सीपीआई-विधायक दल के पूर्व नेता ने पार्टी को कहा था लालू प्रसाद का पिछलग्गू

राजकुमार पूर्वे/ प्रस्तुति : अरुण नारायण

लेनिन ने कहा था, बुर्जुआ जनतंत्र में जनता हर बार अपने नए शोषक का चुनाव करती है इससे जनता के गले में लगे गुलामी के पट्टे का रंग बदल जाता है लेकिन गुलामी का पट्टा कभी नहीं खुलता। इस आलोक में सीपीआई के कई टर्म विधायक और 5 साल विधायक दल के नेता रहे राजकुमार पूर्वे का यह आत्मकथा अंश अवश्य पढ़ना चाहिए कि 90 के दशक की सीपीआई संसदीय राजनीति में किस तरह सत्ताधारी वर्ग की पिछलग्गू होती रही और हर तरह के यथास्थितिवाद की पोषक बनी रही है। 1967 में बिहार में जब पहली गैर कांग्रेसी सरकार महामाया प्रसाद के मुख्यमंत्रीत्व में बनी थी तो उस समय सीपीआई से तीन मंत्री बने थे। लोहिया जी ने उसे लक्षित करते हुए कहा था कि बिहार में सीपीआई अपर कास्ट की पार्टी है। तीनों मंत्रियों को उंची जाति से लिया गया है। इसी प्रकरण को और अलगाते हुए सोशलिस्ट पार्टी बिहार के अध्यक्ष प्रणव चटर्जी ने राजकुमार पूर्वे का उदाहरण देते हुए कहा था कि भाकपा के तो कोई विधायक इनके जोर के नहीं है। फिर भी इन्हें मंत्री नहीं बनाया गया, क्योंकि ये पिछड़ी जाति के हैं। पार्टी का जातिगत आधार आज भी भूमिहारवाद से मुक्त नहीं हुआ है। कन्हैया अक्सर कहते रहे हैं कि उन्होंने अर्जी देकर किसी जाति में जन्म नहीं लिया सही है लेकिन जाति के प्रिवेलेज से उन्हें निषेध भी तो नहीं है।
अरुण नारायण

आत्मकथा अंश

1995 का विधानसभा चुनाव हो चुका था। इस चुनाव में जद से एक गुट हट कर समता पार्टी बना लिया था जिस कारण लालू जी ने जन और वाम (भाकपा और माकपा) के साथ सरकार बनाने का दावा किया था। सभी विधान सभा क्षेत्रों में तीनों दलों के साथ रैली होती रही। सभी बड़ी रैली (सभी विधान सभा क्षेत्रों) में लालूजी रहते ही थे। इस समय भी इनका मिजाज बहुत ऊंचा था। हमारी पार्टी को वास्तव में वे पिछलग्गू समझते थे। इनका ख्याल था कि इनकी कृपा से ही हम इसके पहले लोकसभा में 8 सीट जीते थे। अतः इस विधान सभा में वे हमारे साथ मालिक (मास्टर) जैसा व्यवहार करते थे। बेतिया विधान सभा क्षेत्र में जद और भाकपा दोनों ने दोस्ताना चुनाव लड़ने का लिखित फैसला कर लिया था। अखबारों में इसका प्रकाशन भी हुआ था। संयुक्त रैली दोस्ताना ही हुई। हमारी पार्टी के लोग हजारों की संख्या में लाल झंडा के साथ रैली में आये थे। हमारा उम्मीदवार भी। परन्तु उसी रैली में लालू जी ने ऐलान किया हमारे नेताओं (राज्यसचिव सहित) के समक्ष कि ‘‘भाकपा उम्मीदवार बैठ जायेगा। आप लोग जद उम्मीदवार को जिताएं।’’ ऐसे माहौल में हमारे लोग स्वाभाविक पस्त हो गये। हमारे कोई नेता वहां कुछ नहीं बोले कि इस क्षेत्र में हमारे साथी भी चुनाव लड़ेंगे।  समझौता के अनुसार यहां दोनों दल के उम्मीदवार दोस्ताना लड़ेंगे जो जीत जाएं, मोर्चा में रहेंगे। (2) इसी तरह से सोनबरसा (सहरसा जिला) में जहाँ हमारी पार्टी के एक उम्मीदवार खड़े हो गए थे जिन्हें पार्टी समझाने-बुझाने में लगी हुई थी, के विषय में वहां की एक रैली में लालूजी ने कहा ‘‘आज शाम तक इस उम्मीदवार को सीपीआई से निकाल दिया जाएगा।’’ जैसे वही हमारी पार्टी के महामंत्री थे। इतना ही नहीं इनका मिजाज इतना चढ़ गया था मानो भाकपा का कुछ आधार बच ही नहीं गया है। हम बिल्कुल इनकी दया पर खड़े हैं। लालू जी ने 3 मार्च 1995 को गया की रैली में भाकपा को अपमानित करते हुए कहा ‘‘‘‘Where is your mass base? and added that they should get free uniform for that is green blouse and red under wear.” Patna edition Times of India में प्रकाशित हुआ 4 मार्च को। दुःख है पार्टी की ओर से इसका जवाब नहीं दिया गया। पूछने पर मुझे कहा गया अखबार वाले ने गलत छापा है। हमारे लोग मगन थे कि इस बार सरकार में जाना है। इसीलिए इस पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं किया। चुनाव का पूरा रिजल्ट हुआ भी नहीं था कि हमारे नेताओं ने पूछने पर पत्रकारों को कहा ‘‘हमलोग सरकार में जाने के प्रश्न पर विचार कर रहे हैं।’’ ‘मान-न-मान मैं तेरा मेहमान।’ रिजल्ट निकला, हमें सरकार में शामिल होने के लिए न्यौता मिलता, तभी तो हम विचार करते। हाल ऐसा हुआ कि इस बार 1995 के विधान सभा में जद से निकल कर समता या सपा का हाल बहुत खराब हुआ। लालू जी को वाम को छोड़कर अकेला बहुमत इस बार 1990 के विपरीत आया। वे अकेला सरकार बना लिये। भाकपा तो विरोधी बेंच पर सदन में बैठी, परंतु हमारी पार्टी ने इस सरकार को रचनात्मक सहयोग देने का इकतरफा-बिना सहयोग मांगे- समर्थन देने का ऐलान, इतने अपमान के बावजूद पहले कर दिया। किसी तरह बाद में हम विरोधी बेंच पर बैठे तो लालूजी ने धमकी दी कि वे भाकपा को तोड़ देंगे। हमारी ओर से कोई प्रतिकार नहीं हुआ। हम सदन में विरोधी बेंच पर जरूर बैठते हैं। परंतु लालूजी समझते थे कि भाकपा नेतृत्व उनकी मुट्ठी में है। हम वैसा ही व्यवहार में पहले जैसा करते हैं। पहले झारखंड मुक्ति मोर्चा ने जब 90-95 के बीच अपना समर्थन जनता दल सरकार से वापस ले लिया तो हम अपना लिखित वादा तोड़कर राज्यसभा के चुनाव में झारखंड मुक्ति मोर्चा के समर्थन में लालूजी के कहने पर यह कह नहीं सके कि झारखंड मुक्ति मोर्चा के उम्मीदवार दल-बदलू हैं। कुछ महीनों बाद हम बिहार के एक सामंत परिवार के पूर्व कांग्रेसी सांसद और इस वक्त भी कांग्रेसी जो कांग्रेस नेता और पूर्व कांगे्रस के मुख्यमंत्री सत्येन्द्र नारायण सिंह की पत्नी का समर्थन करने लगे, उसे लालूजी ने खड़ा किया और इनके ‘आदेश’ पर हमने इस महिला दल-बदलू का समर्थन वैशाली संसदीय क्षेत्र के उपचुनाव में किया। हमारा दल-बदलू का सिद्धान्त बदल गया। इसी तरह से चतरा उपचुनाव विधान सभा का हुआ। उपचुनाव इसलिए हुआ कि माकपा के उम्मीदवार की हत्या हो गई थी। हमारी पार्टी माकपा के उम्मीदवार का समर्थन कर रही थी। इनकी हत्या के फलस्वरूप उपचुनाव में शहीद उम्मीदवार की पत्नी खड़ी थी। जद ने इस बार अपना उम्मीदवार खड़ा किया। लालूजी का ‘आदेश’ हुआ हमने वाम यूनिटी की जगह माकपा के विरोध में जनता दल का समर्थन किया जबकि जनता दल की सरकार पूर्ण बहुमत में थी। यह सिद्धांत वाम जनवादी मोर्चा और व्यवहार में पूंजीवादी पार्टी का पिछलग्गू बनना। इसके पहले भी हमारे तत्कालीन महामंत्री और वर्तमान गृहमंत्री जब हमारे ट्रेडिशनल सीट पर लालूजी पटना संसदीय उपचुनाव में उम्मीदवार खड़ा कर रहे थे। मिलने गए तो लालूजी से कहा कि जब हम सहयोगी पार्टी हैं तो हमारी सीट पर वे उम्मीदवार नहीं दें तो लालूजी ने कहा कि वे दो करोड़ रुपये खर्च करेंगे, भाकपा इतना खर्च नहीं करेगी, वे ही भाजपा को हरा सकते हैं। इस क्षेत्र में जद (लालूजी) ने वादा किया था कि ‘‘वे आगे इस क्षेत्र में नहीं लड़ेंगे, यह भाकपा की सीट है।’’ अनेकानेक उदाहरण हैं, पिछलग्गू बनने के। इससे हमारे जनाधार पर बुरा असर हुआ। वैशाली क्षेत्र में हमारी कई यूनिटें टूट गयीं। हमारे आदेश को तोड़कर लोगों ने काम किया। जद के जातीय उन्माद का असर ऐसा था कि उसके जातिवादी सिद्धान्त की लपेट में आकर हमारे पीछे चलने वाली जनता का बड़ा हिस्सा ही नहीं पार्टी सदस्य ने भी खुलकर अपने उम्मीदवार को हराया और जद को जिताया।

इतने पर भी हमने अपनी नीति को बदल कर पार्टी के माक्र्सवादी आधार पर खड़ा करने के बदले जद का दुमछल्ला बने ही रहना उचित समझा। जब बिहार में घोटालों की जानकारी आने लगी और लालूजी की सरकार अनेकों घोटालों में फंसी-खासकर पशुपालन घोटाला में लालूजी खुद फंसने लगे तो लालूजी ने इसकी जांच विधायकों द्वारा कराने का ऐलान किया। इस विभाग (पशुपालन विभाग) के तत्कालीन लालूजी की सरकार के मंत्री ने इसकी जांच सीबीआई से कराने के लिए मुख्यमंत्री से अनुरोध किया था। हमारी पार्टी ने सिर्फ सीबीआई द्वारा जांच का ऐलान या समर्थन नहीं किया, बल्कि इसका विरोध किया और लालूजी द्वारा विधान सभा की कमिटी द्वारा जांच को सही कहा और इसी की मांग की। इस कमिटी की जांच का कोई कानूनी असर नहीं है। यह तो सरकार को ही सिर्फ अनुशंसा करेगी। भाजपा सीबीआई से जांच के लिए पटना उच्च न्यायालय गयी जहां से सीबीआई से जांच का आदेश हुआ। लालूजी इसके खिलाफ उच्चमतम न्यायालय गये। वहां से भी सीबीआई से जांच का आदेश हुआ। अब तो किसी भी तिकड़म से जांच (सीबीआई द्वारा) को रोका नहीं जा सकता, तब हमारी पार्टी ने कहा सीबीआई से जांच हो। ऐसे हास्यास्पद फैसलों से हमारा मखौल लोग उड़ाते हैं और हमें पिछलग्गू के अलावे कुछ नहीं समझते हैं। …. भाजपा ने लालूजी की सरकार के घोटालों, खासकर पशुपालन घोटाला के खिलाफ एक पुस्तक निकाली।…. हमारे एक साथी, जिला मंत्री जहानाबाद, ने कहा कि ‘जनशक्ति’ 50 प्रति वे 8 दिनों में बेच सके और भाजपा के एक व्यक्ति ने घोटालों पर लिखी गई पुस्तक की 200 प्रतियां 20 मिनट में बेच दिया। घोटाला और बिहार के सवाल पर एक बड़ी आमसभा चार वाम दलों ने साथ किया और बिहार बंद किया। लालू जी ने हमें चूहिया से संबोधित किया। हम अभी राजनीतिक उलझन में फंसे हुए हैं। हम न उधर के हैं न उधर के ।हम सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ जुझारू संघर्ष नहीं करते हैं। .ऐसा करके हम भाजपा करे बढ़ते रहने का मौका दे रहे हैं, अपने वर्तमान टैकटिकल नीति से।

रक्षण की घोषणा के बाद जिस तरह का पिछड़ी जातियों में उभार पैदा हुआ था अगर हम आरक्षण के पक्ष में संगठित आंदोलन खासकर प्रचार आंदोलन चलाते, साथ ही संपूर्ण मंडल कमीशन की अनुशंसा के लिए आंदोलन चलाते और आम जनता के हित के लिए संघर्ष चलाते तो सही मायने में सामाजिक न्याय का आंदोलन होता, जनवादी एकता आम लोगों में बनती और पिछड़ी जातियों के इस उभार के, जनता जो हमें अपना मित्र समझती थी, का एक हिस्सा हम अपनेसाथ आंदोलन में ला सकते थे और यह हिस्सा हमारे आंदोलन के प्रति सहानुभूति रखता। हमारे लिए यह सुनहरा अवसर पार्टी के विकास के लिए था। मैंने हजारीबाग पार्टी के राज्य सम्मेलन में लिखित संशोधनभी दिया था। लेकिन हमने इस अवसर को खो दिया और जनता दल के पिछलग्गू की बने रहे। नतीजा यह हुआ कि सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष को जातीयता की ओर जनता दल ने जानबूझकर क्षणिक वोट जीतकर राज करने के लिए मोड़ दिया। इससे समाज में तनाव और अराजकता फैली। पूंजीवादी पार्टियों के बीच में जनता बंटती गई। हमारा जनाधार कमजोर हुआ। हमारी पार्टी संगठन में भी इसका असर इस प्रकार हुआ कि राष्ट्रीय परिषद के एक सदस्य ने जनता दल सरकार के एक मंत्री के साथ आम सभा में मंच पर अपने को शंकराचार्य घोषित किया और वेश भी शंकराचार्य का बनाकर मंच पर बैठे थे। अखबारों में इनकी तस्वीर छपी। आम लोगों में इसकी प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक था।जनता दल के मंत्री ने इसके तुरंत बाद अपना बयान अखबार में दिया कि उन्होंने नाटक किया था। अपनी गलती मानते हुए उन्होंने  यह बयान दिया था।परंतु हमारे राष्ट्रीय परिषद के नेता की ओर से कोई बयान नहीं आया और न हमारी पार्टी ने इनकी कोई आलोचना की। कोई अंदाजा कर सकता है कि हमारे संगठन पर भी, आम लोगों के अलावा इसका कितना कुप्रभाव हुआ? मैंने राज्य और राष्ट्रीय परिषद में भी लिखित शिकायत इसकी की कि यह राजनीति और सिद्धांत-दोनों ही दृष्टि में गलत है। पूंजीवादी पार्टी ने भी इसकी आलोचना की किंतु इसका कोई असर नहीं हुआ उल्टे वे सज्जन विधानसभा में दल के उपनेता बनाकर पदोन्नत किए गए।

लालू प्रसाद वीपी सिंह, ज्योति बसु के साथ

सीपीआई विधायक एवं विधान पार्षद राजकुमार पूर्वे की पुस्तक ‘स्मृति शेष’- के पेज 181 से 186 के बीच के संपादित अंश। अन्वेषा प्रकाशन, मैत्री शान्तिभवन, बी.एम.दास रोड, पटना-800004 प्रथम संस्करण, फरवरी, 2005 से साभार। 

राजकुमार पूर्वे का परिचय

26 मार्च, 1925 को ग्राम धकजरी, थाना-अरेड़ (बेनीपट्टी), जिला-मधुबनी (दरभंगा) में जन्में राजकुमार पूर्वे ने मैट्रिक तक की शिक्षा पाई। 1936, डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद से खादी के महत्व को सुना और खादी धोती, कुर्ता, टोपी पहनना शुरू किया। 1937 से 1946 तक  कांग्रेस पार्टी का चवनिया सदस्य रहे। 1940 में एआईएसएफ. (अखिल भारतीय छात्रसंघ में शामिल) में शामिल हो गए।1944 भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य (आजीवन) बने।

1958 ई.-बिहार राज्य खेत मजदूर यूनियन की स्थापना के समय प्रथम महासचिव निर्वाचित हुए। 1943 से 1992 तक तकरीबन 9 बार स्वतंत्रता, भूमि सुधार आंदोलन, खेत मजदूर की मजदूरी, सामाजिक अत्याचार व राजनीतिक, सामाजिक एक्टिविजम में जेल गए। भूमिगत, फरारी का जीवन जिया। 7 बार पैतृक संपति की नीलामी की गई। 

 मार्च 1962 से मार्च 1985 तक बिहार विधानसभा के सदस्य रहे।1972 से 1977 तक बिहार विधान परिषद के सदस्य रहे। उन्होंने विधान सभा में लोक लेखा समिति एवं अन्य समितियों के अध्यक्ष के रूप में कई उल्लेखनीय कामों के लिए चर्चित रहे। 1980-85 में विधान सभा में कम्युनिस्ट विधायक दल के नेता रहे।

  9 अक्टूबर 1997 को कोचीन (केरल) में उनका निधन हो गया। 

बहुजन मुद्दों में सक्रिय लेखकीय हस्तक्षेप करने वाले अरुण नारायण लेखक एवं सबाल्टर्न पत्रिका के संपादक हैं.

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