बेपढ़ ऐंकरों द्वारा दलित साहित्य पर हमले की नाकाम कोशिश अर्थात साहित्य आजतक

सुशील मानव साहित्य आज तक के दूसरे संस्करण में प्रगतिशीलता, सहिष्णुता, साहित्य, वामपंथी विचारधारा, स्त्री विमर्श और दलित विमर्श निशाने पर रहे। दलित लेखन पर तो उन सत्रों में भी हमला बोला गया जो कि दलित लेखन पर नहीं थे। बिना पढ़े-लिखे ऐंकर, खुद को सर्वज्ञाता होने के भाव में थे और चलताऊ ढंग से साहित्यकारों से सवाल कर रहे थे. शरण कुमार लिम्बाले से कर बैठे अजीबोगरीब सवाल: 

मंच नंबर 2 (हल्ला होल चौपाल) पर पहले दिन का पहला सत्र था ‘साहित्य का राष्ट्रधर्म’। वक्ता थे कथाकर ममता कालिया, कहानीकार अखिलेश और नंदकिशोर पांडेय। मॉडरेटर था रोहित सरदाना।

रोहित सरदाना ने कार्यक्रम के बीच में पूछा-लेकिन ममता जी अगर दलित साहित्य को पढ़कर एक दलित के मन में ब्राह्मण के प्रति घृणा का भाव घर कर रहा हो कि ब्राह्मण तो ऐसा करते हैं कि हमें खा लिया है या दलित साहित्य पढ़कर ब्राह्मण के मन में घृणा का भाव और गहराता जा रहा है तो फिर वह साहित्य देश को कहाँ जोड़ रहा है ? वह तो देश को तोड़ ही रहा है ना। 

अखिलेश- सहस्राब्दियों  से जो घृणा ब्राह्मणों के मन में दलितों के प्रति थी उसे आप क्या कहेंगे। अगर उस घृणा का प्रतिकार करने को देश को तोड़ना कहेंगे तो क्या प्रतिरोध को रचना में रुपांतरित करना घृणा पैदा करने के लिए है?
ममता कालिया- आप लोग आजतक मेजारिटी के राष्ट्रवाद की बात करते रहे। हमें माइनारिटी के राष्ट्रवाद की भी बात करनी चाहिए। इस राष्ट्र में कई जातियों, कई धर्मों के लोग रहते हैं। वे सब सुरक्षित महसूस करें इस राष्ट्र के भीतर हमें उस राष्ट्र की बात करनी चाहिए।

 दूसरे दिन के पहले सत्र का नाम था साहित्य किसके लिए। इसमें प्रमुख वक्ता थे, ‘मैत्रेयी पुष्पा, अरुण कमल और ऋषिकेश सुलभ। मॉडरेटर थे रोहित सरदाना। कार्यक्रम में रोहित सरदाना ने एक सवाल ऋषिकेश सुलभ से पूछा कि – तब कैसा लगता है जब कोई कहता है कि मैं स्त्री के लिए लिखती हूँ, मैं दलितों के लिए लिखता हूँ। और तब कहा जाता है कि समाज को बाँट रहे हैं। ये समाज को जोड़नेवाला साहित्य नहीं समाज को तोड़नेवाला साहित्य लिख रहे हैं। जहाँ दलित विमर्श को ब्राह्मण पढ़ता है तो कहता है कि ब्राह्मणों ने तबाह कर दिया। इन्हीं की वजह से हम आगे नहीं बढ़ पाये आज तक।‘
जवाब में ऋषिकेश सुलभ ने कहा कि –ये बहुत सतही किस्म की बातें हैं।
रोहित सरदाना- मना तो नहीं कर सकते न आप ।
ऋषिकेश सुलभ- साहित्य वंचितों का ही पक्ष है।वधिकों के विरोध में है। साहित्य में दलित विमर्श हो या कोई और विमर्श यदि वो मनुष्य के विरोध में लिख रहा है तो वो साहित्य है ही नहीं। साहित्य की मूल जमीन जो है वो मनुष्य के पक्ष में है। साहित्य पूरे संसार की बात करता है। जब मैं मनुष्य कह रहा हूँ तो उसमें पूरा का पूरा संसार शामिल है।जो वंचित है, जो दलित है। दुःख दुःख में भी फर्क होता है। एक भूखे पेट का दुःख होता है और एक भरे पेट का दुःख होता है। साहित्य में ये ब्राह्मण, वो दलित, ये सब तात्कालिक लड़ाई है। हम टुकड़े में बाँटकर भी लड़ रहे हैं और एक लंबी लड़ाई पर भी हैं। अगर दलित लेखकों का एक पूरा समूह उनकी पीड़ा को लेकर सामने आ रहा है जिसे हम फर्स्ट-हैंड एक्सपीरियंस कहते हैं तो उसका स्वागत हो रहा है। उनके अपने जीवनानुभवों को साहित्य में जगह मिल रही है। तो एक सार्थक संदेश दे रही है समाज में। मकसद सबका एक ही है।

साहित्य आजतक के दूसरे दिन के एक सत्र का नाम ही था ‘दलित लेखन का दम’। सत्र में बतौर वक्ता पत्रकार लेखक श्योराज सिंह बेचैन, लेखक राजीव रंजन प्रसाद और कवि आलोचक शरण कुमार लिंबाले थे जबकि मॉडरेटर थे संजय सिन्हा।
मॉडरेटर- दलित लेखन क्या है? क्या लेखन को अलग कटेगरी में बाँटना चाहिए? क्या दलित साहित्य जैसी कोई चीज होनी चाहिए?
राजीव रंजन प्रसाद- मैं समझता हूँ बिल्कुल होनी चाहिए। साहित्य एक बहुत बड़ा छाता है। लेकिन दलित साहित्य एक आंदोलन की तरह उभरा है। और एक आंदोलन की तरह उसने अपनी पहचान का आकाश विकसित किया है। मैं बहुत बार इस सवाल से दो-चार हुआ हूँ कि दलित साहित्य, आदिवासी साहित्य, स्त्री साहित्य, प्रवासी साहित्य अलग क्यों। पर मैं बता दूँ कि ये अलग अलग खाँचे खेमे नहीं हैं। साहित्य ही हैं। पर साहित्य के भीतर ये जाने-पहचाने अलग से चिन्हित किए जाने वाले रंग हैं। आप इसे यूँ न देखें कि हमने कोई वर्ग-विभेद कर दिया है।
मॉडरेटर- क्या इस तरह का भेद होना चाहिए? अलग-अलग लोगों का अलग साहित्य होना चाहिए?
श्योराज सिंह बेचैन- “दलित साहित्य पर पूछने से पहले इस पर पूछिए कि समाज व्यवस्था क्या है। लोग किन हालातों में रह रहे हैं। दलित शब्द समाज व्यवस्था से ही निकले हैं। हजार बार ये सवाल उठ चुका है। बात ये है कि हमारे समाज में अलग अलग जातियाँ क्यों हैं? अलग-अलग जातियाँ अलग-अलग स्थितियाँ हैं तो अलग अनुभव अलग विचार हैं उससे निकला ये शब्द है। हमने इसे नहीं ईजाद किया है। ‘दलित’ स्थिति-बोधक शब्द है।बाबा साहेब ने तो बहिष्कृत भारत नाम दिया था। दलित कोई छोटा-मोटा नहीं है पूरा बहिष्कृत भारत है। अस्पृश्य भारत है। जो अस्पृश्य है वही दलित है।बदकिस्मती से अस्पृश्यता कायम है और दलित शब्द हटाने की तैयारी कर लिए। शब्द नहीं दलित की स्थिति बदलनी चाहिए। कौन खुद को अस्पृश्य कहलाना पसंद करेगा? लोगों को तो आपने बाँट रखा है और साहित्य पर आप बाँटने का आरोप लगा रहे हो।”
मॉडरेटर- साहित्य क्यों उच्च वर्ग का अलग हो दलित का अलग हो?
शरण कुमार लिंबाले,- साहित्य समाज का आईना है। और आप कहते हो कि छुआछूत को समाज में रहने पर साहित्य में न आने दो। ऐसा कैसे हो सकता है। जो समाज में है वो साहित्य में आएगा ही। आप इसे नकार नहीं सकते। आप हमें अपने समाज से अलग कर रहे हो और जब हम अपना साहित्य अलगाते हैं तो आपको तकलीफ होती है।
लिम्बाले आगे कहते हैं मैं दलित साहित्य की शुरुआत से लेखन कर रहा हूँ। जब मैं अपनी कविताएँ लेकर जाता था तो वो छापते नहीं थे कहते थे पहले भाषा सीखो, व्याकरण सीखो, लिखना सीखो। कोई संगोष्ठियों में बुलाता नहीं था। तब हमें साबित करना पड़ा। साबित करने के लिए लिखना पड़ा। अलग नाम लेकर लिखना पड़ा। हम साबित हो गए हमारी चर्चा होने लगी तब आप भी बुलाने लगे। अब हम अच्छा लिख रहे हैं तो आप कह रहे हैं कि अलग क्यों?क्योंकि आपके पास विचार नहीं है। हमारे साहित्य के पास जाति को खत्म करनेवाला अंबेडकर का विचार है।हमारी भाषा आपकी भाषा से अलग है। आपको भले हमारी भाषा गाली-गलौज वाली भाषा लगती है। हमारी भाषा के कारण भी हमारी अलगता है। हमारे पात्र हमारे नायक दलित हैं। आपके साहित्य में हम दिखते कहाँ हैं?
मॉडरेटर- आपने कहा दलित के लिए दलित ही लिखेगा पर प्रेमचंद्र ने दलित पर काफी कुछ लिखा है। आखिर घीसू-माधव की कहानी को आप किसकी कहानी कहेंगे?
शरण कुमार लिंबाले- कबीर और प्रेमचंद्र को आप बार बार हमारे ऊपर पत्थर की तरह फेंकते हो। ठीक है उन्होंने लिखा पर अब वो नहीं हैं तो हमें लिखने दो। आप प्रेमचंद्र को तब खड़ा करते हो जब लिंबाले बोल रहा है, राजीव और श्योराज बोल रहा है। हमें पीछे हटाने के लिए आप प्रेमचंद्र को आगे करते हो। लेकिन कर्मभूमि के सूरदास से उसकी चमार जाति हटाकर ब्राह्मण कर दीजिए वह ब्राह्मण हो जाएगा। ठाकुर कर दीजिए तो ठाकुर हो जाएगा।
जब हम कोई पात्र लिखते हैं तो हमारे लिखे पात्रों में उसकी जाति भाषा,विचार, कमेटमेंट और भूमिका उसके साथ आता है। आपके पात्रों के साथ ये सब नहीं आता है। प्रेमचंद्र दया, सहानुभूति, करुणा और अनुकंपा से लिखते हैं। हमें अनुकंपा नहीं अधिकार चाहिए।
मॉडरेटर- दलित लेखन की परंपरा में समाज के लिए सबसे बड़ा लेखक किसे मानते हैं।
लिंबले- ये तो आप लड़ाने वाली बात बोल रहे हैं।

श्योराज सिंह बेचैन- यूँ तो हमारे समाज के सबसे बड़े लेखक बाबा साहेब हैं। घीसू–माधव को जो आपने उठाया तो बता दूँ कि प्रेमचंद पर गाँधी-मार्क्स का प्रभाव था। जो ये मानते हैं कि हम जाति का नहीं वर्ग का सवाल उठाएंगे। प्रेमचंद्र ने बेशक़ दलितों के नजदीक जाकर कहानियाँ लिखीं हैं। पर वो अपनी कहानी में दलितों को लालची आलसी और कामचोर दिखा रहे हैं। जिनकी पत्नी प्रसव से पीड़ित है और वो आलू के लिए लड़ रहे हैं। कफन के पैसे से दारू पीते हैं। पर वो कामचोर क्यों बने इसका जवाब वो नहीं देते। मजदूर पानी-बीड़ी के बहाने न बैठे तो मालिक दिन दिन भर बेगार में खपाते रहें उसे। प्रेमचंद मे शोषक और शोषित में से शोषक को चुना। वो मालिक के पक्ष में खड़े हो गए इसलिए वो दलित लेखक नहीं हो सकते। जैसे मैं दलित लेखक हूँ पर मेरे लेखन के पात्र ब्राह्मण या ठाकुर हो सकते हैं। पर देख तो मैं अपनी ही दृष्टि से रहा हूँ।
मॉडरेटर- लेखक कोई एजेंडा नहीं चलाता। वो ब्राह्मण को सुपरलेटिव व दलित को नीचे नहीं बनाता है। हाँ जो वस्तुस्थिति होती है उसे वो रखता है। लेखक दर्पण दिखा रहा है। जो गोरा है, वो गोरा दिख रहा है जो काला है वो काला दिख रहा है। दर्पण रंग नहीं बदल रहा है।
शरण कुमार लिंबाले- आपने हमें उतनी दूर से दलित साहित्य पर बात करने के लिए बुलाया है कि प्रेमचंद्र के साहित्य पर। आप प्रेमचंद्र की बात करके हमें मुद्दे से भटका रहे हैं। दलित साहित्य पर अन्याय करने का एक तरीका ये भी है।
मॉडरेटर- नहीं मेरा ये मकसद नहीं है। आपको जाने क्यों ऐसा लग रहा है। मैं क्षमा माँग रहा हूँ अगर ऐसा आपको लगा तो। मैं तो आपके उस आरोप पर कि दलितों के लिए साहित्य में कुछ नहीं लिखा गया पर सिर्फ आपको ये बताने की कोशिश कर रहा था दलित समाज के लिए प्रेमचंद्र ने लिखा है।
मॉडरेटर – दलित साहित्य का दम क्या है? इसे कैसे आँकते हैं आप?
रवि रंजन प्रसाद –सबसे पहले तो मैं आपके उस प्रश्न का जवाब देता हूँ जो आपने पूछा कि दलित साहित्यकार में सबसे बड़ा कौन ह? यहाँ जो दोनों वरिष्ठ साहित्यकार बैठे हैं गर आपने इनकी आत्मकथाएं पढ़ी होती तो ये सवाल जो आपने प्रेमचंद्र से शुरू की वो सवाल आप लिंबाले के साहित्य से शुरू करते। इसके अलावा एक प्रश्न ये उठता है कि जो लेखन दलित लेखक कर रहे हैं वही दलित साहित्य है या जो लेखक दलित नहीं हैं और दलित समाज के बारे में लिख रहे हैं वो भी दलित साहित्य है। तो मैं कहूँगा कि हम अपनी वस्तुस्थिति को ज्यादा बेहतर लिख सकते हैं। आप तो सिर्फ एक प्रेक्षक हैं।
जैसे कि मैं एक दलित लेखक हूँ पर मैं बस्तर में रह रहा हूँ। और वहाँ जो आदिवासियों पर दमन हुआ है उसे मैंने नजदीक से देखा उससे संवेदित हुआ और प्रेक्षक के तौर पर उसे लिखा। वो मेरा प्रेक्षक के तौर पर दर्द था। शायद यही दर्द प्रेमचंद्र को भी रहा होगा। लेकिन दलित आत्मकथाओं को कई बार पढ़ने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि शायद साहित्य का यही कोना अब तक अनछुआ और अनकहा था।
श्योराज सिंह बेचैन- अक्सर ये देखा गया है कि बिना दलित साहित्य को पढ़े ही दलित साहित्य की बात की जाती है। मैं दो घटनाएँ आपके सामने रख रहा हूँ। शरण कुमार टिंबाले की एक कहानी में दिखाया गया है कि एक व्यक्ति पशुओं की हड्डियां बेचने ले जा रहा है। हड्डिया कम पड़ जाती हैं तो वो अपने पिता या माता की हड्डी उसमें शामिल कर लेता है। इसमें संवेदना की कितनी गहराई है। एक इनकी कविता है, उसके बिंब हैं कि सफाई कर्मचारी सिर पर रखकर मैला ले जा रहा है बरसात हो रही है, वो सारा मैला उसके शरीर पर आ रहा है। तब कवि कहता है कि मैं महसूस करता हूँ कि कैसा लोकतंत्र मैं जी रहा हूँ। क्या इस तरह की शब्दावली या अनुभव कोई गैरदलित लेखक कर सकता है। बेहतर होता कि हमारे लेखन को पढ़कर उस पर बात की जाती।जो कमियाँ होती उसकी आलोचना की जाती।
मॉरेटर- मैं मानता हूँ कि आपका सवाल बहुत वाजिब है।मैं सहमत हूँ उससे । समाज में जिस तरह से सारी चीजों का प्रस्तुतीकरण हुआ उससे समस्या आजतक बरकरार है वर्ना आजादी के 70 साल बाद ये समस्या रहनी नहीं चाहिए थी।
मॉडरेटर- लिंबाले जी अपनी लेखन या निजी जीवन से कुछ सुनाइए।
शरण कुमार लिंबाले – मैंने 40 से ज्यादा किताबें लिखी है पर मुझे उसमें से कुछ याद नहीं। हर रोज का खाना नहीं याद रहता। मैं इतना कहना चाहूँगा कि इस मंच से प्रेमचंद्र को नकारने की बात नहीं कही। हम प्रेमचंद्र को मानते हैं। प्रगतिशील विचार को मानते हैं। दलित साहित्य आज अगर इस मकाम पर पहुँचा है तो प्रगतिशील लेखकों के कारण ही। दलित लेखन में प्रगतिशील लेखन की भूमिका रही है। हम भी प्रगतिशील समाज के लिए ही लिख रहे हैं। आज जब हम अपनी वेदना उठाते हैं तो आप प्रेमचंद्र और कबीर को ढाल बनाकर अटैक करते हो तो हमें दुख होता है।
मॉडरेटर- जैसा कि लिम्बाले जी ने कहा प्रगतिशील लेखक जो होता है वो जातिधर्म नहीं मानता है बेचैन जी इस पर कुछ कहना चाहेंगे आप?
श्योराज सिंह बेचैन- कोई इच्छा रखते हुए भी दूसरी जाति का अनुभव नहीं ला सकता। जो जिस वर्ण में मरता है उसी में मरता है। ये मनोगत बात हो सकती है कि कोई कहे कि वो जातिभेद नहीं मानता। सामाजिक खाँचे में हम अलग-अलग खाँचें में बैठे हैं। न सवर्ण कुछ दलित के बारे में जानता है न दलित सवर्ण के बारे में। कोई भला आदमी हो सकता है वो चहता हो कि दलितों की समस्या पर लेखन करे। लेकिन भाई जब उसे गाँव के निकारे कर रखे हो, खान-पान, रहन-सहन, शादी-ब्याह सो कोई वास्ता नहीं, कोई संवाद नहीं कोई इंटरएक्शन नहीं तो हम कैसे कहें कि आप दलित की अनुभूति लिख सकते हो। हाँ निराला ने दूर से देखकर भले कुछ पत्थर तोड़नेवाली के बारे में लिख दिया। लेकिन जब पत्थर तोड़ने वाली लिखेगी, झाड़ू लगानेवाली लिखेगी तो उसकी वेदना, उसकी सच्चाई के आगे दूर से देखने वाले की सच्चाई कहीं नहीं टिकेगी।
मॉडरेटर- लेकिन जब हम साहित्य को बाँट देते हैं दोनो वर्ग एक दूसरे से वंचित होने लगते हैं।
शरण कुमार लिम्बाले – हमने न तो साहित्य को बाँटा, न हीं हमने समाज को बाँटा।  हम वर्णभेद या जातिभेद करनेवाले लोग नहीं है। हम तो इसके शिकार हैं। हम तो चाहते हैं ये कि कल को खत्म होता हो तो आज हो जाए। हम तो नहीं चाहते कि मनुष्य से मनुष्य की दूरी हो। पर हम कोसों दूर बिठाए गए हैं। भारतीय साहित्य वर्ण साहित्य है। वर्ण साहित्य को राष्ट्रीय फलक का साहित्य बनाने के लिए विभिन्न तरह की साहित्यिक आवाजें जब शामिल होंगी तब साहित्य ऐसा बनेगा जिसे राष्ट्रीय स्वरूप का साहित्य कहा जा सकता है। अभी हम किसी भी लेखन राष्ट्रीय लेखन नहीं कह सकते। क्योंकि जो जिस वर्ग से आता है उसका लेखन उसी वर्ग के लिए है।

सुशील मानव फ्रीलांस जर्नलिस्ट हैं. संपर्क: 6393491351

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