सुमंत की कविताएँ

सुमंत


सुमंत। बेहद अचर्चित नाम। साहित्य समाज तथा राजनीति में तकरीबन तीन दशकों की गहरी सक्रियता। दिल्ली में पिपुल्स पब्लिशिंग हाउस के हिंदी संपादकीय विभाग तथा सर्वोत्तम रीडर्स डाइजेस्ट में काम करने के बाद एक दम से ट्रेड यूनियन आंदोलन की ओर। स्वतंत्र पत्रकारिता के साथ वामपंथी कार्यकर्त्ता के रूप में साहित्यिक-सांस्कृतिक मोर्चे पर राजधानी पटना में निरंतर सक्रीय। सम्पर्क : 9835055021

|| पतित पौरुष सत्ता ||


अपनी अपनी
सीमाओं संकोचों को छोड़
तोड़ रही हैं आज वे
अपने ही बूते – ताबड़तोड़
मर्दों की दुनिया की
अय्याशियों के अड्डे
यानि दारु भट्ठे।

ओ मर्दो,
तो यह भी जानो ज़रुर
इसी रास्ते आगे बढ़कर
तोड़ेंगीं वे कल को
तुम्हारे मर्द होने का ग़रूर।

अलबत्ता,
जो गढ़ता है
औरतों की दुनिया में
पतित पौरुष सत्ता।

(बिहार के गाँवो कस्बों में इन दिनों शराब के अड्डों को तहस-नहस करतीं जुझारू गंवई औरतों की जमात को सलाम के बतौर)

|| सड़न ||
अनिंध्य सुंदरी न भी हों
तो भी
वे पीड़ित जवान लड़कियां
सुंदरी तो थीं ही
चेहरों पर अपने
तेज़ाब की नारकीय धार पड़ने से पहले

अब उनके
वीभत्स हुए चेहरे
इस बात के सबूत हैं कि
कोई समाज
कैसा कैसा शक्ल लेता हैं
अपने समस्त अवयवों के सड़ने से पहले !

(आये दिन तेज़ाब हमलों का शिकार हो रहीं लड़कियों के साहस और सम्मान को समर्पित)

॥दुत्कार ॥

सब पढ़ रहे हैं
मैं भी पढ़ रहा हूं
अखबारों की प्रायः
ये रोज – रोज की ख़बरें/सुर्खियां
कि जर्जरित जवान माएं
अपने नवजातों को अक्सर
छातियों से चिपकाएं
चीथड़े – चीथड़े कर रही हैं
अपने अंग – प्रत्यंगों को
कूद कर रेल इंजनों के आगे ;
या हहराती नदियों में
लगाकर छलांग
समाप्त कर रही हैं
अपनी इहलीलाएं।

मगर
इन छाती चीर ख़बरों या सुर्ख़ियों का
हम पर
बस, इतना ही है असर
कि अगले ही पृष्ठ पर छपे
किसी सुंदरी के खुले कुल्हें
या अधखुले वक्षों पर प्रायः
टिक जाती है हमारी नजर !

जवान माओं का
इस तरह रोज – रोज मरना
यदि
अमानवीय सत्ता का ही विस्तार है
तो जानना
यह भी जरुरी है कि
हमारा यह आचरण
हमारे लिए
उससे भी बड़ा दुत्कार  है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here