ऑर्गेज़्मिक पैरिटी की चैरिटी बनाम ‘योनि उद्धारक’ बाजार

पेशे से प्राध्यापक नीलिमा समाकालीन बहुचर्चित लेखिकाओं में से एक हैं. प्रकाशित पुस्तकें: पतनशील पत्नियों के नोट्स, ऑफिशियली पतनशील, बेदाद ए इश्क (संपादित) संपर्क : neelimasayshi@gmail.com.

मेरी प्यारी बहनों । आओ चलें म्युउचुअल कंसेंट के बाद अब म्यूचुअल ओर्गेज़्म की ओर। ट्रिपल तलाक के बाद ट्रिपल ऑर्गेज़्म की ओर। फेकिंग ऑर्गेज़्मानुभूति से गारंटीड चरमानुभूति की ओर। ड्यूरेक्स कंडोम् के सा ।

हम ड्यूरेक्स वालों का नहीं तो कम से कम अपनी प्यारी सिने तारिकाओं के आह्वान का तो यकीन करो । वो क्या है न कि हुआ ये कि मुल्क की औरतों के शोचनीय कामानुभवों की बात हम क़ंडोम कर्ता लोग से लीक होकर आगे को गई। आगे को गई तो सिने तारिका लोग फीलिंग कंसर्ण्ड हुईं । होकर उनने हम ड्यूरेक्स वालों से कहा कि भई अब तुमी कुछ करो। और हम ड्यूरेक्स वालों की फीलिंग् फेमिनिस्ट चेतना ने हमसे सचमुच कुछ करवा भी दिया। और इस तरह कंडोमरेखा से ऊपर सेक्स बरतने वालों के जीवन में ऑर्गेज़्म- बराबरी भी बरतने का जज़्बा उगा ही दिया।

अब चूँकि अपन ड्यूरेक्स वाले कंडोम बनाते हैं समाज के दिमाग नहीं बना सकते थे। बाज़ार में अपना सामान चलाते हैं सामान के इस्तेमालकर्ता का दिमाग नहीं फिरा सकते थे। तो इसलिए हमने जुगत लगाई। न केवल जुगत लगाई बल्कि माननीय अदालत की सद्बुद्धि जगवा कर कैमिकलादि के इस्तेमाल पर रोक के खिलाफ लांग़ लास्टिंग स्टे भी लगवाई। तमाम दुश्वारियाँ उठाईं। और आखिरकार हुआ आत्मपरस्त लिंग को अपने मौलिक अधिकार से कुछ मिनट दूर रखकर लिंगाश्रित योनियों को उनका हक दिलवाने वाला कंडोमावतार ।

‘लस्ट स्टोरीज’का एक दृश्य

लिंग था कि मानता नहीं। योनि थी कि जानती नहीं। लिंग को जल्दी थी वो चला गया। योनी को अभी देर लगेगी वो छली गई। कंडॉम वाले जान गये लिंगों को रास्ते पर और योनियों को बराबरी की चोटी पर कैसे पहुंचाया जाये। दुनिया भर के लिंगों को हुक्म तो दिया जा सकता नहीं। खासकर बने बनाए ” इंडियन पेनिस कोड” के किसी भी पुराने तौर तरीके में दखलांदाज़ी -अरे न रे बाबा न । पर यूँ कि लपलपाते फन को कुछ वक्त सम्मोहित तो कर ही सकते हैं। ज़नाना के दर्रे के दरकने के लिए कुछ मियाँद तो दिलवा ही सकते हैं। जब साइंसी जुगत दिमागों को सुन्न कर सकती है तो लिंग क्या चीज़ हैं। हेल्प हिम स्टे लांगर। गिव सम मोर मोहलत टु अस्पायरिंग वेजाइनाज़। सत्तर फीसद रह गईं वालियों में सब नहीं तो कुछ तो सीमा पार कर ही लेंगी। बाकी बार्डर लाइन वाली अपना कुसूर या मुकद्दर मानकर नेक्स्ट टाइम ट्राइ करेंगी। तो हे कंडोम की खंदक में हाइबरनेट करते बेंजोकेन!! तुम लिंगों पर लिपट जाओ। उन्हें कुछ देर भुला दो लिंगों को कि वे योनियों में आखिर करने क्या आए थे। हे ओर्गेज़्मोद्द्यत बहनों !! तुम अपनी योनि को आश्वस्त करो। वो आएगा। वो आ रहा है। देखो वो आ गया। बिग वाला. जिसे कहते हैं असली वाला उर्फ बराबरी वाला वल्द म्यूचुअल वाला मज़ा। अब जो वो भीतर आ ही गया है तो जो आया वो जाएगा पर ज़रा ठहरकर। बेंजोकेन के समर्थन वाली हुकूमत ए लिंग गिरेगी पर ज़रा ठहरकर। क्योंकि कंडोम वाले हैं न । तुम्हारी योनी के दिन फिरने वाले हैं क्योंकि कंडोम वालों के पास तकनीक है न। (इतने में)चरानुभूति की लूट है लूट सके तो लूट।

वी लेट हिम टु लेट यू टेक युअर टाइम ।

मेरी प्यारी बहनो !! – तुम कहती थीं आज़ादी दो बराबरी दो , हक् दो , पैसा दो , इज़्ज़त दो। वो जब मिलेगा तब मिलेगा। काम सुख मिल रहा है वो तो लो। देखो हमें पता है तुमने मांगा भी नहीं पर हम कह रहे हैं कि तुम्हारा बनता है ले लो। आप बडी भोली हो। स्टेप बाय स्टॆप चलती हो। एक स्टेप आगे तो दूसरा पीछे को चलती हो। एक दूसरी के स्टॆप पे स्टेप रखती हो । एक ही दिशा में चलती हो तो सब कुछ भूल कर चलती जाती हो । कोई रोक दे तो रुक जाती हो । कोई रास्ता बदला दे तो बदल लेती हो। मॉर्डर्न सती टाइप लगती हो जब तुम कहती हो भैया एक ठो आर्थिक वाली आज़ादी देना । अरे दैहिक वाली नहीं । छी छी । किसी और को दिखाना ये ; हम कोई ऐसी वैसी औरत नहीं हैं। अब तुम मेच्योर हो जाओ। ई लजालूता साइड में रख दो और म्यूअल बेसिस पर यौन सुख मिल रहा आगे बढो और पा लो। अरे बोला न हम पीछे खड़े हैं तुम्हारे। तुम तो पैकेट मंगवाओ और लग जाओ। चंद घडियाँ वही हैं जो आज़ाद हैं। तुम आओ और पाओ। पाने की मंशा जगाओ। तुम पाओगी कि तुम पा सक रही हो। पा नहीं तो पाने की कामना जगा पा रही हो। अब लोग तो बोलेंगे कि ये बाज़ार भी न एकदम बाज़ारू है।

हे बहनों।
काम और काज की मारियों
शंका और शुचिता की मारियों ,
हाँ और नहीं की मारियों ,
अभी नहीं ऐसे नहीं की मारियों
पति और प्रेमी में फंसी
रसोई और बालकों में घिसी ,
घर और बाहर में पिसी ,
योनी और गर्भ में दुविधा वालियों
प्यार और सेक्स में दुविधा वालियों ,
यौन और मौन में दुविधा वालियों प्यारी बहनों !!

सोशल मीडिया पे कैम्पेन। कैम्पेन पे तारिका। तारिका पे बाज़ार और बाज़ार पे तुम्हारे बगल वाले पुरुष जैसी तमाम खोपड़ियों का कोई हाथ नहीं है । कौन किसके साथ है नहीं है । ये ओर्गेज़्म वाली बात कोई बात है भी या नहीं है। तुम बस हमारे कहने पर हमारे तरीके से ओर्गेज़्म हथियाना सीखो ओ बराबरी चाहने वालियों! सर्वे की शक्ति हमारे साथ है और हम तुम्हारे साथ हैं। तुम अपनी योनि का साथ दो। योनि को बाज़ार का साथ देने दो। मर्दाना मंज़िल वाला सेक्स ही सही वाला सेक्स है। वही वाला क्लामेक्स सही वाला क्लाइमेक्स है । तुम लाख महसूसो कि रास्ते में यहाँ मज़ा आया वहाँ करार आया । जाओ भी ! जानती होंगी तुम और दस तरीके ऑर्गेज़्मिक धरातल पर चहलकदमी के। होती होंगी तुम कई बार सेक्सुअलि खुद मुख्तार। होती होगी बिना लिंग द्वारा उद्धार के भी तुम्हारी गंगा पार। पर जब हम कंडोम वालों ने लिंग को नीम बेहोशी में लाकर पैदायशी बदलगाम को झुकाने का नुस्खा खोज ही लिया है तो तुमको भी लिंग की अधीनता में ही पानी चाहिए न और्गेज़्मिक स्वाधीनता ? बोलो चैये के नी चैये। हम तो कहते हैं ऑर्गेज़्म दान महा दान। बोलो चैये के नी चैये ?

तुम सब आर्गेज़्म वंचिताओं की चिंताओं में
तुम्हारा और सिर्फ तुम्हारा प्यारा बाज़ार !!

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2 COMMENTS

  1. सोचना तो नहीं चाहिए लेकिन सोच रहा हूँ कि गर्भ निरोधकों का कारोबार जो किसी भी परम्परागत समाज में यौन स्वतंत्रता की बेशर्त वकालत के बिना मुनाफ़े के क्षेत्र में अपने लम्बे पैर नहीं पसार सकता भारत में हिंदी की कुछ गिनी चुनी लेखिकाओं को किस प्रकार स्त्रियों की यौन आज़ादी और सुख के सपने से भरकर आंदोलित कर देता है। वे बिना देर किए सविनय- सप्रेम- निर्भय कलम उठा लेती हैं। कुछ मुक्तिकामी पाठक पाठिकाएँ उनके साहसिक, उद्धारक, उदात्त और मैत्रीपूर्ण घोषित किये जाने वाले लेखन से राह पा लेते हैं। फेसबुक, ट्विटर, वेबसाईट के पन्ने जगमगा उठते हैं। नया नया, बोल्ड बोल्ड, हैश टैग हैश टैग करती बराबरी की दुनिया सबको शामिल करने के लिए शेयर शेयर होने लगती है। जैसे कभी ग्वालियर के राजघराने के खाने की टेबल पर पकवानों से भरी ट्रेन चलने लगती होगी। सोचना तो नहीं चाहिए पर सोचता हूँ कि इस लेखन के स्वागत में कितना अनुदार रह गया मैं, कितना ऊंच नीच भरा होगा स्त्री पुरुष समाज में कि बराबरी और हक़ की बात कोई कैसे भी कहीं से भी करने लगे प्रिय, योग्य और छलने का अधिकारी हो जाता है या हो जाती है।

    क्षमा सहित !

    -शशिभूषण

  2. बहुत बढ़िया लेख …इस तरह का लिखने के लिये जिगर भी चाहिए ….सलाम लेखिका नीलीमा जी को इस लेख के लिए

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