जहां ईश्वर है और अन्य कविताएं (वीरू सोनकर)

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वीरू सोनकर

कविता एवं कहानी लेखन, विभिन्न पत्र पत्रिकाओं व ब्लाग्स पर रचनाएं प्रकाशित . संपर्क :[email protected], 7275302077

जहाँ ईश्वर है 

प्रार्थना के पीछे पहले आत्मा गयी
फिर देह

दोनों ने इच्छाओं के आकाश तक अपने हाथ बढ़ाये
और संयुक्त रूप से एक नाम वहाँ टांक दिया.

देह की दृष्टि बार-बार आकाश को देखती.
वहाँ अपना नाम देखती और आश्वस्ति से भर उठती

आत्मा कहीं न जाती
रोज एक अंध-कूप खोदती
भर देती उसे तमाम व्याकुल प्रश्नों से.

देह और आत्मा दोनों को चाहिए था एक ईश्वर
जो एक निशान लगाता, आकाश पर लगातार जल रही एक प्रार्थना पर
प्रतीक्षा-सूची से घटा देता एक नाम
प्रश्नों के भरे एक पतीले को वही पलटा सकता था!

एक वही था
जो एक मौसम की तरह पृथ्वी पर गिरता.
एक वही था, जिसे हर प्रार्थना मोक्ष की तरह तलाशती.

बहुत बार वह मिलता था देह और आत्मा के एक अनुपातिक संतुलन में

देह और उसकी प्रार्थना,
ईश्वर के हो सकने पर दोनों ही शंकालु थे.

आत्मा अंधकूप में रोती कि देह ने अपवित्र किया है प्रार्थना को
वह सोचती थी और प्रश्नों से कूप भरती थी.

आत्मा ईश्वर की परछाई को एकदम साफ देखती थी
अपना पांव बढ़ाती थी उस तक

देह पीछे छूटती थी.
शंकाओं का भार सिर्फ देह उठाती थी.

नींद


1.
एक आदमी

हर दिन कपड़े की तरह पहनता है नई सुबह को
और रात को याद करता है कि वह आदमी होने से पहले एक बादल था.

एक थका हुआ बादल फिर बदलता है ओस में
जिसे रात ओढ़ कर सो जाती है.

2. 
एक स्त्री

नींद की प्रतीक्षा में गोल-गोल घुमाती है पृथ्वी.

घूमने से थकी पृथ्वी के पास नही है कोई शिकायत
उसके पास मौसम है.

स्त्री सोचती है वह मांग लेगी एक दिन पृथ्वी से उसके मौसम.

स्त्री कई सदी से थकान में चूर है पर उसके पास भी नही है शिकायतें

पृथ्वी और स्त्री अनंत चाहनाओं की देह है.

पृथ्वी और स्त्री एक दिन सो जाएंगी एक साथ.

एक मौसमी नदी का हाथ पकड़ कर जाएंगी वह
एक बहु-प्रतीक्षित नींद की ओर

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एक बच्चा

हवा की आवाज सुनता है
और चला जाता है नींद की ओर

नींद बड़े होने के सपनो से भरी एक आकाशगंगा है.

वह उस आकाशगंगा को लोरी गाते सुनता है
कुनमुना कर कहता है अभी और सोऊँगा.

आकाशगंगा
उसकी इस नींद से इतना खुश है
कि अगली सुबह वह चुपके से काट देगी
बड़े होने की प्रतीक्षा का एक और दिन.

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हवा के हाथों में है
उस एक आदमी, स्त्री और बच्चे की शिकायतें.

वह स्वांस बन कर रोज गिनती है प्रतिक्षाओ से भरे एक दिन को
और चाहनाओं से भरी एक नींद रोपती है उनके माथे पर

रात, पृथ्वी पर रोज फैलने वाला एक मौसम है.

नींद एक सुरंग है जो रात को खुलती है
और इन तीनो को एक साथ आवाज देती है.

ओ धरती के सबसे जिंदा मौसमों, ओ अथक दौड़ती घड़ियों, ओ प्रतीक्षित प्रेमिल नदियों

आओ, इस मखमल पर एक साथ गिरो.
आओ, अपने इस बहुत भारी दिन को मेरे हाथो में दे दो.

एक बादल बनो और सो जाओ!

स्त्री

वह संसार देख रहे थे
वह यात्री हुए.

उन्होंने दुख देखा तो कई बार बुद्ध बने.

आकाश देख साधु हुए.
पहाड़ देख कर वह पुरुष हुए.

वह कौतूहल से भरे थे वह बच्चे हुए.
अब एक पूरी पृथ्वी उनके मुँह में समा सकती थी

जब उनकी जिज्ञासा का भूत उतरा
तो उन्होंने इन सभी को फिर से देखा.

उन्होंने फिर से देखा, क्योंकि वह उनके प्रेम में पड़ गए थे.

वह अब चुप हुए
वह इस बार स्त्री हुए!

टिके रहने का सौंदर्य-शास्त्र 

वह बदसूरत होंगे.
रुकी हुई एक बासी झील के बगल से
एक नदी की लज्जा ओढ़ कर निकल जाएंगे!

वह धीमे चलेंगे
पर मुक्त होंगे ठहरे होने के अपराध-बोध से.

समझौते की पाप संधि से बाहर
एक अराजक दृश्य रचेंगे.

पुरानी होती देह पर घाव खाएंगे
और अपने वक्त की सबसे निष्पाप स्वांस लेंगे

वह एक लुप्तप्राय प्रजाति हैं उनकी भाषा मे समा जाती है एक पूरी पृथ्वी.

‘रुकने’ और ‘टिकने’ को बार-बार परिभाषित करते हुए
वह लगातार नए की ओर चलेंगे.

वह बदसूरत होंगे
पर दृश्य में सबसे सुंदर होंगे!

उसने जाना था 

जामुन से अपने हिस्से की रात उधार लेकर
उसने आंखों में दो बूंद इच्छा रोपी थी
एक स्वप्न उगा था फिर

देह में, दुख की एक रिस रही कोख भी है
उसने जाना था

आवाज में कोई अनंत प्रतीक्षा छुपी थी
पुकार से जाना उसने

उसने जाना, आकाश के भीतर बैठी है समस्त प्रार्थनाएं

वह समुद्र के मौन-शोर में पनाह मांग रही थी
कि उसके चेहरे पर टपक पड़ी
एक नवजात नदी!

उसने जाना कि एक नदी का साथ होना भर ही काफी है

उसने जाना कि कितना सुंदर है
नमक घुली मुस्कुराहट के साथ आईने के भीतर जाना

वह नही गयी फिर कहीं!

उसने शाम होते ही एक चुटकी सिंदूर हवा में उड़ा दिया
और उसकी सभी स्मृतियों के चेहरे चमक उठे

यह पहली बार था
कि एक उदास नदी से समुद्र ने उसकी गहराई मांग ली!

तस्वीरें गूगल से साभार 

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