समता की सड़क जोतीबा फुले से होकर गुजरती है.


विकाश सिंह मौर्य
जोतीबा फुले के परिनिर्वाण दिवस पर विशेष 
आज 28 नवंबर है। 28 नवंबर 1890 को जोतीराव गोविंदराव फुले का परिनिर्वाण हुआ था। आज उन्हे याद करते हुए भारतीय समाज मे व्याप्त विसंगतियों और शोषण के तमाम आयामों पर विचार करने के साथ ही उनका सम्यक समाधान भी तलाशे जाने की अवश्यकता है। कारण जो भी हो, सरकार जहाँ मूर्ति बनाने और उसपर पागलपन की हद तक उसका प्रचार-प्रसार करने मे लगी हुई है। इससे आखिर नुकसान तो इस देश के उत्पादक और श्रमण (श्रम और आग पर आधारित जीवन जीने वाले) समुदाय का ही होना है। 
शिक्षा, प्राथमिक शिक्षा और उच्च शिक्षा ऐसी चीजें हैं जिनके अभाव में व्यक्ति, उसकी अभिव्यक्ति एवं व्यक्ति की प्रवृत्ति को समझ पाना मुश्किल होता है । आजादी के बाद के भारत में शिक्षा को स्कूली और व्यावसायिक उपक्रम सा बना दिया गया है ।शिक्षण संस्थाओं की स्थापना करने का उद्देश्य धनपशुओं की क्रूर धनपिपासा को शान्त करना है । जो वास्तव में कभी शांत न होकर बहुआयामी स्वरूप में बढ़ती ही जाती है । भारत में विद्यालय श्रृंखलाओं के नाम पर मासूम बच्चों के मस्तिष्क में रचनात्मक क्षमता का विकास न होकर तोड़-फोड़ एवं हिंसक प्रवित्त्तियों का विकास एवं प्रसार होता है । इसलिये शिक्षा, शिक्षण, शिक्षक एवं औद्योगिक इकाइयों की ही तरह बहुसंख्यक किसान-आदिवासी समुदायों को नुकसान पहुचाने लगे हुए विद्यालयों की संरचना एवं प्रभावों का अध्ययन महत्वपूर्ण है । और इतना ही महत्वपूर्ण आधुनिक भारत में शिक्षण-प्रशिक्षण के अतीत का अवगाहन करना भी है ।
यह उपक्रम केवल और केवल विभिन्न जातियों, आदिवासियों एवं विभिन्न आय स्तर के व्यक्तियों, परिवारों के बीच बड़े पैमाने पर वैमनस्यता को बढ़ाने के काम आता दिखाई दे रहा है । ऐसे में आधुनिक भारत में ‘शिक्षा के बहुजनीकरण’ अर्थात सबको शिक्षा प्रदान करने के ऐतिहासिक परिदृश्य एवं उसके लिपिबद्धकरण की प्रक्रिया और उसकी प्रभाविकता का आलोचनात्मक विश्लेषण आवश्यक है ।
हम इस आलोचना-प्रत्यालोचना से भरे विश्लेषण की शुरुआत महाराष्ट्र के पूना में जोतीराव गोविंदराव फुले द्वारा 1848 ई. से प्रारंभ किये गए शिक्षा, शिक्षक तथा सत्य शोधक समाज के द्वारा एक युग प्रवर्तक समाज सुधारक के रूप में उनके कृतित्व एवं व्यक्तित्व को समझते हुए करेंगे । क्योंकि मुझेपुख्ता यकीन है कि वहाँ से हमें वर्तमान समाज के दरपेश अनेक विघटनकारी गुत्थियों को समझने में पर्याप्त मदद मिलेगी ।क्योंकि उन्नीसवीं सदी के नवशिक्षित भारतीयों में से कुछ का ध्यान भारतीय समाज की कुरीतियों की तरफ गया। इनमे से अधिकांश ने हिन्दू धर्म के दायरे में ही पुराने धर्मग्रंथों के हवाले से समाज सुधार करने का प्रयास किया । वहीं जोतिबा फुले इन सभी में सबसे अनोखे और प्रभावशाली थे। उनके कार्य और चितन का प्रारंभ ही धर्म संस्था की आलोचना और इसके खिलाफ़ व्यापक जनजागरण के लिए किये गए सफल आंदोलनों से होता है। जोतिबा फुले शूद्र-अतिशूद्र एवं समाज की महिलाओं के शिक्षा के अधिकार के प्रबल पैरोकार थे ।
यह बहुत दुखद है कि देश मे बहुजन शिक्षा के जन्मदाता जोतीराव फुले और दक्षिण एशिया में महिला शिक्षा की नींव रखने वाली शिक्षा की देवी माता सावित्री बाई फुले के जन्मदिन एवं परिनिर्र्वाण दिन भी न तो सरकारी स्तर से और न ही विद्यालय या विश्वविद्यालय स्तर से उनके जीवन, कृतित्व एवं व्यक्तित्व पर किसी चर्चा, परिचर्चा का आयोजन किया जाता है । यह और दुखद और विनाशकारी है कि विद्यालयों और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों से भी ऐसी विभूतियों को बाहर रखा गया है । यह एक ऐसी लोकतंत्रीय शासन व्यवस्था है जो अपने नागरिकों के जागरूक हो जाने की सम्भावना मात्र से ही भयभीत हो जाती है । यह भय इसलिए होता है कि सदियों से जोंक की भांति इस देश के मेहनतकश किसान, आदिवासी और स्त्रियों का दिमाग और खून चूसने वाला भारत का पारंपरिक सत्ताधारी वर्ग अपने अय्यासी, भोग-विलास और अपने काले कारनामों पर से पर्दा उठ जाने के बाद की स्थिति की कल्पना मात्र से ही खौफजदा हो जाता है । 

उनके इस कार्य से रुष्ट होकर तथा समाज तथा धर्म के ठेकेदारों की धमकियों से परेशान होकर जोतीबा के पिता श्री गोविंदराव फुले ने घर से इन्हें निकाल दिया । ऐसे में इनकी प्रथम शिष्या एवं इनकी पत्नी सावित्री बाइ फुले की साथी फ़ातिमा शेख़ ने अपने घर में इन्हें सम्मान पूर्वक रखा । फ़ातिमा शेख़ ने फुले दंपति को महिला विद्यालय खोलने में भी बहुत मदद की । सोलह विद्यालय फ़ातिमा और उनके भैया उस्मान शेख़ ने बनवा के दिये । बाद में फ़ातिमा शेख़ दक्षिण एशिया की पहली मुस्लिम शिक्षिका हुईं । 
सम्भ्रांत घरों की विधवा महिलाओं के साथ दमनीय एवं अमानवीय व्यवहार के विरुद्ध सत्यशोधक समाज ने एक नाई समाज को साथ में लेकर सफल कार्यक्रम चलाया । साथ ही विधवाओं के साथ बलात्कार अथवा किसी अन्य पुरुष के साथ स्वैच्छिक संबंधों के बाद गर्भवती होने एवं बच्चा जनन के समय बेहद कष्टकारी पारिवारिक एवं सामाजिक दूरी के साथ ही ताने और कर्णभेदी अपमान के कारण ऐसी महिलाएं अधिकतर आत्महत्या कर लेती थीं । इसी तरह से आत्महत्या करने जा रही एक विधवा ब्राम्हणी काशीबाई को इन्होने बचाया एवं उससे पैदा हुए बच्चे को यशवंत राव नाम देकर खुद उसकी परवरिश किया । इनसे बचने के लिए फुले दंपत्ति ने एक जच्चा केंद्र खोला, जहाँ पर ऐसी महिलाएं अपने बच्चों को जन्म दे सकती थीं और चाहें तो जन्म के बाद उन्हें छोड़ भी सकती थीं ।
अधिकांश लोगों का मानना है कि महिलाओं को हासिल स्वतंत्रता का सबसे महत्वपूर्ण कारण पूंजीवादी सामाजिक व्यवस्था है । कुछ लोग औद्योगीकरण को इसका महत्वपूर्ण कारण मानते हैं । पर वास्तव में ऐसा  नहीं है । भारत में स्त्रियों सहित बहुजन समाज को जो कुछ भी सम्मान और अधिकार हासिल हुआ है और जिसे हासिल करने की जद्दोजहद हो रही है, उसको समझने के लिए अठारवीं सदी के महाराष्ट्र और बंगाल के आंदोलनों की समझ का होना अति आवश्यक है।
आधुनिक पूंजीवादी व्यवस्था ने अपने स्वार्थों के अधीन महिलाओं को एक हद तक आजादी दी है क्योंकि उसे महिलाओं के सस्ते श्रम की आवश्यकता थी । इस व्यवस्था को स्त्री के शरीर को नुमाइश की वस्तु बना दिया है। आज की स्त्री एक ओर जहाँ पूंजीवादी शोषण का शिकार है वहीं दूसरी ओर वह शोषण व उत्पीड़न के परम्परागत रूपों को ढोने के लिए भी विवश है, जिसकी जड़ें समाज व संस्कृति से गहरे रूप में नाभिनालबद्ध हैं । 
मानव का स्वभाव ही मनन करना है । बोलना ही व्यक्ति को इंसान बनाता है । किन्तु विश्वगुरु भारत की स्त्री को इंसान की जगह देवी का दर्जा दिया गया है । और देवी कभी बोला नहीं करतीं । वो तो सजी-धजी लाल कपड़े में लपेटकर एक आलमारी में अथवा पूजा के पंडाल में मूक-बधिर ही अच्छी लगती हैं । यहीं पर औरत ही औरत की दुश्मन है, की मानसिकता का विश्लेषण करें तो पाते हैं कि यहाँ भी मामला शोषक बनाम शोषित का ही है । वर्षों से दमित, प्रताड़ित औरत के हाथ में जैसे ही सत्ता आती है वह सत्ताधरी शोषक की प्रतिरूप बन जाती है । 
भारतीय समाज के मध्यवर्गीय ढांचे में स्त्री आधुनिक और आत्मनिर्भर तो हुई है पर उसे वह माहौल नहीं मिला जहाँ आत्मनिर्भरता उसे बराबरी का दर्जा दिला पाती । आज भी मध्यवर्गीय कस्बाई मानसिकता के पास इन समस्याओं का एक ही हल है कि उसे इतना मत पढ़ाओ कि वह सवाल करने लगे या ससुराल में अपनी बेकद्री को पहचानने लगे । ‘पहचान देना गलत है’ आज भी इसके पक्ष में बोलने वाले कसबे ही क्या महानगरों में भी बहुतेरे मिल जायेंगे । बस सामन्ती मध्यवर्गीय संभ्रांतता का बारीक सा खोल भर हटाने की देर है । 

पराधीनता स्वाभाविक व आवश्यक रूप से सभी लोगों के लिए अपमानजनक होती है सिवाय उस व्यक्ति के जो शासक है या ज्यादा से ज्यादा उस व्यक्ति के लिए जिसे उत्तराधिकारी बनने की उम्मीद है । जे.एस. मिल (Subjection of Women) ने लिखा है कि “जिसे भी सत्ता की आकांक्षा है वह सबसे पहले अपने निकटतम लोगों पर सत्ता हासिल करने की इच्छा रखता है…..राजनीतिक स्वतंत्रता पाने के संघर्ष में प्रायः इसके समर्थकों को रिश्वत आदि तरीकों से ख़रीदा जाता है या अनेक साधनों से डराया जाता है । महिलाओं के सन्दर्भ में तो पराधीन वर्ग का हर व्यक्ति रिश्वत व आतंक दोनों की मिली-जुली चिरकालिक अवस्था में रहता है ।” 
लोग सोचते हैं कि हमारी मौजूदा प्रथाएं कैसे भी शुरू हुई हों, वे विकसित सभ्यता के मौजूदा समय तक संरक्षित हैं तो इसलिए कि धीरे-धीरे सामान्य हित के अनुकूल हुई हैं । वे यह नहीं समझते कि इन प्रथाओं से लोग कितनी निष्ठां के साथ जुड़े होते हैं ; कि जिनके पास सत्ता होती है उनके अच्छे व बुरे मत भी सत्ता की पहचान व उसे बनाये रखने के साथ जुड़ जाते हैं । बहुत कम ऐसा होता है कि जिनके पास बल के चलते क़ानूनी ताकत आती है वे तब तक सत्ता पर अपनी पकड़ नहीं खोते जब तक उनके बल पर विरोधी पक्ष का कब्ज़ा न हो जाय । 
यह कहा जायेगा कि स्त्रियों पर शासन अन्य सत्ताओं से अलग इसलिए है क्योंकि यह स्वेच्छा से स्वीकारा जाता है, महिलाएं शिकायत नहीं करतीं और इसमें समस्त रूप से भागीदार होती हैं । पहली बात तो यह बहुत सी महिलाएं इसे स्वीकार नहीं करतीं । इस बात के पर्याप्त संकेत मौजूद हैं कि कितनी महिलाएं इसकी इच्छा करेंगी यदि उन्हें अपने स्वभाव के प्रति इतना दबने का समाजीकरण न करवाया जाय । 
जोतीराव फुले और सावित्री बाई फुले के योगदान की चर्चा प्रथमतः दो दृष्टिकोणों से की जा सकती है । एक भारतीय स्त्रीवादी आन्दोलन की प्रथम तथा सशक्त प्रणेता के रूप में और दूसरा भारत के बहुजन समाज की शिक्षा एवं पाखण्डी यथास्थितिवाद के विरुद्ध सफल सामाजिक आन्दोलनकारी कार्यकर्त्ता-संगठनकर्ता के रूप में । सावित्री बाई जी ने शिक्षा को ही प्रगति का मूल स्वीकार करते हुए जाति तोड़ने एवं सफल होने के लिए आवश्यक माना है । किन्तु आज के शिक्षा व्यवस्था की बिडम्बना यह है कि यह पूंजी का साथ में गठजोड़ करके विनाशकारी हो रही है । जिसके पास पैसा होगा वही अपने बच्चों को ठीक-ठाक शिक्षा दिलवा सकता है । सरकारी विद्यालयों को जानबूझकर तबाह किया जा रहा है । इससे नौकर मिलना आसान हो जाता है किन्तु भारत निर्माण का लक्ष्य बहुत पीछे छूटता जा रहा है ।
जोतीराव ने साहित्य सृजन भी भरपूर मात्रा मे किया। यहाँ पर भी उनका प्रधान उद्देश्य सामाजिक  पुनर्निर्माण ही रहा। उनकी प्रमुख और चर्चित रचनाएं इस प्रकार से हैं: तृतीय रत्न, पँवाड़ा छत्रपति शिवाजी भोसले का, पँवाड़ा शिक्षा विभाग के ब्राम्हण अध्यापक का, ब्राम्हणों की चालाकी,गुलामगिरी, किसान का कोड़ा, सार्वजनिक सत्यधर्म पुस्तक आदि। 
अंत में एक प्रख्यात अफ़्रीकी इतिहासकार चिनुआ अजीबी की बात, कि “जब तक शिकार के अपने इतिहास लेखक नहीं होंगे तब तक शिकारी का गुणगान ही  इतिहास में दर्ज होता रहेगा ।” वैसे भी आंधियाँ दिये के हक़ में गवाही नहीं ही दिया करती हैं ।  
शोधार्थी, इतिहास विभाग, डी.ए.वी.पी.जी.कॉलेज , काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी  इमेल :[email protected]
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