स्त्री के अकेलेपन का दर्द है दोपहरी

रेणु अरोड़ा 


दोपहर का समय स्त्री के जीवन का ऐसा समय होता है जब अपनी दिनचर्या से थोड़ी फुर्सत पा वह अपनी सखी-सहेलियों और पड़ोसिनों के साथ अपना दुख-सुख बांटती है,हँसी-ठिठोली करती है। ये सब करते हुए समय कब बीत जाता है-पता ही नहीं चलता। लेकिन अकेले में यही दोपहरी खाने दौड़ती है और अगर इस अकेलेपन में बुढ़ापा भी मिल जाए तो स्थिति और भी मारक और दयनीय हो जाती है। अवस्था,परिस्थिति और स्थिति की इसी विडम्बना,मार्मिकता को उभारा पंकज कपूर द्वारा लिखित,निर्देशित नाटक दोपहरी ने। इस नाटक का मंचन 18वें भारत रंग महोत्सव में 5फरवरी को हुआ था। मूलतः यह एक कहानी है जिसका भावपूर्ण वाचन बड़े ही सहज ढंग से किया गया।

पंकज कपूर दोपहरी को प्रस्तुत करते हुए

यह कहानी लखनऊ की गलियों में बसी एक बड़ी हवेली में रहने वाली एक अकेली बूढ़ी अम्मा बी की कहानी बताता है यह नाटक। अम्मा बी के शौहर नवाब साहब की मृत्यु हो चुकी है। इकलौता बेटा जावेद अमरीका अपने परिवार के साथ रहता है। कभी-कभी कुछ दिनों के लिए घर आता है। माँ को जल्दी वापस आने का भरोसा और दिलासा देकर लौट जाता है न आने के लिए। उनके अकेलेपन का साथी है उनका नौकर,जो सुबह आकर काम करके दोपहर को चला जाता है फ़िर शाम को वापस आता है। दोपहर के इस अकेलेपन में अम्मा बी को छत पर किसी के दौड़ने की आवाज़ सुनाई देती है। एक दिन कदमों की आवाज़ के साथ पायल की आवाज़ भी सुनाई देती है और फ़िर एक दिन कागज़ का एक पुर्जे पर आज रात दस बजे—ये संदेश मिलता है। अम्मा बी की हालत ऐसी कि काटो तो ख़ून नहीं। उन्हें ये आवाज़ें इतवार को नहीं सुनाई देती क्योंकि हर इतवार को नवाब साहब के दोस्त डॉक्टर साहब घर आते,अनके साथ ही दोपहर का खाना खाते और गप-शप में ही सारा दिन बीत जाता। डॉक्टर साहब अम्मा बी को कोई काम करने या किरायेदार रखने की सलाह देते है मगर वे तैयार ही न होतीं ।

 एक दिन जुम्मन के कहने पर वे वृद्धाश्रम भी जाती हैं  ऊपर से तो सब ठीक ही लगता है लेकिन वहाँ रहने वाले परिचित उन्हें अपनी ही हवेली में रहने की हिदायत देते हैं। इस घटना के बाद डॉक्टर साहब अधिकारपूर्वक किरायेदार रखने को कहते हैं और अम्मा बी को तैयार होना पड़ता है। काफ़ी जद्दोज़हद के बाद एक लड़की सबीहा को वे चुनती हैं क्योंकि वह उनके मायके जौनपुर की रहने वाली है साथ ही दोपहर एक बजे से शाम चार बजे तक तथा रात आठ बजे घर लौटने की शर्त उसे मंज़ूर थी। सबीहा के आने से अम्मा बी का अकेलापन ही दूर नहीं होता बल्कि औलाद की दूरी का ग़म भी नहीं अख़रता और सबसे बढ़कर छत से आने वाली आवाज़े भी अब उन्हें परेशान न करती। एक दिन सबीहा बिना बताए चली जाती है और बाद में बी को एक आदमी के फोन से पता चलता है कि वह काम से बाहर गई है दो दिन में लौटेगी। अम्मा बी के मन में तमाम अच्छे-बुरे ख्याल आते हैं , अपनी बेचैनी में वे उसके कमरे का ताला तुड़वाकर कमरे में दाख़िल होती है तो बिस्तर पर अधसिली गिलहरी को प्यार से पुचकारकर सिल देती हैं।

पंकज कपूर दोपहरी को प्रस्तुत करते हुए

सबीहा के वापस आने पर उन्हें सच्चाई का पता चलता है साथ ही सबीहा को भी बी के हुनर का पता चलता है। वह बताती है कि उसे पाँच सौ खिलौनों का आर्डर पूरा करना है मगर अकेले काम पूरा करना संभव नहीं। जिस सहेली ने भरोसा दिया था वह अब मुकर गई। बी के हुनर को देखकर वह उनसे खिलौने बनाने का इसरार करती है। बी थोड़ी न-नुकुर के बाद काम में लग जाती है और इन सब में उनका अकेलापन, बुढ़ापे के सारे दर्द औ ग़म गायब ही हो जाते हैं। वे पूरे उत्साह से काम में जुट जाती है। समय पर आर्डर पूरा हो जाता है। कंपनी के मालिक को खिलौने पहले से भी ज्यादा पसंद आते हैं और वह और खिलौनों का आर्डर दे जाता है। बी को सबीहा उनकी मेहनत की कमाई का पहला चैक देती है जिसे वे ख़ासी मशक्कत के बाद स्वीकारती हैं। और उन्हें पहली बार यह एहसास होता है कि यह उनकी कमाई है और वे केवल अम्मा बी नहीं मुमताज़ सिद्दकी हैं—उनका अपना वजूद है। इस तरह कहानी केवल स्त्री-सरोकारों की ही बात नहीं करती बल्कि परिवारों में वृद्धों के साथ जो दुर्व्यवहार और अत्याचार होता है—उसकी भी बानगी कहती है—यह कहानी। हम बेटे की चाहना करते हैं लेकिन अनचाही बेटी कैसे हमारे जीवन के भाव-कोष को भर देती हैं—इससे हम अनजान नहीं—फ़िर भी अपनी चाहत से मजबूर हैं। सबीहा के किरदार के माध्यम से हम इसी सच्चाई से दो-चार होते हैं। लड़की का बचपन से लेकर बुढ़ापे तक का सफ़र पिता,पति और पुत्र की छाया में बीत जाता हैं उसका ख़ुद का व्यक्तित्व घर-गृहस्थी के बोझ तले ओझल ही हो जाता है। मगर पहचान की चाह राख में दबी चिंगारी की तरह मन के किसी कोने में रहती है।  अम्मा बी का चाँद को संबोधित करते हुए अपने शौहर को बताना कि—यह मुमताज सिद्दकी की अपनी कमाई—इसी सत्य को प्रमाणित करता है।

पंकज कपूर के कहानी कहने के अंदाज़ के कारण हम कहानी सुनते नहीं बल्कि देखते हैं । ध्वनि-प्रकाश और आवाज़ के ताने-बाने से ऐसा लगता है कि कहानी हमारे सामने घटित हो रही है। कहानी का घटनाक्रम तीन स्थलों पर घटित होता है। इन तीन अलग स्पेसों का आभास मंच पर थोड़ी-थोड़ी दूरी पर रखे सामान या व्यवस्था से आसानी से हो जाता है। दाहिनी ओर एक टेबल-कुर्सी और उस पर रखा लैंप कमरे का एहसास देता है तो बीच में रखी आरामकुर्सी और साथ ही रखी साइड-टेबल तथा थोड़ी दूरी पर रखा कपड़े टँगा हैंगर-रैक कभी आँगन तो कभी अम्मा बी का कमरा बन जाता है। बाईं ओर दो सीढ़ी का रेलिंग लगा चबूतरा छत बन जाता है। वाचक का इन स्पेसों में घूमते हुए आवाज़ के उतार-चढ़ाव के साथ कहानी पढ़ना पात्रों के आपसी संबंधों को और स्थान एवं समय के साथ उनके जुड़ाव को बाख़ूबी उजागर करता है। वाचक कभी सीधे दर्शकों से सीधे संवाद स्थापित करके भी कहानी कहता चलता है। अंतिम दृश्य में साइक्लोरामा पर उभरा चाँद और छत पर खड़ी अम्मा बी का उससे अपने मन की बात कहना दर्शकों के मर्म को ही नहीं छूता बल्कि उसे ये भुला भी देता है कि वह वाचक है अम्मा बी नहीं। बड़ी सादगी से किया गया यह अंदाज़े बयां मन को मोह लेता है।

रेणु अरोड़ा मिरांडा हाउस, दिल्ली विश्वविद्यालय में असिसटेंट प्रोफेसर हैं. नाटक और रंगमंच में अभिरूची . संपर्क : renur71@gmail.com 

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ISSN 2394-093X
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