खौफ और आशंकाओं में जी रहे कश्मीर के लोग, नाबालिगों और महिलाओं पर भी हो रहे अत्याचार: महिला संगठन

विक्रम कुमार

आज 50 दिनों से कश्मीर में दुकानें, होटलें, स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय बंद पड़ी है गलियां सड़कें सुनसान पुरे शहर में सन्नाटा भरा है, क्या ये वही कश्मीर है जिसका नाम सुनते ही हम गर्व से कहते थे की धरती का स्वर्ग कहीं और नहीं भारत में है मोदी सरकार ने जब से अनुच्छेद 370 को समाप्त कर दिया गया है तब से कश्मीर के हालात ऐसे हो गए हैं. देश भर से पत्रकार सामाजिक कार्यकर्ता जोखिम उठाकर भी कश्मीर के हालात देखने जा रहे हैं और वे ही आकर वहां की वास्तविक स्थितियां बयां कर रहे हैं अन्यथा मेनस्ट्रीम मीडिया कश्मीर का सच दिखाने की जगह राष्ट्रवाद का उन्माद पेश कर रही है.

कश्मीर की स्थिति को समझने के लिए 5 महिलाओं की एक टीम ने 17 से 21 सितम्बर तक कश्मीर का दौरा किया। टीम में एनी राजा, कवलजीत कौर, पंखुड़ी जहीर NFIW से, प्रगति महिला संगठन से पूनम कौशिक और मुस्लिम विमेंस फोरम से सैयदा हमीद शामिल थीं। उनलोगों ने बताया की “हम अपनी आँखों से देखना चाहते थे कि 50 दिनों के इस तालाबंदी में लोगों की हालत, विशेषकर महिलाओं और बच्चों को कैसे प्रभावित किया है। श्रीनगर में समय बिताने के अलावा, हमने शोपियां, पुलवामा और बांदीपोरा जिलों में कई गांवों का दौरा किया। हम अस्पतालों, स्कूलों, घरों, बाजारों में गए, ग्रामीण लोगों के साथ-साथ शहरी क्षेत्रों में पुरुषों, महिलाओं, युवाओं और बच्चों से बात की। यह रिपोर्ट आम लोगों की, हमारी चश्मदीद गवाही (चश्मदीद गवाह) है जो एक ना दिखने वाले पिंजड़े में 50 दिनों से कैद हैं।“

NFIW प्रगति महिला संगठन और मुस्लिम विमेंस फोरम
नई दिल्ली प्रेस क्लब में पत्रकारों से वार्ता करते हुए

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आगे बतातीं हैं की जुबेदा, शमीमा, खुर्शीदा अपने घरों के दरवाजे पर खड़ी होकर अपने 14, 15, 17, और 19 साल के बेटों के वापस आने का इंतजार कर रही हैं।  उन्होंने आशा नहीं छोड़ी, लेकिन वे जानते हैं कि यह एक लंबा इंतजार होगा, इससे पहले कि वे उनकी यातनाग्रस्त शरीर या उनकी लाशों को देखें… अगर वे (सेना के लोग) ऐसा करते हैं। डॉक्टरों, शिक्षकों, छात्रों, श्रमिकों ने हमसे पूछा, “अगर इंटरनेट सेवाएं 5 मिनट के लिए काट दी गईं तो आप दिल्ली में क्या करेंगे?” हमारे पास कोई जवाब नहीं था।

लगभग कश्मीर के हर जिले का यही हाल था. मगरिब की प्रार्थना के बाद लगभग 8 बजे लाइट काट दिया दिया जाता था. बांदीपोरा जिला मुख्यालय के पास एक गाँव में रहने वाली ज़रीना बताती हैं कि “पुरुषों को शाम 6 बजे के बाद घर के अंदर कैद हो जाना पड़ता है अगर कोई आदमी या लड़का शाम के बाद घर के बहार दिखाई पड़ता है तो उसके साथ क्या होगा पता नहीं। यदि ज्यादा कुछ आवश्यकता पड़ती है, तो हम महिलाएँ बाहर जाते हैं.” गुलाम अहमद की माँ की मौत हो गई वो दुखी आवाज में बताते है “मैं अपनी बहनों को उनकी माँ की मृत्यु के बारे में कैसे सूचित करूँगा? ”

फोटो EPA

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श्रीनगर के एक लल्ला डेड महिला अस्पताल में कई युवा महिला डॉक्टरों ने अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद से उन बाधाओं पर अपनी पूरी निराशा व्यक्त की वहां कई ऐसे मामले हैं महिलाएं प्रसव के लिए समय पर नहीं आ सकती हैं। बहुत कम एम्बुलेंस हैं; जो एम्बुलेंस चल रहा होता है उन्हें रास्ते में ही पिकेट पर रोक दिया जाता है। प्रसव के कई मामले ऐसे हैं अच्छे से इलाज नहीँ होने के कारण बच्चे विकृति के साथ जन्म जन्म ले रहे हैं. यह उनके माता-पिता को आजीवन कष्ट दिया जा रहा है। वर्तमान स्थिति में तनाव और खौफ (भय) के कारण कई महिलाएं समय से पहले बच्चों को जन्म दे रही हैं। एक युवा महिला चिकित्सक ने दुख के साथ हमें बताया ऐसा लगता है कि सरकार हमारा गला घोंट रही है.

बांदीपोरा अस्पताल के एक वरिष्ठ चिकित्सक ने हमें बताया कि कुलगाम, कुपवाड़ा और अन्य जिलों से लोग यहाँ इलाज केलिए आते हैं। मानसिक विकार, दिल के दौरे, के बहुत सरे मामले आते है हैं, इससे पहले कभी इतने मामले नहीं आये हैं। आपात स्थिति के लिए जूनियर डॉक्टर सीनियर्स की तलाश करते हैं; फोन से उन तक नहीं पहुंचा जा सकता है यदि वे परिसर से बाहर हैं, तो वे चिल्लाते हुए सड़कों पर दौड़ते हैं, पूछते हैं, हताशा हो कर ढूंढ़ते हैं। एसकेआईएमएस के एक आर्थोपेडिक डॉक्टर को सेना ने उस समय नाकाबंदी के दौरान रोका गया जब वह ड्यूटी के लिए जा रहा था। उन्हें सात दिनों के लिए रखा गया था। शोपियां में सफिया की कैंसर का सर्जरी हुई थी और उसे जाँच की जरूरत है मैं अपने डॉक्टर तक नहीं पहुँच सकती एक ही रास्ता है कि मैं शहर जाऊँ, लेकिन मैं वहाँ कैसे पहुँचूँ?

फोटो BBC

अनंतनाग की तहमीना ने अपने पति से आग्रह किया,  हमें एक और बच्चा चाहिए उनका बच्चा फैज़ को सेना ने मार डाला, अब्दुल हलीम चुप थे। वह इन शब्दों को सुनते हुए अपने छोटे लड़के के शव को अपने हाथों पर पड़ा देख सकता था।

एक महिला सुरक्षा गार्ड ने कहा कि भारतीय सरकार इसे फिलिस्तीन बनाना चाहती है। यह एक लड़ाई है जो हम और हमारे कश्मीर के लोग मिल कर लड़ेंगे और इस मुश्किल हालात का सामना करेंगे। एक युवा पेशेवर ने हमें बताया, हम स्वतंत्रता चाहते हैं, हम भारत नहीं चाहते, हम पाकिस्तान नहीं चाहते। हम इसके लिए कोई भी कीमत अदा करेंगे।

कश्मीर के हालात को देखने वहां के लोगों की आपबीती सुनने के बाद दौरे पर गई महिलाओं की टीम ने कहा कि हम अपने अनुभव और कश्मीर के लोगों की गवाही देते हुए हम दो निष्कर्षों पर पहुँचते हैं पहला जहाँ कश्मीरी लोगों ने पिछले 50 दिनों में भारत सरकार और सेना द्वारा बर्बरता और ब्लैकआउट के विरोध में अद्भुत संयम दिखाया है। जिन घटनाओं के बारे में हमें बताया गया था, उन्होंने हमारी रीढ़ को हिला दिया और यह रिपोर्ट केवल उनमें से कुछ को सारांशित करती है। हम कश्मीरी लोगों के साहस और संकल्पशीलता को सलाम करते हैं। दूसरा वहां के स्थिति के बारे में, कश्मीर में कुछ भी सामान्य नहीं है। उन सभी का दावा है कि स्थिति धीरे-धीरे सामान्य हो रही है, विकृत तथ्यों के आधार पर झूठे दावे किये जा रहे हैं.

NFIW  प्रगति महिला संगठन और मुस्लिम विमेंस फोरम ने सरकार से अपनी मांगे रखी है

1. हालात को सामान्य बनाने के लिए सेना और अर्धसैनिक बलों को वहां से हटा लें।
2. विश्वास पैदा के लिए सभी मामलों/एफआईआर को तुरंत रद्द करें और उन सभी को छोड़ दें, विशेष रूप से वे युवा जो हिरासत में और जेल में हैं, धारा 370 के निरस्त होने के बाद से।
3. व्यापक हिंसा और सेना और अन्य सुरक्षा कर्मियों द्वारा किये गए अत्याचारों पर न्यायिक जाँच हो।
4. परिवहन की अनुपलब्धता और संचार ठप होने के कारण उन सभी परिवारों को जिनके प्रियजनों को जान गंवानी पड़ी, उनको उचित मुआवजा मिले।

इसके अतिरिक्त:

• इंटरनेट और मोबाइल नेटवर्क सहित कश्मीर में सभी संचार लाइनों को तुरंत बहाल करें।
• अनुच्छेद 370 और 35 ए को पुनर्स्थापित करें।
• जम्मू और कश्मीर के राजनीतिक भविष्य के बारे में सभी निर्णय जम्मू और कश्मीर के लोगों के साथ बातचीत की प्रक्रिया के माध्यम से लिए जाएँ।
• सभी सेना कर्मियों को जम्मू और कश्मीर के नागरिक क्षेत्रों से हटाया जाय।
• सेना द्वारा की गई ज्यादतियों को देखने के लिए एक समयबद्ध जांच समिति का गठन किया जाय।

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