मी लार्ड, यहाँ महिलाओं को न्याय नहीं न्याय का स्वांग मिलता है

पिछले दिनों भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई पर उनके मातहत काम कर चुकीं एक महिला का आरोप सामने आया कि मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने उनका यौन उत्पीड़न किया, विरोध करने पर नौकरी से निकलवा दिया, फिर इसकी सजा उसे उसके परिवार को प्रताड़ित करके दी गयी। पहली नज़र में ये मामला राजनितिक करार दिया गया बहुत से लोगों ने इसे इसी रूप में देखा भी। जाहिरन ये हैरान करने वाली बात नहीं थी आखिर मौजूदा निज़ाम में देश की सर्वोच्च संस्थाओं की निष्पक्षता और स्वायत्तता लगातार निशाने पर रही है। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के मामले में तो इसकी एक मजबूत पृष्टभूमि भी पहले से रही है। गौरतलब है कि 12 जनवरी 2018 को जस्टिस गोगोई सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा के ख़िलाफ़ प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाले चार न्यायाधीशों में शामिल थे। जस्टिस गोगोई समेत चारों न्यायाधीशों ने सार्वजनिक कहा था कि न्यायपालिका पर सरकार का दखल और बहुत दबाव है। चारों जजों ने उनके द्वारा तत्कालीन सीजेआई दीपक मिश्रा को लिखी चिट्ठी भी सौंपी, जिसमें अन्य बातों के साथ हर छोटे-बड़े मामले की न्यायिक प्रक्रिया में सत्ता के हस्तक्षेप के कारण देश और न्यायपालिका पर दूरगामी असर पड़ने के सन्दर्भ में चिंता जताई गयी थी। यौन शोषण के इस आरोप के सन्दर्भ में इस बात का जिक्र भी जरूरी है कि आने वाले दिनों में मुख्य न्यायधीश कई ऐसे मामलों पर सुनवाई करने वाले थे जिसे लेकर मौजूदा सरकार असहज़ हो सकती थी या है । सबसे महत्वपूर्ण राफेल विमानों की खरीद का मामला ही है जिसपर सुप्रीम कोर्ट से सरकार को क्लीन चिट मिल जाने के बाद अखबारों में छपे दस्तावेज़ों के आधार पर खुद मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई ने ही इसपर संज्ञान लिया।

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दरअसल, मामला तब सामने आया जब सुप्रीम कोर्ट में जूनियर कोर्ट असिस्टेंट के पद पर काम करने वाली 35 वर्षीय महिला ने सुप्रीम कोर्ट के 22 जजों को पत्र लिखकर आरोप लगाया कि मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई ने अक्टूबर 2018 में उसका यौन उत्पीड़न किया था। कथित उत्पीड़न की यह घटना 11 अक्टूबर 2018 की है,महिला का आरोप था कि उस दिन जब वे सीजेआई के घर पर बने उनके दफ्तर में थीं तब चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने उन्हें कमर के दोनों ओर से पकड़कर गले लगाया और जबरन उनके नज़दीक आने की कोशिश की। चीफ जस्टिस के इस “आपत्तिजनक व्यवहार’का विरोध करने के बाद से उनके और उनके परिवार के अन्य सदस्य लगातार प्रताड़ना के शिकार हो रहे हैं। देखा जाय तो यह बात निराधार नहीं है क्योंकि इस घटना के बाद महिला का विभिन्न विभागों में तीन बार तबादला हुआ और दो महीने बाद दिसंबर 2018 में उन्हें बर्खास्त कर दिया गया। जांच रिपोर्ट में जिन तीन वजहों का जिक्र है उनमें से एक उनका एक शनिवार को बिना अनुमति के कैज़ुअल लीव लेना भी है। फिर उनके पति और पति के भाई को भी जो दिल्ली पुलिस की नौकरी में थे झूठे केस में फंसाया गया और नौकरी से निलंबित कर दिया गया।

मामला शुरुआत में नाटकीय इसलिए भी लगा क्योंकि महिला के आरोप के तुरंत बाद सुप्रीम कोर्ट के एक वकील उत्सव बैंस ने सोशल मीडिया पोस्ट पर खुलासा किया कि मुख्य न्यायधीश को फंसाने की बड़ी साजिश हो रही है जिसमें अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम और जेट एयरवेज के संस्थापक नरेश गोयल शामिल हैं। बाद में हलफ़नामा दाखिल कर उसने कहा कि चीफ जस्टिस को बदनाम करने के लिए उसे भी रिश्वत पेश की गयी थी यह मामला उक्त महिला और कुछ अन्य रजिस्ट्री कर्मचारियों के साथ तपन चक्रवर्ती और मानव शर्मा द्वारा चीफ जस्टिस के खिलाफ एक साजिश है। बैंस ने पीठ को सीलबंद लिफाफे में सबूत उपलब्ध कराए जिसके तहत माफ़ी मांगती महिला के सीसीटीवी फुटेज भी शामिल होने की बात कही गयी। इसके अलावा ये भी गौर करने वाली बात थी कि जिस मानव शर्मा और तपन कुमार चक्रवर्ती का जिक्र हो रहा था वो दोनों सुप्रीम कोर्ट में असिस्टेंट रजिस्ट्रार के पद पर तैनात थे जिनका काम जजों द्वारा डिक्टेट किए गए आदेश को नोट कर उसे कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड करने की थी। जनवरी 2019 की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस आरएफ नरीमन की बेंच की अवमानना के मामले में अनिल अंबानी को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश दिया गया था लेकिन इन दोनों ने जो अपलोड किया उसके मुताबिक अनिल अंबानी को कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से पेश होने की जरूरत नहीं थी, मामले के प्रकाश में आने पर चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने दोनों को सस्पेंड कर दिया था। साज़िश की बात घटनाओं के क्रम से भी साबित करने की कोशिश की गयी मसलन महिला के साथ यौन दुर्व्यवहार की घटना 11 अक्टूबर 2018 की है और तपन व मानव पर आरोप जनवरी 2019 के केस में लगा, यह मामला अनिल अंबानी से जुड़ता है जिनका सम्बन्ध राफेल विमानों की खरीद मामले से भी है।

खैर, इस पूरे मामले का केवल राजनीतिक पक्ष नहीं है , इसका दूसरा पक्ष ज्यादा महत्वपूर्ण है जो महिलाओं को न्याय, कार्यस्थल पर उनकी सुरक्षा,लैंगिक बराबरी जैसे मुद्दों से जुड़ा है लेकिन जिस तरह से इसे निपटाया गया है वह इंसाफ की बुनियादी अवधारणा को ही सिरे से ख़ारिज करता है मसलन, इंसाफ हो इसके लिए जरूरी है कि दूसरे पक्ष की बात सुनी जाय और कोई भी व्यक्ति अपने खिलाफ लगे आरोपों के लिए खुद जज होकर फैसला नहीं सुना सकता। जबकि इस मामले में इन दोनों ही बातों का उल्लंघन हुआ है, चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता में जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस संजीव खन्ना की तीन जजों की बेंच ने छुट्टी के दिन मामले पर गौर किया और मामलें की जांच के लिए तीन सदस्यों की एक जांच समित बनाई। जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस इंदु मल्होत्रा और जस्टिस इंदिरा बनर्जी की इन हाउस कमेटी ने अपनी जाँच में महिला कर्मचारी की शिकायत में कोई सत्यता नहीं पाई और इस आधार पर मुख्य न्यायधीश को छः मई को आरोपों से मुक्त करते हुए क्लीन चिट दे दी। पूरी प्रक्रिया में न तो महिला की अपना एक सपोर्ट पर्सन या वकील साथ लाने की मांग मानी गयी और न ही प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग की गई। विशाखा गाइडलाइंस का पालन नहीं किया गया। यह अकारण नहीं है कि पहले ही 261 महिला वकीलों, स्कालरों के महिला समूह ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी करते हुए इस बात को नोटिस कराया था कि जस्टिस एएस बोबड़े द्वारा गठित समिति में भी कोई बाहरी सदस्य नहीं है जो कि अपने आप में महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध, प्रतितोष) अधिनियम, 2013 का उल्लंघन है। सबसे दुखद मुख्य न्यायाधीश की प्रतिक्रिया रही, उन्होंने न सिर्फ आरोपों से इनकार किया बल्कि महिला के साथ न्याय के सवाल को न्यायपालिका की आजादी के बरक्स खड़ा कर दिया। यही नहीं खुद अपने खिलाफ मुकदमे की सुनवाई शुरू कर दी , न्याय का उदाहरण पेश करने के बजाय महिला की यौन उत्पीड़न की शिकायत को ही गैरकानूनी करार दे दिया। इस मामले में भारत के मुख्य न्यायाधीश और विशेष बेंच का आचरण संस्थानों और सत्ता के उन्हीं लोगों की तरह रहा जो पदों पर रहते हैं और यौन उत्पीड़न के आरोपों का सामना करते हैं। जबकि यौन उत्पीड़न की शिकायत करने वाली महिला को प्रशासनिक उत्पीड़न का भी शिकार होना पड़ा है । उसे नौकरी से बर्खास्त किया जाना उसके परिजनों पर आपराधिक मामले दर्ज होना ये सब प्रशासनिक उत्पीड़न के दायरे में आते हैं।

न्याय की मांग करती महिलायें

खटकने वाली बात ये भी है कि शिकायतकर्ता महिला को इन हाउस कमेटी के सामने अपने वकील को रखने की अनुमति नहीं मिली इसलिए तीसरी बार महिला ने न्याय नहीं मिलने की उम्मीद के साथ पेश होने से ही इंकार कर दिया, कमेटी के सामने पेश नहीं होने की उसने तीन वजह बतायी, पहली सुनवाई के दौरान न तो वकील और न ही सहायक स्टाफ रखने की अनुमति मिलना जबकि उसे ठीक से सुनाई नहीं देता है, कमेटी की सुनवाई की ना वीडियो रिकॉर्डिंग हो रही है, ना ही ऑडियो रिकॉर्डिंग। 26 और 29 अप्रैल को दिए गए उसके बयान की कॉपी भी उसे नहीं सौंपी गई। लेकिन दूसरी ओर मुख्य न्यायाधीश, महिला के तीसरी बार अदालत में पेश इंकार करने के एक दिन बाद जजों की तीन सदस्यीय समिति के सामने पेश हुए। हालाँकि महिला को इस बात की जानकारी नहीं मिली कि समिति के समक्ष मुख्य न्यायाधीश के अपना बयान दर्ज कराते समय आरोपों से अवगत अन्य लोगों को समिति के समक्ष बुलाया गया था या नहीं। सबसे हैरान करने वाली बात तो ये है कि छः मई के फैसले की कॉपी न तो शिकायतकर्ता महिला को उपलब्ध कराई गयी है ना ही उसे सार्वजानिक किया गया है। इसलिए क्लीन चिट दिए जाने के इस फैसले को तुरंत ही 300 से अधिक महिला अधिकार कार्यकर्ताओं और सिविल सोसाइटी के सदस्यों ने खारिज कर दिया और इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट द्वारा सत्ता का दुरुपयोग करार दिया। क्योंकि इसे बगैर किसी नियम, निर्देश और निष्पक्ष जांच के आधार पर लिया गया है, फैसले में विशाखा गाइडलाइंस के उल्लंघन के साथ कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न एक्ट 2013 का भी उल्लंघन किया गया है। जबकि ‘कार्यस्थल पर महिला यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निवेष एवं निवारण) अधिनियम 2013 की धारा 13 के तहत दोनों पक्षों को रिपोर्ट की कॉपी पाने का अधिकार है। पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त श्रीधर आचार्युलु ने भी आंतरिक समिति की रिपोर्ट को सार्वजनिक किये जाने की मांग की है और सुचना के अधिकार के तहत गोपनीयता के तर्क को कानून के खिलाफ बताया है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जजों द्वारा इस मामले में लगे आरोपों का निपटारा करने के तौर-तरीको को लेकर केंद्र सरकार और अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल के बीच भी गंभीर मतभेद पैदा हो गए हैं।
फिलहाल, मुख्य न्यायाधीश को क्लीन चिट दिए जाने के फैसले के खिलाफ, आरोप लगाने वाली सुप्रीम कोर्ट की पूर्व महिला कर्मचारी जल्द ही अदालत में अपील करेगी, मामला क्या रुख लेता है ये तो आनेवाला समय ही बताएगा लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि इस मामले को जिस तरह से निपटाया गया है उससे कार्यस्थल पर यौन शोषण के खिलाफ महिलाओं की इंसाफ की लड़ाई कमजोर हुई है। इस मामले में इंसाफ की लड़ाई तभी आगे बढ़ सकती है जब सबसे पहले सबसे पहले विश्वसनीय व्यक्तियों की एक विशेष जांच समिति गठित हो, शिकायतकर्ता की मांग को लेकर पारदर्शिता बरती जाए उसे अपना पक्ष रखने दिया जाए, उसकी पसंद का वकील और कानूनी मदद उसे हासिल हो, जांच पूरी होने तक मुख्य न्यायाधीश को अपने आधिकारिक कर्तव्य और जिम्मेदारियों से मुक्त किया जाये। हो सके तो भारत के राष्ट्रपति को इस मामलें में संज्ञान लेना चाहिए। आरोप लगाने वाली महिला की शिकायत को यौन उत्पीड़न की रोकथाम के लिए बनाए गए क़ानून, ‘सेक्सुअल हैरेसमेंट ऑफ़ वुमेन ऐट वर्कप्लेस (प्रिवेन्शन, प्रोहिबिशन एंड रिड्रेसल)’ 2013 के तहत सुना जाए और विशाखा गाइडलाइंस का पालन हो, कानून के मुताबिक 90 दिन में जाँच पूरी हो और सभी रिपोर्ट सार्वजनिक हो।

ये इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अभी पिछले ही साल #metoo अभियान के तहत हमने ऐसे मामलों पर एक हद तक गंभीर नजरिया हासिल किया है। इस अभियान के तहत देश भर की महिलाओं को अपने साथ हुए यौन दुर्व्यवहार और शोषण की दस्तानों को सार्वजनिक मंचों से साझा करने का हौसला मिला था फिर उसे अदालत ले जाकर इंसाफ पाने का रास्ता भी मिला था। उत्पीड़न की ये कहानियां हाल की भी थीं पांच-दस साल के अंतराल की भी और बीस साल से पहले की भी। इसके तहत उन महिलाओं ने भी हिम्मत करके अपना कटु अनुभव साझा किया जो उम्र के चालीसवें -पचासवें दशक में हैं और अपनी आधी से ज्यादा जिंदगी जी चुकी हैं ,समाज और कैरियर में अपना मुकाम हासिल कर चुकी हैं । बावजूद इसके उनका सामने आना और कहना बहुत हिम्मत की बात थी क्योंकि उन्हें ये मालूम था समाज का बड़ा तबका पहले उनकी ओर ही ऊँगली उठाएगा उन्हें लेकर जजमेंटल होगा। इसका सकारात्मक असर भी हुआ कई नामचीन नाम बेपर्दा हुए , बहुतों को इसकी कीमत अब चुकानी पड़ी और कई सत्ता और संस्थानों के प्यारे भी बने रहे। इस अभियान से कार्यस्थलों पर महिलाओं के साथ व्यवहार को लेकर एक किस्म की चेतना और संवेदनशीलता का माहौल बनने की शुरुआत हुई दूसरी ओर सुरक्षात्मक होने की भी। #MeToo केम्पेन के बाद दुनिया भर में कार्यस्थल पर महिलाओं की मौजूदगी को कम किये जाने के खतरे भी सामने आये। जाहिर है किसी महिला द्वारा कार्यस्थल पर यौन शोषण होने का आरोप बहुत गंभीर मसला है भले आरोपी सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज क्यों न हों , अतः इस मामले में फेयर न्यायिक प्रक्रिया की अनदेखी देश की तमाम पीड़ित महिलाओं के हौसले को ख़त्म करेगा और इंसाफ के लिए लड़ रही महिलाओं को निराश करेगा।

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