नागार्जुन के उपन्यासों में स्त्री

श्याम लाल गौड़


प्राध्यापक,श्री जगदेव सिंह संस्कृत महाविद्यालय,सप्त ऋषि आश्रम हरिद्वार.

उपन्यासकार नागार्जुन बहुमुखी प्रतिभा के व्यक्ति थे। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन साहित्य सर्जन में लगाया। उन्होंने कविता, उपन्यास, कहानी, संस्मरण, यात्रा वृत्त, निबंध साहित्य आदि साहित्यिक विधाओं को अपनी लेखनी का विषय बनाया। हिन्दी, मैथिली और संस्कृत तीनों ही भाषाओं में उन्होंने साहित्य रचना की। उनके जीवन काल में ही उनकी काफी पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी थी।


नागार्जुन की सर्वप्रथम प्रकाशित रचना 1929 ई0 की है। यह रचना एक मैथिली कविता ‘मिथिला’, (लहेरिया सराय दरभंगा) नामक पत्रिका में छपी थी। उनकी पहली हिन्दी कविता जो 1934 ई0 में लाहौर से निकलने वाली साप्ताहिक पत्रिका ‘विश्वबन्धु’ में छपी। इसके बाद बुकलेट ‘बूढ़वर’ और ‘विलाप’ 1942 ई0 में छपी वह भी मैथिली में महात्मा गांधी की हत्या पर हिन्दी कविताओं का एक बुकलेट ‘शपथ’ नाम से प्रकाशित हुआ और कुछ समय पश्चात् 1948 ई0 में उनका पहला उपन्यास ‘पारो’ ‘मैथिली’ में प्रकाशित हुआ तथा दो वर्षपश्चात् सन् 1948 में उनका पहला हिन्दी उपन्यास ‘रतिनाथ की चाची’ प्रकाशित हुआ। सन् 1949 ई0 में अट्ठाईस मैथिली कविताओं का संग्रह प्रकाशित हुआ जो ‘चित्रा’ नाम से है। ‘युगधारा’ जो सैंतीस हिन्दी कविताओं का पहला व्यवस्थित संग्रह है जो 1953 में छपकर प्रकाशित हुआ। इसके बाद उपन्यासेत्तर गद्य की पहली पुस्तक निराला पर आधारित ‘एक व्यक्ति एक युग’ सन् 1963 की कृति है। स्फुट गद्य तो नागार्जुन रचना काल के शुरुआती दौर से ही लिखते आ रहे थे।

सन् 1936 ई0 में ‘असमर्थदाता’ नामक कहानी छपी थी। उसी समय से कथेत्तर भी लिखते रहे और साथ ही बाल साहित्य लेखन का कार्य भी करते रहे। बच्चों के लिए पहली पुस्तक ‘वीर विक्रम’ सन् 1956 में प्रकाशित हुई इसके साथ-साथ 1944 से 1954 ई0 के बीच नागार्जुन ने अनुवाद का काम भी किया। बंगला उपन्यासकार ‘शरत चन्द्र’ के कई उपन्यासों का हिन्दी अनुवाद कर प्रकाशित किया। ‘कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी’ के उपन्यास ‘पृथ्वी वल्लभ’ का गुजराती से हिन्दी में सन् 1945 ई0 में अनुवाद किया था। ‘मेघदूत’ का मुक्त छन्द से अनुवाद 1953 ई0 का है। ‘अपने खेत में’ हिन्दी कविता 1947 के अन्त में प्रकाशित हुई।


नागार्जुन द्वारा रचित उपन्यास जिनकी कुल संख्या ग्यारह है। नौ उपन्यास हिन्दी में और दो मैथिली में हैं। जिनका प्रकाशन काल इस प्रकार हैः
उपन्यास रचना काल प्रकाशक
1. रतिनाथ की चाची 1948 किताब महल, इलाहाबाद
2. बलचनमा  1952 किताब महल, इलाहाबाद
3. नई पौध    1953 किताब महल, इलाहाबाद
4. बाबा बटेसरनाथ 1954 राजकमल प्रकाशन, दिल्ली।
5. वरुण के बेटे 1957 राजपाल एण्ड संस, दिल्ली।
6. दुःखमोचन 1957 राजकमल प्रकाशन, दिल्ली।
7. कुंभीपाक 1960 राजपाल एण्ड संस, दिल्ली।
8. हीरक जयंती 1962 आत्माराम एण्ड संस, दिल्ली।
9. उग्रतारा 1963 राजपाल एण्ड संस, दिल्ली।
10. जमनिया का बाबा 1968 राजपाल एण्ड संस, दिल्ली।
12 पारो 1968 किताब महल, इलाहबाद।
13. गरीबदास        1975 संभावना प्रकाशन, हापुड़।


इस प्रकार अध्ययन से प्राप्त ज्ञान के आधार पर नागार्जुन के उपन्यासों का यहाँ पर क्रमिक परिचय दिया हुआ है। इसके अलावा नागार्जुन के दो खण्ड काव्य भी प्रकाशित हैं। उपन्यासेत्तर गद्य और बाल साहित्य की रचना भी उन्होंने की। विद्यापति की कृति ‘पुरुष परीक्षा’ की कुछ कहानियों का भाव रूपान्तर विद्यापति की कहानियां नामक शीर्षक से प्रकाशित है।

नागार्जुन ऐसे पहले कथाकार थे, जिन्होंने ने साहित्यिक कृतियोंको सामाजिक सोद्देश्यता से जोड़ा है, और कथा साहित्य की सामाजिक परम्परा का सूत्रपात किया। उनमेंसामाजिक दायित्व की भावना सर्वोपरि थी। यह सही है कि हिन्दी मेंकथा साहित्य की जनवादी परम्परा की शुरुआत भारतेन्दु युग से हुई थी, परन्तु उसे वास्तविक रूप से नागार्जुन ने ही अपने कथा साहित्य द्वारा पुष्ट और संवर्धित किया था। जिसका विकास बाद मेंप्रगतिशील कथाकारा­यशपाल, भैरव प्रसाद गुप्त, राहुल सांकृत्यायन, रांगेय राघव, आदि मेंस्पष्ट दिखायी देता है।

वस्तुतः नागार्जुन ने प्रेमचन्द की ही यथार्थवादी-जनवादी कथा परम्परा को आत्मसात करके उसके विकास मेंमहत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। यह कहा जा सकता है कि नागार्जुन के साहित्य मेंविचारधारात्मक विसंगतियों और अन्तर्विरोध है। यह भी कहा जा सकता है कि उनके साहित्य मेंअनेक वैचारिक राजनैतिक भटकाव आये हैं। वे सभी 1962 के चीनी आक्रमण तथा प्रखर रूप मेंसन् 1968 के राजनीतिक सामाजिक बदलाव के बाद आये हैं। इसके विपरीत उनका कथा-साहित्य इन वैचारिक राजनीतिक भटकावोंसे अछूता है। कारण स्पष्ट है कि वे कविता क्षेत्र मेंराजनीतिक, सामाजिक आंदोलनोंके तात्कालिक प्रभावोंसे अपने आपको सर्वथा मुक्त नहींरख पाते हैं, और उनसे शीघ्र प्रभावित होकर कवि-कर्म मेंप्रवृत्त होते हैं। जबकि कविता मेंतात्कालिकता का अतिक्रमण अत्यन्त जरूरी है, इसके विपरीत कथा-साहित्य मेंतात्कालिकता का अतिक्रमण उनके यहाँ आसानी से देखा जा सकता है। उनके कथा साहित्य मेंवैचारिक भटकावनहींके बराबर है।

नागार्जुन के उपन्यासों का अध्ययन करने से स्पष्ट होता है कि वे अपने युग के प्रति अत्यधिक जागरूक रहे हैं। उन्होंने तत्कालीन युग की प्रत्येक समस्याओं सामाजिक,धार्मिकआर्थिक एवं राजनीतिक आदि की गहराई से अनुभूत कर अपनी रचनाओं में प्रस्तुत किया है। उन्होंने उच्च वर्ग के प्रति निम्न वर्ग के विद्रोह को जगाकर एक नयी अलख जगायी है। साथ ही अत्याचारउत्पीड़न और शोषण का यथार्थ स्वरूप भी प्रस्तुत किया है। उनकी स्त्री समाज से गहरी सहानुभूति रही है। वे नारी को हर क्षेत्र में आगे लाना चाहते हैं। उन्होंने सामाजिक कुरीतियों एवं धार्मिक अंधविश्वासों का खण्डन किया है। इस प्रकार उन्होंने निम्न वर्ग की दयनीय स्थिति एवं इसके कारणों को स्पष्ट करने का प्रयास किया है।



नागार्जुन रूस की समाजवादी आर्थिक विचारधारा से अत्यधिक प्रभावित रहे हैं। उनके पात्र कर्म को ही अपना धर्म मानने वाले हैं। वे मुंशी पे्रमचन्द के पात्रों की तरह परिस्थितियों के आगे घुटने नहीं टेकते अपितु इसके विपरीत परिस्थितियों से जूझने एवं संघर्ष के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। स्त्री समस्त मानवीय सौंदर्य एवं चेतना की सर्वोंत्तम अभिव्यक्ति है। साथ ही सृष्टि सृजन का मूल कारण भीसाहित्य की प्रत्येक विधा के सृजन में नारी-हृदय की पुलक एवं उसकी अनुरक्ति जीवन-प्रदायिनी शक्ति की मुख्य भूमिका रही है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने सृष्टि एवं सर्जन में नारी की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा है-
‘’पुरुष स्वभावतः निःसंग व तटस्थ रहा हैनारी ही उसमें आसक्ति की भावना उत्पन्न कर उसे निर्माण की ओर उन्मुख करती है। पुरुष अपनी पुरुष प्रकृति के कारण द्वन्द्व-रहित हो सकता हैलेकिन नारी अतिशय भावुकता के कारण हमेशा द्वंद्वोन्मुखी रहती है। इसीलिए पुरुष मुक्त है और नारी बद्ध है.’’

 ऐसा ही उदात्त दृष्टिकोण जयशंकरप्रसाद की ‘कामायनी’ में ‘नारी केवल तुम श्रद्धा हो’का स्वरूप हैंतो गुप्त जी उसे ‘आंचल में दूध और आंखों में पानी’ को त्याग की मूर्ति के समान स्वीकार करते हैं. जबकि महोदवी वर्मा का कथन है कि ‘नारी का मानसिक विकास पुरुष के मानसिक विकास से अधिक द्रुत गति से विकसित होता है। उसका स्वभाव कोमल और प्रेम,घृणा आदि भाव अधिक तीव्र और स्थाई होते हैं। इन दोनों प्रकृतियों में उतना ही अन्तर हैजितना विद्युत और झड़ी में एक से शक्ति उत्पन्न की जा सकती हैपरन्तु दूसरी से शान्ति मिलती है।
नागार्जुन का उपन्यास-लेखन भारत की आजादी के बाद आरम्भ हुआ है। प्रेमचन्द के बाद भारतीय ग्राम्य जीवन के भाष्यकार के रूप में नागार्जुन का नाम पहले आता है। उनके उपन्यासों का परिवेश मिथिलांचल से सम्बन्धित है। नागार्जुन के नारी-पात्र समाज द्वारा त्रस्त होने पर भी सदैव कर्तव्यरत रहते हैं। पुरुष द्वारा प्रताड़ित ये नारी पात्र अपने हृदय की उदात्तता के कारण भविष्य में स्वयं के उद्धार का मार्ग प्रशस्त कर लेती हैं। ये सभी अपने कर्तव्य निर्वाह करते हुए क्षण भर के लिए भी विचलित नहीं होतींऐसे पात्रों के अन्तर्गत गौरी (रतिनाथ की चाची) शशीकला की मामी (दुःखमोचन) मधुरी (वरुण के बेटे) निर्मला (कुम्भीपाक) और नर्मदेश्वर की भाभी (उग्रतारा) प्रमुख हैं।

‘रतिनाथ की चाची’नागार्जुन का प्रतिष्ठित उपन्यास है. गौरी रतिनाथ की चाची है। गौरी इस उपन्यास की नायिका है। रूप सुन्दरी गौरी दरिद्र और रोगी बैद्यनाथ झा से व्याही गई है। बेटे उमानाथ और बेटी प्रतिभामा को जन्म देकर गौरी विधवा हो गई। विदुर जयनाथ गौरी का देवर है। रतिनाथ जयनाथ का बेटा है। गौरी की इच्छा के विरुद्ध गौरी को देवर से गर्भ रह जाता है। उसकी सहासी माँ गर्भपात से गौरी को मुक्त कराती है। उमानाथ को माँ के पापी कृत्य का पता चलता है। और वह माँ का तिरस्कार करने लगता है। चाची के लिए रतिनाथ ही जीने का सहारा बना। व्रतीसयंमीआत्मनिर्भर चाची ने अपना जीवन तापसी की तरह बिताया। बेटे उमानाथ से तो इतना तिरस्कार पाया कि वह माँ के अंतिम संस्कार के लिए भी नहीं आता।


‘रतिनाथ की चाची’की गौरी का चरित्र भावुकतापूर्ण होते हुए भी संजीदगी से भरा हुआ है। उपन्यास के अंत तक आते-आते चाची के सारे दोषों एवं कलंक का परिमार्जन हो जाता हैअंततः वह दयाकरुणा और पे्रम की मूर्ति ही परिलक्षित होती हैजयनाथरतिनाथ और उमानाथ के प्रति उसका व्यवहार उसकी इन चारित्रिक विशेषताओं का परिचायक है। गौरी के चरित्र में मातृत्व सहिष्णुता का चित्रण अत्यन्त स्वाभाविक रूप में हुआ है। उसकी आखों में छलकते वात्सल्य के तरल रूप को देखकर रतिनाथ का चेहरा खिल उठता है। रतिनाथ द्वारा चाची के प्रति कहे गये ये शब्द- ‘ऐसा लगता है कि दिन व दिन तुम देवता होती चली जा रही हो’ चाची के चरित्र में निहित उदात्तता की ही अभिव्यक्ति है।

‘दुःखमोचन’की शशिकला की मामी की सेवा भावना और त्याग प्रत्येक भारतीय नारी के लिए अनुकरणीय है। वह परिवार के सदस्यों की छोटी सी छोटी आवश्यकताओं का ध्यान रखती है। एवं दुःखमोचन को एक आदर्श माँ का प्यार देती है। गाँव की कन्या-पाठशाला के लिए उसके द्वारा दो हजार रुपये दान देना उसके चरित्र की गरिमा प्रदान करता हैतथा यह उसके चरित्र की उदारता का ही परिचायक है। वरुण के बेटे की माधुरी एक समाज-सेवी नारी के रूप में हमारे समक्ष उपस्थित होती है। जब ग्रामांचल में बाढ़ आती हैतो उस समय उस बाढ़ के कारण वहां का जन-जीवन त्रस्त हो जाता है। इस बाढ़ के कारण जो व्यथित लोग थेउनके लिए वहां शिविर लगाया गया। जिसमें वह मोहन माझी की सहायता कर शिविर का संचालन करती हैइस सम्पूर्ण परिवेश में माधुरी सेवात्याग और परोपकार की साकार प्रतिमा ही दृष्टिगत होती है|

‘नई पौध’की वाचस्पति की माँ की उदात्त भावनाओं को भी नहीं भुलाया जा सकता क्योंकि उसके हृदय में न केवल अपने पुत्र के लिए वरन् उसके सभी मित्रों के लिए अजस्र वात्सल्य का स्रोत बहता रहता है। इसलिए उसका उल्लेख भी यहाँ पर अत्यन्त आवश्यक हो जाता है।

‘उग्रतारा’की नर्मदेश्वर की भाभी तेज ओज की प्रतिमा है। इस नारी के अन्तरंग हृदय में सामाजिक व्यभिचार की शिकार हुई उगनी के प्रति उनका कितना सद्भाव है। यह उसके इस कथन से स्पष्ट हो जाता है- ‘लुच्चे-लफंगे अपना ही मुंह काला करते हैं। हमारा-तुम्हारा मुंह तो शीशे से भी ज्यादा साफ रहेगा। नागार्जुन के ये नारी पात्र उदात्त एवं एक उच्च भावनाओं से ओत-प्रोत हैं। और नागार्जुन की इन नारी पात्रों के प्रति असीम करुणा दिखाई देती है।

 संदर्भ सूची

 1.नागार्जुन: रतिनाथ की चाची, पृष्ठ 150
 2.नागार्जुन: रतिनाथ की चाची, पृष्ठ 96
 3.नागार्जुन: उग्रतारा, पृष्ठ42

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