आचार्य श्रीराम शर्मा और स्त्री शिक्षा

योगेश कुमार/ डॉ सुशील उपाध्याय

भारतीय संस्कृति विश्व की श्रेष्ठ एवं समृद्ध संस्कृतियों में से एक है। यदि हम यह कहें कि यह विश्व की श्रेष्ठतम् संस्कृति है तो भी कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी क्योंकि जीवन के जिन उच्च आदर्शों एवं लक्ष्यों का निर्धारण यहाँ हुआ वह अन्यत्र कहीं भी दुर्लभ है। संस्कृति के ऊषाकाल में ही सामाजिक, धार्मिक व राजनैतिक सहित हर एक क्षेत्र में तथा व्यक्तिगत एवं पारिवारिक स्तर पर श्रेष्ठतम् मूल्यों एवं नियमों का प्रणयन हुआ। सभी सामाजिक संस्थाओं यथा विवाह, परिवार, आश्रम आदि ने इस संस्कृति के उद्भव एवं विकास में इन नैतिक मूल्यों ने प्रेरक भूमिका निभायी। प्रारम्भ से समाज में स्त्री-पुरुष का भेदभाव न करते हुए दोनों को समान महत्व व अधिकार प्रदान किए गये। स्त्रियों को भी पुरुषों के समान ही स्वतन्त्रता व अधिकार प्राप्त थे। भारतीय स्त्री के इतिहास पर यदि दृष्टिपात किया जाये तो यह पता चलता है कि वेदकालीन समाज की स्त्रियाँ भले ही समाज में समान स्थान की अधिकारिणी रहीं हो, लेकिन उसके बाद तो स्त्री जाति का सूर्य ही ढलता गया है। पुराण व शास्त्रीय ग्रन्थ आदि पुरुषों की धरोहर थे और उन्होंने आदर्श स्त्री की रूढ़िबद्ध धारणा को उसी रूप में व्यक्त किया, जिस रूप में वे उसे देखते थे। अपने परम्परागत रूप में भारतीय स्त्री त्याग और पवित्र प्रेम के लिए सदैव प्रेरणा-स्रोत रही। भारतीय संस्कृति में स्त्री जिस पुरूष से विवाह करती है उसी पर सर्वस्व न्यौछावर करना उसका धर्म है। बदले में भले ही उसे वैसा न मिले। पत्नी का यही धर्म परिवार की नैतिकता और शान्ति का मेरूदण्ड है। इसी के परिप्रेक्ष्य में महादेवी वर्मा ने शृंखला की कड़ियाँ में कहा है कि- ‘‘यूरोप में स्त्रियां चाहे हमारी तरह देवत्व का भार लेकर न घूम रही हों, मानवी अवश्य समझी जाने लगी हैं।’’  जबकि भारत में आज भी स्त्रियों को भोग्या माना जाता है।

श्रीराम शर्मा आचार्य ने स्त्री शिक्षा की जमकर वकालत की। उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से स्त्री शिक्षा के लिए अभियान चलाया। उनका अभियान कारगर भी हुआ और समाज में स्त्री शिक्षा के प्रति जागृति आई- ‘‘समाज का एक और विशाल वर्ग है स्त्री का। देश की कुल जंनसख्या में लगभग आधी स्त्री हैं। दुर्भाग्यवश इतनी बड़ी जनशक्ति को आज प्रायः अशिक्षित स्थिति में ही रहना पड़ रहा है। तद्नुरूप उनका पतन भी काफी हुआ। 1989 की जनगणना रिपोर्ट के अनुसार पुरूष तथा स्त्रियों में साक्षरता क्रमशः 46.7 प्रतिशत तथा 24.9 प्रतिशत है। ग्रामीण क्षेत्र में स्त्रियों की साक्षरता तो और भी कम है। 1979 में किए पर्यवेक्षण के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में पुरुषों की साक्षरता 33.8 प्रतिशत तथा स्त्रियों की 13.2 प्रतिशत थी। नगरीय क्षेत्र में 61.3 प्रतिशत पुरूष तथा 42.3 प्रतिशत स्त्रियाँ साक्षर थीं। शिक्षा की यह विभिन्नता स्त्री जाति की प्रगति में अवरोध बनकर खड़ी है।’’ 

आचार्य जी का मानना था कि अगर स्त्री को शिक्षित करना है तो उसके लिए सामान्य प्रयास भर करने से काम नहीं चलेगा। उसके लिए अधिक प्रयत्न करने होंगे- ‘‘आज की कन्या कल की माँ है, जिसे एक बहुत बड़ा उत्तरदायित्व सँभालना है। देश को सुयोग्य नागरिक देकर अपना कर्तव्य निभाना है। शादी के तुरन्त बाद ही उसको घर का सभी कार्य संभालना पड़ता है तथा एक महान जिम्मेदारी निभाने को नये गृह में प्रवेश करती है। वहाँ हर एक कार्य को सोच-समझ कर करना पड़ता है। घर को स्वर्ग बनाने की महान जिम्मदारी भी उसी की बुद्धि पर निर्भर करती है।

अक्षर ज्ञान के अभाव में वह कुछ पढ़-लिख नहीं सकती। यदि उसने बचपन में कुछ नहीं सीखा है और शिक्षित है तो स्वाध्याय द्वारा वह अन्य गुण प्राप्त कर लेगी। पति, पुत्र, सास, ससुर से कैसे व्यवहार किया जाय, घर को किस तरीके से सजाना चाहिए आदि? कई बातें न जानने पर भी स्वाध्याय द्वारा वह इतने गुण प्राप्त कर सकती है जिनका अब तक अभाव रहा। यदि वह अशिक्षित है तो पुस्तकें पढ़ना लिखना तो दूर रहा, वह यह भी ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकेगी कि उसके (ऊपर) क्या-क्या महान जिम्मेदारियाँ हैं और कैसे उन्हें निभाए। ऐसी स्थिति में महिलाओं का शिक्षित होना तो इतना आवश्यक है जैसे दीपक को तेल।’’  महिला शिक्षा के विरोधियों को आचार्य जी ने अपने लेखों के माध्यम से समझाया कि समय बदल रहा है। बदलते समय की बयार को स्वीकार करो और अच्छी चीजों को अंगीकार कर आगे बढ़ो- ‘‘विकास क्रम में ऐसे बदलाव अनायास ही प्रस्तुत कर दिए गए हैं। इस परिवर्तन क्रम को रोका नहीं जा सकता। जो पुरानी प्रथाओं पर अड़ा रहेगा, उसे न केवल घाटा ही घाटा उठाना पड़ेगा, वरन् उपहासास्पद भी बनना पड़ेगा।’’

उस समय कुछ लोगों का मानना था कि जब महिलाओं को नौकरी नहीं करनी है और घर का कामधाम संभालना है तो फिर उन्हें पढ़ाने पर इतना जोर क्यों दिया जा रहा है। इस पर आचार्य जी ने स्पष्ट किया कि स्त्री को गृहलक्ष्मी का दर्जा दिया गया है और गृहलक्ष्मी पढ़ी-लिखी होगी तो घर का सारा बजट नियंत्रित कर सकती है। उन्होंने स्त्री की शिक्षा के स्वरूप और महत्व के बारे में बताया कि- ‘‘स्त्री शिक्षा का स्वरूप और महत्त्व असाधारण है। इसलिए उसकी समग्रता के लिए परिवार की समझदार महिलाओं को वह उत्तरदायित्व सँभालना चाहिए। लड़के रोटी कमाने लगे तो उनका काम चल जाता है और सामान्यजनों को सामान्य काम मिल जाता है। लड़कियाँ सीधे पैसा तो नहीं कमातीं, पर कम खर्च में घर की शोभा-सज्जा बनाए रह सकती हैं। स्वयं काम में व्यस्त रहने के साथ-साथ परिवार के बड़ों या छोटों को साथ लगाए रह सकती हैं। स्वच्छता भी शोभा हैं। सादा जीवन उच्च विचार की नीति अपनाने पर हर किसी को बड़प्पन का श्रेय मिलता है। स्त्री को विशेष रूप से, क्योंकि उनमें से एक भी प्रगतिशील, परिश्रमी एवं मधुर स्वभाव की हो तो बच्चों या बड़ों को, मर्दों या महिलाओं को अपने ढाँचे में ढाल सकती हैं।’’ 

आचार्यश्री का मानना था कि लड़कियों को केवल किताबी शिक्षा देने भर से काम नहीं चलेगा। बल्कि लड़कियों को स्वालम्बन की शिक्षा देनी होगी ताकि आधी आबादी अपने पैरों पर खड़ी हो सके। उनका सोचना था कि-  ‘‘लड़कियों की शिक्षा के सम्बन्ध में कुछ नये सिरे से विचार करना पड़ेगा क्योंकि बच्चों की, घर गृहस्थी की जिम्मेदारी सँभालते हुए घर छोड़कर अन्यत्र कठिनाई में ही जा सकती हैं। उन्हें ऐसे ही उद्योग सीखने चाहिए, जिन्हें घर रहते हुए सहायक धन्धे के रूप में आसानी से सम्पन्न किया जा सके’’  

स्त्री शिक्षा के साथ ही उन्होंने अपने समय में अनपढ़ रह गए बुजुर्गों की शिक्षा की ओर ध्यान दिए जाने की जरूरत बताई। उनका कहना था कि बच्चों और महिलाओं की शिक्षा की तरह ही प्रौढ़ शिक्षा का प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए- ‘‘लोकतन्त्रात्मक समाजवाद की दिशा में जो कदम उठाए जा रहे है, उनकी भी सफलता साक्षरता और प्रौढ़-शिक्षा के कार्यक्रम की सफलता के बगैर संदिग्ध है। ग्राम पंचायत और सहकारी भण्डारों की ही बात लीजिए। ग्राम पंचायतों की स्थापना के पीछे जो उद्देश्य थे, क्या उनकी सम्यक् सिद्धि हो पाई है? क्या ग्राम पंचायतों में चुनाव निष्पक्ष और योग्यता के आधार पर होता है? क्या वहाँ आज भी साम्प्रदायिकता, जाति भेद आदि का प्राधान्य नहीं है? और क्या, ग्राम पंचायतों से जिन कार्यों को सम्पन्न करने की उम्मीद बाँधी गई थी, वे कार्य हो रहे हैं? सहकारिता का आन्दोलन जो वर्तमान महँगाई, मुनाफाखोरी और जमाखोरी की विश्राम स्थिति में उपभोक्ताओं के लिए तथा अन्य अनेक स्तरों पर कृषकों, मजदूरों आदि के लिए अत्यन्त लाभप्रद हो सकता है- क्या सम्यक् रूप से चल रहा है? मैं समझता हूँ कि अधिकांश जनता में सामाजिक जागृति का अभाव ही इसके लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार है। प्रौढ़-शिक्षा के प्रभावी कार्यक्रम द्वारा ही हमारी निश्चेष्टा दूर की जा सकती है।’’

आचार्य श्रीराम शर्मा ने अपने लेखों के माध्यम से शिक्षा का महत्व बताते हुए लिखा- ‘‘शिक्षा की गुण गरिमा जितनी भी गाई जाए, उतनी ही कम है। विद्या को ज्ञानचक्षु की उपमा दी गई है। उसके अभाव में मनुष्य अंधों के समतुल्य माना जाता है। विद्या को सर्वोपरि धन माना गया है। उससे अमृत की प्राप्ति होती है, ऐसा कहा जाता रहा है। पर उसमें यह सभी विशेषताएं तब उत्पन्न होती हैं, जब उसके द्वारा मनुष्य के गुण, कर्म, स्वभाव का, व्यक्तित्व का विकास हो, प्रतिभा को समुन्नत-सुसंस्कृत बनाने में सहायता मिले। अन्यथा भ्रष्ट चिन्तन और दुष्ट आचरण से मनुष्य और भी अधिक खतरनाक होता जाता है। उसे ब्रह्म-राक्षस की संज्ञा दी जाती है।’’  आचार्यश्री कहना था कि समाज को उन्नत व विकसित बनाने के लिए शिक्षा ही सबसे बड़ा हथियार होता है। विद्या सर्वोत्तम धन है जिसकी सहायता से आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति भी महान कार्य कर सकता है।

श्रीराम शर्मा आचार्य बच्चों को नैतिक शिक्षा दिए जाने के पक्षधर थे। उनका मानना था कि जो बच्चे आगे चलकर देश का भविष्य बनने वाले हैं उन्हें नैतिक तौर पर मजबूत होना चाहिए- ‘‘देश का भविष्य उन लोगों के हाथ है जो आज शिक्षा प्राप्त करने के उपरान्त भावी उत्तरदायित्वों को सँभालने वाले हैं। प्रगति और सुव्यवस्था के लिए आवश्यक है कि भावी जिम्मेदारियाँ सँभालने वालों को नैतिक दृष्टि से उत्कृष्ट बनाया जाय। अन्यथा योजनाएँ कितनी ही उत्तम क्यों न हों, उन्हें चलाने वाले यदि उपयुक्त स्तर के न हुए तो सफलता संदिग्ध रहेगी। इसलिए अभिभावकों का, विज्ञानों का और शिक्षा संचालकों का यह सोचना ठीक है कि सच्चरित्रता को भी शिक्षा के साथ-साथ ही सुदृढ़ करने के लिए प्रयत्नरत हुआ जाय। गीली मिट्टी से इच्छित आकार के बर्तन बन सकते हैं। सूखने पर वह ढलती नहीं बिखर जाती है। गीली लकड़ी को मोड़ा जा सकता है पर सूख जाने पर वैसा सम्भव नहीं। बालकपन और किशोरावस्था ऐसी है, जिसमें पूर्वाग्रह नहीं होते और संस्कार भी परिपक्व नहीं होते। ऐसी दशा में यदि शिक्षा के साथ नीति-निष्ठा का समावेश रहे तो उसका अच्छा प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। प्राचीनकाल में गुरुकुलों के ढले विद्यार्थी नर-रत्न बनकर निकलते थे। इसमें जहाँ पाठ्यक्रम का महत्त्व था वहाँ अध्यापन शैली की विशेषता भी अपना काम करती थी।’’  आचार्य जी का कहना था कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए, जिससे विद्यार्थियों में शिष्टता आये। शिष्टता के बिना सभ्यता की कल्पना नहीं की जा सकती- ‘‘शिष्टता सभ्यता की आधारशिला है और अशिष्टता अनगढ़पन की सबसे बुरी प्रतिक्रिया है।’’ 

आचार्य जी का कहना था कि बच्चों को स्कूल भेजते समय उनका मनोवैज्ञानिक विश्लेषण भी किया जाना चाहिए- ‘‘मनोवैज्ञानिक बातों का ध्यान रखते हुए भी बच्चों के मन से यद्यपि समूची हिचकिचाहट तो दूर नहीं की जा सकती। पर उनके मन में वह क्षमता अवश्य उत्पन्न की जा सकती है, जो नये वातावरण के अनुकूल बनने का आत्मविश्वास दिला सके। बच्चा स्कूल में प्रारम्भिक दिनों में उस प्रकार प्रवेश करता है, जैसे-बत्तख का बच्चा तालाब में उतर रहा हो, जाना पड़ रहा है-यह विवशता है और जाने का मन नहीं है। क्योंकि आस-पास सब कुछ नया ही नया और अनदेखा-सा है।’’ 

आचार्य जी ने स्त्री शिक्षा के साथ ही समाज के सभी वर्गों के लिए अनिवार्य शिक्षा की मांग की। भविष्य के लिए देखा गया उनका स्वप्न भी इसी से जुड़ा हुआ था। आचार्य जी ने संकल्पना की थी कि- ‘‘समाज का कर्तव्य होगा कि हर व्यक्ति को कामचलाऊ शिक्षा अनिवार्य रूप से मिले। अशिक्षित रहना कानूनन जुर्म बना दिया जाएगा। जो स्वेच्छा से न पढ़ेंगे, वे कैदखाने में रखकर पढ़ने के लिए बाधित होंगे।’’

शिक्षा को लेकर आचार्य जी की गंभीरता का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि उन्होंने समाज और देश के अन्य कार्यों को शिक्षा के बिना अधूरा बताया। उनका कहना था कि जब तक देश में साक्षरता की दर नहीं बढ़ेगी तब तक देश की उन्नति संभव नहीं है- ‘‘हमारे देश में शिक्षा प्रसार की बड़ी आवश्यकता हैं। मुश्किल से पच्चीस प्रतिशत लोग साक्षर हैं। ऐसी स्थिति में जनतन्त्रा की सफलता व राष्ट्र की प्रगति के स्वप्न देखना कितना बेमानी होता है। शिक्षा, समाज कल्याण, समाज-सेवा आदि के कार्य सेवा-भावना से जितनी अच्छी तरह सम्पादित हो सकते हैं। उतनी अच्छी तरह नौकरपेशा लोगों द्वारा नहीं जिन्हें सरकार रखती है। आज के वर्ग को यदि समुचित मार्गदर्शन मिले और उन पर समाज की जिम्मेदारी डाली जाय तो वे निश्चित रूप से अपनी शक्ति का सदुपयोग करते हुए समाज-सेवा में ऐसे ही कीर्तिमान स्थापित करें, जैसे भोजाडांगा में हुए उच्छृंखलतापूर्ण कार्यों में लगी हुई है वहीं, यदि सृजन और सेवा की रचात्मक प्रवृतियों में लग सके, तो निश्चित रूप से यह देश और समाज के लिए समस्या न बनकर प्रगति का सेतु बन जाय।’’

आधुनिक शताब्दी में स्त्री के अनेक रूप हमारे सामने प्रस्तुत हुए। जिनमें शिशु के डगमगाते कदमों के साथ गृहस्थी की डगमगाती नौका को सम्भालने वाली स्त्री या पहाड़ों की अलंघ्य उंचाईयों तथा सागर की अथाह गहराईयों को अपने कदमों से नाप लेने वाली स्त्री, खेल के मैदान में अपनी ताकत या शिक्षा के क्षेत्र में विलक्षण प्रतिभा का परिचय देने वाली स्त्री या फिर सामाजिक संत्रास, घुटन, विखण्डन व भौतिकता तथा आर्थिक विषमता से जन्मी मानसिक संत्रास को झेलती चलती आ रही स्त्री के रूप प्रमुख रहे।

इक्कीसवीं सदी की स्त्री राजनीतिक दृष्टि से अधिकार सम्पन्न है। भारत की शिक्षित स्त्री ही नहीं अशिक्षित स्त्री ने भी भारतीय गणराज्य की स्थापना के साथ मताधिकार पा लिया था। समाज में मध्यम वर्ग की स्त्रियों को घर के भीतर व घर के बाहर, नवीन और पुरातन आदि की अनेक समस्याओं में संघर्षरत रहना पड़ता है। भारत के भावी स्त्री समाज की रूपरेखा इन्हीं समस्याओं के स्वस्थ निराकरण पर निर्भर करती है। अर्थाभाव व स्वावलम्बन की इच्छा ने मध्यम वर्ग की शिक्षित स्त्री को घर से बाहर आने में सहायता दी है, लेकिन दोनों ही क्षेत्रों में उसकी उपस्थिति संदेह के घेरे में है। सम्बन्धों में संघर्ष एवं कटुता, जीवन के लिए आवश्यक वस्तुओं का अभाव तथा पारिवारिक अव्यवस्था आदि के कारण शिक्षित स्त्री बाहर कार्य खोजती है।

आधुनिक काल में स्त्रीयों ने जितनी भी उन्नति और विकास किया है, इतिहास को देखें तो उतना पहले कभी नहीं हुआ। स्त्रीयों का कार्य क्षेत्र अब तक घर, परिवार, पति और बच्चे ही रहे थे, परन्तु अब वह उन सीमा रेखाओं को लांघकर नये युग में पदार्पण कर चुकी है और नये युग का सृजन भी कर रही है। उसने बहुत सी धार्मिक, रूढ़िगत और सभ्यता सम्बन्धी लक्ष्मण रेखाओं को लांघ लिया है। जमीन को अपने कर्मों से चूमती स्त्री आकाश में उड़ान भरने लगी है। पिछले वर्षों में स्त्री की जीवन शैली में अप्रत्याशित परिवर्तन हुआ है। पर्दे में रहने वाली स्त्री आज पुरुषों की तरह केश सज्जा रखकर उनके जैसे ही वस्त्र धारण कर कन्धे से कन्धा मिलाकर काम करती नजर आ रही है। यह प्रसन्नता का विषय है कि समाज की आधी आबादी आज अपनी पहचान बनाने में समर्थ है।

श्रीराम शर्मा आचार्य का भी मानना था कि शिक्षा आदमी को मानव बनाती है और उसे एक सभ्य समाज में रहने लायक बनाती है। इसलिए उन्होंने शिक्षा की महत्ता और अनिवार्यता पर विशेष जोर दिया। शिक्षा में जिन सुधारों की बात आज हम कह रहे हैं। बड़े-बड़े आयोग बनाकर शिक्षा में सुधार के जो उपाय सुझाए जा रहे हैं। आचार्यश्री काफी पहले उन्हें बता गए थे। आज हर बोर्ड की तरफ से प्रयास किया जा रहा है कि केवल किताबी ज्ञान बच्चों को न परोसा जाए, उसके स्थान पर व्यवहारिक शिक्षा दी जाए। यह बात आचार्यश्री ने कापफी समय पहले कह दी थी। उन्होंने लिखा था कि पाठ्यक्रम में व्यावहारिक जीवन सम्बन्धी जानकारियों को स्थान अवश्य दिया जाय, जिससे विद्यार्थी को स्वास्थय, यात्रा, शिष्टाचार, रेल, डाक तार, व्यापार तथा राजकीय नियमों की आवश्यक जानकारी हो जाय।

आज सीबीएसई और उत्तराखंड सहित कई बोर्ड विद्यार्थियों के समग्र मूल्यांकन पर जोर दे रहे हैं। देश का मानव संसाध्न विकास मंत्रालय कह रहा है कि केवल तीन घंटे की परीक्षा के आधर पर छात्र का मूल्यांकन न किया जाए। यही बात आचार्यश्री दशकों पहले कह गए। उनका मानना था कि परीक्षा में उत्तीर्ण-अनुत्तीर्ण होना वार्षिक परीक्षाओं पर निर्भर न रहे वरन् विद्यार्थी के कार्य की मासिक प्रगति के विवरण के आधार पर उसे उत्तीर्ण या अनुत्तीर्ण किया जाय। शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान को कम करके नहीं आंका जा सकता। शिक्षा को लेकर उनकी भविष्य दृष्टि की भी सराहना की जानी चाहिए। आज पूरे देश में बारहवीं कक्षा तक एक बोर्ड और एक पाठयक्रम की आवाज उठ रही है। आचार्यश्री ने इसे दशकों पहले महसूस करते हुए कहा था कि सब प्रान्तों में एक ही प्रकार का पाठ्यक्रम हो, जिससे एक प्रान्त के विद्यार्थियों को दूसरे प्रान्त में जाने पर दाखिला सम्बन्धी कोई अड़चन न हो। आचार्य श्रीराम शर्मा भी स्त्री शिक्षा के पक्षधर थे उनका कहना था कि आधी आबादी को शिक्षित के बगैर समाज का भला नहीं हो सकता। आचार्य जी लड़कियों को लेकर किताबी ज्ञान देने तक सीमित नहीं रखना चाहते थे बल्कि वह लड़कियों को स्वालम्बन की शिक्षा देने की बात करते थे।

सन्दर्भ ग्रन्थ सूची-

  हिन्दू स्त्री का पत्नीत्व, शृंखला की कड़ियां, महादेवी वर्मा, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 1942

2 शिक्षा एवं विद्या, श्रीराम शर्मा आचार्य, अखण्ड ज्योति संस्थान मथुरा, 1998

3 मनःस्थिति बदले तो परिस्थिति बदले, श्रीराम शर्मा आचार्य, युग निर्माण योजना विस्तार, गायत्री तपोभूमि, मथुरा, 2010

4 समस्याएँ आज की समाधान कल के, श्रीराम शर्मा आचार्य, युग निर्माण योजना विस्तार, गायत्री तपोभूमि, मथुरा, 2009

5 जीवन साधना के स्वर्णिम सूत्र, श्रीराम शर्मा आचार्य, युग निर्माण योजना विस्तार, गायत्री तपोभूमि, मथुरा, 2008

6 मूल्यनिष्ठ पत्रकारिता और युग पत्रकार पं0 श्रीराम शर्मा आचार्य, डॉ0 विजय कुमार मिश्र, शिशिर प्रकाशन, मेरठ, 2007

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