महिला राजनेताओं की सेक्सुअल ट्रोलिंग को रोक सकती है राजनीतिक जागरूकता

कनुप्रिया

कनुप्रिया
पेशे से इंजीनियर कनुप्रिया इंजीनियरिंग पढ़ाने और कुछ सालों तक यूनाइटेड नेशन के लिए काम करने के बाद आजकल सोशल सेक्टर से जुड़ी हैं. संपर्क: [email protected]

राजनीतिक अनपढ़ सबसे ख़राब अनपढ़ होता है,  क्योकि वह न कुछ सुनता है, न कुछ देखता है, वह राजनीतिक गतिविधियों में कोई हिस्सा नही लेता. उसे नही पता कि उसके जीवनयापन की क़ीमत, आटे दाल का भाव, उसके किराए से लेकर उसकी दवाइयों तक सबकुछ राजनीतिक निर्णयों पर निर्भर करता है. यहाँ तक कि वो अपनी political ignorance पर गर्व करता है, सीना ठोंककर कहता है आई हेट पॉलिटिक्स. उसे नही पता कि उसके राजनीतिक अज्ञान से और भागीदारी न करने से ही समाज मे वेश्यायें हैं, अनाथ और छोड़े गए बच्चे है, लुटेरे हैं और सबसे ख़राब भ्रष्ट अधिकारी और शोषणकारी संस्थाओं के अनुचर हैं: कथन बर्तोल्त ब्रेख़्त.

अब आते हैं एक सर्वे पर जो 2013 में गार्डियन में छपा था, इसमें विश्व के 10 विकसित और विकासशील देशों अमेरिका, कनाडा, इटली, ब्रिटेन, जापान, कोलंबिया, उत्तरी कोरिया, ग्रीस, ऑस्ट्रेलिया और नॉर्वे के दस हज़ार लोगो पर राजनीतिक जागरूकता को लेकर सर्वे किया गया और सर्वे में पाया गया था कि बावजूद इन देशो में राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक भिन्नता के और विकसित देशों में बेहतर जेंडर इक्वलिटी के इनमें एक समानता है कि स्त्रियों में पुरुषों के बनिस्पत राजनीतिक जागरूकता 20 से 30 प्रतिशत तक कम है. यानि दुनिया की आधी आबादी की हिस्सेदारी राजनीतिक प्रक्रिया में कम है या न के बराबर है और इसका कितना बड़ा ख़ामियाजा हम एक समाज के तौर पर उठाते हैं इसकी कल्पना ही की जा सकती है. 

यदि हम स्त्रियों में राजनीतिक अज्ञानता के कारणों को समझने की कोशिश करें तो कई बातें सामने आती हैं मसलन एक उम्र तक वो घर-परिवार संभालने और उसके मसलो में उलझी रहती हैं, वो खुलकर सामाजिक-राजनीतिक मामलों में विचार प्रकट करने से डरती हैं, वो ग़लत होने से डरती हैं, उनके पास माकूल मंच या विमर्श के समूह नही होते जहाँ वो अपने विचारों की अभिव्यक्ति कर सकें, और जाहिर है जब जिस अभिव्यक्ति के लिये मंच नही होता तो उसकी विचार की क्षमता भी उसी अनुसार घट जाती है.

इसके अलावा अगर हम अपने ही देश की बात करें तो पितृसत्ता भी एक बहुत बड़ी बाधा है स्त्रियों के जागरूक न होने के पीछे. हमारा समाज आज भी स्त्री को निर्णयकर्ता के रूप में देखने को तैयार नही, घर परिवार छोड़िये वो ख़ुद अपने लिये निर्णय नही ले सकती. भारत मे स्त्री मतदाताओ पर किये सर्वे बताते है कि दक्षिण भारत मे स्त्रियाँ स्वैच्छिक मतदान का प्रयोग ज़्यादा करती हैं उत्तर भारत की तुलना मे जहाँ आज भी स्त्रियाँ अपने मत का निर्णय करने के लिये स्वतंत्र नही. आपको जिन मामलों में निर्णय का अधिकार अथवा स्वतंत्रता न हो तो निर्णय करने की क्षमता पर भी इसका सीधा असर पड़ता ही है.

राजनीति जनता के प्रतिनिधत्व का मंच है, जहाँ जनता अपने मुद्दों के लिये निर्णयकर्ता चुन कर भेजती है, हमारा समाज स्त्रियों को आज भी निर्णयकर्ता की भूमिका में देखने के लिए तैयार नही.

 इसके अतिरिक्त एक और प्रमुख कारण ये भी है कि जिस क्षेत्र में समाज के किसी वर्ग का प्रतिनिधित्व न हो तो ये बात उस वर्ग के अन्य लोगो के लिए एक तरह की मानसिक बाधा का काम करती है मसलन कुछ क्षेत्र जो पुरुष क्षेत्र माने जाते हैं उनमे स्त्रियाँ अपने आप ही रुचि कम दिखाती हैं उसे बतौर करियर भी नही चुनती और राजनीति भी पुरुष वर्चस्व का क्षेत्र ही माना जाता है.

इन बाधाओं के दूर होने का एक उपाय ये है कि  स्त्रियों को राजनीति में अधिक से अधिक प्रतिनिधित्व के अवसर मिले. पंचायत स्तर पर स्त्रियों के आरक्षण ने राजनीतिक प्रतिनिधित्व में स्त्री विकल्प को देखने के सामाजिक नजरिये को बदलने की एक हद तक कोशिश की है  मगर इसके बावजूद भी स्त्रियों के लिये चुनौतियाँ कम नज़र नही आतीं, सरपंच पति आज भी निर्णयकर्ता की भूमिका में काबिज़ हैं, पितृ सत्ता अपना दावा छोड़ने को तैयार नही.  वहीं देश मे जो स्त्रियाँ राजनीति में मज़बूत स्थिति में नज़र भी आती हैं उनमे से ज़्यादातर के पास राजनीतिक सिस्टम सपोर्ट मौजूद है, वो राजनीतिक परिवारों से आई हैं या उनके पिता, माँ, भाई, पति पहले से ही राजनीति में लंबे समय से मौजूद रहे हैं, उनके इतर ऐसी बहुत कम स्त्रियाँ हैं जो राजनीति में अपना स्थान बना पाई हों.  

राजनीति में जेंडर इक्वलिटी की समस्या के समाधान के लिये संविधान में 108 वे संशोधन के साथ संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के 33 % आरक्षण का बिल 2008 में प्रस्तावित किया गया था, जिसे 2010 में राज्यसभा में पास कर दिया, मगर लोकसभा में ये वोटिंग कभी नही हुई. इस बिल पर वोटिंग की माँग तबसे लगातार सामाजिक राजनीतिक हलकों में उठती रही है और हाल ही में कॉंग्रेस ने इसे अपने घोषणापत्र में फिर जगह दी है. 

इसके अतिरिक्त एक बड़ी चुनौती जो राजनीति में स्त्रियों के लिये है वह है उनकी sexual trolling. लगभग हर छोटी बड़ी स्त्री राजनीतिज्ञ को ज़रूर कभी न कभी इससे गुज़रना पड़ा है, उनके ऊपर चरित्र हनन के हमले पुरुषों के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा होते हैं. न सिर्फ़ नेताओ द्वारा बल्कि मीडिया और सोशल मीडिया पर भी. ध्यान देने वाली बात ये है कि ऐसे हमले सिर्फ़ पुरुष ही नही करते महिलाएँ भी करती हैं, मगर इससे ऐसे हमलों को किसी भी हालत में जायज़ नही ठहराया जा सकता. इस तरह के हमले न सिर्फ़ मनोरंजन के लिये, खीज निकालने, निंदा आलोचना के लिये किये जाते हैं बल्कि ये एक किस्म के haarrasment tool की तरह काम मे लिए जाते हैं जो अधिक से अधिक स्त्रियों को राजनीति में आने के लिये हतोत्साहित करते हैं. राजनीति में जैसे-जैसे जागरूकता, भागीदारी और प्रतिनिधित्व बढ़ेगा उम्मीद है कि सेक्सुअल ट्रोलिंग में भी कमी आयेगी.

फिर भी तकनीक ने न सिर्फ़ स्त्रियो में राजनीतिक जागरूकता को बढ़ाया है बल्कि उनकी अभिव्यक्ति और विमर्शों को भी मंच प्रदान किये हैं. फ़ेसबुक पर बावजूद चरित्र हनन के हमलों के राजनीतिक विमर्शों में स्त्रियों की उपस्थिति बढ़ी है, वो बिना इस बात से डरे और हिचके कि तुम स्त्री हो तुम्हे राजनीति का क्या पता, अपने विचार खुलकर अभिव्यक्त कर रही हैं. बीजेपी के IT cell की सफ़लता को हम हाल ही में हुए गुजरात विधानसभा चुनाव में बीजेपी के पक्ष में महिला वोटर्स के पुरुषों की तुलना में अधिक संख्या प्रतिशत के रूप में देख सकते हैं. 

स्त्रियों में राजनीतिक जागरूकता और निर्णयकर्ता के तौर पर उनका प्रतिनिधित्व न सिर्फ़ स्त्रियों के मुद्दों के लिये महत्वपूर्ण है बल्कि समाज की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक नीतियों के निर्धारण के लिये भी बहुत ज़रूरी है. दुनिया के निर्णयों में स्त्रियों की भागीदारी एक बेहतर विश्वसमाज के बनने के लिये बहुत महत्वपूर्ण है, इसमें कोई संदेह नही.



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