बच्चों को रोटी, कपड़ा, दवा और पढाई नहीं दे पाने वाला समाज सिर्फ सजा देने के लिए उतावला है

स्त्रीवादी अधिवक्ता अरविन्द जैन किशोर न्याय अधिनियम,1986 की विशेषज्ञ समिति के सदस्य रहे हैं. किशोर न्याय अधिनियम में परिवर्तन के कदम पर उनसे राष्ट्रीय सहारा (हस्तक्षेप) के लिए राजीव मंडल की बातचीत . स्त्रीकाल के पाठकों के लिए साभार . 


अरविन्द जी, आप किशोर न्याय अधिनियम,1986 की विशेषज्ञ समिति के सदस्य रहे हैं. कुछ लोगों का कहना है कि निर्भया कांड जैसी घटनाओं को देखते हुए नाबालिग़ अपराधियों/किशोरों की उम्र घटाना ज़रूरी था,जबकि दूसरे लोगों का मानना है कि किसी एक घटना के आधार पर क़ानून में इतना अहम फैसला काफ़ी सोच-विचार कर ही होना/करना चाहिए था.



मेरा मानना है कि इस संदर्भ में बच्चों के प्रति राष्ट्र और समाज की जो जिम्मेदारी है, उसे किसी एक ख़ासमामले पर उभरी जन-भावनाओं या मीडिया के दबाव-तनाव में नहीं बदला जाना चाहिए था. विशेषकर जब राष्ट्रीय स्तर पर कोई अध्ययन उपलब्ध ना हो. पन्द्रह साल पहले सन 2000 में ही तो संशोधन करके अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में (मंत्री मेनका गांधी ने) किशोरों की उम्र16 से बढ़ाकर 18 साल की थी. इस बीच ऐसा क्या हो गया कि उम्र घटाने की जरूरत आन पड़ी! यह जन-भावना का सम्मान है या शहरी-शिक्षित माध्यम वर्ग का दबाव या मीडिया या तनाव? देश जब अपने करोड़ों बच्चों कोशिक्षा, रोटी, कपड़ा, दवा, छत या रोज़गार नहीं दे सकता, तो उन्हें सचमुच अपराधी बनने पर विवश करता है और सिर्फ सज़ा देता हैं। इस संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय  समझौते, संविधान और बाल अधिकारों को भी नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता.

सरकार का तर्क है इस दौरान किशोर अपराधों में काफी बढ़ोतरी हुई है?
किशोर अपराधों में बढ़ोतरी हुई दिखती है, तो राष्ट्रीय स्तर पर तमाम तरह के अपराधों में हुई है. भारत में जितने अपराध हुए हैं, उसमें से किशोरों से जुड़े अपराधों का हिस्सा तो सिर्फ 1.2 प्रतिशत ही है. फिर भी इतना शोर या हो-हल्ला क्यों मचाया जा रहा है.हमें नहीं भूलना चाहिए कि सन 2000 में उम्र 16 साल से बढ़ा कर 18 साल की गई थी, सो 16-18 साल के लड़कों द्वारा किये अपराध भी किशोर अपराध की श्रेणी में शामिल हो गए. वास्तव में यह यह आंकड़ों की जादूगरी भी है और छलावा भी. मान लो कि पिछले कुछ सालों में 16-18 साल के किशोरों से जुड़े जघन्य अपराध भी बढ़ रहे हैं,तो क्या इनकी उम्र घटाकर बालिगोंकी तरह सजा देने से समस्या का समाधान हो जाएगा. अगर अपराध बढ़े भी हैं तो उसके कारणों की जांच-पड़ताल की जानी चाहिए, ना कि सज़ा बढ़ाने कर अपराध कम करने का प्रयास. बच्चों को जेल में ख़तरनाक अपराधियों के साथ रखेंगे, तो जब बाहर निकलकर आएंगे तो निश्चित तौर पर पक्के अपराधी बनकर ही बाहर निकलेंगे. राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार  2010 में 26629, 2011 में 29990, 2012 में 35346, 2013 में 39361 और 2014 में 45621 किशोर अपराध के मामले दर्ज किए गए थे. 55.6% किशोर अपराधियों के परिवार की आर्थिक हालात का अनुमान इस बात से ही लगाया जा सकता है कि उनकी सालाना आमदनी 25000 रूपये तक और 22.4% की आय 50000 रूपये तक ही थी. किशोर अपराधियों में 21% एकदम अनपढ़, 31% प्राथमिक शिक्षा, 37% दसवीं पास थे और 10% दस से अधिक पढ़े हुए थे.

स्त्री के विरुद्ध यौन हिंसा के अपराध बढ़ने का मुख्य कारण क्या है?
ना जाने कब से, यौन हिंसा की शिकार स्त्री की ‘प्रेतात्मा’, सड़क से संसद तक मंडरा रही है और शायद तब तक मंडराती रहेगी, जब तक उसे ‘इन्साफ’ नहीं मिलता। ‘प्रेतात्मा’ के भय, दबाव और तनाव में रातों-रात ‘आपात कालीन’ आयोग बने, ‘कॉस्मेटिक सर्जरी’ से अध्यादेश जारी किये गए, ‘विंडोड्रेसिंग’ से कानूनी संशोधन करने पड़े और आंसू पोछने के आधे-अधूरे प्रयास किए, परिणाम स्वरूप यौन हिंसा के ‘आंकड़े’ लगातार बढ़ते गए और निरंतर बढ़ रहे है। क्या करें-सरकार की समझ से बाहर है।

क्या मौजूदा कानूनों से बाल अपराधियों को नहीं सुधारा जा सकता था?
हालाँकि तीन साल बाल सुधार गृहों से संबंधित अभी तक कोई ऐसा अध्ययन सामने नहीं आया है कि तीन साल के बाद सुधार गृहों से निकलने वालों में से ऐसे कितने हैं, जो वाकई में सुधर गए और कितने अपराध की दुनिया में खो गए.सच बात तो यह है कि क़ानून और नीतियां बनने के बावजूद, नाबालिग़ अपराधियों की शिक्षा, पुनर्वास और सुधार पर अपेक्षित काम नहीं किया गया, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि इन्हें भी बालिग़ शातिर अपराधियों की तरह, सुधारने का अवसर दिए बिना ही सज़ा दी जाए या फ़ांसी पर लटका दिया जाए. अधिकांश किशोर अपराधी अनपढ़ और गरीब परिवारों के बच्चे हैं. इनके प्रति देश-समाज इतना असंवेदनशील, विवेकहीन या बेरहम कैसे हो सकता है! बाल सुधार गृहों में इन नाबालिग़ अपराधियों की समुचित ‘काउंसलिंग’ की जानी चाहिए. मुझे तो इन सब के सुधार की हर संभावना, तलाशना-तराशना लाज़िमी लगता है. संभावना का गर्भ में ही गला घोंटना तो आत्मघाती भी है और जघन्य अपराध भी, जिसके लिए भावी पीढियां हमें कभी माफ नहीं कर पाएंगी!

इस बारे में आंकड़े क्या और किस तरफ इशारा करते दिखाई देते हैं? 
जहाँ तक नाबालिग़ों के रिकॉर्ड की बात है, तो सभी सुधार गृहों में इस तरह के आंकड़े तो हैं कि उनके पास कितने नाबालिग़ आए, कितने समय तक रहे और उन्हें कब छोड़ा गया. लेकिन सुधार गृह से छोड़े जाने के बाद का ‘ट्रैक रिकॉर्ड’ शायद उनके पास नहीं होता.जघन्य अपराधों के मामले में भी यही स्थिति है. आंकड़ों या अपराधियों का कोई वर्गीकृत रिकॉर्ड रखा जाता है, कहना मुश्किल है. नया अधिनियम जो अभी राज्यसभा ने पारित किया है, संभवत उसमें ऐसे प्रावधान किए गए हैं, जिसमें किशोर अपराधियों का सम्पूर्ण रिकॉर्ड रखा जाएगा.

‘निर्भयाकाण्ड’ के बाद, 2013 में भी तो कानूनी संशोधन करके कड़ी सज़ा के प्रावधान किये गए थे, फिर अपराध क्यों बढ़ रहे हैं?
दरअसल ‘निर्भयाकाण्ड’(दिसम्बर, 2012) के बाद, भारतीय दंड संहिता की धारा 375 में किए/हुए संशोधन (2013) के बाद ‘सहमति से सम्भोग’ की उम्र, 16 साल से बढ़ा कर 18 साल कर दी गई, मतलब यह कि 18 साल से कम उम्र की लड़की से यौन सम्बन्ध, भले ही उसकी सहमती हो या ना हो- ‘बलात्कार’ का अपराध माना जाने लगा, सो जाहिर है कि 16-18 साल की लड़कियों के साथ हुए अपराध इस वजह से भी अपराध के आंकड़े बढ़ेंगे ही. दूसरा कारण यह कि ‘बलात्कार’ की परिभाषा भी पहले से कहीं अधिक व्यापक कर दी गई, उसकी वजह से भी अपराध बढ़े हुए दिखाई देते हैं. इस तरफ किसी ने नज़र घूमा कर देखा तक नहीं, सोचने-विचारने का तो सवाल ही नहीं उठता.

ऐसे कानूनी संशोधन से क्या कोई लाभ हो पाया या नहीं?
आप देखे कि 2013 संशोधन में ‘सहमति से सम्भोग’ की उम्र 16 साल से बढा कर 18 की गई, लेकिन 15 साल से बड़ी उम्र की पत्नी से कानूनी ‘बलात्कार का अधिकार’ पहले जैसा ही बना रहा. इस संदर्भ में विधि आयोग और वर्मा कमीशन की एक भी सिफारिश सरकार ने नहीं मानी. मुझे लगता है कि मूल मंशा ‘देश की बेटियों’ को ‘यौन हिंसा’ से भी बचाना था और ‘कानूनी विसंगतियों और अंतर्विरोधों’ को भी समाप्त करना था। पर सच यह भी है कि हमें अपनी ‘बेटियों’ को तो यौन सम्बंधों से सुरक्षित रखना है,पर नाबालिग पत्नी (बहुओं) से सहवास (बलात्कार) करने का कानूनी अधिकार (हथियार) और ‘बलात्कार की संस्कृति’ को भी बनाये-बचाये रखना है। अभी भी तमाम ‘कानूनी विसंगतियां और अंतर्विरोध’ बने-बचे है, जिनकी वजह से वरना विवाह संस्था या परिवार चलेगा कैसे!

बढ़ते किशोर अपराधों को रोकने, अपराधियों को सुधारने और अपराध-मुक्त समाज बनाने के लिए क्या किया जाना चाहिए?
किशोर अपराधों को रोकने, अपराधियों को सुधारने और अपराध-मुक्त समाज बनाने के लिए ‘राजनीतिक इच्छा शक्ति’ होना जरूरी है. यह नहीं कि कहीं आग लगे तो ‘फायर ब्रिगेड’ बुलाओ, आगबुझवाओऔर भूल जाओ. किशोर अधिनियम में अभी जो संशोधन किए गए हैं, वह मूल रूप से ‘अमेरिकनसिस्टम’ की नक़ल ही है, जबकि भारत और अमेरिका की सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक स्थिति में बहुत अंतर है. मुख्य रूप से अशिक्षा और निर्धनता या पारिवारिक हालत ही किशोर लड़के-लड़कियों को अपराध की अंधेरी गलियों तक पहुंचाते है. अपराधों के आंकड़े आईने की तरह साफ़ है, बशर्ते हम पढ़ना चाहें. पिछले कई सालों से बच्चियों से बलात्कार और किशोर अपराधों के मामले में मध्य प्रदेश सबसे आगे रहता रहा है और महाराष्ट्र और बिहार पीछे-पीछे. क्या कभी इन राज्य सरकारों या किसी विद्वान-समाज-शास्त्री ने यह जानने की कोशिश की कि आखिर इसके पीछे कौन से सामाजिक-आर्थिक कारण हैं. सामन्ती सोच, निर्धनता, अशिक्षा या कुछ और!मुझे लगता है कि कानून का ‘छकड़ा’ वापिस लौट रहा है. 2015 से 1860 तक का उल्टा सफ़र, शायद अगले कुछ सालों में पूरा हो जाए. अब और क्या कहूं? क्या लिखूं? क्या बताऊं?

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने महत्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120, [email protected]

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