द ब्यूटी ऑफ़ नाईट इज नॉट फॉर अस (प्रियंका कुमारी नारायण की कहानी

प्रियंका कुमारी (नारायण)

शोधार्थी, काशी हिन्दू विद्यापीठ, बनारस संपर्क: [email protected]

अरे यार !बंटा पीने का दिल कर रहा है ...चल न पीकर आते हैं |कितने दिन हो गये हैं,हॉस्टल की सड़ी हुई चाय पी – पी कर मेरा मन उब गया है |आज कुछ चेंज करते हैं …
अरे यार ! चाय है तो जान है और जान है तो जहान…मेरे लिए तो बस चाय होनी चाहिए |चाहे उसमें दूध हो या न …कड़क चाय की पत्ती और चीनी आहाहा …और वो तो मेस वालों के पास पूरा होता है हा हा हा हा …विशाखा की चाय चालीसा शुरू  हो गयी थी और अड्डाखोरी कर रही चारों लड़कियां ठहाके लगाने लगी |इतने में एक जोर की धौल विशाखा की पीठ पर पड़ी …चल बहुत हो गयी तेरी चाय चालीसा …जहाँ देख अलापने बैठ जाती है …चल रिंग रोड चलते हैं …तुमलोगों को चलना है ? ज्योति ने जोर से पूछा |

विशाखा,काजल ज्योति और अमृता ये चारों हर शाम यूनिवर्सिटी का कोई न कोई ऐसा कोना तलाश लेती ,जहाँ उस वक्त इक्के –दुक्के लोग आ जा रहे हों और इनके ठहाके कोई और लगभग – लगभग न सुन पाए |उस शाम वहीं उनका अड्डा होता |जब कभी उन्हें ऐसी जगह नहीं मिल पाती,उस शाम या तो वे रिंग रोड पे  चक्कर मारा करती या विशाखा के कमरे में मजलिस लगा लेती आज विशाखा के यहाँ ही जमघट लगा हुआ था |

अबे बोलो !चलना है कि नहीं तुमलोगों को या उस बनर्जी के नये बॉयफ्रेंड की जब तक चिंदी न उड़ा दोगी यहीं जमी रहोगी ,कभी तो मुद्दे की बात कर लिया करो तुमलोग नहीं तो यहाँ से जाने के बाद तुम्हारी चिंदी तुम्हारे शहरों में लोग उड़ायेंगे …| बी सीरियस …विशाखा मुंह पर ऊँगली रखती हुई बोली …यार ! ज्योति की बातों को तुमलोग सीरियसली लिया करो | कुछ सेकेण्ड के लिए शांति छा गयी …दबे हुए कहकहे ठहाके बन कर फूट पड़े …हा हा हा | ज्योति तमतमाती हुई …मरो तुमलोग ! मैं जा रही हूँ !विशाखा कुर्सी से उठकर हाथ पकड़ लेती है ….अरेरेरेरेरेरेरे … कहाँ ???काजल बिस्तर पर खड़ी होकर पूरी अदा के साथ हाथों को आँख के ऊपर लती हुई बाल बिखेरकर …न जाओ सैयां छुड़ा के बईयाँ कसम तुम्हारी (मुंह आगे करते हुए मैं रो पडूँगी …रो पडूँगी हा हा हा …अभी अभी तो आये हो अभी न जाओ छोड़कर …हा हा हा देर तक कहकहे लगते रहें | गाते-गाते ही अपनी –अपनी चप्पल पहन कर कमर कस कर तैयार हो गयी सारी पलटन | ज्योति खीसियाती हुई …रबिश …आई एम नॉट गोइंग विद यू गाईज …बाय |विशाखा तुझे चलना है तो चल नहीं तो गो टू हेल …नरक हो तुम लोग …|अरे मेरी जान गुस्साती क्यों है??यार ! तू लोग जा बंटा पी …ज्योति और मैं निकल रहे हैं …कोई ड्रामा नहीं आगे …बाय |

हॉस्टल से निकलते-निकलते शाम पूरी तरह से घिर आई थी या लगभग रात दरवाजे पर खड़ी थी |ज्योति और विशाखा एक दूसरे का हाथ थामे चुप-चाप चली जा रही थी |पीली लाइट्स के बीच  पसरे हुए सन्नाटे  में वे शायद शाम को  सुनने की कोशिश कर रही थी | पानी टंकी के पास वाली सड़क पर दो लड़के खड़े होकर बहस कर रहे थे …नहीं उनमें एक लड़की थी शायद |थोड़ा और पास जाने पर बहस के टुकड़े कान में पड़ने लगे |लड़की तेज आवाज में बोले जा रही थी …आर यू मैड ??हाऊ कैन यू टॉक लाइक दिस ??इट्स यू हू क्रिएट डिस्क्रिमिनेशन ऑन द बेसिस ऑफ़ जेंडर |…यू थिंक ओनली यू हैव आल द ब्रेन इन द वर्ल्ड एंड आल वीमेंस आर स्टुपिड ! दे हैव नो ब्रेन,दे कांट थिंक,…अगर कोई गलती से ऐसी मिल गयी देन ऑल इंडिया ‘रोमियो थिंक’…हाऊ कैन  शी थिंक यार ! हाऊ कैन शी गिव अ ओपिनियन???हाऊ कैन शी कन्फ्रन्ट विद द गवर्मेंट ????यू नो ये जो थर्ड जेंडर है न, उनमें और औरतों के दर्द में बहुत फ़र्क नहीं होता…

लड़की का चेहरा रौशनी से पीठ किए था | लडके के चेहरे पर भेपर की पीली लाइट पड़ रही थी | हालाकि लड़की के सामने खड़े रहने से पूरा चेहरा नहीं दिख रहा था |विशाखा ने एक बार पलट कर देखा |ठंढ़ी साँस छोड़ती हुई आगे बढ़ गयी | एकाध बच्चे लाइब्रेरी से लौटते हुए दिख जाते और एकाध उधर की ओर जाते हुए भी | थोड़ी देर चलने के बाद वे रिंग रोड पर थीं | ज्योति ने धीरे से  कहा यार ,कभी इन अंतहीन बहसों का अंत होगा ….इतिहास,समाज राजनीति,जेंडर,स्त्री –पुरुष और अब ये थर्ड जेंडर !लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी की लड़ाई ने तो थर्ड जेंडर का नाम दिला दिया लेकिन क्या सोसायटी उन्हें अपना पायेगी या ख़ुद उनके कस्टम उन्हें उन्हें हमसे जुड़ने देंगे ???

ज्योति अपनी रौ में बोलती चली जा रही थी-पिछले दिनों ‘जेंडर आइडेंटिटी’,’जेंडर बिहेवियर’,’सेक्सुअल ओरिएंटेशन’,जैसे तकनीकी शब्दों के बारे में अमेरिकन सायकोलोजिकल एसोसिएशन की एक रिपोर्ट आई थी …बेहद उम्दा रिपोर्ट थी | फॉरेन में तो इस पर बहुत काम हो रहा है…इंडिया कितना पीछे है न एक्सेप्टेंस के मामले में …और करता है भी तो अधकचरा …वो कहते हैं न नकल के लिए भी अकल चाहिए …देख न मॉडर्निटी को भी अपनाया तो कैसे …आजादी के तो मायने ही बदले –बदले से हैं और डेमोक्रेसी !    डेमोक्रेसी  का तो चक्का ही पंक्चर है ,घिसट –घिसट कर चल रही है और और विशाखा ‘कम्युनिज्म़’! कम्युनिज्म की थ्योरी की तो हमने हवा ही निकाल दी है….फिस्स्स्सस्स्स्स ….थ्योरी का पता नहीं पर कम्युनिस्ट हैं हम ….हा हा हा …सारी खूबसूरत चीजों को बर्बाद करने का ठेका ले रखा है हमने |राजनीतिक एजेंडा बनाकर सारे मायने ही बदल दिए जाते हैं …सच में इंडिया से बेहतर कोई नहीं सीखा सकता |विश्व गुरु हैं हम गुरुत्व दिखना चाहिए ….हा हा हा | अरे बोल न विशाखा चुप क्यों है  ???

धीरे से सिर उठाकर , सुन रही हूँ | बोलने से पहले सुनना ज़रूरी होता है | क्या तू भी कोई एजेंडा तय करती है ? ताकि हर हालत में गेंद अपने ही पाले  में रहे | सटअप ! ! ! मैं न तो पॉलिटीशियन हूँ और न इनटेलैक्चुअल | आर यू फिलोसफर ???? हा हा हा …सटअप…आइ एम ओनली अ स्टूइडेंट |

तू ! तू ट्रांसजेंडर की बात कर रही है ! ! ! दिमाग ख़राब है तेरा | दिल्ली दूर है उनके लिए | कभी शबनम मौसी , कभी मधु किन्नर , और वो पटना की कौन है वो …हा , मोनिका दास बैंकर या इंजिनीअर पृथिका याशिनी या वो साउथ इंडियन एंकर रोज़ या वो इंस्पेक्टर जिसे यह जानने के बाद कि वो हिजड़ा है निकाल दिया गया… छूट रहा हो तो बीस नाम और जोड़ ले ….पूरी लिस्ट बना ले | जानती है तू बात भी इसलिए कर पा रही है …ये जो दिमाग चल रहा है तेरा …घुमड़ – घुमड़ कर विचार आ रहे हैं , क्योंकि तू जे.न.यू के हाइली सोफिस्टीकेटेड कल्चर में है | कहीं और होती तो पता चलता | पता है तूझे जेंडर का मतलब क्या होता है ??????? लड़ते – लड़ते अपना जेंडर भूल जाती | पता हीं नही चलता कि तू लड़की भी है | मतलब समझती है न तू लड़की होने का ?? नहीं न… कभी इस कैंपस से बाहर झाँक लेना…समझ जायेगी! पता है ट्रांसजेंडर के लिए क्या कहते हैं ??हिन्दी में किन्नर भी नहीं कहते हैं ….अरे मेरा कहना है ‘हिजड़ा’ कहते हैं ‘हिजड़ा’| समझ सकेगी इस शब्द के पीछे के दर्द को ?? जहाँ नाम तक लेने में हेजिस्टेशन है वो इन्टेलैक्चुअलस बात करेंगे , बहस करेंगे , देश को दिशा देंगे ,क्यों ? इससे बढ़िया तो मोरैलिटी और कल्चर का ढ़कोसला ही पालना है … कम से कम ‘मेड इन इंडिया’ तो है | ढ़कोसला भी हो तो हाईट का | आज तक दलित और स्त्री को स्वीकार न सकें | अरे औरतें कम से कम बिस्तर से लेकर ऑफिस तक मनोरंजन तो कर देती हैं …अकार्डिंग टू इंडियन फिलोसफी घर की शोभा है , लक्ष्मी हैं …तब ये हाल है | ये हिजड़े कहाँ की शोभा बनेंगे ?? न बिस्तर की न घर की न ऑफिस की …. कानून बना है लोगों ने स्वीकार नहीं है ….

हूऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊधप्प ! दोनों की पीठ पर धौल पड़ती है हा हा हा हा … क्या जब देखो तुम दोनों खिट – पीट,खिट –पीट करती रहती हो …बहसें… मुद्दे… अरे मेरी जान ! कभी मोहब्बत से हमें भी देख लिया करो ! तुम्हारी खूबसूरत आँखों में डूब जाने का दिल करता है हाय्यययययय …| चल हट ! लेस्बियन नहीं हूँ | अरे बन जा न एक रात के लिए …वर्जिनिटी नहीं जाएगी तेरी ! हा हा हा …बंद करो बकवास काजल ! ज्योति गुस्से में तमतमाती हुई बोली | उनकी भी अपनी दुनिया है | जब देखो मजाक सूझता रहता है | इससे बाहर भी दुनिया है तुम्हारी ??

है न ! कल मूवी देखने का प्लान है …हा हा हा ,चलेगी न ज्योति ? देख ना मत कहना… चारों के लिए टिकट ली है ..फंटास फाड़ू मूवी है | डिनर भी बाहर ही कर लेंगे | दस तक तो लौट ही आयेंगे | बोल! क्या बोल रही है ? गर्दन कुछ यूँ अदा के साथ मटकाती हुई काजल बोली कि ज्योति हँस पड़ी | काजल की पीठ पर धौल देती हुई बोली , तू नहीं सुधरेगी | चारों रिंग रोड पर सेल्फी लेती हुई गाना गाते हुए …. ज़िन्दगी यूँ गले आ लगी है …एक तरह के आवारा थे …एक तरह की आवारगी …
“रात कितनी खूबसूरत लगती है न ?” धीरे से अमृता अपने आप से पूछ उठी |

अगली रात दस बजे …यूनिवर्सिटी के पीछे वाली सड़क पर एक लाश पड़ी हुई थी | देह पर एक भी कपड़ा नहीं | चिथड़े भी नहीं थे वहाँ पर …छिले हुए गाल , कटी और सूजी हुई होठ , गर्दन पर दाँतों के कटे हुए निशान …छाती और देह को कहाँ कहाँ भमोरा गया था कह नहीं सकते …दोनों पैर फैले और अकड़े हुए …लगातार खून रिस रहा था …जांघों के बीच से… छाती और योनी के आस – पास दागे जाने का निशान थे , शायद सिगरेट के थे | रूक – रूक कर साँस चल रही थी या फिर मौत अभी और घसीटना चाह रही थी | एक बार आँख खुली और बंद … दर्द से देह बेहोशी में भी कांप जाती …कुछ गाडिओं की रफ़्तार घटती , शीशा उतरता , फिर आगे निकल जाती ,कुछ की सामान्य बनी रहती |

उधर मुनिरका में डिनर टेबल पर …अमृता कहाँ चली गयी यार बीच में ही ? काजल कहकहे लगाते हुए टेबल पर थाप देती है …उसके घर से बार – बार फ़ोन आ रहा था …बड़े मौरल लोग हैं …रात के आठ बजे दूर दिल्ली मल्टीप्लेक्स में मूवी देख रही रही थी , बनारसी पंडित डूब न मरेंगे …हा हा हा | व्हाट रबिश ? जब देख मजाक करती रहती है , पता नहीं  क्यों मुझे अच्छा नहीं लग रहा है ,सिरियसली अजीब –सी फीलिंग्स आ रही है , विशाखा ने कहा |

अब बैठ भी जा मेरी  फिलौसफर ! तू और तेरे इन्टयूशन्स ! ! ! ज्योति ने विशाखा का हाथ पकड़ कर बैठा दिया |
पता है उसे रात से बहुत लगाव है …वह हमेशा रात को घूमना चाहती है |वह जरूर झूठ बोलकर निकल गयी होगी सड़क पर घूमने …वह बराबर कहती है मुझे रात की आवारगी से मोहब्बत है | यहाँ रात में तारों भरा आकाश तो नहीं दिखता लेकिन स्ट्रीट लाइट्स में दुनिया कितनी रंगीन नज़र आती है न ! दूधिया रौशनी में दूधिया रंग और पीली रौशनी में पीला… बीच बीच में ग्रीन और रेड लाइट्स पर भी आ जाती है ‘रेड लाइट’ पर थोड़ा गंभीर हो जाती है …रात हर रंग को गाढ़ापन देता है और रेड लाइट्स तो गाढे से भी गाढ़ा… लगभग कालेपन की लेई – सा …लेकिन पता है ज्योति ! मैं हमेशा उसे समझाती हूँ …’The beauty of night is not for us’रात का सौंदर्य हमारे लिए नहीं है …

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