न्यायपालिका में यौन शोषण का मामला पहला नहीं है और न्याय नहीं हुआ तो आख़िरी भी नहीं होगा

अरविंद जैन


देर आयद दुरुस्त आयद के तर्ज पर भारत के सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने अपने खिलाफ़ यौन उत्पीड़न की जाँच, न्यायमूर्ति बोबड़े को सौंप दी है। न्यायमूर्ति बोबड़े ने आंतरिक समिति में, न्यायमूर्ति एन. वी.रमन्ना और इंदिरा बनर्जी को रखने का फैसला लिया है। काश! यह फैसला शनिवार को ही ले लिया गया होता, तो कितना बेहतर होता। किसी को यह नहीं लगता कि मीडिया, सुप्रीम कोर्ट बार या किसी और दबाव-तनाव में लिया फैसला है। खैर… न्यायिक विवेक जागा तो सही, भले ही थोड़ी देर से।

शिकायत कर्ता महिला और उसका पति चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के साथ

मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई पर यौन शोषण के गंभीर आरोप लगे हैं, जिसे ‘षड्यंत्र’ कह कर ‘न्यायपालिका पर खतरा’ बताया जा रहा है. कोई भी कैसे भूल सकता है कि यह न्यायिक परिवार के मुखिया पर आरोप हैं! मीडिया में खबर आते ही शनिवार को तीन जजों की विशेष पीठ का गठन हुआ और पीठ में खुद मुख्य न्यायधीश मौजूद रहे, हालांकि फैसले पर उन्होंने हस्ताक्षर नहीं किये. क्यों नहीं किये हस्ताक्षर? दोनों न्यायमूर्ति ने भी आदेश में लिखा है कि यह कोई ‘न्यायिक आदेश’ नहीं है. ‘न्यायिक आदेश’ नहीं है तो क्या है? मिडिया पर कोई रोक नहीं लगाई गई बल्कि कहा गया कि अपने विवेक से समाचार प्रकाशित करें. सर्वोच्च न्यायालय के इतिहास में इस तरह और ऐसी ‘संदेहास्पद’ और ‘रहस्यमयी’ कार्यवाही शायद कभी नहीं हुई. हम सब जानते हैं कि आरोपों की जाँच और सुनवाई के समान अवसर दिए बिना, न्याय संभव नहीं हो सकता.

दरअसल न्यायपालिका के संकट या खतरे बाहरी कम, भीतरी अधिक है.अगर संविधान के रक्षकों पर ही, स्त्री अस्मिता खंडित करने के गंभीर आरोप (सही या गलत) लग रहे हैं और न्यूयार्क टाइम्स तक में छप रहे हैं, तो यह अपने आप में बेहद संगीन मामला है. न्याय मंदिरों के ‘स्वर्ण कलश’ ही कलुषित होने-दिखने लगे, तो फिर ‘लज्जा’ कहाँ फरियाद करेगी? समय रहते इसका समुचित समाधान ढूँढने और उसे कारगर रूप से लागू करने की मुख्य जिम्मेवारी, निस्संदेह न्यायिक परिवार के मुखिया और अन्य सदस्यों की ही है.

इससे बड़ी न्यायिक विडम्बना और क्या होगी कि देश की सर्वोच्च अदालत ने (‘विशाखा’ बनाम राजस्थान राज्य, ए.आई.आर. 1997 सुप्रीम कोर्ट 3012) ‘कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न’ रोकने के लिए, 13 अगस्त 1997 को जो एतिहासिक ‘दिशा-निर्देश’ जारी किये थे, उन्हें खुद अपनी अदालत में लागू करने में लगभग 17 साल लग गए. सरकार और कानून मंत्रालय भी विधेयक बनाने के बारे में 17 साल तक सोचते-विचारते रहे. आख़िरकार, 22 अप्रैल 2013 को कानून बन पाया. कारण एक नहीं, अनेक हो सकते हैं, पर इससे लिंग समानता और स्त्री रक्षा-सुरक्षा के सवाल पर, विधायिका और न्यायपालिका की गंभीरता का अनुमान तो लगाया ही जा सकता है.

इससे पहले न्यायमूर्तियों और वरिष्ठ अधिवक्ताओं पर भी यौन शोषण के आरोप लगते रहे हैं. आए दिन महिलाओं के साथ होने वाले यौन उत्पीडन, अत्याचार के दुखद हाद्सो के बावजूद समाज, मीडिया और न्यायपालिका की ख़ामोशी का मतलब क्या है? क्या औरतें यह सब होने-देखने के लिए ही अभिशप्त हैं? न्यायपालिका में पारदर्शिता पर चल रही बहस के बीच में ही, एक और ‘दुर्घटना’ हमारा सामने आई थी. मध्य प्रदेश उच्च-न्यायालय (ग्वालियर) के न्यायमूर्ती एस.के.गंगेले द्वारा यौन उत्पीड़न से परेशान महिला सत्र-न्यायाधीश द्वारा त्यागपत्र देने की. महिला की शियाकत पर, सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश आर.एम. लोढ़ा ने कहा था कि ”यह एकमात्र ऐसा पेशा है, जिसमें हम अपने सहयोगियों को भाई और बहन के रूप में देखते हैं। यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण घटना है. मेरे पास शिकायत आई है और मैं इस पर उचित कार्रवाई करूंगा.” जांच कमेटी द्वारा न्यायमूर्ती एस.के.गंगेले को ‘क्लीन चिट’ के बाद, महिला सत्र-न्यायाधीश ने फिर से सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया लेकिन कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आ पाए.

आश्चर्यजनक है कि समाज के सर्वश्रेष्ठ और संदेह से परे तक ‘सम्मानित’ माने-समझे जाने वाले क्षेत्रों (शिक्षा, चिकित्सा, न्यायपालिका, मीडिया आदि) से भी, महिलाओं के देह-दमन के शर्मनाक समाचार निरंतर बढ़ते जा रहे हैं. न्याय के प्रांगन से बचाओ…बचाओ की चीख-चिल्लाहट, अस्मत के बदले इंसाफ़ की दास्ताँ या किसी न्यायमूर्ति द्वारा नौकरी पाने-बचाने की ऐसी शर्मनाक शर्तें, सचमुच गंभीर चेतावनी और चिंता का विषय है. पुनर्विचार करना पड़ेगा कि न्यायधीशों की चुनाव प्रक्रिया में किस-किस खामी के कारण, अनैतिकता और बीमार मानसिकता भी चोरी छुपे प्रवेश कर रही है. चारों ओर से सवालों का घेराव बढ़ता जा रहा है. पीड़ित स्त्री रोज एक ही सवाल पूछ रही है कि क्या न्याय की अंधी देवी के हाथों में सज़ा देने वाली तलवार को जंग लग चुका है? न्याय और कानूनविदों के चाक-चौबंद किले में, ‘कुलद्रोहिओं’ का क्या काम?

दरअसल शिक्षित और स्वावलंबी स्त्रियों को दोहरी भूमिका निभानी पड़ रही है. आज़ादी के बाद शिक्षा-दीक्षा के कारण स्त्रियाँ बदली हैं….बदल रही हैं, परन्तु भारतीय शिखर पुरुष अपनी मानसिक बनावट-बुनावट बदलाने को तैयार नहीं है. एक तरफ पुरुषों के लिए यह सत्ता से भी अधिक, लिंग वर्चस्व की लड़ाई है और दूसरी ओर स्त्रियाँ अपने सम्मान और गरिमा पर हुए हमले का हर संभव विरोध करने लगी है. दमन और विरोध के इस दुश्चक्र में यौन शोषण, उत्पीड़न और हिंसा लगातार बढ़ रही है.

समानता के संघर्ष में स्त्रियों का विरोध-प्रतिरोध या दबाव-तनाव बढ़ता है, तो कुछ उदारवादी-सुधारवादी ‘मेक-अप’ या ‘कॉस्मेटिक सर्जरी’ की तरह, नए विधि-विधान बना दिए जाते हैं और कुछ और सुधारों के सपने दिखा दिए जाते हैं. सच है कि सिर्फ कानूनी विधान-प्रावधान बना देने भर से, समस्या का समाधान नहीं होगा. विशाखा दिशा-निर्देशों की छाँव में ढले-पले अधिनियम में, अभी भी ढेरों अन्तर्विरोध और विसंगतियां मौजूद हैं. अधिनियम में ‘कानूनी गड्ढों’ और चोर रास्तों के रहते, यौन उत्पीड़न और स्त्री-विरोधी अपराधों पर लगाम लगा पाना मुश्किल होगा.

कोई भी व्यक्ति कानून से उपर नहीं है और हमें नहीं भूलना चाहिए कि हक़ मांगने वाली आवाजों को चुप कराना या रख पाना अब नामुमकिन है. शायद मीडिया को परोक्ष रूप से डरा-धमका कर झुकाया जा सकता हो, मगर सोशल मीडिया का गला घोंटना असंभव है.1860 के न्याय-शास्त्रों और सिद्धान्तों से, इक्कीसवीं सदी के वर्तमान भारतीय समाज, विशेषकर स्त्री-समाज को नहीं चलाया जा सकता. बदलते समय-समाज में सोचना पड़ेगा कि स्त्री-पुरुष समानता के सिद्धांत व्यवहार में कैसे बदलें. आम व्यक्ति की आखिरी उम्मीद हैं न्यायपालिका और हर न्यायमूर्ति से यह अपेक्षा है कि वह निष्ठा और नैतिक मानदंडों पर खरा उतरे. यह कहने से काम नहीं चलेगा कि समाज का नैतिक पतन हो रहा है और न्यायाधीश भी उसी समाज से आते हैं, सो आदर्श व्यवहार की आशा नहीं करनी चाहिए. न्यायधीश की निष्पक्षता और नैतिकता संदेह से परे होना लाज़िमी है. भारतीय समाज “न्यायधीश की बौद्धिक ईमानदारी और नैतिक चरित्र” को, “स्त्री के कौमार्य और पवित्रता” की तरह ही देखता-समझता है. निष्पक्ष न्यायधीशों के बिना, प्रजातंत्र और कानून के राज्य की रक्षा कैसे होगी? ‘आधी आबादी’ बड़ी उत्सुकता और बेचैनी से सम्पूर्ण न्याय की बाट जोह रही है. उसे यह विश्वास दिलाना ही होगा कि इंसाफ़ होने में देर या अंधेर नहीं होगा

लेखक वरिष्ठ न्यायविद हैं. संपर्क: [email protected]

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