एक थी रमता और अन्य कविताएँ



मुकेश कुमार ‘मुकुल’


एक थी रमता

उसे एहसास नही था
लड़की होने का
पुरुष-वर्चस्व वाले समाज में
पुरुषों की ग़ुलामी करने का
पुरुषों के जूतों तले रहने का
सदियों से पैरों में बेड़ियाँ बँधे होने का

राम से आम तक को अग्निपरीक्षा देने का
तुलसीदास की ताड़ना झेलने का
पिता-पति-पुत्र की ग़ुलामी झेलने का,
एक थी रमता…
चल दी डंके की चोट पर उस समाज को चुनौती देने
जिसने सदियों से उसे दासता  मुक्त नही होने दिया
यत्र नारी पूज्यन्ते  तत्र देवता रमन्ते
से अबला हाय तेरी यही कहानी
तक मूर्ख बनाकर
असहाय बना कर
अबला होने का अहसास दिलाने वाले पुरुषों को चुनौती देने

एक थी रमता..
देखा उसने ख्वाब
न्याय का डंडा लेकर
पुलिस की वर्दी में
ठीक करेगी पुरुष-वर्चस्व को
महिलाओं का मान-सम्मान बढ़ाकर
करेगी प्रहार सोच पर
बदलेगी सामाजिक धारा

लेकिन
लेकिन यह हो न सका
कुचल दिये गये उसके अरमान
मारे जाने के पहले कुचला गया उसका अस्तित्व
यह सन्देश था कि कोई रमता न बने

चलो देते हैं चुनौती इस वर्चस्व के खेल को
हर घर से पैदा करते हैं एक रमता

2.
अब रुक भी जा.
क्यों बोझ उठा रही हो
इस ग़ुलाम संस्कृति का
श्रृंगार के नाम पर पैरों में पायल पहना दिया
कि पायल की खनकती आवाज झंकृत करती  है पुरुष- मन मस्तिष्क को
लेकिन सदियों से मूर्ख बनाये गए तुम
पायल नही हैं ये
ये तो बेड़ियाँ हैं

सभ्यता पागल और अपराधी  के नाम पर
डालती है बेड़ियाँ
यही सन्देश है पुरुष-वर्चस्व का
क्या तुम अपराधी हो
या उनकी परिभाषा की पागल

ख़ूबसूरती के नाम पर नाक में नथिया डाल दिया गया
कि नाक में चमकता नथिया पुरूषों को आसक्त करता है
शृंगार नही है

यह तो नाथ है
जो कथित मरखंड जानवरों को नाथा जाता है
ताकि जब वे भड़कें, विद्रोह करें पालतूपन से
तो नाथ पकड़कर
परास्त किया जा सके

इसलिए रुक, रुक जा साथी
उतार फेक जुआ
इस गुलाम संस्कृति का

परिचय :-मुकेश कुमार ‘मुकुल’ प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी हैं।

(अरवल जिला के पिढ़ो निवासी रमता की सेना/पुलिस में भर्ती होने की तैयारी करने/दौड़ने के दौरान कुछ दरिदों द्वारा अस्मिता तार-तार कर उसकी हत्या कर दी गयी)

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