घेराबंदी (अरविंद जैन की कहानी)

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

सुश्री कामना उसके (पाठक क्षमा करें! नायक का नाम-अनाम ‘गोपनीय’ रखना कानूनी अनिवार्यता है) पड़ोस में रहती थी और उम्र में उससे चार-पाँच साल छोटी थी. जब वह पाँचवीं कक्षा में था, तो कामना ने स्कूल जाना शुरू किया था.स्कूल जाते-आते समय वह कामना को जब भी खट्टी-मीठी गोली, टॉफी, लॉलीपॉप या चॉकलेट देने लगता, तो वह ‘नहीं, मुझे पसंद नहीं’ कह कर लेने से मना कर देती. इस तरह मना करना, उसे कभी अच्छा नहीं लगता था.

कामना जब सातवीं क्लास तक पहुँची, तो वह बारहवीं के बाद कॉलेज जाने लायक हो गया. कामना ‘ब्वाय कट’ बालों के बावजूद, ‘लड़की’ सी दिखने-लगने लगी थी. एक बार उसने कामना को जन्मदिन पर देने के लिए, ‘पार्कर गोल्ड’ खरीदा मगर कामना ने ‘धन्यवाद सहित’ लौटा दिया.


जब युवा नायक इंजीनियर बन गया तो ‘बार्बी डॉल’ सी कामना ने कॉलेज में दाखिला लिया था. इंजीनियर बाबू कमाने लगे, तो एक हीरे की अँगूठी खरीदी और जेब में रख कर घूमने लगे. कई बार कामना के साथ एकांत में बैठ, चाय-कॉफ़ी पीने की कोशिश की, मगर हर बार वह ‘आज नहीं’ कह कर भाग जाती.

चार-पाँच साल बाद इंजीनियर बाबू को किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी ने अमेरिका आने की पेशकश की, तो उसे ‘सपनों का स्वर्ग’ दिखाई देने लगा. उसने सोचा कि जाने से पहले हीरे की अंगूठी, नायिका की अँगुली में पहना दे तो अच्छा. तमाम कोशिशों के बावजूद सुंदरी ने ‘धर्मपत्नी’ बनने से, ‘अभी नहीं’ कह कर टाल दिया. इसके बाद वह हर साल आता और बैरंग लौट जाता.

उन दिनों उसके सपनों में देसी-विदेशी फिल्मी हीरोइनों के नाप-तोल, दिमाग में  रंगीन-चिकने पन्नों पर छपे न्यूड’स का बवंडर और फ्लैट में मादक संगीत बजबजाता रहता.  सन्नाटे से समय में वह कभी ‘ब्लू चिप शेयर’ या ‘मर्सेडीज’ खरीदता, कभी ‘रोलेक्स’ या ‘ओमेगा’ और कभी लिमिटेड एडिशन के ‘मोंट ब्लां’. ‘जॉय’ की महक उसकी नाक में रच-बस गई थी, ‘रॉयल सैलूट’ का स्वाद जीभ पर और हर साँस में कामना थी. छुट्टियों में वह समुद्र किनारे कामना की तलाश में भटकता रहता और उसके (अव)चेतन में सब बिकनी वाली स्त्रियाँ, कामना का रूप धारण कर उसे चूमने लगती.होश आता तो पता लगता कि हवा में मरी हुई मछलियों की गंध बढ़ती जा रही है और सूरज कब का डूब चुका है.

कामना ने कॉलेज की पढ़ाई (एम. ए. अर्थशास्त्र) के बाद हार्वर्ड से एम.बी.ए और पीएच.डी किया और नामी-गिरामी पूँजी-पुत्रों को सलाह देते-देते, अपनी बीमा और म्यूचअल फण्ड कंपनी की मालकिन बन गई. उसने अलग-अलग नस्ल के, कई कुत्ते पाल रखे थे. उसके ‘ब्रेन’ में हर ‘ब्रांड’ का बाज़ार, रात को खुलता और सुबह बंद हो जाता. मिलियन-बिलियन डॉलर-पाउंड-यूरो-येन उसके इशारों पर, सीढियाँ चढ़ने-उतरने लगे. कामना को सूँघते ही पता चल जाता कि कौन सा (महंगा या सस्ता) ‘परफ्यूम’ छिड़क कर, ‘मिस वर्ल्ड’ को आकर्षित किया जा रहा है.

खैर….समय अपनी रफ्तार से भागता रहा और नायक-नायिका अपनी रफ्तार से. दुनिया घूमते-घूमाते दोनों ‘ओरली एयरपोर्ट’ पर मिले. इस बार नायक ने हीरे की अँगूठी के साथ-साथ, अपनी नई कंपनी में साँझीदार बनने का प्रस्ताव, यह सोचते हुए आगे बढ़ा दिया कि ‘भाग कर जाएगी कहाँ’! कामना सुनती रही,सोचती रही  ‘मैं इसे कभी समझ नहीं आऊंगी’ और सिगरेट ऐशट्रे में बुझाती हुई बोली “धन्यवाद…पर अब तो आपकी कंपनी के 55% शेयर मेरे नाम हो गए हैं. देखो…. अभी कुछ देर पहले ही मेल आया”. कॉफ़ी का कप उसके हाथ से छूट कर फर्श पर जा गिरा और वह कामना सुनो..सुनो ना! का म ना….कहता-बड़बड़ाता रहा.

देखते-देखते सुश्री कामना ने अपना ‘लैपटॉप’ उठाया और आकाश में उड़ गई. सामने लगे ‘स्क्रीन’ पर,धुंधली सी परछाइयाँ बन-बिगड़ रही थी.

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