उस बलात्कारी की क्रूर हँसी को, क्षणिक ही सही, मैंने रोक दिया: प्रिया राज

लाल बाबू ललित 


उस बलात्कारी की क्रूर हँसी को, क्षणिक ही सही, मैंने रोक दिया. यह कहना है प्रिया राज का, जिसने कोर्ट परिसर में बच्चियों के बलात्कारी ब्रजेश ठाकुर के चेहरे पर कालिख पोत दी थी और परिसर की  दीवार फांद कर  फूर्ती से वहां से निकल गयी. कौन है प्रिया राज, क्या पृष्ठभूमि है जानने के लिए पढ़ें लाल बाबू ललित का यह परिचय लेख: 


उसकी आँखों में अजीब सी चमक है। छरहरी काया में बिजली की सी फुर्ती है। बाज की तरह अपने शिकार पर झपट्टा मारती है और फिर चीता की मानिंद तीव्र गति से भाग जाती। इसलिए तो उस दिन देखते-देखते ही ब्रजेश ठाकुर के चेहरे पर कालिख पोतकर ब्रजेश ठाकुर मुर्दाबाद के नारे लगते हुए सामने खड़ी पुलिस के दलबल को चकमा देकर दीवार फाँदकर भाग गयी।

अपने गाँव में बाइक चलाती प्रिया राज

मैं बात कर रहा हूँ प्रिया राज की,  जो अचानक सुर्ख़ियों में तब आयी जब मुजफ्फरपुर बालिका गृह के सरंक्षक ब्रजेश ठाकुर का चेहरा कोर्ट में पेशी के लिए ले जाते वक्त कालिख से पुत गया।वह बिहार के मधुबनी जिले में सुदूर देहात के एक गाँव मनोहरपुर, हरलाखी ब्लॉक की रहने वाली है। पिता श्री हरि यादव और माता अनीता यादव की सात संतानों में से चौथे नंबर की प्रिया राज का झुकाव शुरू से ही सामाजिक कार्यों की तरफ रहा है। बचपन से ही वह आक्रामक स्वभाव और विद्रोही प्रवृति की रही है। किसी तरह का भेदभाव और अन्याय उसे कचोटता रहा है और वह इसका प्रतिकार अपने तरीकों से करती रही है।

समाज में घट रही घटनाओं से उसका स्वाभाविक जुड़ाव भी रहा क्यूँकि पिता और माँ दोनों ही सामाजिक गतिविधियों में बढ़चढ़कर हिस्सा लेते रहे हैं। जहाँ उसकी माँ अनीता यादव अपने पंचायत की पूर्व मुखिया हैं , वहीं उसके पिताजी भी कृषक होने के बावजूद सार्वजानिक जीवन जीते रहे हैं। प्रिया राज अभी जन अधिकार पार्टी के बिहार प्रदेश की छात्र इकाई की उपाध्यक्ष है।

यह पूछे जाने पर कि एक ग्रामीण परिवेश, परम्परावादी और ऑर्थोडॉक्स समाज में जन्म लेकर सक्रिय छात्र राजनीति का अनुभव कैसा है, आमिर हसन कॉलेज ,मधुबनी से  मनोविज्ञान से हाल में स्नातक हुई प्रिया कहती हैं,” शुरू से ही मैं मददगार, सहयोगी लेकिन विद्रोही प्रवृति की रही हूँ। मेरे दोस्तों में भी अधिकांश गरीब परिवार के ही लड़के- लड़कियाँ है, जिनका मैं अपने तरीके से यथासंभव सहयोग करती रही हूँ। लेकिन मेरे व्यक्तित्व का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू मेरा विद्रोही प्रवृति का होना भी रहा है।’ वह आगे कहती हैं, ‘मैं अपनी पिता से कहती थी, जो लड़के करते हैं, मैं भी वही करुँगी।’ मैंने को-एड स्कूल का चुनाव भी किया। मैंने टी किया कि लड़के बाइक चलते हैं तो मैं भी बाइक चलाऊँगी। मुझे कार, बाइक, ट्रैक्टर सब चलाना आता है।”

ट्रैक्टर कैसे सीखा, पूछने पर वह हँसती है बताती हैं, “खेतों में काम कर रहे मजदूरों को देखने जाने के लिए जब पिताजी कहते और मैं वहाँ जाती तो ड्राइवर को खेत में ट्रैक्टर चलाते हुए देख मैं उससे जिद करने लगती क़ि मुझे भी ट्रैक्टर चलाना सीखा दो। वह इंकार करता था कि मालिक (मेरे पिताजी ) मुझे डांटेंगे। तब मैं जिद करते हुए कहती कि मुझे यदि नहीं सिखाओगे तो मैं ट्रैक्टर नहीं चलाने दूँगी। और इस तरह मैंने ट्रैक्टर चलाना भी सीख लिया। ”

प्रिया राज की फ़ाइल फोटो

अपने पास के गाँव गंगौर उच्च विद्यालय से प्रिया ने दसवीं उत्तीर्ण की, जहाँ उसके अपने चाचा स्व श्री राम चंद्र यादव प्रिंसिपल थे। पढ़ने में हालाँकि अच्छी थी, लेकिन पढ़ने से ज्यादा दिलचस्पी उसकी खेलने और अन्य गतिविधियों में होती थी। वहाँ जब लड़कों को क्रिकेट खेलते देखती, उसका मन भी क्रिकेट खेलने का होता था। अपने प्रधानाचार्य चाचा की मदद से वह उनके साथ क्रिकेट भी खेलने लगी। बारहवीं की पढाई उसने राम जानकी महाविद्यालय बासोपट्टी से की और फिर ग्रेजुएशन के लिए मधुबनी आ गयी। और फिर पटना।

एक ऐसे समाज में जहाँ लड़कियों के लिए बहुत ही कड़े कोड ऑफ़ कंडक्ट हैं, सिर नीचे झुका हुआ हो , आँखें भी नीचे की तरफ हो , कौन से कपडे पहनने हैं और कौन से कपडे नहीं पहनने हैं , यह भी खुद तय करने  की छूट न हो , जरा से रीढ़ सीधी क्या की कि चरित्र प्रमाण पत्र बँटने लग जाते हैं, वहाँ क्या इतना सहज रहा होगा यह सब कर लेना ?

इसका जवाब देते हुए प्रिया लम्बी साँस लेते हुए कहती है, “नहीं, बिलकुल भी सहज नहीं था। फब्तियाँ भी कसी जाती थीं। सामने भी और परोक्ष में भी सुनने को मिलता था कि यह सभी लड़कियों को बिगाड़ देगी। पर मैंने किसी की नहीं सुनी। बाइक चलाना नहीं छोड़ा। जींस पहनना नहीं छोड़ा। जो मन में आया, किया। एक बार अपने गाँव में ही अपने कपड़े सिलने देने के लिए दरजी के पास गयी। मुझे देखते ही उसने कहा – क्यों ऐसा करती हो? क्यों बाइक? जींसक्यों पहनती हो ? मेरी बेटी भी बाइक चलाना सीखने की जिद कर रही है। सबको बिगाड़ रही हो तुम?’

तब मैंने उन्हें कहा कि ‘इसमें बिगाड़ने वाली क्या बात है? बाइक सीखाने के लिए कहती है तो सीखने दीजिये। या कहिये तो मैं सीखा देती हूँ। फिर मैंने उन्हें समझाते हुए कहा कि मान लीजिये किसी दिन आपके घर में कोई पुरुष नहीं हो और आपके परिवार का कोई सदस्य सख्त बीमार पड़ जाय और उसे तत्काल हॉस्पिटल ले जाने की दरकार हो। आपके घर में बाइक तो है लेकिन किसी महिला सदस्य को बाइक नहीं चलाना आता है। ऐसी स्थिति में उस बीमार सदस्य की जान भी जा सकती है लेकिन यदि आपकी बेटी या अन्य महिलाओं को यदि बाइक चलाना आता हो तो ऐसी नौबत नहीं आएगी। तो यह सब इतना आसान नहीं था लेकिन मैंने सारी आपत्तियों और फब्तियों को दरकिनार किया। लोगों से अपना नजरिया बदलने को कहा। मैं यह सब बिलकुल नहीं कर पाती यदि मेरे पिता और मेरी माँ का रवैया सहयोगपूर्ण नहीं रहा होता। कुछ भी करने से पहले मैंने अपने पिता को विश्वास में लिया। उन्होंने मुझे किसी भी चीज के लिए मना नहीं किया। वे मेरे असली गुरु हैं।  ”

ब्रजेश ठाकुर को कालिख लगाने काआखिर क्या सूझा था उस दिन ? किसी ने सिखाया ऐसा करने को या सोचा कि चलो ऐसे ही कोई एडवेंचर  कर लिया जाय ?तो वह बोल पड़ी, ” नहीं, किसी ने नहीं सिखाया। जिस दिन मैंने टेलीविज़न पर मैंने ब्रजेश ठाकुर को अट्ठहास करते हुए पूरी व्यवस्था पर हँसता हुआ देखा , मैं अंदर से जल- भून गयी। मैं उबल रही थी उस दिन से। उसी दिन से मेरे दिमाग में चल रहा था कि कुछ करना होगा। इसकी क्रूर और अभद्र हँसी  को रोकना होगा। पूरे सिस्टम का इसने बलात्कार कर दिया है।  फिर मैं इसके विरोध में राजभवन मार्च में भी हिस्सा लिया।  पुलिस ने मुझ पर लाठियाँ बरसायीं और मेरे कपडे फाड़ डाले। इतना सब करके भी मुझे संतोष नहीं हुआ। मैं सो नहीं पा रही थी। उसकी बदसूरत हँसी मुझे चिढ़ा रही थी। मैंने ठान लिया कि इसके चेहरे को मलिन किये बिना मैं चैन नहीं लूँगी। मैंने अपने पिता से बात की और इसके अलावा किसी से भी इस विषय में कुछ नहीं कहा। अधिक लोगों से साझा करने पर बात लीक हो जाने का डर था। पिता भी अनुमति देने से हिचक रहे थे पर मैंने उन्हें भरोसे में लिया। मैंने उनसे साफ़ कहा कि यदि मुझे कुछ हो भी जाता है तो आपकी और भी बेटियाँ और बेटे हैं। तब अनमने ढंग से उन्होंने हामी भर दी और कहा, तुम्हें जो सही लगता है वही करो। फिर उस दिन मैंने उसके चेहरे पर कालिख पोत दी, उसके चेहरे को मलिन किया और उसकी उस क्रूर हँसी को, क्षणिक ही सही, रोक दिया। मेरे दिल को सुकून पहुँचा। मैं जानती हूँ, उसका कुछ नहीं होगा। कुछ महीनों में मामला रफा-दफा हो जायगा और वह फिर से इस घृणित काम को अनवरत जारी रखेगा।”

पप्पू यादव की जन-अधिकार-पार्टी से जुड़ी हैं प्रिया

पूछे जाने पर कि उस दिन की घटना के बाद कोई तबदीली आयी है या किसी तरह का डर है मन में? वह कहती है — ” नहीं , डर तो बिलकुल नहीं लग रहा। लेकिन हाँ, थोड़ा सतर्क और सावधान रहना पड़ रहा है। ब्रजेश ठाकुर के लोग 4 -5  बार मेरे आवास के आसपास आये थे और पूछ रहे थे कि प्रिया राज यहीं रहती है ? जब लोगों ने बताया कि रहती तो यहीं हैं लेकिन अभी नहीं है। फिर उनलोगों ने कहा कि उसे कह देना कि अपनी औकात में रहे। तो लगता है मेरी जान को कहीं न कहीं ख़तरा तो है। इस बाबत मैंने पार्टी के संरक्षक और सांसद पप्पू यादव जी से भी बात की और उन्हें अपनी चिंताओं से अवगत कराया। ”

वह यहीं नहीं रूकती है।  प्रिया राज साफ़ शब्दों में कहती है कि वह फिर ऐसा करेगी और बार-बार करेगी। उसने तय कर लिया है कि उसे नौकरी नहीं करनी है। वह अपना जीवन सामाजिक कार्यों में ही लगाना चाहती है। लोगों की समस्याओं को समझने और सुलझाने की कोशिश करते रहना ही अब उसका ध्येय है।  खासकर महिलाओं के अधिकार की लड़ाई लड़ना उसकी प्राथमिकता में है। वह कहती है कि महिलाओं , अनाथ और बेसहारा बच्चियों की लड़ाई लड़ते-लड़ते उसे कुछ हो भी जाता है तो उसे इसकी तनिक भी परवाह नहीं है। अपनी कुर्बानी के लिए वह सहर्ष तैयार है। वह लड़ती रहेगी।

युवा अधिवक्ता लालबाबू ललित उच्चतम न्यायालय सहित दिल्ली के न्यायालयों में वकालत करते हैं. 

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.

आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 
‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here