हिन्दी कविता में मुक्तिबोध के पूर्वज थे जयशंकर प्रसाद – प्रो.मैनेजर पाण्डेय

हिन्दी भाषा-साहित्य और समाज-विज्ञानों में शोध की दुनिया आज विमर्शों के दबाब में हैं. जिसके कारण आकर -ग्रंथों के निर्माण और उन ग्रंथों पर शोध की प्रवृति में भी कमी आई है. ऐसे दौर में डॉ.कमलेश वर्मा तथा डॉ. सुचिता वर्मा द्वारा लिखित एवं सम्पादित तथा “द मर्जिनालाइजड पब्लिकेशन,वर्धा”द्वारा प्रकाशित “प्रसाद काव्य-कोश”का आगमन अत्यंत सुखद अहसास है.

बायें से दायें : ओमप्रकाश सिंह, सुधा सिंह, मैनेजर पाण्डेय, अर्चना वर्मा, विश्वनाथ त्रिपाठी, कमलेश वर्मा

जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के SSS-1 सभागार में इस काव्य-कोश के विमोचन एवं परिचर्चा कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ आलोचक प्रो. मैनजेर पाण्डेय ने कहा कि प्रसाद मूलतः सभ्यता-समीक्षा के कवि हैं जिसका सर्वोत्कृष्ट उदाहरण उनकी अमर महाकाव्यात्मक कृति “कामायनी”है.  प्रसाद के काव्य और उनके नाटकों में आये गीतों का गंभीर अध्ययन करने पर हम पायेंगे की उनकी कविता गहरी विचारशीलता,गंभीर सामाजिक-सांस्कृतिक एवं दार्शनिक चिंतन तथा गहन वैचारिक द्वंद्व की कविता है जिनकी विरासत का सच्चा प्रतिनिधित्व आगे की कविता में मुक्तिबोध करते हैं . इस दृष्टि से जयशंकर प्रसाद हिन्दी कविता में मुक्तिबोध के पूर्वज थे. जिस गहन सामाजिक-सांस्कृतिक तथा वैचारिक द्वन्द का आरम्भ प्रसाद की कामायनी में होता है उसकी तीव्रता और गहन तनाव आगे मुक्तिबोध की लम्बी कविता”अँधेरे में” दीखता है.  यही कारण है कि प्रसाद की प्रसाद की काव्य-भाषा अपने अर्थ तक ठीक-ठीक पहुँचने के लिए अलग काव्य-कोश की मांग करती है.  डॉ.कमलेश वर्मा ने यह कोश तैयार कर इस अभाव की पूर्ति की है जिसके लिए वे बधाई के पात्र हैं.

सावित्रीबाई फुले रचना समग्र 

प्रो.ओमप्रकाश सिंह ने काव्य-कोशों के आवश्यकता बताते हुए कहा कि हिन्दी की अनेक क्लासिक कृतियों के कॉपीराईट मुक्त होने के बाद दृष्टिहीन प्रकाशन उपक्रमों की भीड़ द्वारा उन कृतियों के गलत मुद्रण ने भी कविता में अर्थ का संकट पैदा किया है.  ऐसी स्थिति में काव्य-कोश हमें कविता के मूल अर्थ तक ले जाने में मदद करते हैं.  उन्होंने स्वयं द्वारा “प्रसाद ग्रंथावली”तथा”भारतेन्दु-समग्र” के संपादन के अनुभवों का हवाला देते हुए कहा कि यदि हम कामायनी के मूल संस्करण और आज बाज़ार में उपलब्ध कामायनी के संस्करणों की तुलना
करेंगे तो हमे पाठालोचन की आवश्यकता महसूस होगी .

चन्द्रिका प्रसाद जिज्ञासु ग्रंथावली 

अपना वक्तव्य देते हुए सुधा सिंह बायें से दायें : ओमप्रकाश सिंह, मैनेजर पाण्डेय,  कमलेश वर्मा, धर्मवीर और रेणु

कार्यक्रम में डॉ. सुधा सिंह तथा डॉ.अर्चना वर्मा ने स्त्रीवादी दृष्टि से प्रसाद की कविता पर विचार का आग्रह किया.  डॉ.सुधा सिंह ने कहा कि स्त्रीवादी नजरिये से बात करते हुए अक्सर प्रसाद की “ध्रुवस्वामिनी”पर ही बात होती है लेकिन “प्रलय की छाया”मुझे इस दृष्टि से अपील करती है. डॉ. अर्चना वर्मा ने कोशकार की इस स्थापना से अपनी असहमति व्यक्त कि “प्रसाद प्राय:अबूझ शब्दों का प्रयोग नहीं करते .”

बहुजन परम्परा की किताबें 

द मार्जिनलाइज्ड प्रकाशन की किताबें

वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने छायावादी-कवियों के भाषा निर्माण पर बात करते हुए कहा कि प्रसाद की कविता गहरे दार्शनिक और सांस्कृतिक बिम्बों से निर्मित कविता है जिसकी ठीक- ठीक पड़ताल के लिए इस कोश की नि:संदेह गहरी उपयोगिता है और डॉ कमलेश वर्मा इस श्रमसाध्य कार्य के लिए बधाई के पात्र है.  कार्यक्रम का संचालन धर्मवीर ने किया.

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