नीरा जलछत्री की कवितायेँ

1.

नीरा जलछत्री

युवा कवयित्री, दौलतराम कॉलेज ,दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी की प्राध्यापिका. संपर्क : neerajalchhatri@gmail.com

हमें अच्छा लगता है,
तुम्हारा घूरना, फब्तियां कसना
धक्का देकर आगे बढ़ जाना
और निर्लज्जता से हँसना
हमें अच्छी लगती है,
जबरन प्रेम न स्वीकार करने पर
जान लेने और देने की धमकी

हमें बहुत अच्छा लगता है,
मुंह अँधेरे उठकर
दिन-भर घर के कामों में खटना
और तुम्हारा शाम को लौटकर यह कहना
कि करती क्या हो तुम घर पर पड़ी-पड़ी ?

हमें अच्छा लगता है,
तुम्हारी पसंद का खाना,
तुम्हारी इच्छा से घूमना,
तुम्हारी पसंद के कपडे-जेवर
तुम्हारी फरमाइश किये गए पकवानों को बनाना
ये सब और करवाचौथ का निर्जल व्रत तुम्हारे लिए,
इन्ही के साथ बच्चों का  टिफिन, होमवर्क,
और पी.टी.एम. की मीटिंग्स,
दूध-सब्जी और धोबी का हिसाब
और …और भी बहुत कुछ
अच्छा लगता है मुझे,
ऐसा तुम सोचते हो !
पर क्या सच में ?
तो सुनो!

नहीं पसंद मुझे, तुम्हारे नाम का सिन्दूर मांग में भरना
बाल कम हो रहे है बीच में,
वहां खुजली होती है।
पाँव के बिछुओं से पैर की अंगुलियाँ कट गई हैं,
साडी फंसती है बार-बार,
और दर्द रहता है बहुत ।
मंगलसूत्र के लगातार घिसने से
गले में एक काली धारी बन गई है

और
कांच की चूड़ियाँ तो न जाने कितनी बार
टूट कर चुभी  हैं
कई निशान हैं वहां छोटे-बड़े
सुनो सबको उतार फेकने का मन हो रहा है !
तुम्हारी पाबंदियों, तानों और फब्तियों को सुन कर
कस कर एक तमाचा मारने का मन होता है मेरा,
मन हो रहा है

आज तुम्हारी आँख में आँख डालकर
बेनकाब करूँ तुम्हारा वीभत्स चेहरा
और बताऊँ कि तुम्हारे ‘जबरन’ की पैदाइश हैं ये बच्चे!
और नहीं मिली तुम्हारे संग-साथ से कभी कोई तृप्ति
सिर्फ झेला है तुम्हे मैंने अपने शरीर और आत्मा पर!
हे वाहियात आदमी !
नहीं है तुम्हे कोई शऊर
उठने-बैठने और बात करने का

टांग पर टांग चढ़ाये
बेवजह की बकवास करते हुए
जब देते हो आदेश
बार-बार
चाय- पानी- अखबार देने का
तो मन करता है कि,
कान पकड़ कर दिखा दूँ बाहर का रास्ता,
सुनो
नहीं है पता मुझे
तुम्हारे मोजे, रुमाल, पर्स और घड़ी
और सुनो ..
नही हो तुम आदमी मेरी नज़र में !

2.  


शनि के मंदिर में जाने के लिए
लालायित स्त्रियों,
किसलिए जाना है तुम्हे वहां ?
बेजान पत्थरों पर सर पटककर
क्या होगा हासिल ?
होना तो ये चाहिए था
कि मंदिर प्रवेश पर रोके जाने पर
तुम एकजुट होकर,
ठोकर मार देतीं
सभी मठ-मंदिरों को
धार्मिक आडम्बर के घरों को,
उपेक्षा कर त्याग देना चाहिए था
तुम्हे ऐसे सभी पावन स्थलों को |
फिर …….
फिर क्या होता,
भागते भगवान तुम्हारे पीछे
और उनके साथ
उनका पूरा दल-बल  भी
भागते हुए आते तुम्हारे पीछे
क्यूंकि
तुम्हारे न जाने से, रुक जाता उनका व्यापार
ठप्प पड़ जाती
अंधविश्वासों की ख़रीदफ़रोख्त
और बंद हो जाती अंधश्रद्धा की दूकानें
तुम्हे घुटनों के बल चलकर
लेने आते वे |

क्यूंकि,
हे नादान स्त्रियों!
सभी धर्मों का पूरा व्यापार
तुम्हारे ही काँधे पर टिका है
दरअसल तुमने ही तो
मूर्खतापूर्ण व्रत-उपवासों,
द्वेषपूर्ण तीज-त्योहारों
और जड़ परम्पराओं का
बोझ उठाया हुआ है |
इस सबके लिए
उन्हें तुम्हारा कोमल, टिकाऊ
और सहनशील कन्धा चाहिए
पर अब समय आ गया है
कि क्लाइमेक्श तुम तय करो
नकार कर सब मठ और मठाधीशों को |

3.
महानगर की जीवन शैली को
दौड़ते हाँफते अपनाने की जद्दो जहद में
कई बार
वो पुराना आराम तलब शहर
मुझमें अंगडाई लेता है
जिसकी सुस्त सुबह
चाय की चुस्कियों के साथ उठती थी
आज इस महानगर में
नींद खट से टूटती है
अलार्म घड़ी की तेज़ आवाज़ के साथ
और चाय पीते नहीं गटकते हैं
फटाफट फटाफट
दौड़ते  हुए पकड़ते हैं ऑटो

किसी बुजुर्ग को पीछे छोड़ते हुए
अब नहीं कहते कभी
“पहले आप”
ठसाठस भरी मेट्रो में दूसरों को धकेलकर
जगह बनाते हुए
कह देते हैं सॉरी
जिसे महसूस नहीं करते बस कह देते हैं
इस शहर की जीवनशैली को
अपनाते हुए लगता है
मेरे शहर का कुछ
लगातार मुझमे टूट रहा है और
छूट रहा है

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