डीयू (DU) प्रशासन का महिला विरोधी और अमानवीय व्यवहार

आरती रानी प्रजापति

हमारी एक साथी 3 दिन से बुरी तरह बीमार है लेकिन नियुक्ति में हुए इस भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रही है। कल उसकी हालत ज्यादा खराब होने पर यह बैठे सुरक्षा कर्मियों से कहा गया कि आप डॉक्टर की व्यवस्था कर दीजिए। उस लड़की को लिवर इंफेक्शन है। बेहद अमानवीय तरीके से उनका जवाब था कि बीमार है तो घर जाए, यहां क्यों बैठी है? उस लड़की की है दृढ़ संकल्प की शक्ति ही थी जो वह बीमार होने के बाद भी यहां जमी रही। खैर तबियत खराब होने पर हमने जिद कर के उसको बाहर भेज दिया। अपनी दवा लेकर वह आई और उसको सुरक्षाकर्मियों ने नीचे ही रोके रखा। बुखार में होने के बाबजूद वह बारिश में बाहर खड़े होने को मजबूर थी। कई मिन्नते की। बातचीत करने के लिए लोग तो, जो कि इन सुरक्षाकर्मियों के जानकार थे तो ऊपर आये लेकिन वह लड़की नहीं आई। बता दूं वह लड़की इस दिल्ली में अकेली है। पीजी में रहती है। रात 11 बजे हमारे जिद करने पर लगभग शाम 5 बजे से बाहर बैठी वो लड़की अपने पीजी में अकेले जाने को मजबूर हुई। 

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सवाल यहां है कि एक महिला जो कि बीमार है, जिस पर वह पीरियड में भी है क्या उसकी मूलभूत सुविधाओं को ध्यान नहीं रखना चाहिए?
क्या उस अकेली लड़की से इस व्यवस्था को इतना डर था कि उसको बाहर ही रखा गया। जबकि उसकी स्थिति खराब थी?
यदि कोई आ जा नहीं सकता तो इनके जानने वाले लोग हम तक कैसे पहुँच गए।
यदि यहाँ से यानी इस फ्लोर से बाहर जाना ही आंदोलन को खत्म करना माना जा रहा है तो रात में मीडियाकर्मियों के आने पर हमपर नीचे आने का दवाब क्यों बनाया गया।
वह लड़की रात 11 बजे यहां से अकेले गई, यदि उसको कुछ हो जाता तो उसका जिम्मेदार कौन होता।

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अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति में हुई पहले आओ पहले पाओ की नीति का विरोध प्रशासन पर इतना भारी क्यों पड़ रहा है।
क्योंकि इन्होंने मान लिया है कि यह बेरोजगार हैं इसलिए इन्हें तंग किया जा सकता है, लेकिन 4 दिन में यदि कोई बीमार है और किसी जरूरी काम से जा रहा है तो सिर्फ उसी व्यक्ति के आने से इतनी परेशानी क्यों?
आंदोलन का चौथा दिन है।
डटे हुए हैं, लड़ते रहेंगे.

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