रजनी तिलक का स्त्री चिंतन : जाति, जेंडर, पितृसत्ता और यौनिकता के प्रश्न

अरुण कुमार प्रियम

“दलित स्त्रीवाद पितृसत्ता और जाति के ढांचागत शोषण के विरुद्ध अपनी आवाज उठाता है और विवाह संस्था में लोकतांत्रिकता चाहता है. दलित स्त्रीवाद  राज्यसमाजऔर परिवार में पितृसत्ता व सत्ता की जकड़न से मुक्ति चाहता है और सभी संस्थाओं में ढांचागत लोकशाही एवं व्यवहारिक बराबरी चाहता है. घरेलू  कामों और श्रमाधारित कार्यों के लिये सम्मान एवं सम्मानजनक वेतनमान चाहता है. दलित स्त्रीवाद पितृसत्ता के बहुस्तरीय  शोषण और जेंडरविभेद के विभिन्न रूपों से घर,कार्यस्थल, वर्ण आधारित समाज, सड़कों और ब्राह्मणवादी राज्यसत्ता के विभिन्न फलकों परसंघर्षरत है.

– रजनी तिलक (स्त्रीकाल पत्रिका के वेब वर्ज़न में प्रकाशित अरुण कुमार प्रियम के साथ एक साक्षात्कार में )

“दलित स्त्रीवाद अंतरजातीयअंतरधार्मिक  विवाह को सामजिक बदलाव का अस्त्र मानता है, जो सामुदायिक पितृसत्ता को खंडित करता है. यह दलित स्त्री को अपने फैसले लेने की आजादी देता है. ये दलितों के आतंरिक जातिवाद का खंडन करता है और जाति,जेंडर, वर्ग, और योग्यता के ब्राह्मणवादी मापदंडों को खारिज करके समतासमानता, बंधुत्व और बहनापे की नींव पर प्रबुद्ध भारत के निर्माण का स्वप्न देखता है. दलित स्त्रीवाद परिवार में लोकतांत्रिक मूल्यों के सृजन का पक्षधर है. (वही )

उपर्युक्त दोनों उद्धरण रजनी तिलक के स्त्री चिंतन का मूल आधार हैं. ये उन्होंने इन पंक्तियों के लेखक साथ एक साक्षात्कार में कहा था. रजनी तिलक ने स्त्रीवादी सैद्धांतिकी पढ़कर अपना स्त्री चिंतन विकसित नहीं किया. न ही उन्होंने स्त्री चिंतन के कोई सिद्धांत दिए. हाँ, उनके चिंतन से कोई भी सिद्धान्तकर स्त्रीवाद के सिद्धांत गढ़ सकता है. रजनी तिलक का स्त्री चिंतन एक सृजन है. उन्होंने अपने स्त्रीवाद को रचा है.रजनी तिलक का स्त्री चिंतन उनके द्वारा समता के लिए किये गए संघर्ष से पैदा होता है. उनका स्त्री चिंतन मूलतः दलित स्त्री और अल्पसंख्यक यौनिकता (गे, लेस्बियन, ट्रांस जेंडर और किन्नर )पर केन्द्रित है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह सवर्ण स्त्री के अपने अधिकारों की लड़ाई में उसके साथ नहीं हैं. लेकिन वो सवर्ण या जिसे भारत में मुख्य धारा का स्त्रीवाद कहा जाता है और दलित स्त्रियों की जीवन स्थितियों और समस्याओं में फर्क करती हैं. इसीलिए उनके  चिंतन का लक्ष्य समूह हाशिये की यौन अस्मिताएं और दलित स्त्री है. रजनी तिलक के स्त्रीवाद और सवर्ण स्त्रियों के स्त्री चिंतन में फर्क है. इसलिए रजनी तिलक के स्त्री चिंतन को अलग नजरिये से देखा जाना चाहिए. रजनी तिलक का स्त्री चिंतन डॉ. अम्बेडकर के स्त्री सम्बन्धी विचारों को स्त्रियों के जीवन में वास्तविक रूप में लागू करना है. रजनी तिलक का स्त्री चिंतन आन्दोलन धर्मी है. यह खाली समय में कमरे में बैठकर लिखा गया या किया गया विमर्श नहीं है. इन्होंने आन्दोलन से जुड़कर  और उसमें काम करके स्त्रीवाद की अपनी समझ विकसित की है.

मर्यादाओं के फ्रेम में जकड़ी स्त्री को समाज ने इतने अवसर तक नहीं दिए कि वह अपने भीतर की धडकनें भी ठीक से सुन पाती.जब कभी उसने अपने मानवीय अस्तित्व को आवाज दी तब हर तरफ से उस पर हमले होने लगे. इस पीड़ा के एहसास ने उसके स्त्रीत्व और स्त्री रूप में उसकी अस्मिता को तीव्रतर किया.

रजनी तिलक अपने जीवन के सफ़र में संघर्ष करने से कभी पीछे नहीं हटीं. खुद की पहचान और अपने अस्तित्व को स्थापित करने की लड़ाई उनके चिंतन को ऊंचाई प्रदान करती है.

रजनी तिलक पुरुष से अलग एक दुनिया बनाने की बात नहीं करतीं हैं. उनका मानना है जब तक समाज स्त्री के प्रति सहज नहीं होगा तब तक स्त्री मुक्ति का प्रश्न अधूरा है. मानवता का प्रश्न सम्पूर्ण मानव जाति का प्रश्न है न कि केवल स्त्री या केवल पुरुष का.

1970 के दशक में ही स्त्री मुक्ति को हवा देने वाली बेट्टी फ्रिडन ने नारीवाद की पहली लहर से अपने को अलग करते हुए ‘द सेकंड स्टेज’ नामक किताब लिखकर ‘परिवार’ को महत्व देना शुरू किया. लेकिन वो ‘परिवार’ जाहिर है पारम्परिक परिवार नहीं था. रजनी तिलक भी  ऐसा मानती हैं कि ‘परिवार’ हो, लेकिन वो पितृसत्तात्मक ढांचे वालापरिवार न हो.वो चाहती हैं कि परिवार लोकतान्त्रिक हो.

जब तक पितृसत्तात्मक पूंजीवादी समाज में निजी संपत्ति के उत्तराधिकार के लिए  वैध पुत्र यानि शादी से उत्पन्न पुत्र की अनिवार्यता और परिवार में पुरुष (पिता, भाई, पति और पुत्र) का अधिनायकवादी वर्चस्व बना रहेगा तब तक औरत की अस्मिता, अस्तित्व, अधिकार, सम्मान और समानता का हर संघर्ष अधूरा रहेगा. इसलिए वो अंतरजातीय और अंतर्धार्मिक विवाह को सामाजिक बदलाव का अस्त्र मानती हैं और इसीलिये  वो परिवार के लोकतंत्रीकरण की मांग करती हैं. वो कहती हैं कि संम्पत्ति, सत्ता और सम्मान में बराबर हिस्से के लिए औरतों को सभी संवैधानिक प्रावधानों का इस्तेमाल हथियार की तरह करना चहिये.

रजनी तिलक मानती थीं कि हाशिये की सभी अस्मिताओं को गौण अंतर्विरोधों पर संवाद करते हुए साझे संघर्ष की भूमिका बनानी चाहिए.वो यह भी मानती थीं कि जब तक दलित स्त्री और स्त्री के संपत्ति के अधिकार सुनिश्चित नहीं होंगे और उत्तराधिकार को पुत्राधिकार से मुक्त कर विस्तार नहीं किया जायेगा तब तक स्त्री की यौनिकता पर नियंत्रण की व्यवस्था बनी रहेगी.

इसी जेंडर-विभेदऔरस्त्रीअसमानताके कारण समाजमेंजोसंकुचनहैउसने रजनी तिलक कोउद्वेलित किया औरउन्होंनेसामाजिक बदलावकेलिएकामकरनाआरम्भकिया और उन्होंनेअपने शुरुआती दिनों में पी.एस.ओ. (प्रोग्रेसिवस्टूडेंट्सआर्गेनाइजेशन ) नामकेप्रगतिशीलछात्रसंगठनकोज्वाइनकियाऔरआई.टी.आई. (औद्योगिकप्रशिक्षणसंस्थान) मेंयूनियनबनायी. इसीदौरानवामपंथीविचारधाराकेसाथ-साथ रजनी तिलक अम्बेडकरवादी आन्दोलन और साथ ही स्त्रीवादी संगठनों में भी जुड़ गयीं . रजनी जी ‘दलितपैंथर’ की दिल्ली यूनिट की संस्थापक सदस्य हैं. ‘दलितपैंथर’ का संविधान बनाने में अन्य साथियों के साथ उनकी भी बराबर की हिस्सेदारी थी.रजनी तिलक ने एक साक्षत्कार में बताया कि ‘दलितपैंथर’ कीदिल्लीयूनिटकागठनकरनेकेबादहमने ‘अखिलभारतीयआंगनवाड़ीयूनियन’ बनाई. ये सब काम करते हुए रजनी तिलक ने  सन 2005सेदलितस्त्रीवादपरमहिलाआन्दोलनकेसाथचर्चाआरंभकी . 2007 मेंनागपुरमेंअक्टूबर महीनेमेंदलितस्त्रीवादपरकार्यशालाआयोजितकी. सन2008 में ‘राष्ट्रीयदलितमहिलाआन्दोलन’ नाम से उत्तर भारत में दलित-आदिवासी महिलाओं की नेटवर्किंग के लिए संगठन कीस्थापनाकी. बिहार, झारखण्ड, हरियाणा ,उत्तरप्रदेश, उड़ीसाऔरदिल्लीमें ‘राष्ट्रीयदलितमहिलाआन्दोलन’ कीएकहजारों सदस्यहैं. रजनीजीनेदलितों परहोरहेअत्याचारोंकीशताधिकफैक्टफाइंडिंगकीऔरअपने जीवन के अंतिम दिनों में भी लगातार सक्रियरहीं . उन्होंने दलित, आदिवासी और अकेले रहने वाली महिलाओं को डायन कहकर मार देने की घटनाओं का बिहार, झारखण्ड और उड़ीसा के१२जिलो में ‘राष्ट्रीयमहिलाआयोग’ के साथ मिलकर अध्ययन किया और उन्होंने पाया कि‘डायन’ कहकर मारी जाने वाली औरतें सिर्फ दलित-आदिवासी और पिछड़े समुदाय की हैं.

रजनीतिलकनेस्त्री-मुक्ति आन्दोलन में जाति के सवाल पर लम्बी बहस चलाई एवं समांतर दलित आन्दोलन में जेंडर के सवाल को लगातार उठाया. वामपंथीऔरअन्यप्रोग्रेसिवआंदोलनोंमेंदलितमहिलाओंकेसवालएवंउनकेनेतृत्वपरबहसचलाई. स्त्रीवादी संगठनों के साथ जाति, वर्ग, पितृसत्ता और यौनिकता और यौन व्यापार पर संवाद के लिए उन्होंने दिसम्बर, 2015 में ट्रांसजेंडर, यौनकर्मी महिलाओं और प्रगतिशील महिला संगठनों के साथ एक 2 दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन दिल्ली स्थित गाँधी शांति प्रतिष्ठान में किया. इस संगोष्ठी का विषय था, ‘Resisting Caste and Patriarchy :Building Alliances’जिसमें उत्तर और दक्षिण भारत में स्त्री मुद्दों पर काम करने वाले स्त्री संगठनों, छात्र संगठनों, ट्रांसजेंडर समुदाय और यौनकर्मी महिलाओं, समाजशास्त्रियों और बुद्धिजीवियोंने हिस्सा लिया. पहली बार यौनकर्मी महिलाओं और ट्रांसजेंडर समुदाय के बारे में बौद्धिक वर्ग ने जाना कि इन समुदायों में जाति कैसे काम करती है. इस संगोष्ठी के बाद तथकथित मुख्य धारा के नारीवाद और दलित स्त्रीवाद के बीच संवाद का सिलसिला शुरू हुआ. रजनी तिलक ने एक पुल का काम करते हुए तमाम मुक्तिकामी संगठनों और व्यक्तियों के बीच संवाद का जरिया बनीं और एक साझे संघर्ष की पृष्ठभूमि तैयार हुई. जिसके फलस्वरूप महिलाओंकेसंसद, विधान सभाओं और विधान परिषद में भागीदारी हेतु आरक्षण के लिये 33 प्रतिशत आरक्षण में दलित,आदिवासी, अल्पसंख्यक और पिछड़े समुदाय की महिलाओं के समानुपातिक प्रतिनिधित्व की मांगउ ठायी. स्त्री-मुक्ति आन्दोलन में दलित महिलाओं के स्टैंड-पॉइंट से स्त्री के सवालों को देखने के लिये महत्वपू र्ण हस्तक्षेप किया. स्त्री-मुक्ति आन्दोलन में हाशिये की महिलाओं के सवालों पर अलग से स्थान बनाने में वो सफल हुईं.

रजनी तिलक हाशिये की स्त्रियों के सरोकारों और उनप र होने वाले अत्याचारों के विरुद्ध आवाज को मुखर करने हेतु ‘आंदोलित’ नाम की एक लघु पत्रिका का संपादन भी 2010 के बाद से लगातार कर रही थीं. इनके संपादकीय कर्म का सबसे महत्वपूर्ण काम है ‘राष्ट्रीय दलित महिला आन्दोलन’ के जरिये नयी लेखिकाओं की खोज और उनके सृजन कर्म को व्यापक जन समाज तक पहुँचाने के लिए ‘अखिल भारतीय दलित महिला लेखन’ नामक श्रृंखला पुस्तक का संपादन. इसपुस्तकका संपादन रजनी जी ने2011 में शुरू किया. अब तक इसके दो खण्डों का प्रकाशनहो चुका है. तीसरा खण्ड जल्दी की प्रकाशित होने वाला है, जो दलित महिलाओं के आत्मकथ्यों पर आधारित है.

दलित स्त्रियों केआंदोलन में स्त्री-पुरुष समानता की मांग की जाती है।यहां पुरुषों का विरोध नहीं है,बल्कि स्त्री जागृति के साथ पुरुषों को जागृत करके महिलाओं के प्रति पुरुषों से समानता और सम्मानजनक व्यवहार की अपेक्षा की जाती है।इसी आधार पर इस पुस्तक में ‘दलित स्त्री की दुनिया में पुरुष’ नाम का स्तम्भ प्रकाशित किया गया है. इस स्तम्भ में बेबी ताई काम्बले का एक लेखहै-‘मेरे निर्माण में बाबासाहब अंबेडकर का योगदान.’ रजनी तिलक जी के इस सम्पादकीय कौशल और जेंडर की सूझ-बूझ से पता चलता है कि वह रेडिकल नारीवादियों की तरह पुरुष विहीन स्त्रियों की दुनिया के निर्माण की पक्षधर नहीं थीं.

रजनी तिलक की चिंताओं में समाज का शोषित वर्ग और हर समुदाय की स्त्री, समाज में हाशिये पर पड़े यौनिक-अल्पसंख्यक और स्तरीकृत समाज के अंतिम सिरे पर खड़ा मनुष्य है. रजनी तिलक को प्राध्यापकीय लेखकों की लॉबी ने कभी लेखक माना ही नहीं. न ही उनके लिखे को कोई तवज्जो दी. रजनी तिलक ने कहानियां, कविताएं, लीफलेट्स, पम्फलेट्स, आंदोलनों में वितरित करने के लिए पर्चे, स्त्री शिक्षा,स्त्रियों पर यौन हिंसाके विरोध के प्रति जनमानस में चेतना के प्रसार के लिए लिए पर्चे लिखे. दलित-आदिवासी स्त्रियों और दलितों पर होने वाले अत्याचार की तथ्यान्वेषी रिपोर्ट और उनके साथ काम करते हुए जो अनुभव हासिल किया उसको अपने आलेखों और निबन्धों में समाज से साझा किया. हिंदी साहित्य का कोई अध्येता शायद ही रजनी तिलक के चिंतन और उनके काम के साथ कभी न्याय कर पाए. यदि समाज विज्ञान का कोई शोध अध्येता उन पर शोध पूर्ण काम करेगा तो दलित और स्त्रियों पर किये गए रजनी तिलक के काम से बौद्धिक समाज रूबरू हो सकेगा.

रजनी जी की कविताओं के बारे में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में भारतीय भाषा केंद्र में अध्यापन करने वाले, ख्यातिप्राप्त कवि और आलोचक  प्रो. गोबिंद प्रसाद ने लिखा है कि “अधिकांश कविताओं की सांसें स्त्री मन में उठने वाले सहज प्रश्न और चिंताओं से बुनी गयी हैं”.( रजनी तिलक के काव्य संग्रह ‘हवा सी बेचैन युवतियां’ के फ्लैप से ) प्रो. गोबिंद प्रसाद ने ये बात रजनी जी के दूसरे काव्य संग्रह की कविताओं के बारे में कही है. लेकिन ये बात उनके सम्पूर्ण कविता-कर्म में लागू होती है. दुनिया में स्त्री ही वह मनुष्य है जिसकी चिंताओं के घेरे में हर जीवन-व्यापार है. वो महज अपनी और अपनी समानधर्मा के सुख-दुःख के बारे में ही चिंतित नहीं है. वह एक सर्जक है. जो नयी संतति का सृजन करती है. इसलिए उसे प्रकृति द्वारा रची गयी हर शय की चिंता रहती है कि हर चीज बची रहे और विकसित हो एवं अपने चरम उत्कर्ष तक पहुंचे. जब हम रजनी तिलक के पहले काव्य संग्रह की कविताओं को देखते हैं तो ये पाते हैं कि वो जीवन से लबरेज़ हैं और उसे आशा से देखती हैं. तभी वो ‘युद्ध नहीं बुद्ध चाहिये’ कविता में कहती हैं कि-

“क्यों खड़ी की तुमने
बारूद के ढेर पर हमारी दुनिया
मुझे जीवन से आस है
मैं सावन को आँखों में भरकर
बहारों में झूलना चाहती हूँ
शांति, ज्ञान, करुणा मेरा गहना
युद्ध,क्रूरता, तृष्णा तुम्हारा हथियार
हिरोशिमा की तड़प मैं भूलना चाहती हूँ.”(पदचाप, पृष्ठ 6 )

यह रजनी तिलक और उनके प्रतिबद्ध लेखन की विश्व दृष्टि है. हाशिये को अपने सृजन के दायरे में लाने वाले रचनाकारों से एक सवाल अकसर पूछा जाता है कि आपकी विश्वदृष्टि क्या है? यह भी तोहमत लगायी गयी कि अस्मितावादी कवि-लेखक सिर्फ अपना रोना रोते हैं. अपनी मुक्ति को ही वो मनुष्य की मुक्ति मान लेते हैं. उनके सवालों का जवाब हैं रजनी जी की कवितायें  और उनका वैचारिक लेखन. रजनी जी दलित-शोषित समुदाय की स्त्री की प्रतिनधि आवाज हैं, लेकिन वो सिर्फ दलितों की पीड़ा और चिंताओं के बयान तक सीमित नहीं है. उनकी  चिंता यह भी  है कि ये धरती जो मनुष्य के जीवन का आधार है, कैसे बचे? क्योंकि आज वैश्विक स्तर पर देखने को मिल रहा है कि फासीवाद और पूंजीवाद के गठजोड़ ने दुनिया को बारूद के ढेर पर लाकर खड़ा कर दिया है. आज संहारक हथियारों की बिक्री से विश्व शांति का ढोंग करने वाले अमेरिका जैसे देश अपनी जी.डी.पी. की विकास दर ऊँची कर रहे हैं. रजनी जी को यह नहीं चाहिए. उनकी चिंता है कि धरती बची रहे. उनका मानना है कि जब धरती बची रहेगी तभी मनुष्यता भी बचेगी. वो ऐसी धरती चाहती हैं जो हरी-भरी हो. क्योंकि वो विकास के उस खतरे को देख रही हैं जो आदिवासियों को उनके जल-जंगल-जमीन के अधिकारों से वंचित कर रहा है. रजनी तिलक सावन को आँखों में भरने की कामना करती हैं. वो नहीं चाहतीं  कि  दुनिया में युद्ध हों. वो नहीं चाहतीं कि नागासाकी और हिरोशिमा जैसी त्रासदी फिर दोहरायी जाये. इसलिए वो कहती हैं-

“हम जंग नहीं चाहते
जीना चाहते हैं
हम विनाश नहीं सृजन चाहते हैं
हम युद्ध नहीं बुद्ध, चाहते हैं.” (वही, पृष्ठ-7)

रजनी तिलक ये बखूबी जानती हैं कि युद्ध के दौरान अमेरिका ने जापान के दो शहरों, नागासाकी और हिरोशिमा में परमाणु बम गिराये थे. उन बमों का असर आज तक वहां बना हुआ है. आज भी वहां के बच्चे मानसिक और शारीरिक रूप से असक्षम पैदा हो रहे हैं. परमाणु विकिरण ने मानव जीन्स तक को प्रभावित किया है. यह बात रजनी तिलक समझती हैं कि युद्ध में सबसे ज्यादा महिलाएं ही प्रभावित होती हैं. इसलिए वो कहती हैं कि हम जीना चाहते हैं. हमें युद्ध नहीं, बुद्ध चाहिए. ये उनकी वैचारिक-सांस्कृतिक प्रतिबद्धता है. रजनी तिलक की एक्टिविस्ट और सर्जक एक कविता में बहुत आसानी से पहचानी जा सकती है. कविता है-‘तुम्हारा मानव अधिकार’

“दादा
तुमने मुझे स्नेह दिया
छोटी बहन समझ
मानवाधिकार का अर्थ
सिखाया
तुम थे जिसने
उसे वाकील का घर दिखाया
विश्वास नहीं होता.

जानना चाहती हूँ आज मैं
बच्चों और स्त्रियों के सवाल
क्या मानव अधिकार के सवाल नहीं?
बच्चों की मुस्कान
स्त्रियों का स्वाभिमान
क्या उनका मानवाधिकार नहीं?” (वही,पृष्ठ 21-22)

स्त्री के  पास अत्याचारों के अनुभवों का एक भण्डार होता है जिसकी चाभी शायद ही कभी किसी के पुरुष के हाथ लगती होगी. स्त्री के प्रति बहुत सदाशयी पुरुष भी अनुकूल समय देखकर पाला बदल देता है. रजनी ऐसे सदाशयी पुरुषों से भी सवाल करती हैं. ये सवाल करने की ताकत उन्हें जीवन में मिले अनुभवों और उनकी आंच में तपकर बाहर निकलने से आई है. स्त्री की नज़र और उसका मन हर भाव को बहुत सटीक तौलता है. स्त्री किशोरावस्था से ही हर छुवन और शब्द के अर्थ  को बिना किसी व्याकरणिक और शब्दकोशीय ज्ञान के समझ लेती है. स्त्री जैविक उमर से पहले  सामाजिक उमर में बड़ी हो जाती है. जब वह कैश्योर्य  जीवन के हुलसते दरिया को पार कर यथार्थ की भीषण जमीन पर खड़ी होकर दुनिया को देखती है तो सच्चे-झूठे  मनोभावों को पहचानने की शक्ति उसमें आ जाती है. यही शक्ति रजनी तिलक से यह कहलवाती है कि-

“परिंदा हूँ मुझे खुला
आसमान चाहिये,
न बरगला
मैं पिंजरा तोड़ के आयी हूँ.
मुझे मेरी
मंजिल है प्यारी,
न डिगा
मैं कांटे रौंद के आई हूँ.
ढूंढ कोई और महबूबा
न बहा अश्क,
मैं आशिकी की दीवारें
फांद कर आयी हूँ.”(वही,पृष्ठ 14)

रजनी तिलक जी की इस कविता का आरंभिक सिरा जहाँ से शुरू होता है वहां उनकी ‘दलित साहित्य (वार्षिकी), 2005   में प्रकाशित कहानी ‘बेस्ट ऑफ़ करवा चौथ’ का अंतिम सिरा जुड़ता है. यह कहानी आत्मकथात्मक शैली में लिखी गयी है. यह कहानी रजनी तिलक की ही कहानी है. यह कहानी उन तमाम स्त्रियों की कहानी भी हो सकती है, जिनके जीवन की कहानियां प्रकाश में नहीं आयीं हैं. इस कहानी में वर्णित कथ्य भारत ही नहीं, विश्व की हर स्त्री का कथ्य है. लेकिन हर स्त्री उस मंजिल तक नहीं पहुँचती. न ही पहुँचने की हिम्मत करती है, जहाँ ‘बेस्ट ऑफ करवाचौथ’ की नायिका पहुँचती है. मानसिक द्वंद्व से गुजरती हुई इस कहानी की नायिका अपनी मंजिल को खुद के लिए करवा चौथ का सर्वोत्तम उपहार मानती है. तमाम स्त्री रचनाकारों की कहानियां ऐसी हैं जिनका कथ्य इस कहानी के कथ्य से मिलता-जुलता है, लेकिन उनमें  और रजनी तिलक में यही फर्क है कि बाकी स्त्री विषयक स्त्री-पुरुष लेखकों की कहानियां शादी और परिवार जैसी घोर स्त्री विरोधी और पितृसत्तात्मक संस्थाओं से अपनी कहानी के स्त्री-चरित्र को बाहर निकलने का रास्ता न दिखाकर बार-बार उन्हीं संस्थाओं की गुलामी करने के लिए बाध्य करते हैं. आप कह सकते हैं कि यह तो संघर्ष से पलायन है.  लेकिन पूरी कहानी में जो द्वंद्व लेखिका ने उभारा है उसको देखते हुये आप यह जानेंगे कि संघर्ष करते हुये जिन्दगी के नए रास्ते तलाशती एक स्त्री का बयान है रजनी तिलक की कहानी ‘बेस्ट ऑफ करवाचौथ.’ रास्ता नहीं उसने तो संभावनाओं का राजमार्ग खोज लिया है. जिस पर चलकर वो मानसिक और भावनात्मक रूप से उत्तरोत्तर मजबूत होती चलती है. जो अपने पति की पहल पर तलाक के कागजातों पर हस्ताक्षर करने के बाद अपनी किशोरवय बेटी को भी मानसिक और भावात्मक रूप से दृढ़ बनने के लिये तैयार करती है. कहानी की नायिका से उसकी बेटी का संवाद देखने लायक है-

“आठ बजे जब मैं अपनी बेटी के साथ खाना खाने बैठी तो मैंने दिन की बातें याद करते हुये उसे बताया कि आज मैंने तलाक पर अपनी सहमति दे दी है.

सुनकर बेटी को दुःख हुआ, लगभग वह रोने लगी. मुझे देखकर वह हैरान भी थी….

“मम्मी आप खाना कैसे खा सकती हैं?” मैं संयत थी. ग्यारह साल बाद इस भ्रमजाल की डोर को काट कर. मुझे न सुख था न दुःख.

“खाना तुम खा लो… बेटे… जीने के लिये… और लड़कर जीने के लिये खाना जरूरी है. उसने बेमन से खाना खाया.”  (बेस्ट ऑफ करवाचौथ, दलित साहित्य वार्षिकी-2005,पृष्ठ 335) 

रजनी जी की नायिका इस पड़ाव पर अनेक संताप, दुःख और मानसिक पीड़ाओं से गुजरकर पहुंची है. जब एक कम्युनिष्ट पति अपनी पत्नी और पांच साल की बेटी को घर से निकाल देता है उसके बाद के संघर्ष का बयान देते हुए नायिका कहती है, “पांच  साल की बेटी को लेकर मैं दर-बदर यहाँ-वहां किराये की खोलियों में भटकती रही. बहुत कठिन दिन थे. न पूरी तनख्वाह न रहने को छत. बेटी के स्कूल व क्रेच का खर्चा.ऊपर से तरह-तरह की असुरक्षा. सुबह से शाम तक बेटी का स्कूल, नौकरी. नौकरी से दोपहर को क्रेच, फिर नौकरी, फिर शाम को क्रेच… फिर घर, भागदौड़… कभी वीमेन सेल तो कभी सेल से वापस उसके द्वारा भेजे ‘दूतों’ के साथ समझौतों की बैठकें…” यह एक सामान्य स्त्री का संघर्ष था जो पितृसत्तात्मक समाज की सभी संस्थाओं- परिवार, शादी, ससुराल आदि सभी के कायदों को अपना चुकी थी. उनमें इसका विश्वास मजबूत हो रहा था. लेकिन एक स्वतंत्र चेता स्त्री इन संस्थाओं की उदारता के प्रति शशंकित भी थी. इसलिये जब कभी वो अपनी चेतना को अभिव्यक्ति देना चाहती तो उसको प्रताड़ना झेलनी पड़ती. यह बहुत पीड़ादायक होता. रजनी की कहानी की नायिका, जो अम्बेडकरवादी है, ने एक कम्युनिष्ट कार्यकर्त्ता से शादी की थी जो हर तरह की गैरबराबरी से मुक्त, जेंडर विभेद से रहित, शोषितों-मजदूरों की सत्ता वाले समाज के लिये घर से बाहर आन्दोलन करता है. जो निजी संपत्ति की अवधारणा पर विश्वाश नहीं करता है. जो स्त्री-पुरुष की जेंडर आधारित भूमिकाओं को ध्वस्त करने की बातें  सभा गोष्ठियों में करता है. जो क्रांति की बात करता है. क्रांति का मतलब समाज में हर तरह के शोषण और भेदभाव से मुक्ति. अस्तित्वमान व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन. लेकिन अपनी ही तरह की सोच रखने वाली पत्नी जो वैचारिक रूप से चेतना संपन्न है, जब अपनी बात कहती है तो उसकी हंसी उड़ाई जाती है. उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है. उस समाज में स्त्री के लिए, उसके विचारों के लिये जगह न थी. उसकी भूमिका उस क्रांतिकारी समाज में भी वही पुरानी वाली थी जो परम्परवादी समाज में थी.  नायिका कहती है कि “शादी के तुरंत बाद हम हनीमून को रोक कर कलकत्ता में राजनैतिक सेमिनार के लिये गए थे. वहां एडवोकेट भगवान दास भी थे,जिन्हें मैं अंकल कहकर पुकारती थी. इस सेमिनार में भगवान दास जी दलित मुद्दों पर एक कार्यशाला ले रहे थे. अचानक वो कुछ देर के लिये बाहर गये. उनके जाते ही उनके बारे में हमारे पति महोदय ने अशोभनीय बातें बोलनी शुरू कीं. उनके लौट आने पर चुप बैठ गये. मुझे यह बात कुछ हजम न हुई. शाम को वापस धर्मशाला (जहाँ हम इनके दोस्तों के साथ सामूहिक रूप से रुके थे.) जाकर मैंने सुबह की बात पर आपत्ति जतायी.

मेरी आपत्ति पर इन्होंने तुरंत चुटकी ली और अपने साथियों को बुलाकर मेरी मजाक उड़ा दी. हँसते-हँसते लोटते-पोटते इन तीनों मित्रों ने कहा-

“ये तो भगवानदास की चेली निकली…पक्की अम्बेडकरवादी.”          

 अम्बेडकरवादी होना जैसे कोई गाली हो.इस शादी से मैं विचारों में ठगी गयी. यह व्यवहार मैं सहन नहीं कर पा रही थी. मेरी रुलाई फूटने लगी.मैं धम्म से वहीं बैठ गयी. रिश्तों का कम्यून. दोस्तों के बीच उनकी-मेरी निजता का कोई भेद नहीं था,बल्कि वे मुझसे भी ज्यादा नजदीक थे. मैं कहाँ से अनावश्यक वहां प्रवेश कर गयी. वहां मेरे लिये रत्ती भर जगह न थी. मैं अब उनके बीच अनर्गल विचित्र दर्शन का अनुसरण करने वाली चेली और घर की मेहरी थी. मैं दोस्तों की कतार से उतार कर चारदीवारी में पहुंचा दी गयी. मुझे अब रोटी बनाना, नौकरी करना, हर बात में हाँ, मेरा कर्तव्य होना चाहिए था.मैंने अपनी शादी के सात साल इसी वातावरण में कैद होकर झेले.” (वही,पृष्ठ 333) रजनी तिलक की स्त्री इतना ही नहीं वह भारतीय कम्युनिस्टों  के सिद्धांत और व्यवहार में जमीन-आसमन के फर्क को भी रेखांकित करती है. वह परम्परावादी पुरुषों को उनके स्त्री विरोधी दकियानूसी विचारों के लिये बहुत दोष नहीं देती है. वह कहती है परम्परवादी पुरुष जैसा व्यवहार निजी जीवन में करता है वह उसका दर्शन है, लेकिन एक  कम्युनिस्ट  का दर्शन तो वह नहीं कहता है जो वह अपने निजी जीवन में बरतता है. वह कहती है-

“कम्युनिस्ट पति का चरित्र और उसका व्यवहार आम आदमी से अलग नहीं था. हर तरह से दमनकारी था. किसी भी तरह से समानता वाला नहीं था. ये वो विद्वान हैं जो शब्दों व कुतर्कों के तीरों से दर्शन की आड़ में अस्मिता को ज्यादा छेद सकते हैं. पुरातनपंथी पति कहेगा तुम मेरी हो. मेरे सिवा किसी की कल्पना न करो. बिल्कुल ठीक. क्योंकि यही उसका दर्शन व समझ है. उसकी समझ की सीमाएं हैं.परन्तु प्रगतिशील साथी कहेगा कि मैं विद्वान हूँ. तुमसे ज्यादा जानता हूँ. मैं एक सिद्धांत के लिये प्रतिबद्ध हूँ.(खोखले अव्यवहारिक सिद्धांत) मेरे प्रति और उसके प्रति एकनिष्ठ होना तुम्हारे लिये आवश्यक है. वरना हमारी पटरी अलग. रात को दिन, दिन को रात कहते-कहते मैं थक गयी.” (वही)

ये कम्युनिस्ट पुरुषों के निजी और वैचारिक जीवन का प्रमुख तनाव है. इस तानव को कमोबेश हर लेखिका ने अपने सृजन में  रेखांकित किया है. रजनी जी की स्त्री इस द्वंद्व को झेलकर बाहर निकलती है और बेटी को साथ लेकर आगे बढ़ती है. जैसा मैंने पहले कहा है कि रजनी जी की चिंताओं के घेरे में हाशिये का समाज है. हाशिये के समाज में भी सबसे निचले पायदान पर स्त्री है. वैसे हर समुदाय की स्त्री दोयम स्थिति में है. लेकिन दुनिया भर के समाजों में स्त्री एकरैखिक सामाजिक-लैंगिक श्रेणी नहीं है. स्त्रियों में सामाजिक,आर्थिक, भौगोलिक स्तरीकरण है. जैसे उत्तर भारत और पूर्वोत्तर भारत की स्त्रियों की स्थिति एक जैसी नहीं है. ऐसे ही कश्मीर की स्त्री और देश के बाकी हिस्सों की स्त्रियों की हालत एक जैसी नहीं है. ऐसे ही अफ्रीका की काली औरतों और वहां की गोरी औरतों की स्थिति एक जैसी नहीं है. भारत में जाति की विशिष्टता के कारण यहाँ की अछूत और दलित-आदिवासी स्त्रियों की सामाजिक-आर्थिक-लैंगिक हैसियत भी सवर्ण स्त्री जैसी नहीं है. स्त्री के जीवन के इस स्तरीकरण और अवसरों की समानता को चित्रित करती हुई रजनी तिलक ‘औरत औरत में अंतर है’ शीर्षक से अपनी एक कविता में कहती हैं-

“एक भंगी तो दूसरी बामणी
एक डोम तो दूसरी ठकुरानी
दोनों सुबह से शाम खटती हैं
बेशक एक दिनभर  खेत में
दूसरी घर की चारदीवारी में
शाम को एक सोती है बिस्तर पे
तो दूसरी काँटों में

एक सतायी जाती है स्त्री होने के कारण
दूसरी सतायी जाती है स्त्री और दलित होने पर
जन्मती है एक नाले के किनारे दूसरी अस्पताल में

एक सत्तासीन है
दूसरी निर्वस्त्र घुमायी जाती है” (पदचाप, रजनी तिलक, पृष्ठ 41-42)

रजनी तिलक स्त्रीवाद के ‘सार्वभौम बहनापा’ की भ्रमित करने वाली अवधारणा को प्रश्नांकित करते हुए  ‘योनि है क्या औरत ?’ नामक अपनी कविता में कहती हैं-

“कल तक हमने भी बहनापे के राग अलापे
हाँ, ‘जागोरी’ ‘सहेली’ ‘निरंतर’
‘फोरम’ की बहनों के साथ
हमारे जज्बात सब सांझे थे
परन्तु आज
शरीर और मन से आजाद
तुम
तुम्हारा सुन्दर संसार
हम कहाँ हैं इस दुनिया में?”(वही, पृष्ठ 83)

रजनी तिलक स्त्रीवाद के उस अकादमिक जगत से सवाल करती हैं, जो यह तो कहता है कि स्त्री-स्त्री में कोई फर्क नहीं होता है. लेकिन वो भारत के वर्ण-व्यवस्था वाले सामाजिक स्तरीकरण और आर्थिक गैरबराबरी से पैदा हुई विषमता की मार झेल रहे स्त्री समुदाय में भी हाशिये पर अवस्थित दलित,आदिवासी,पसमांदा और गरीब स्त्री के सवालों को अपनी बहस का केंद्र नहीं बनाता है. भारत का स्त्रीवाद  इन समुदायों की स्त्रियों को अपने आन्दोलनों में भीड़ के रूप में इस्तेमाल करता है, लेकिन नेतृत्व देने से कतराता है. स्त्रीवादी आन्दोलन से हासिल हुए अधिकारों का विलासिता पूर्ण उपभोग भारत की उच्च वर्ग और उच्च जाति की स्त्रियाँ कर रही हैं. दलित, आदिवासी और पसमांदा स्त्रियों द्वारा बनाये गये दबाव से पैदा हुए अवसरों के लाभ लेते हुए सवर्ण और उच्च वर्ग की ये स्त्रीवादी अनेक अकादमिक संस्थानों में ऊँचे वेतन पर नियुक्त हो गयीं. आने-जाने और सभा सेमिनारों में भाग लेने के लिए विलासपूर्ण यात्रा सुविधाएं हासिल किया. अपने वर्गीय विकास को स्त्री समुदाय का विकास बताया. लेकिन जो महिलाएं भीड़ का हिस्सा थीं उनकी हालत जस की तस बनी हुई है. उनकी सामाजिक-आर्थिक हालत में कोई बदलाव नहीं आया है. तभी रजनी तिलक अपने समुदाय की स्त्रियों की हालत बयान करते हुए कहती हैं कि हम-  

“भारत के नक़्शे पर भिनभिनाती
मक्खियों सी?
हुनर नहीं, शिक्षा नहीं
रोजगार नहीं
रहने को आवास नहीं
रात को अँधेरे में
डूबी हुई आँखें हैं
निराशा में डूबे माँ-बाप
सुबह सबेरे दुधमुहों को
भेजते हैं सड़कों पर
बटोरती है
लोहा,रद्दी,कूड़ा
बुहारती
सड़क,गली,चौबारा!!” (वही)

दलित स्त्री के निर्णय लेने, चयन की आजादी और उसकी यौनिकता पर खुद के नियंत्रण के सवाल पर रजनी तिलक उन सवर्ण स्त्रीवादी महिलाओं से सवाल करती हैं, जो यौन कर्म को उद्योग का दर्जा देकर वैध बनाने की बात करती हैं. सच यह है कि यौन कर्म में लगी सभी महिलाएं सामाजिक रूप से दलित-पिछड़ी-आदिवासी महिलाएं हैं. जो अपनी जिंदगी चलाने के लिए बीस रुपये में अपना शरीर बेचने को तैयार हो जातीं हैं. इनके पास काम नहीं है. जो काम मिलता है उसके लिए वो उपयुक्त नहीं हैं. इनके कौशल विकास के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था नहीं है. जो प्रशिक्षण यदि दिया भी जाता है तो वह मात्र खाना-पूर्ति होता है. कुछ सवर्ण स्त्रीवादी ऐसे हाल में कहती हैं कि यौन-कर्म को उद्योग का दर्जा देकर वैध बनाया जाए. रजनी तिलक तब सवाल करती हैं कि-   

“तुमने हमसे कहा
क्या हुआ अगर
तुम्हारे पास स्किल नहीं
शिक्षा नहीं,पैसे की विरासत नहीं
वर्ण शंकर देवदासी हो
कोल्हाटी की बार गर्ल
या नौटंकी की बेड़िनी
एक योनि तुम्हारी भी है
तुम इसे जमीं बना लो
‘सेक्सवर्क’ का बीज जमा दो
पीढ़ी पर पीढ़ी तर जाओगी
हम बहनें तुम्हारी
तुम्हारे लिये लड़ जाएँगी
पुलिस,कानून,पार्लियामेंट
से भीड़ जाएँगी
सेक्स वर्क को इज्जत दिलाएंगी
हम
संसद पहुँच कानून बनाएंगी” (वही)
रजनी तिलक ऐसी स्त्रीवादियों से एक  प्रश्न करते हुए पूछतीं  हैं कि- 
“एक योनि सवर्ण बहिना की
उन्हें अपनी योनि पर
खुद का नियंत्रण चाहिये
तब दलित स्त्री की आबरू पर
बाजारू नियंत्रण क्यों?
धन्य हो… आपके बहनापे का
आप जैसी जिनकी मुक्तिदात्री हों
उनकी मुक्ति क्या?
गुलामी क्या? (वही,पृष्ठ 83)

रजनी तिलक स्त्रीवाद की मूलभूत अवधारणा ‘सार्वभौम भगिनीवाद’ को भी प्रश्नांकित करती हैं और वो यह कहती हैं कि यह कैसा बहनापा है जो खुद की यौनिकता पर तो स्वयं के नियंत्रण की बात करता है, लेकिन जिनको ‘बहनें’ कहता है उनको अपनी यौनिकता को बाजार के हवाले कर देने की बात कहता है. यहाँ रजनी दलित और सवर्ण स्त्रीवाद के फर्क को रेखांकित करती हैं. यही नहीं वो दलितवादी चिंतन  में दलित स्त्री की जगह और वहां उसके चयन के अधिकार और स्वतंत्रता के हक़ पर दलित पुरुष को भी सवालों के घेरे में लातीं हैं और कहती हैं-

“ तुम मेरे कौमी भाई !
अपनी आजादी मांगते हो
बताते और हमें समझाते हो
उसे पूरी कौम की आजादी!
कौम की आजादी
क्या औरतों की गुलामी है?” (वही, पृष्ठ 31)

दलित समाज में स्त्री के दोयम दर्जे और मुक्ति की बात तो दलित साहित्यकार और चिंतक करते हैं,लेकिन दलित स्त्री अपनी मुक्ति की आवाज खुद नहीं उठा सकती. उसे दलित समाज में नेतृत्वकारी भूमिका में नहीं आने दिया जायेगा. दलित पुरुष ये मानता है कि दलित मुक्ति में ही दलित स्त्री की मुक्ति समाहित है. दलित चिंतक यह मानते ही नहीं कि दलित समुदाय की स्त्री दलित समुदाय में ही गुलामी का जीवन जी रही है. दलित पुरुष हर तरह के भेदभाव से अपनी मुक्ति की बात तो कहता है, लेकिन जब दलित स्त्री दलित समाज में व्याप्त पितृसत्ता से मुक्ति की बात कहती है तो दलित पुरुष उसकी इस आवाज को दलित आन्दोलन को पीछे धकेलने वाली या सवर्ण महिलाओं द्वारा प्रायोजित कृत्य कहता है. यही मुख्य वजह है कि दलित स्त्रीवाद का जन्म हुआ. जिसके फलस्वरूप रजनी तिलक ने दिल्ली में अगस्त-सितम्बर 2017 में  प्रो. हेमलता महिश्वर, डॉ. रजत रानी मीनू, प्रो. विमल थोरात, रजनी अनुरागी आदि सृजनात्मक दलित महिलाओं के साथ ‘दलित लेखिका मंच’ नामक दलिक लेखिकाओं का संगठन बनाया. दलित स्त्रियों का संघर्ष कई स्तरों में है. उसे अपने घर-परिवार में भी लड़ना है और अपने लिए जगह बनानी है. उसे वर्ण व्यवस्था से भी संघर्ष करना है. अपने घर में अपने भाई-बाप और घर के बाहर वर्ण-जाति की भेदभाव मूलक व्यवस्था के पोषक ब्राह्मणवादी पुरुष से भी लड़ना है. रजनी तिलक का सृजनात्मक कर्म और उनका एक्टिविज्म एक साथ सभी मोर्चों पर संघर्षरत था. घर-परिवार और बाहर की विषमता पूर्ण दुनिया से संघर्ष करते हुए रजनी तिलक जी ने  30 मार्च, 2018 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया. उनका असमय जाना समता और सामाजिक न्याय के आंदोलनों के लिए बड़ी क्षति है, लेकिन उन्होंने साझे संघर्ष की जो विरासत छोड़ी है आने वाली पीढ़ियाँ उस विरासत के सहारे समतामूलक समाज-निर्माण की मंजिल प्राप्त करने के लिए अपनी यात्रा जारी रखेंगी.    

                             अध्येता दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी दलित लेखन में पीएच.डी. हैं. दलित, स्त्री और हाशिये की अस्मिताओं के मुद्दों पर लिखते रहते हैं. आलोचना की एक किताब पितृसत्ता और साहित्यप्रकाशित. तीन सम्पादित किताबें, ‘यह पलास के फूलने का समय है, चुनिन्दा दलित आदिवासी कविताएँ,मार्क्सवाद और अम्बेडकर, अभय मौर्य एवं ‘हिंदी दलित साहित्य की यात्रा’प्रकाशित हैं. ‘पाखी’, ‘हंस’, ‘स्त्रीकाल’, ‘बयान’, ‘दलित साहित्य वार्षिकी’, ‘अपेक्षा’, ‘युद्धरत आम आदमी’, ‘मगहर आदि पत्रिकाओं में लेख व शोध पत्र प्रकाशित हैं.सम्प्रति स्वतंत्र लेखन.संपर्क– 9560713852

युवा आलोचक अरुण प्रियम स्त्रीवादी आलोचना में सक्रिय हैं : [email protected]

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