‘सनातन’ कहाँ खड़ा है मुजफ्फरपुर में: हमेशा की तरह न्याय का उसका पक्ष मर्दवादी है, स्त्रियों के खिलाफ



प्रेमप्रकाश 

कर्ण रहे होंगे अप्रतिम, लेकिन हमारा सनातन तो अर्जुन के साथ ही खड़ा है-– पिछले दिनों अपनी ही किसी पोस्ट पर अपने ही एक अनन्य मित्र की यह टिप्पणी पढकर हम सोच मे पड़ गये। तत्काल उनकी बात का उत्तर तो वहीं दे दिया लेकिन अभी भी लगता है कि समाधान नही हुआ। न उनका, न मेरा और न सनातन का। आज की इस पोस्ट के लिए अपने उसी उत्तर का एक सिरा पकड़ रहा हूँ।
सनातन के साथ होने का दावा करता संगठन बजरंग दल वैलेंटाइन डे के विरोध में

मै सोचता रहा कि हमारा सनातन बात तो करता है न्याय के साथ खड़े होने की, धर्म के साथ खड़े होने की, सत्य के साथ खड़े होने की और वंचित के साथ खड़े होने कि फिर वह खड़ा अर्जुन के साथ क्यो होता है? अर्जुन पीड़ा का नाम तो नही है और कम से कम कर्ण के सामने तो न्याय का नाम भी नही है अर्जुन। सनातन कर्ण को पैदा तो करता है पर कर्ण की कीमत पर भी खड़ा अर्जुन के साथ ही होता है। सही तो कह रहे थे मेरे मित्र।

सनातन माने आधुनिक संदर्भों मे कोई धर्म विशेष नही, सनातन माने देश की मूल चिन्तन धारा। सनातन माने भारत का राष्ट्रीय आचरण। सनातन माने वृहत्तर समाज का सहज स्वभाव। सनातन माने गुणधर्म के आधार पर सही गलत, उचित अनुचित का निर्णय। सनातन माने नैतिकता का तराजू और सनातन माने अपने मानदंडों पर मूल्यों की तौल। अब इन सूचकांकों पर अपना इतिहास तौलकर देखिये तो सनातन कब कहाँ किसके पक्ष मे खड़ा रहा है।सनातन कर्ण के साथ ही नही, एकलव्य के साथ भी खड़ा नही होता। सनातन द्रोण के साथ खड़ा होता है, जबकि वह अपराधी है लेकिन सत्ता के हाथ उसके सिर पर है। सनातन अर्जुन के साथ खड़ा होता है, जबकि उसका पराक्रम सत्तापोषित है। सनातन सुग्रीव और विभीषण के साथ खड़ा होता है, जबकि वे राज्य के भगौड़े और देशद्रोही है लेकिन प्रभुवर्ग के साथ है।

सनातन आज मुजफ्फरपुर मे कहाँ किसके साथ खड़ा है, निरीक्षण भाव से देखने की चीज है। सनातन जहाँ भी खड़ा है, या तो सेलेक्टिव सोच के साथ खड़ा है या फिर तटस्थ है। अनाथ को शरण देना सनातन का मूल्य रहा है। शरणार्थी के प्रति अतिथि और सेवाभाव सनातन के आग्रही नियम रहे है। सनातन संस्कार बच्चों की सूरत मे ईश्वर की मूरत के दर्शन करते है। ये बातें सनातन पुस्तकों मे लिखी हुई है। सनातन चिन्तकों का दर्शन ही इन्ही मूल्यों, परंपराओं और नियमों पर खड़ा बताया जाता है। लेकिन लिखे जाने और किये जाने के बीच जो अंतर है, मुजफ्फरपुर उसकी नायाब तस्वीर है। नाम मालूम है न आपको उस एनजीओ का ? सेवा, संकल्प और विकास समिति नाम है उसका। उसके अपने बाईलाज भी होंगे, जिसमे लिखित रूप से शपथ ली गयी होगी कि यह समिति समाज के अनाथ बच्चों की सेवा, शिक्षा और स्थायित्व के लिए संकल्पित है।उन कागजों पर इस संकल्प को प्रमाणित करती सरकारी मुहरे भी लगी होंगी।ये मुहरे हमारी चुनी हुई सरकारों की तरफ से लगायी जाती है। यानी ये कि हमने ही, यानी समाज ने ही उस समिति को उन बच्चों की जिम्मेदारी दे रखी थी, जिसके संचालन के लिए उन कागजों के पीछे एक सनातनी खड़ा था।

मुजफ्फरपुर की घटना का विरोध करती महिलायें

हमारा सनातन मुजफ्फरपुर मे कहाँ खड़ा है ? बड़े शांत भाव से, पूरी तटस्थता से सनातन अपने सनातनी के पीछे खड़ा है।सनातन यह बात समझता है कि उन बच्चों की सूरत मे ईश्वर जरूर है लेकिन स्त्री की देह में है। और अगर स्त्री की देह मे ईश्वर भी है तो सनातनी पुरुष की जाँघो मे दबोचने के लिए ही है। सनातन का स्टैंड एकदम क्लियर है। सनातन की प्रज्ञा पर कोई सवाल खड़ा नही होता। अगर वह मुजफ्फरपुर मे है तो सात से पंद्रह साल की अनाथ लड़कियों को नोचते, खसोटते, मारते, पीटते, घसीटते, भोगते अपने श्रेष्ठि सनातनियो की सुरक्षा मे खड़ा है और अगर वह हरियाणा मे है तो अपने उन्ही श्रेष्ठि सनातनियो के लिए एक सगर्भा बकरी की योनि मे रास्ता बनाता खड़ा है। सचमुच याद रखने लायक वाक्य है कि हमारा सनातन धोखे और छल से नौ वर्ष की बालिका कुन्ती को गर्भवती करने के समर्थन मे खड़ा होता है। एक निर्दोष और निष्काम बच्ची के गर्भ से पैदा होने वाले कर्ण को पालने के समर्थन मे खड़ा नही होता। हमारा सनातन उस विप्लवी पुरुष के पराक्रम के साथ भी खड़ा नही होता है। सनातन वहाँ खड़ा होता है, जहाँ अर्जुन है, जहाँ राज्य की संभावना है, जहाँ सत्ता का सुख है।

चिरन्तन से अधुनातन तक सनातन की यही भूमिका ही है। उसके नियमो की किताबें मोटी होती जाती है।उपदेशों के अध्याय बढते ही जाते है। उसकी कलम की स्याही कभी नही सूखती। सूखता जा रहा है लेकिन सनातन की  आँखो का पानी, सूखता जा रहा है करुणा का सोता, तृष्णा नही मरती, मर रहा है स्वयं सनातन।

फिल्म पद्मावत का विरोध

इस मरने को आप रोक नही सकते लेकिन इस मरने के खिलाफ खड़े हो सकते है। इस मरण के खिलाफ जीवन की पुकार जरूरी है। इस मरण के खिलाफ जीवन का उद्गार जरूरी है। अगर इस मरण की परंपरा के खिलाफ खड़े नही हुए तो कल को कही खड़ा होने लायक नही रहेगा सनातन। ध्यान से देखिये। देखिये कि मुजफ्फरपुर का विस्तार हो रहा है। मुजफ्फरपुर केवल झांकी है। सनातन मूल्यों के नाम पर कहीं कुछ नही बाकी है। मुजफ्फरपुर न जाने कब से भारत मे तब्दील होने लगा है। देश के हर शहर मे एक मुजफ्फरपुर है। ये विस्तार बहुत सघन है। फर्क सिर्फ इतना है कि मुजफ्फरपुर की कलई उतर गयी। बाकियों की अभी बाकी हृ। सच कह रहा हूँ, मुजफ्फरपुर तो बस झांकी है। आइये ! नागरिक समाज का आवाहन है। कल उतर आइये सड़कों पर इस पतन, इस मरण के खिलाफ। उतरिये आप भी अपने शहर मे इस मरण के खिलाफ। ध्यान रहे, पूरी शर्मिन्दगी के साथ उतरेगे हम। अपनी लड़कियों, अपनी बच्चियों, अपनी बहन बेटियों और अपनी औरतों से आँखे चुराते हुए निकलियेगा ताकि अदब बनी रहे,  लिहाज बचा रहे, आँखो के पानी की लाज रह जाय और शेष रह जाय सनातन मे उम्मीदों का ध्वंसावशेष भी।

वरिष्ठ पत्रकार प्रेमप्रकाश जी की फेसबुक वाल से 

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