार की फेहरिस्त में डाल दिया गया – वह पुरुष  प्रेम भी तो करता है पत्नी से तो उसकी गलती पर कभी उसका हाथ उठ जाता है तो कौन सा कहर टूट पड़ा । औरतें पढ़ लिख गईं , पति भी संभ्रान्त, शालीन  थे तो मारपीट अशिक्षित होने की निशानी मान ली गई और पुरुषो ने पहचान लिया कि स्त्री का भावनात्मक पक्ष कमज़ोर है , वह वल्नरेबल है तो उसके भावात्मक पक्ष को हलाल करो । एक से एक प्रगतिशील , नामी , यशस्वी कलाकरों और साहित्यकारों के खाते में ऐसी भावात्मक प्रताड़ना ( इमोशनल अब्यूज़ ) अघोषित रूप से दर्ज है। असंख्य कॉमरेड पत्नियों की शिकायत है कि उनके कॉमरेड पति , पति का ओहदा पाने के बाद , अपने ही सिद्धांत और स्थापनाओं से परे , सिर्फ पति होकर रह गये , कॉमरेड ( यानी सहयोगी ) नहीं रहे । अधिकांश  दाम्पत्य आइसबर्ग की टिप पर बैठे हुए हैं – बाहर से सुरक्षित दिखने वाले और भीतर ऐसा घमासान कि लावा बाहर फूटने का निकास चाहता है ।
 समय के बदलने के साथ जब औरतें काम के लिये घर की छोटी स्पेस से बाहर के बड़े कार्यक्षेत्र में दखल देने लगीं तो बिल्कुल उसी तरह जैसे पुरुषों ने स्त्री की भावनात्मक कमज़ोरी की नस पहचान ली थी , स्त्रियों ने अपनी महत्वाकांक्षाओं के चलते पुरुषों की कमज़ोर नस भांप ली – उसकी यौन कामनाएं । देह मुक्ति के नाम पर अपनी देह पर अपना हक और देह के आज़ाद होने के सारे फलसफ़े हमारे साहित्य के विचारकों ने उन्हें थमा दिये । अब स्त्रियों की एक जमात नैतिकता को तिलांजलि देकर और मूल्यों को ताक पर रखकर वही करने लगी जो पुरुष आज तक करता आया था । भावना को देह से बनवास दिया और पूरी तरह देह बनकर रह गईं । पुरुषों को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल किया और मंजिल की ओर कदम बढ़ाये । कितनों को पीछे फेंका , देखने की न फुर्सत रही , न ज़रूरत । इस जमात के खिलाफ़ पुरुषों को खड़ा होना चाहिये था पर वे इसे सिर माथे बिठा रहे हैं । संबंध भावना-संवेदना विहीन होकर रह गए । स्त्री चिंतक भी स्त्रियों को तिरिया चरित सीखने और व्यवहार में लाने के गुर सिखाने लगीं । सारा असंतुलन यहां से शुरु हुआ । तराजू का एक पलड़ा झुक जाये और दूसरा अपनी ही जगह अड़ा रहे तो संतुलन कैसे बनेगा ? हमारी पूरी लड़ाई तो सामाजिक पितृसत्तात्मक  संरचना से है , सिर्फ पुरुष से नहीं । और सिर्फ स्त्री के लिये नहीं ।
आधुनिक मीडिया भी कारुणिकता और हृदयविदारकता को एक महान ‘दर्शनीय’ उपलब्धि बना कर पेश करता रहता है और पुरुष-विमर्श के दयनीय उद्भावक इसी बहाने अपना कद बढ़ाकर आकाश छू लेने का मंसूबा बांधते हैं लेकिन उन्हें ढेरों असुविधाजनक सवालों से जूझना पड़ेगा । स्त्री की शारीरिक बनावट और भावनात्मक संवेदना का प़क्ष उसे बहुत व्यावहारिक और सख्त होने नहीं देता इसलिये वे वल्नरेबल हैं और अपनी भीतर की कोमलता का शिकार हो जाती हैं । प्रकृति ने कुछ खास गुणों को अलग अलग स्त्रियों और पुरुषों के लिये गढ़ा है ,ऐसा दावे के साथ नहीं कहा जा सकता सौन्दर्य और कोमल भावनाएं स्त्रियों की वजह से सुरक्षित रह पाई , ऐसा सदियों का इतिहास हमें बताता है । आज की  परिस्थितियां उन्हें जटिलताओं और मुश्किलों से निबटने के लिये क्रूर और भौतिकतावादी होने को उकसा रही हैं । स्त्रियां कितना इन विकट परिस्थितियों से जूझ पायेगी , कितना अपने भीतर की स्त्री को बचाकर रख पायेंगी , यह तो समय ही बतायेगा । दाम्पत्य में टूटन और दम्पतियों में अलगाव का अनुपात बहुत बढ़ गया है । दाम्पत्य में तालमेल बिठाने के इस संकट से युवा वर्ग भी जूझ रहा है ।
पहले पुरुषों ने अपनी आज़ादी का भरपूर गलत फायदा उठाया । अब औरतें भी यहीं कर रही हैं । मूल्यों का विघटन , लड़कियों को मिली आज़ादी इतनी औचक और आकस्मिक है कि वे उसे संभाल नहीं पा रही हैं और उस आज़ादी के बहाव में बही चली जा रही हैं। आदमी के हाथ में सत्ता और सल्तनत रही और वह तानाशाह हो गया । आज कुछ औरतें भी दिखा रही हैं कि अब तुम हमारी भी तानाशाही देख लो।

प्रशांत पवार का स्केच

इसे अपनी तरह से साधती एक अलग किस्म की पुरुषवादी जमात भी खड़ी हो रही है , जिसका फलना-फूलना-पनपना पुरुषों के हक में कतई नहीं है क्योंकि पुरुष को अपना सामंजस्य बिठाने के लिये आखिर कोमलता और संवेदना की ही ज़रूरत होगी , स्त्री में जगते एक पुरुष की नहीं । पुरुष तो स्त्री कभी बन नहीं सकता पर स्त्री का पुरुष बन जाना और ज्यादा खतरनाक है । एक दूसरे का पूरक और सहयोगी बनकर ही गृहस्थी की गाड़ी चल सकती है – यह एक बहुत पुराना जुमला है जिसे आज की स्थितियों ने चलन से बाहर ( ऑब्सोलीट ) कर दिया है । पश्चिम में क्लारा जेटकिन ने सार्वजनिक निर्णयों में स्त्री की भूमिका की वकालत की । सिमोन द बोउवा ने स्त्री की उपेक्षा के जैविक कारणों  की पड़ताल की और जर्मेन ग्रीयर ने उसके बधियाकरण के अनेक स्रोतों की खोज की लेकिन दशकों पहले भारत में महिला प्रधानमंत्री होने के बावजूद इस प्रक्रिया में कोई विमर्श नहीं चला । इन्दिरा गांधी लौह महिला थीं,  लेकिन उनका लौहत्व पितृसत्ता के खिलाफ कोई हथियार न बन सका । वे राजनीतिक अधिनायकवाद का ही एक रूपक बनकर रह गईं।
स्त्री शासित है , इसलिये सार्वजनिक और राजनीतिक निर्णयों से वंचित है । अगर वह अपनी आवाज आज उठा रही है तो केवल इसलिए कि आज उसे अपनी गुलामी का अहसास हो चुका है । इस गुलामी के अहसास से ही नहीं , अपनी मां दादी नानी की पीढ़ी को इस गुलामी के नीचे ताज़िन्दगी पिसते देखकर और सामाजिक आर्थिक राजनीतिक घेरों में अपनी एक पहचान बना लेने के बाद भी जब स्त्रियों ने देखा कि उनके प्रति मर्दों के रवैये में कोई खास बदलाव नहीं आया है तो जहां एक किस्म की मध्यवर्गीय लड़कियों में आत्महंता प्रवृत्ति  ने घातक रूप से जड़ें जमायीं , वहीं दूसरी ओर एक आक्रामक जमात असंतुलित रूप से बगावत पर उतर आई ।
लड़कियों का लड़कों जैसा होना या दिखना – मानसिकता से अधिक पहरावे में बदलाव से शुरु हुआ ।पश्चिम  से शुरु हुई इस प्रवृत्ति  ने तेज़ी से भारत में भी घर कर लिया । पोशाक के खुलेपन से लेकर व्यवहार और भाषा तक में ‘स्त्री’ को तिलांजलि दी गई । यह बदलाव ज़ाहिर है , प्राकृतिक और बुनियादी फर्क की अभ्यस्त आंखों को रास नहीं आया । किसी भी व्यक्ति को चाहे वह पुरुष हो या स्त्री , आराम देह पोशाक पहनने का अधिकार है पर यह बदलाव सिर्फ पोशाक तक सीमित नहीं रहा । इसने हर ओर से स्त्री की निजी विशिष्टताओं  के लोप होते चले जाने पर सवाल खड़ा किया ।

इसमें संदेह नहीं कि आज पूरे विश्व में एक भ्रम , असंतुलन और दिशाहीनता का माहौल पैदा हो गया है । स्त्रियां अपनी देह पर सिर्फ पोशाक ही नहीं , अपने स्त्रियोचित गुण त्याग कर , मर्दाना अंदाज़ में बेखौफ़ गाली गलौज की भाषा इस्तेमाल कर , सिगरेट के छल्ले उड़ाते हुए अपने को पुरुषों के पेडेस्टल पर खड़ा करने में अपने जीवन की सार्थकता समझ रही हैं और उन्हें लगता है कि वे इसी तरह इस सामंती वर्ग को ‘सबक’ सिखा सकती हैं । स्त्रियों के आक्रामक बयान स्त्री भाषा के मानक को धूल चटाते दिखाई देते हैं । स्त्री प्रेम और संवेदना को दरकिनार कर अगर पुरुष जैसी बर्बर और नृशंस  बनती है तो उसकी आज़ादी या बहादुरी पर फख्र करने का कोई कारण नहीं है ।
भारत ही नहीं , पूरे विश्व  में दाम्पत्य सबसे ज़्यादा जटिल , संश्लिष्ट  और कठिन ‘पज़ल’ है जिसे सुलझाना बड़े बड़े विमर्शकारों के बस का नहीं है। इस गुत्थी को जितना सुलझाने की कोशिश करो , यह उतना ही उलझती जाती है । दोनों पक्ष एक-दूसरे को दोषी ठहराते हैं जबकि दोषी तीसरा है और वह आकार में इतना बड़ा है कि सामान्य आंखों से हमेशा  ओझल ही रहता है । जैसे भारतीय रसोई में दो बर्तन बिना टकराये नहीं रह सकते , यहां दो व्यक्ति टकराने में ही उम्र गुज़ार देते हैं । इन बर्तनों में  एक को अगर बदल भी दिया जाता है तो वह बदला हुआ बर्तन पहले से ज़्यादा शोर  पैदा करता है । कहा जाता है कि दाम्पत्य में दोनों में से जो पक्ष सहृदय और सहनशील होगा , वही दबाया जाएगा – वह स्त्री हो या पुरुष । या जिसके पास अर्थसत्ता होगी , वह भिक्षापात्र बढ़ाने वाले पक्ष पर अपना रुआब जतायेगा । यानी हर हाल में एक पक्ष दूसरे पर हुकूमत करेगा ही । एक पीड़ित ही होगा ओर दूसरा उत्पीड़क । अधिकांश  शादियां समझौते पर ही टिकी होती हैं , जिसमें एक पक्ष शासन और नियंत्रण करता है और दूसरा पक्ष उन दबावों के तले ज़िन्दगी गुज़ार देता है । एक पक्ष की सहनशीलता पर ही यह गठबंधन टिका रहता है और 95 प्रतिशत ( या इससे ज़्यादा ) यह पक्ष स्त्री का ही होता है ।
महिला सलाहकार केंद्रों में काउंसिलिंग के दौरान , प्रताड़ित स्त्रियों में एक बहुत बड़ा फर्क महसूस किया जा रहा है । आज से बीस साल पहले , हमारे पास 40 से 55 के बीच की उम्र की औरतें , सलाह के लिये सलाहकार केंद्रों में आया करती थीं – जब उनका अधेड़ होता शरीर और झेलने से इनकार करने लगता था । वहां आई दस महिलाओं में से आठ के कान के परदे हिंसा की मार से फटे होते थे । हड़िडयां पिट पिट कर कमज़ोर हो जाती थीं । बच्चों के बड़े होने के बाद उन्हें अपना ख्याल आता था कि ज़िंदगी के बचे खुचे साल अब चैन से गुज़ार सकें । कुछ तो पचपन साठ की उम्र में तलाक की कार्यवाही की जानकारी चाहती थीं । आज फर्क यह आया है कि पचीस से पैंतीस साल की लड़कियां शादी के एक डेढ़ साल बाद ही अपनी समस्याओं पर बात करना चाहती हैं । समय इतना बदल गया है पर आज भी संयुक्त परिवार में , नौकरी करते हुए देर सबेर लौटने का स्पष्टीकरण  उन्हें देना पड़ता है , आंखें नीची कर , घर में ऊंची आवाज़ में न बोलने की उनसे अपेक्षा की जाती है , अपनी पूरी तनखा सास या पति के हाथ में रखकर अपने दैनिक खर्च के लिये हाथ फैलाना पड़ता है यानी उनके पुराने तयशुदा रोल में अर्थोपार्जन की ज़िम्मेदारियां तो बढ़ गईं पर पर उनके कर्तव्यों की फेहरिस्त नहीं बदली । लेकिन यह मध्यवर्गीय युवा लड़की का एक चेहरा है ।

इसका एक विपरीत चेहरा भी है – ऐसी लड़कियां भी आती हैं जिनके पतियों से जब बात की तो पता चला – दोनों कमाते हैं , दोनों घर के काम में हाथ बंटाते हैं पर लड़की चाहती है कि वह अपनी तनखा घर के किराये और खाने पीने और वीकएंड पर सिनेमा या रेस्तरां में क्यों खर्च करे , वह ज़िम्मेदारी सिर्फ पति की है । यानी लड़की को घर से बाहर कमाने की छूट भी मिली , उसने अपना एक मुकाम भी बनाया पर घर खर्च की ज़िम्मेदारी आज भी पुरुषकी ही मानकर वे चल रही हैं । अधिकांश  दाम्पत्य की समस्याएं दोनों की कमाई , बैंक बैलेंस और खर्च के बंटवारे को लेकर है ।  आर्थिक आत्मनिर्भरता अपने साथ बहुमुखी नयी समस्याएं लेकर आई है जिसके बारे में पहले कल्पना करना भी असंभव था । यानी हम एक ही समय में दो परस्पर विषम स्थितियां देख रहे हैं । इसके बरअक्स लिव इन की अवधारणा आई ज़रूर पर अन्ततः उसकी परिणति भी कमोवेश  वैवाहिक संबंधों में उठने वाली समस्याओं पर ही हुई ।
सलाहकार केंद्रों में , हमने यह निष्कर्ष  भी निकाला कि पुरुष प्रताड़ना के अधिकांश  मामले पहली पत्नी के जीवित रहते दूसरी के पास चले जाने से होते हैं। दूसरी पत्नी पहली को अपदस्थ कर आती है तो इस आशंका को साथ लिये आती है कि उसे भी कोई तीसरी अपदस्थ कर सकती है । इस स्थिति से चौकन्नी स्त्री पहली की सारी कमजोरियों से पहले अपने को मुक्त करती है और पति के बराबर दबंग हो जाती है । पति इस ‘दूसरी’ के सामने इतना दयनीय हो जाता है कि अपने किसी मित्र के आने पर उसे चाय पिलाने के लिये कहते हुए भी थर-थर कांपता है । ऐसे कुछ स्वनामधन्य पतियों से हम सब परिचित हैं जो दूसरी शादी के बाद सारा जीवन एक पछतावे की आग में चुप रहकर काटते हैं और अपना दुःख किसी से बांट भी नहीं सकते ।
स्त्रियों के मामले में यह और बड़ा सच है । एक पति की प्रताड़ना से तंग आकर जब वह दूसरा ठौर तलाशती है तो अधिकांश अपने को पहले से ज्यादा बड़े चक्रव्यूह में फंसा पाती है जिसमें से सामाजिक दबाव के कारण वह निकल भी नहीं पाती । वहां दूसरा पति अपनी पत्नी की कमज़ोरी को भांप कर अपने सैडिज़्म को पोसता है और उसे दैहिक – भावनात्मक हर तरह से शासित करता है।  गरज यह कि कुछ खुशकिस्मत कहे जाने वाले अपवादों को छोड़ दें तो औसत दाम्पत्य जीवन एक कसाईबाड़ा है , जहां एक कसाई है और दूसरा जिबह होने को तैयार खड़ा है । इस सच्चाई से भला कौन मुंह मोड़ सकता है !

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