वह आत्मीय और दृष्टिसंपन्न संपादक हमें अलविदा कह गयी

अनिता भारती

जानी मानी लेखिका, दलित आदिवासी और स्त्री लेखन की सशक्त पैरोकार रमणिका गुप्ता जी छब्बीस मार्च दोपहर तीन बजे दुनिया छोड़कर चली गई। रमणिका जी बेहद सरल और मिलनसार स्वभाव की थी। मैं तो हमेशा उनको आंटी कहकर ही बुलाती थी। रमणिका जी का भी मुझपर बहुत स्नेह था। मेरा उनसे पहला परिचय तब हुआ जब मैंने उत्तर प्रदेश के डोमकच्छ समुदाय के बीच पसरी भुखमरी और गरीबी पर लेख लिखा था, जो उस समय जनसत्ता के रविवारीय पृष्ठ में छपा था। रमणिका जी को वह लेख बहुत पंसद आया था और उसी लेख को बाद में उन्होंने अपनी मासिक पत्रिका युद्धरत आम आदमी में भी छापा था । इसके बाद जब मैंने दलित सामाजिक क्रान्तिकारी गब्दूराम बाल्मीकि और कश्मीरी कविता की जनक ललदेह पर काम किया, तो उस मह्त्वपूर्ण काम को सबसे पहले रमणिका जी ने ही युद्धरत आम आदमी में  जगह दी। रमणिका जी को हमेशा मौलिक काम और नये विचारों को सुनने समझने में बहुत रुचि थी। यह बात गलत भी नही है कि युद्धरत आम आदमी जैसी नामचीन पत्रिका के कारण ही दोनों प्रख्यात दलित व्यक्तित्व गब्दूराम वाल्मीकि और दलित कवयित्री को मह्त्वपूर्ण स्थान मिला।

रमणिका गुप्ता

जब हंस का दलित साहित्य विशेषांक आया जिसके सम्पादक अजय नावरिया और श्योराज सिंह बैचेन थे। उस अंक में शामिल कुछ लेख स्पष्ट रुप से दलित स्त्री विरोधी विचारधारा वाले थे, उस अंक के खिलाफ मैंने हंस के संपादक राजेन्द यादव जी को अपना एक लेख दिया था परन्तु उन्होंने उसे छापने से एकदम इंकार कर दिया। रमणिका जी को भी हंस के इस दलित विशेषांक से बहुत आपत्ति थी। परंतु उन्होने अपनी आपत्ति तुरंत राजेन्द्र यादव जी को फोन कर जता दी थी। परंतु मेरे रमणिका जी को यह बताने पर कि वह मेरी आपत्ति लेने से इंकार कर रहे है तो मेरा यही लेख रमणिका जी ने कहा – मुझे दो मैं छापूंगी और उन्होने उस लेख को बडे सलीके से युद्धरत आम आदमी में छापा।

रमणिका जी के व्यक्तित्व की यही खासियत उन्हें सबसे अलग बनाती है। वह बहुत खुले दिल से सबके लेखन का स्वागत करती थी और उसे अपनी पत्रिका में ससम्मान स्थान देती थी। इसी प्रकार उन्होंने कथादेश पत्रिका के चले धर्मवीर प्रकरण पर अपना सशक्त विरोध दर्ज करते हुए ‘स्त्री नैतिकता का तालीबानीकरण’ विशेषांक घोषित किया और उस विशेषांक के संपादन कार्य में  अतिथि संपादक के तौर पर विमल थोरात, प्रोमिला और अपने साथ मुझे भी इस अंक का संपादक बनाया। इस अंक पर हमने लगभग पूरे साल काम किया। अंक बेहद शानदार निकला। अब यह अंक पुस्तक के रुप में आ चुका है। इसी दौरान रमणिका जी से और भी पहचान और दोस्ती हो गई। उनके साथ रहने से एक तरह की भावनात्मक और बौद्धिक सुरक्षा का अहसास रहता था।

   रमणिका जी की उम्र जरुर बढ़ रही थी पर इस बढ़ती उम्र से उनकी उर्जा, उनके आत्मविश्वास या फिर उनकी गतिविधियों में कोई फर्क आया हो ऐसा दिखाई नही देता था। उनमें रोज नए विचारों और रोज नये कार्य करने की प्रेरणा और लालसा रहती थी । रमणिका जी ने जितना लिखने-पढ़ने व अपनी पत्रिका व आंदोलन से जुडने का मौका नयी पीढ़ी को दिया उतना उन्होने अपने लेखन कार्य को भी पूरा महत्व दिया। वह नये-नये युवक-युवतियों से पहली मुलाकात में ही कह देती थी युद्धरत आम आदमी के लिए लिखो मैं छापूंगी जबकि आजकल के संपादको का यह हाल है कि वे नये लोगों के प्रति अतिरिक्त कठोर होते हैं।

    रमणिका जी दलित स्त्री और आदिवासी मुद्दो और उनके अधिकारों को लेकर बड़ी संवेदनशील थी। उनकी दलित मुद्दों की समझ बहुत स्पष्ट थी। जब कभी भी दलित गैर दलित विषय या लेखन पर विवाद हुआ तो वह निर्भीकता से अपना पक्ष रखती थी। उनकी निगाह में लेखकों की कोई जाति नही होती और कोई छोटा बडा नही था । फिर चाहे किसी ने एक कविता लिखी या चाहे किसी के चार कविता संग्रह हो वह सबको एक समान प्यार, दुलार सम्मान और अवसर देती थी। इतनी बड़ी लेखिका और एक प्रसिद्ध सम्पादक होते हुए भी स्वयं किसी को भी फोन करने में नहीं हिचकिचाती थी और बड़े अधिकार से अपनी बात मनवा लेती थी और उससे अपनी पत्रिका में छापने के लिए सामग्री ले लेती थी। उन्होंने अपने एक अपन्यास मौसी पर मुझे लेख लिखवाया था, जोकि उन्हें बहुत पसंद आया था वो हमेशा मुझे और लिखने की प्रेरणा देती थी।

अभी पिछले दिनों जब वह अपोलो में भरती थीं तो मैं बजरंग , हीरालाल राजस्थानी और सुनीता उनसे मिलने अपोलो अस्पताल गए थे। वे बिस्तर पर बेसुध पड़ी थी। उन्हें सांस लेने में बहुत दिक्कत हो रही थी।  उन्हें ऐसी स्थिति में देखकर हम सबको दुख हुआ। बाद में जब वह जगी तो हम सबने उनके लेख, कविता, कहानी आदि पर ज्यों ही बात करनी शुरू कि तो हमें उनकी हालत हमें एकदम सुधरी हुई लगी। उन्होंने उस हालत में बड़ी खुशी से  बताया उनकी आत्मकथा आपहुदरी कोर्स में लग गई है। उन्होंने मेरे सावित्रीबाई फुले की कविताओं वाले लेख को खूब सराहा और कहा मैं उसे छाप रही हूँ। हीरालाल राजस्थानी जी ने अपनी कुछ कविताएं उनको सुनाई। रमणिका जी ने भी अपनी भी कविता सुनाई। बजरंग जी ने अपने उस लेख के बारे में बताया जो उन्होंने उनके ऊपर लिखा था और किसी अखबार में  छपा था। इतनी सारी बातों और हंसी मजाक के बीच हम सबने महसूस किया कि रमणिका जी की दवाई, उनकी ऊर्जा, उनका हिम्मत उनकी उस पढ़ाई लिखाई के वातावरण में ही है। रमणिका जी एकदम चुस्त दुरूस्त हो गई ऐसा लगा।

रमणिका फाउंडेशन से सम्मानित होती अनिता भारती

 उनके स्वभाव में जितनी सरलता थी, जितनी निश्छलता थी, उतना ही कहीं न कहीं उनके विरोधाभास भी नजर आ जाता था। कहीं से गाहे बगाहे उनके मातहत काम करने वाले वर्करों के प्रति बरती गई आर्थिक और व्यक्तिगत कठोरता भी सुनाई दे जाती थी। कभी-कभी दिखाई भी दे जाती थी । लेकिन यह भी सही है कि रमणिका जी के घर आफिस रमणिका फाउंडेशान जाने में मुझे कभी किसी तरह से झिझक, डर या असहजता महसूस नहीं हुई। वे हमेशा मुस्कुराकर स्वागत करती थी और अपनी नई किताबों के प्लान में, हमेशा जुड़ने के लिए कहती थी। आज उनके न रहने पर मन दुखी है। मुझे लगता है मैंने सचमुच एक स्नेहिल व्यवहार वाली, बुद्धिमान औरत, किताबों में डूबती उतरती, नये लोगों का भरपूर अवसर देने वाली शख्सियत को खो दिया है। सच है रमणिका आंटी आप को भूलना बहुत मुश्किल है।

अनिता भारती साहित्यकार एवं सोशल एक्टिविस्ट हैं/ संपर्क:
[email protected]

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here