इंसाफ करने के नाटक-नौटंकी की क्या जरूरत: अरविंद जैन

सुप्रीम कोर्ट ने अपने मुख्य न्यायधीश पर लगे आरोप को खारिज कर दिया और इसपर अपनी रिपोर्ट जारी करने से इनकार भी कर दिया है. जाहिर है कि अपने इस निर्णय के लिए वह स्त्रीवादियों के निशाने पर है. वरिष्ठ स्त्रीवादी अधिवक्ता अरविंद जैन से स्त्रीकाल ने इस निर्णय पर बातचीत की.

मुख्यन्यायधीश को यौन शोषण के आरोपों से ‘क्लीन चिट’ मिलने पर आपका क्या कहना है?”

मुखिया के साथ ‘पूर्ण इंसाफ’ करके, क्या न्यायपालिका पर मंडराता ‘खतरा’ टल  गया? कहा गया है कि इंदिरा जय सिंह बनाम सुप्रीमकोर्ट (2003) 5 एससीसी 494 निर्णय के अनुसार, ऐसे मामलों में आंतरिक प्रक्रिया के तहत गठित समिति की ‘जाँच रिपोर्ट’ सार्वजनिक करना अनिवार्य नहीं है। अगर यह सही है, तो इंसाफ करने के नाटक-नौटंकी की क्या जरूरत!  विश्वास से कह सकते हैं कि भविष्य में कोई भी स्त्री,किसी न्यायमूर्ति पर आरोप लगाने का ‘दुःसाहस’ नहीं करेगी।

इंदिरा जयसिंह ने ट्वीट कर विरोध जताया है कि निर्णय बहुत पुराना है और उसमें ऐसा कुछ नहीं है।

मैं नहीं जानता कि उन्होंने क्या लिखा है। वो सुप्रीमकोर्ट की वरिष्ठ वकील हैं। तमाम विरोध और विवादों के वो शायद पहली (महिला) अतिरिक्त महाअधिवक्ता रही हैं, सो हम सबसे बेहतर ही समझती होंगी।

समाचार है कि आज कुछ महिला संगठनों और राजनीतिक दलों ने भी विरोध प्रदर्शन किया।

विरोध-प्रदर्शन करना उनका (हमारा) मौलिक अधिकार है. आप लगाते रहें धारा 144… गिरफ्तार करके शाम तक बैठाए रखें या जेल भेज दें। देश भर में आंदोलन होते रहे हैं..होते रहेंगे। हालांकि जितना विरोध बढ़ता है, उससे अधिक दमन बढ़ जाता है। सत्ता में सब ‘चरित्रवान’ दिखने का प्रयास करते रहते हैं। 

यौन शोषण की शिकायत करने वाली  महिला ने, आंतरिक जाँच समिति के न्यायमूर्तियों से जाँच रिपोर्ट की कॉपी माँगी है। उसे कॉपी मिलनी चाहिए या नहीं?

इसका फैसला भी जाँच समिति के सदस्य ही करेंगे। हो गया इंसाफ! ‘अर्थहीन’ राय देने से क्या लाभ!

क्या पहले की तरह इस बार भी, घर की बात को घर के आँगन में ही दफ़न कर दिया जाएगा?

संभावनाओं से कहीं अधिक आशंकाएं हैं। संस्थाओं के अपने अंतर्विरोध और विसंगतियाँ इतने गहरे और महीन हैं कि कहना कठिन है- अंततः क्या और कैसा होगा। अब कहने को क्या बचा है!

आपके विचार से क्या कोई समाधान संभव है?

असाधारण स्थितियों में सामान्य दवा से इलाज कैसे हो सकता है। कानून को रक्त कैंसर या न्यायिक विवेक को मानसिक पक्षाघात हुआ हो, तो समाधान साधारण व्यक्ति की क्षमता से बाहर है। प्रतिभाहीन नेतृत्व से संकट और विकट हो सकता है।

वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद जैन स्त्रीवादी क़ानून-विश्लेषण के लिए जाने जाते हैं. संपर्क:[email protected]

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