आज का स्त्रीलेखन सहज और ज्यादा आत्मविश्वासी है

विवेक मिश्र

रचना किसी भी समय में आसान नहीं होता. कोई समय पुरुष रचनाकार केलिए जितना कठिन और जोखिम भरा होता है स्त्री के लिए हमेशा उससे कहीं ज्यादा कठिन और जोखिम भरा होता है. उसके अपने द्वंद्व और अपने जीवन संघर्ष उसे और कठिन तथा जोखिम भरा बनाते हैं.

क्लॉक वाइज विजय श्री तनवीर, अंजू शर्मा, सपना सिंह, रजनी दिसोदिया

हम जब लिखते हैं तो किसी न किसी रूप में जीवन और उसके आस-पास फैले यथार्थ का ही संधान करते हैं, …और जीवन सृष्टि के कितने कौनों अंतरों में कितनी-कितनी परतों में सतत प्रवाहमान है. ऐसे में किसी कहानी में किसी घटना, या उससे जुड़े यथार्थ को समय सापेक्ष रखकर ही पकड़ा जा सकता है. पर सापेक्षता में आज कठिनाई ये है कि जिस गति से समय बीतता है, आज उससे कई गुणा तेज़ी से वह बदल जाता है. आप एक बात को जब तक जानते हैं, समझते हैं तब तक वह बदल जाती है. इसलिए ऐसे समय में किसी घटना, उससे जुड़े यथार्थ को पकड़ना उसके लिए कोई मेटाफर रचना बहुत कठिन हो जाता है. इसलिए कहा जा सकता है कि आज रचना के लिए बहुत सारा कच्चा माल हमारे चारों तरफ होते हुए भी अच्छी और स्थायी प्रभाववाली रचना, कोई कहानी लिख पाना बहुत चुनौतीपूर्ण काम है. आज रचनाकार जब तक एक समय से ताल मिलाकर यथार्थ का एक कोना पकड़ता है, तो उसी समय उससे उसका दूसरा कोना छूट जाता है.

आज सूचनाओं के विस्फोट के इस समय में जो अभी नया है वह पलक झपकते पुराना हो जाता है, जो सच्चा है वो झूठा हो जाता है और जो झूठा है वो सच्चा हो जाता है. आज क्षणिक आधुनिकता का समय है जहाँ बच्चे के पैदा होने से उसके पालने में आने तक समय और उसकी समझ बदल जाती है. यह एक खंड-खंड यथार्थ का,एक फ्रेक्चर्डरियलिटी का समय है, और ऐसे समय में निर्मित होती स्मृति भी उसी फ्रेक्चर्ड रियलिटी का रिफ्लेक्शन है. इसलिए वह भी खंड-खंड है, फ्रेक्चर्ड है. इसलिए यथार्थ, स्मृति और कल्पना से मिल के भी कोई सर्वस्वीकृत पात्र, कोई पूरे समय का प्रतिनिधित्व करता नायक, या कोई रचना नहीं बन पाती. यूँ तो हर समय में समाज के हर वर्ग के स्वप्न, समय से अपेक्षाएं, आकांक्षाएंअलग-अलग ही रही आई हैं. पर आज वह वर्ग विभेद व्यक्तिक हो गया है. आज व्यक्तिगत स्तर पर सबके स्वप्न, उनकी आकाक्षाएँ अपने समय और समाज से अपेक्षाएं बिलकुल अलग हैं, या कहूँ कि हो सकती हैं. ऐसे में रचनाकार न तो किसी वर्ग विशेष की कोई फार्मूलाबद्ध रचना लिख सकता है और न ही एकरेखीय आत्मालाप जैसी रचना लिख सकता है.पर इस सब के वाबजूद आज हिंदी कथा संसार में इतनी स्त्री रचानाकार सक्रिय हैं और समय के विविध कोणों और आयामों को पकड़ते और परखते हुए कहानियाँ लिख रही हैं. यह बहुत सुखद और आश्वस्त करने वाला है.

आज हर व्यक्ति का वेल्यु सिस्टम, उसके जीवन मूल्य दूसरे से बहुत अलग हैं, या तो वहाँ नैतिकता का प्रश्न अप्रसांगिक हो गया है, या सबने इसे अपने वेल्यु सिस्टम के अनुसार पुनर्परिभाषित कर लिया है. आज सामूहिक जीवन मूल्यों की प्रतिध्वनियाँ धीरे-धीरे डूबती जा रही हैं वे औरअगर वे कहीं सुनाई भी देती हैं तो विभिन्न सत्ताओं द्वारा अपने अस्तित्व को बचाने के लिए व्यक्ति या समाज पर आरोपित होती हैं.इसलिए ऐसे समय में जब हम स्त्री लेखन की बात करते हैं तो उसमें कोई एक ट्रेंड, एक प्रवृत्ति को रेखांकित करना कठिन ही नहीं, असंभव लगता है. इसलिए मैं किसी एक प्रवृत्ति की बात न करते हुए एक ध्वनि, एक अनुगूँज की बात करता हूँ. एक रेसोनेंस, एक फील की बात करता हूँ. और इस तरह समकालीन महिला लेखन में जो ध्वनि मुझे सुनाई देती है…वह है जीवन जीते हुए- जीवन जीने के तरीके, उसके नए उद्देश्यों का संधान, उसका विश्लेषण, और कई बार अब तक जो जिया जा चुका हैउसका मूल्यांकन, मान्य-अमान्य, नैतिक-अनैतिक के द्वंद्व के बीच मौलिक सुख और संतोष, एक देह-एक लिंग के संकट और संघर्ष से ऊपर एक मनुष्य मात्र का सुख और संतोष. उसकी चाहना. सही-गलत से ऊपर जीवन की रोशनी, उसकी महक की तलाश. जिसको पाकर कोई कह सके कि हां.. चाहे एक पल ही सही अपने-सा, निरा अपने-सा, बिलकुल मौलिक, आदिम इच्छाओं से भरा जीवन जिया. ये अनुगूँज मुझे सुनाई देती है.. आज स्त्री लेखन का स्वर पितृसत्ता से टकराहट भर नहीं है. आजके स्त्री लेखन में फेमिनिज्म की टोन बदली है. अब उसमें पहले जैसी अकुलाहट नहीं है बल्कि अब यह सहज और ज्यादा आत्मविश्वासी है. हाल ही में गरिमा श्रीवास्तव की ‘देह ही देश-क्रोएशिया प्रवास की डायरी’, मनीषा कुलश्रेष्ठ का उपन्यास‘मल्लिका’, किरण सिंह का ‘शिलावहा’ और सुजाता का पहला उपन्यास ‘एक बटा दो’ पढ़ा. और लगा कि अनुभव का एक बहुत विराट संसार मेरे सामने खुला. जहाँ स्त्री-पुरुष संघर्षों से उलझने के बजाय उनसे आगे निकलके एक ऐसे संसार को दिखाने की कोशिश है जो इन सब बातों में कहीं छूट गया था. लेकिन यहाँ बात कहानियों की है और वो भी उन चार महिला कहानीकारों को केंद्र में रखके की जानी है जिनका पहला कहानी संग्रह हाल ही में आया है.और ये कहानीकार हैं रजनी दिसोदिया, अंजू शर्मा,विजयश्री तनवीर और सपना सिंह.

सबसे पहले बात सपना सिंह के संग्रह ‘उम्र जितना लंबा प्यार’ की कहानियों की… सपना सिंह की इस संग्रह में जो कहानियाँ हैं, उनके केंद्र में जो स्त्री है वो आपकी देखी और जानी-पहचानी स्त्री है पर ये कहानियाँ आपको उस जानी-पहचानी स्त्री की अनजानी-अनदेखी दुनिया में ले जाती हैं. और तब आपको लगता है कि कितना कुछ था जो जानने से रह गया था. और कितना कुछ आप जानते नहीं थे बल्कि अपने अपने पूर्वाग्रहों की वजह से अनुमान लगाए थे. आप जिसे जानते थे वह वो छवि थी जो आपने स्त्री की बना रखी थी.तब जानते हैं कि जहां आपने उस जानी-पहचानी स्त्री को जान बुझक्कड़ बनकर कोई सलाह दे डाली थी वहाँ वह चाहती थी आप चुपचाप उसके साथ चलते रहतेऔर कुछ न कहते. ये तो कतई नहीं कि इस दुनिया को आप उससे बेहतर जानते हैं. ये कहानियाँ इन स्त्रियों के बहाने आपके जाने पहचाने आपके आसपास के पुरुषों के दिल-दिमाग को, उनके मनोविज्ञान को भी उजागर करती हैं. ‘फिरमारे गए गुलफाम’ ऐसी ही एक कहानी है. संग्रह की शीर्षक कहानी ‘उम्र जितना लंबा प्यार’ के साथ-साथ‘कम्फर्ट ज़ोन से बाहर’, ‘जाएगी कहाँ?’ और‘कमिटमेंट’ इस संग्रह की ख़ास कहानियाँ हैं. सपना सिंह की कहानियों में ‘लोक’ और‘लोक की भाषा’ बहुत जीवंत रूप से सामने आती है. ये कुछ-कुछ वैसे ही है जैसे किरण सिंह, योगिता यादव और सोनी पांडे की कहानियों में बदलता गाँव, अपनी आवाज़ खोजती और उसे पाती स्त्री और उसके जीवन की दुश्वारियां सामने आती हैं. सपना सिंह ने एक लम्बे अंतराल के बाद इधर फिर से लिखना शुरू किया है इसलिए जो अभी हाल में छपी कहानियाँ हैं उनमें लेखिका कहीं थोड़ी झिजकती, सकुचाती या कहते-कहते रुक जाती लगती है.

 दूसरा संग्रह है विजयश्री तनवीर का‘अनुपमा गांगुली का चौथा प्यार’ विजयश्री तनवीर की कहानियों पर कुछ कहने से पहले मैं उनके कहन, उनकी शैली और उनकी भाषा पर ये कहना चाहूँगा कि पहले ही संग्रह में भाषा की ये परिपक्वता, ये प्रवाह बहुत कम दिखाई देता है. दूसरी बात यो कि कहानियाँ बाहर से ज्यादा भीतर की और उससे भी ज्यादा स्त्री-पुरुष की पारस्परिकता की कहानियाँ हैं. ये कहनियाँ बताती हैं कि एक ने क्या कहा और दूसरे ने क्या समझा, एक ने क्या चाहा और दूसरे से क्या मिला. ये बताती हैं कि जीवन की आपाधापी के बीच स्त्रियाँ कैसे अपने वर्तमान से जुडी रहकर कितनी तरलता से अपने अतीत में जाकर लौट सकती है. और वह ऐसा बार-बार करती है, और लौट कर पाती है कि इस बीच समय तो बीता पर जिस तरह बीते समय में वह मैच्योर हुई है जीवन और रिश्तों को लेकर उसका साथी नहीं हुआ. वह अभी भी वहीँ खड़ा है- उसकी अपेक्षाएं अब भी वही हैं, पर अब वह एक नहीं दो है- एक पति के रूप में अपनी पत्नी के साथ अलग और एक प्रेमी के रूप में उसके साथ अलग. ‘पहले प्रेम की दूसरी पारी’ कहानी बहुत सरल तरीके से अपनी यह बात कह जाती है. ‘भेड़िया’ एक मनोवैज्ञानिक कहानी है. यथार्थ और कल्पना के बीच जूझता एक आदमी. यह कहानी हम जो जीते हैं और जो जीना चाहते हैं की कशमकश के बीच एक धुंधलके से शुरू होकर दुसरे धुंधलके में ख़त्म हो जाती है. विजयश्री की कहानियों का फील, उनका वातावरण उनकी ताकत है.पर दो-एक कहानियाँ पढ़ने के बाद आप उस वातावरण के कल्पना लोक में यथार्थ ढूँढने लगते हैं और वो आपको उस तरह नहीं मिलता बल्कि कई जगह कहानी वास्तविकता से बहुत दूर खड़ी दिखाई देती है.‘अनुपमा गांगुली का चौथा प्यार’ जैसे शीर्षक बहुत चतुराई से पाठक को अपनी और खींचते हैं और पठनीयता की वजह से आप इन कहानियों को पढ़ भी जाते हैं पर स्त्री जीवन की गहरी पड़ताल,यथार्थपरक विश्वसनीय वातावरण के अभाव में इन कहानियाँ और इनके पात्रों से पाठक की एक दूरी बनी रहती है. लेखिका को जादुई भाषा औरलगातार कौतुहल पैदा करती किस्सागोई और जीवन के गुदगुदाते प्रसंगों के साथ जीवन के बहुस्तरीय यथार्थ को भी पकड़ने की कोशिश भी करनी होगी.

तीसरा संग्रह है अंजू शर्मा का ‘एक नींद हज़ार सपने’ संग्रह में ‘छतवाला कमरा और इश्क वाला लव’ जैसी प्रेम कहानियाँ होने के बाद भी मैं कहूँगा कि अंजू की कहानियाँ न तो रूमानियत से भरी कहानियाँ हैं और न ही केवल स्त्री मन की कहानियाँ हैं, इनका विमर्श भी स्त्री विमर्श तक सीमित नहीं है. ये समय, समाज, जाति, धर्म और आर्थिक विषमताओं से उपजे संघर्षों को भी बहुत अच्छे से पकडती हैं. पहली कहानी ‘गलीनंबर दो’ एक बौने की कहानी है जो बहुत सुंदर मूर्तियाँ बनाता है और उसका व्यक्तित्व, असली क़द अपने आसपास के लोगों से बहुत बड़ा और विशाल होकर सामने आता है. ‘समय रेखा’ प्रेम को नए ढंग से परिभाषित करती कहानी है. ‘भरोसा अभी कायम है’ घोर अविश्वास के समय में कहीं किसी कोने में थोड़े से बचे रहे आए भरोसे की कहानी है. आज जब पूरा देश हिन्दू-मुसलमान हुआ चाहता है ऐसे में एक हिन्दू परिवार को एक मुस्लिम इलाके में उसके मुस्लिम पड़ोसी उसे पलायन से न केवल रोक लेते हैं बल्कि उसके टूटे भरोसे को फिर उसमें पैदा करते हैं. इस तरह यह एक उम्मीद की कहानी बनकर सामने आती है. ‘नेमप्लेट’ स्त्री अस्मिता की एक मार्मिक कहानी है. जहाँ अंत में स्त्री न केवल अपना स्व ढूँढती है बल्कि उसपर भरोसा करके अपने रास्ते पे चल भी पड़ती है.

चौथा संग्रह रजनी दिसोदिया का है-चारपाई. भारत में धर्म, भाषाऔर क्षेत्रवाद से छुटकारा मिल सकता है पर आपकी जाति यहाँ आपका पीछा नहीं छोड़ती. समाज काजातीय विभाजन, उसके आधार पर सदियों से होता आ रहा शोषण, उसके ख़िलाफ़ संघर्ष, उसके बीच आए पूंजी और तकनीकी विकास से आधुनिक से दिखते समाज के भीतर सेयहाँ-वहाँ से झांकते विद्रूपों और विरोधाभासों को रजनी दिसोदिया की कहानियाँ बहुत बारीकी से पकडती हैं. वे जातिवाद पर, जातिवादी मानसिकता पर विमर्श ही नहीं करतीं बल्कि उसपर कड़ा प्रहार भी करती हैं. उनकी कहानियाँ ऑनर किलिंग, सामाजिक न्याय जैसे मुद्दे पूरी शिद्दत से उठाती हैं. ‘सांचकहूँ तो’ संग्रह की ऐसी ही एक कहानी है. ये कहानियाँ मध्यवर्गीय खोखली ठसक को जगह-जगह ध्वस्त करती हैं. यह उस सवर्ण मानसिकता पर प्रहार करती हैं जहाँ पढ़ाई-लिखाई, आधुनिकता सब दिखाने के लिए है. सारी आधुनिकता बाहर है घर की देहरी के भीतर और दिमाग के अंदर वही सदियों पुराने जीवन मूल्य जड़ें जमाए बैठे हैं. ‘चारपाई’ तीं पीढ़ियों को जोडती एक मार्मिक कहानी है- कहानी में एक पुरानी खात है जिससे परिवार के युवा और किशोर नए घर में जाने से पहले छुटकारा पाना चाहते हैं और बुजुर्गरामस्वरूप जिनकी पत्नी और गाँव की स्मृतियाँ उससे वावस्ता हैं वह उसे छोड़ना नहीं चाहते. पर उनकी बहू कैसे वह खाट किसी को बिना बताए नए घर में ले आती है, कैसे वह एक पुराने सामान को नहीं एक स्मृति को बचा लेती है यह पाठक को याद रह जाता है.नए समय में प्रवेश करते हुए हम कैसे अपना लोक, उसकी परंपरा के कुछ अंश संजोकर स्मृतियों के रूप में अपने साथ बचाए रख सकते हैं इस ओर इशारा करती है.

इन चारों संग्रहों पर संक्षेप में बात करते हुए लगता है कि आवाज़ों कीकमी नहीं बल्कि बाज़ार के शोर औरचकाचौंध में कुछ मौलिक स्वरों को पढ़ने और पहचाने की ज़रूरत है.

विवेक मिश्र हिन्दी के चर्चित कथाकार हैं. यह आलेख स्त्रीकाल और मेरा रंग द्वारा आयोजित समकालीन महिला कथा-लेखन पर एक बातचीत के लिए लिखा गया था. संपर्क: 9810853128/[email protected]

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