मध्यवर्गीय कामकाजी स्त्रियों के कशमकश भरी जिंदगी की कविताएं !

विनीता परमार केबी पतरातु (झारखंड) में शिक्षिका के पद पर कार्यरत हैं. कविता संग्रह “दूब से मरहम” प्रकाशित .

1.
काले पैंट सफ़ेद शर्ट में
सहसा ऑर्डर लेने खड़ी वो
एक प्लेट चिकेन, चार नान,
स्टार्टर विथ हॉट एंड सोर सूप ।

खाना परोसते समय साधना होता था हाथ
नहीं मिलनी चाहिए बिगड़ैलों से आँख
टेबल के पास खड़ी-खड़ी कर रही खाली प्लेटों का इंतजार
हर प्लेट को उठाते
चटक जाता था अन्दर
जैसे कोई कांच का ग्लास

नहीं कर रही किसी मैनेजमेंट की ट्रेनिंग
मैनेज कर रही भाई का स्कूल बैग
बहन का टिफिन बॉक्स
अपनी नौकरी के फॉर्म का हिसाब
बंधे जुडों में बांध रखी है अपनी हंसी ।

2 .
हवाई जहाज में उड़ने का सपना लिए
सीखी थी अंग्रेजी
नियमों को बताना
हाथों को हिलाना
फिर शुरू होती थी
केक, पेस्ट्री

हॉट वॉटर, कोल्ड कॉफी की सर्विंग ।
हर यात्रा के बाद जमा की गई
खाली बोटलों और ग्लासों के
साथ जमा करती थी
दबी… शुक्रिया वाली हंसी ।

3.
शादी-ब्याह के बदल गए रंग
केटरर को ठेके के बाद
सब कुछ हो जाता है चुटकियों में बंदोबस्त
बारात की स्वागत के लिए
खाना परोसने से प्लेट उठाने तक
पैंट-शर्ट पहनी स्मार्ट
लड़कियों की ही थी डिमांड ।

देर रात तक हर व्यक्ति से पूछती
खाने की पसंद
खाते-खिलाते
प्लेट जमा करते
कबका भूल चुकी खाने का स्वाद.

5.
सुर्ख लाल लिपस्टिक
सधा आइलाइनर
स्ट्रेट बालोंवाली
बगल वाले गांव से भागती आती
बिग बाज़ार , विमार्ट, एफबीबी वगैरह- वगैरह में काम करती वो लड़की
ट्रायल रूम में ही लटका देती है पर्स वहीं छोड़ देती है टिफिन
दिखलाती है रंग बिरंगी साड़ियां और शूट ।

तभी आती है आवाज़ मैजेंटा कलर की शूट बतलाना
उपर – नीचे , आगे- पीछे देख
कोशिश करती है मैनेज करने की ।
व्हाट ए नॉनसेंस के साथ
थरथराती आवाज़ में सहमी सी
नई हूं थोड़े दिनों में ही सीख लूंगी
सारे रंग
मुझे भरने हैं अपने घर में
आसमान सा नीला रंग ।

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