स्त्री के लिए एकांत, आज अभी भी ‘लक्जरी’ माना जाता है

विपिन चौधरी


विपिन चौधरी युवा कविता की महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं.विश्व की दूसरी भाषाओं से अपनी रुचि के साहित्य का अनुवाद भी करती रही हैं.संपर्क: vipin.choudhary7@gmail.com

हमारे प्राचीन शास्त्रों ने इंसान के अकेलेपन से जन्म और मृत्यु को जोड़ते हुए कहा गया है कि इंसान का अकेलापन, जीवन का शाश्वत  सत्य है. तमाम तरह के रिश्ते-नाते और बंधनों के बावजूद इंसान अकेला हैं. दूसरी ओर  ‘एकांत’ इंसान द्वारा अर्जित एक ऐसी वृहत  मानसिक अवस्था भी है, जहाँ एकांत सिर्फ उसे पाने वाले की दिशा- निर्देश के अनुसार ही काम करता है. पितृसत्तात्मक समाज में पुरुष अपने लिए ‘एकांत’ रचता आया है, लेकिन स्त्री के लिए  ‘एकांत’ तक पहुँचने का रास्ता आज भी बीहड़ बना हुआ है. स्त्री के जीवन के ढेरों पेचों-ख़म ही, एकांत तक उसकी पहुँच को दूर कर कर  देते हैं.यही कारण है कि समाज के परंपरागत ढांचे में रची-बसी एक भारतीय स्त्री के लिए आज के आधुनिक  दौर में भी  ‘ एकांत’ बहुत दूर की चीज़ है. इसका एक कारण यह भी है कि स्त्री और समाज के एक बड़े वर्ग  का एकांत की परिभाषा से सहज परिचय नहीं हो पाया है.  अक्सर एकांत को अकेलेपन का ही दूसरा रूप मान लिया जाता है जिसका सीधा अर्थ ही  चुप्पी,अवसाद और समाजिक दूरी है. इसी तरह जब एक स्त्री के  सम्पूर्ण  व्यक्तित्व को लेकर बात की जाती है तो  ‘एकांत तक पहुँचने से पहले  ‘अकेलापन’ आ धमकता है। एक चेतना-संपन्न स्त्री के संदर्भ में जिस ‘एकांत’ की बात कही जाती है, उस एकांत के लिए अभी तक स्त्री के एक बड़े वर्ग ने मानसिक रूप से तैयारी नहीं की है.  इसके पीछे स्त्री का सामाजिक सेट-अप और घर-परिवार से उसके घनिष्ट सरोकार हैं.

सदियों से हमारा स्त्री-वर्ग,  इसी परिवार के वायुमंडल में रच-बस कर खुद को धन्य मानता आया है. कुदरत ने स्त्री को उसके परिवेश  ने उसे इसी मानसिक समझ के साथ ही रचा है जिस पर समाज ने ठप्पा लगा कर उसे मज़बूत कर दिया.  सच है कि पीढ़ी दर पीढ़ी परिवार के लिए खुद को भुला देना ही स्त्री को सदियों से भाता आया है.  तभी उसने अपने लिए कभी भी एकांत नहीं चुना या इस दिशा में कभी सोचा ही नहीं। दरअसल विवाह के बाद बच्चे होने की प्रक्रिया में फिर स्त्री बच्चे की परवरिश में लग जाती है और अपनी सभी रुचियों को भूल जाती है. भारत में  सामूहिकता को प्राथमिकता दी जाती रही है.  आज एकल परिवार का ज़माना है. एकल परिवार की नौकरीपेशा स्त्री के कंधों पर दोहरा भार है । यदि उसे ‘एकांत’ का संज्ञान हो भी तो परिवार से छिटक कर, अपने लिए किसी भी तरह के ‘एकांत’ में प्रवेश करना, उसे अपराध-बोध के गिरफ्त में ले जाने के लिए  काफी है. आज की स्त्री, चाहे आर्थिक रूप से  आत्मनिर्भर हो गयी हो और समाज को उसकी अलग पहचान के लिए बाध्य भी होना पड़ा हो  लेकिन अपने लिए उस ‘एकांत’ की  बात करना, जिसमें वह अपमें मन-मुताबिक सर्जन कर सके, अपने मन का अलहदा संसार रच सके, वैसा एकांत आज भी उसे दुर्लभ जान पड़ता है.

आखिर क्या है ‘स्त्री का एकांत’

एकांत की अवधारणा को कई तरह से समझा जा सकता है. ‘एकांत’ का सेवन एक सजग  इंसान के भीतर ईंधन का काम करता है.   जैसे एक अकेला पेड़ अपने जड़ों को दूर-दूर तक फैला कर अपने अस्तित्व को विस्तृत करता है, बस वैसे ही  ‘एकांत’ स्त्री के  समूचे व्यक्तित्व में फ़ैल कर पुख्ता  बनाता है. एकांत ऐसा टॉनिक है जिसके जरिये कोई भी स्त्री अपने मानस की सेहत को और अधिक दुरुस्त कर सकती है. सर्जनात्मक स्तर पर काम करने के लिए जरुरी  ‘एकांत’ को हांसिल करने के लिए अपने समय की कई प्रसिद्ध स्त्री रचनाकारों को घरेलू और सामाजिक स्तर पर काफी जद्दोजहद करनी  पड़ी।  इन लेखिकाओं को घर-बाहर के ढेरों काम-काज निपटा कर देर रात को  ही लिखने के लिए उन्हें मनवांछित’ एकांत’ मिलता था. एकांत स्त्री की अपनी व्यक्तिगत नागरिकता का नाम है। इस एकांत में स्त्री के मन की स्वतंत्रता सम्माहित है. संसार भर के कलात्मक व्यक्तित्व  वाले लोगों को स्वतन्त्रता बेहद प्रिय होती है वे बेरोकटोक जीवन का रसास्वादन करना चाहते हैं। किसी भी बंधन में बंधते ही वे बंदी पक्षी की  तरह फड़फड़ाने लगते हैं.  स्वतंत्रता ही उनकी जीवनी शक्ति होती है और एकांत ही उनको स्वतंत्रता मुहैया करवाता है.

स्त्री- सशक्तिकरण के लिए जरुरी है ” एकांत “


एकांत की चाह रखना ही स्त्री अधिकारों की सबसे पहली कड़ी है. 1960-70 पश्चिम में चल रहे नारीवादी आंदोलनों द्वारा स्त्री के लिये  एकांत की चाह ने ही संसार भर की स्त्रियों को इस दिशा में सोचने की आँख दी. तब स्त्रियों ने यह जाना कि  एकांत का आशय स्त्री की उस सकारात्मक आज़ादी से है जहाँ वह अपना मनचाहा रच सके. तब तक जागरूक स्त्रियां जान ही गयी थी कि किसी भी  स्त्री के लिए एकांत को पाना  महत्वपूर्ण के साथ-साथ कठिन भी है. आज तक किसी भी स्त्री को रेडीमेड एकांत नहीं मिला,  जिस तरह अपने नाखूनों से खुरच कर जानवर अपने लिए एक सुरक्षित जगह बनाता है उसी तरह स्त्री को अपने हाथों से अपना एकांत बनाना पड़ता है. एक सजग स्त्री के सशक्तिकरण में ‘एकांत’ सबसे सशक्त  टूल के रूप में  काम करता है. उसके जरिये स्त्री अपने विचारों की धार को तेज़ कर सकती है और अपने  बौद्धिक संसार को और अधिक विस्तृत कर सकती है. इसके लिए उसे सबसे पहले अपने घर और  समाज से लड़ना पड़ता है.आज भी देखने को मिलता है कि यदि कोई स्त्री स्वेच्छा से अपने लिए एकांत का वरण करती है तो भी समाज  उसे ‘बेचारी ‘ की संज्ञा देता है. क्योंकि समाज, स्त्री को उसके  इस एकांत के साथ देखने में अभ्यस्त नहीं है. एकांत में जाने वाली  स्त्री अपने जीवन के सभी जोखिम खुद उठाती हैं  और साथ ही वह अपने सुख दुःख की खुद ही जिम्मेवार होती है.

DINA TSYPINA

एकांत के भीतरी सुख


एकांत में इंसान की अंदरूनी आवाज़ सबसे मुखर होती है. वह बिना किसी शोर- शराबे के आप लगभग ‘ध्यान’ की अवस्था  में  चला जाता हैं. हर स्त्री को अपने एकांत की अलहदगी को ‘अकेलापन’ बनाने से बचना चाहिए।    एकांत में बार- बार सोचने से चीज़ें साफ होती जाती हैं और जिन चीज़ों को आप दूर की अलभ्य चीज़ समझते हैं वह आपके करीब आती दिखती हैं. अपने जीवन की  समस्याओ पर बार बार सोचना और उसपर अपनी राय बनाना एकांत के बाई- प्रोडक्टस हैं. एकांत को ध्यान की संज्ञा इसलिए भी दी जाती है क्योंकि धुंधली आकृतियां इसी एकांत के आलोक में स्पष्ट  हो जाती हैं. रचनात्मक काम के लिए  एकांत  बहुत जरुरी है, ऐसा एकांत, जिसका समूचा आकाश खाली हो और सिर्फ स्त्री विशेष का मन ही वहां पंछी की तरह मुक्त होकर विचरण कर सके.

 जिन्होंने गढ़ा अपना ‘एकांत’

मीराबाई का जन्म, सोलहवी सदी में जोधपुर के चोंकड़ी नामक गाँव में हुआ था. वे एक स्वाभिमानी, आत्मनिर्भर और सजग  स्त्री थी. विवाह के पश्चात पति के निधन होने के बाद  घर वालो के व्यावहार से परेशान होकर वह द्वारका और वृन्दावन चली गयी. उस समय उन्होंने अपने एकांत को खोजा जो  उन्हें कृष्ण भक्ति में मिला और उसी दौरान उन्होंने तुलसीदास को ख़त लिखा. इसी तरह छायावादी कवयित्री महादेवी वर्मा, जिन्हें आधुनिक मीरा भी कहा जाता है, ने अपने लिये एक सुद्रढ़ एकांत रचा और उसके भीतर भरपूर सृजनात्मक जीवन जिया. देश-दुनिया में हर दौर में कुछ स्त्रियाँ ऐसी रहीजो अपने एकांत को गढ़ने में पूरी तरह से सफल रही। चाहे संसार भर की आधी-आबादी के हिसाब से उनकी संख्या नगण्य रही हो मगर उन्होंने अपने एकांत को पुष्ट करते हुये,अपने समय की दूसरी स्त्रियों के ह्रदयों को भी झंकृत किया और इतिहास में दर्ज हो गयी.    1815 को न्यूयॉर्क में जन्मी एक अमेरिकी नारी-मताधिकारवादी, सामाजिक कार्यकर्ता एलिजाबेथ कैडी स्टैंटन, ने 76 वर्ष की उम्र में  राष्ट्रीय अमेरिकी महिला मताधिकार एसोसिएशन के अध्यक्ष के पद से  इस्तीफा देते हुए ‘ द solitudeसोलिट्युड ऑफ़ सेल्फ’ शीर्षक से  एक बहुत महत्वपूर्ण व्याख्यान दिया। जिसमें स्त्री की व्यक्तिगत खुशी, मानसिक विकास और स्व-संप्रभुता के बारे में महत्वपूर्ण  बातें दर्ज थी। इसी तरह से स्त्री-अधिकार कार्यकर्ता सुसन बी. अंथोनी ने स्त्री के पक्ष में कहा कि ‘स्वतंत्रता में ही असली खुशी है’

और असली स्वतंत्रता का अर्थ ‘स्त्री का एकांत’ से है. स्त्री के लिए बंधन के सभी रूप,परंपरा, निर्भरता, अंधविश्वास से पूरी तरह से मुक्ति पाकर‘एकांत’ ही उसके स्वयं के व्यक्तिगत जीवन की जिम्मेदारी उठाता है।

1929, को  वर्जीनिया वूल्फ ने अपने निबंध ‘ए रूम ऑफ़ वन’स ओन’ में स्त्री के इसी एकांत की अवधारणा को विस्तृत किया है.  अंग्रेजी उपन्यासकार और कवि  ऐमिली ब्रोंटे, जो अपने एकमात्र  क्लासिक उपन्यास,’ वुदरिंग हाइट्स’ के लिए जानी जाती हैं. ऐमिली  ब्रोंटे की शांत और एकांतिक जीवन शैली इसी ‘एकांत’ का परिचायक थी. ऐमिली की दिनचर्या बहुत ही शांत और नियमित थी। वह हर-रोज़ सुबह- सवेरे उठती, घर में बिछें कालीनों को झाड़ती, प्रतिदिन सिलाई-बुनाई करती, फिर ऊपर जाकर अपनी मौसी के  बताये पाठ को पढ़ती। फिर अपने भाई-बहनों के साथ घर के सामने वाले बंजर मैदान पर खिले जंगली फूलों के बीच सैर करने  निकल जाती।   चौदह साल की उम्र में घर के काम-काज में दक्ष और घर पर रह कर  अपनी पढ़ाई  करने वाली ऐमिली नन्हें पक्षियों को अपने हाथों में लेकर कहानियां सुनाती। बहुत बचपन में ही ऐमिली ने अपना एकांत रच  लिया था जिसे उसने ताउम्र संजोये रखा. ऐमिली ने अपनी पसंदीदा जर्मन भाषा सीखी, फ्रेंच भाषा के साहित्य और व्याकरण  का भी बराबर अध्ययन किया. संगीत की पढाई और रियाज किया.  इसी तरह ऐमिली की बड़ी बहन और ‘जेन आयर’ उपन्यास की लेखिका चार्लोट ब्रोंटे का कहना था,
” सबसे अधिक मैं खुद की परवाह करती हूँ । मैं एकान्त और मित्रहीन होने की वजह से खुश हूँ और इस अवस्था में, मैं अपने आप का अधिक सम्मान करती हूँ । “अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध लेखिका व नाटककार, ईव एंस्लर कहती हैं, स्त्रियों को अपने एकांत का आनंद उठाना चाहिए। जिन जगह पर आप कभी नहीं गए हो वहां घूमना चाहिए और अकेले ही तारों की छांव में  सो जाना चाहिए और लंबे समय तक  एकांत में रहने के आशातीत लाभ हैं।

सुसन संटोंग, जोसेपहिन बौर्गिस जैसी बौद्धिक दुनिया की प्रसिद्ध स्त्रियों ने अपने एकांत की रक्षा करते हुए खूब काम किया और  अपने विचारों से लोगों को प्रभावित किया. इस तरह 1889 को यूक्रेन में जन्मी रूस की आधुनिक कवयित्री, अन्ना अख्मातोवा ‘सोलिट्युड’ शीर्षक की अपनी कविता में कहती हैं,
मुझपर ढेरों पत्थर फेंके गए,
कि अब उनसे नहीं लगता है डर
पत्थरों का गड्ढे से
बन गयी है लंबी ठोस मीनार,
सबसे लंबी मीनारों से भी अधिक लंबी
मैं भवन-निर्माताओं  का शुक्रिया अदा करती हूँ कि ,
उनके पास से चिंता और उदासी गुजर जाती होगी
यहाँ से मैं पहले- पहले सूर्य के आने  को  देखूंगी ,
सूर्य की आखिरी किरण यहाँ आनंद में भर उठती है
और मेरे कमरे की खिड़कियों में
अक्सर प्रवेश करती हैं  उत्तरी हवाएं
और कबूतर मेरे हाथ से गेहूं के दाने खाता है
मेरे अधूरा पन्ने से संबंधित
प्रेरक शक्ति के दैवीय शांत और नाजुक
गहरे पीले हाथ,
यह खत्म हो जाएगा।

हर स्त्री को एकांत के लिए समय निकालना चाहिये। दुनिया की लगातार शोर-शराबा से दूर, अपनी शक्ति के साथ जुड़ने के लिए, और अपनी स्वतंत्रता और साहस का परीक्षण करने के लिए एकांत आज की स्त्री के लिये बेहद जरुरी है वहीँ हर हाल में  समाज  को एकांत का सम्मान करना चाहिये क्योंकि इसी एकांत के भीतर आपको एक सजग स्त्री  विचरण करती हुए मिलेगी.

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