बेपनाह क्रूरता:शिवपुरी का भावखेड़ी हत्याकांड

बजरंग बिहारी तिवारी

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फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट
     
घटना ऐसी कि क्रूरता दहल उठे. हृदयहीनता की हदें लांघ जाने वाली घटना. नौ साल के बच्चे और तेरह साल की बालिका की लाठियों से पीट-पीटकर हत्या की गई. इन बच्चों का अपराध क्या था? कई बार बच्चे जाने-अनजाने संगीन जुर्म कर बैठते हैं. यहाँ ऐसी कोई बात ही नहीं थी. ये बच्चे सड़क किनारे शौच के लिए गए थे. किसी के खेत में शौच के लिए बैठते तो भी गुस्से का कारण समझ में आता. वे डामर वाली पक्की सरकारी सड़क के किनारे गए, जिस पर किसी व्यक्ति का निजी हक़ नहीं. परिवार वालों से ऐसी कोई निजी दुश्मनी भी नहीं जिसका बदला लेने के लिए इस तरह का कदम उठाना स्वाभाविक लगे. स्वच्छ भारत अभियान अपनी निरर्थक क्रूरता के लिए पहले से बदनाम हो चुका है. शाम के धुंधलके में या पौ फटने के पहले शौच के लिए बैठे स्त्री-पुरुषों को टार्च जलाकर बेशर्मी दिखाते कारिंदे अश्लीलता का विस्तार करते चलते हैं. यहाँ शिवपुरी में स्वच्छ भारत मिशन ने अमानवीयता का कीर्तिमान स्थापित करना चाहा. ये बच्चे आवाज सुनने से उठ जाते, डांट दिए जाने से भाग जाते. तत्काल न भाग पाते तो इनका कान उमेठा जा सकता था. चांटा लगाया जा सकता था. इतने संभावित विकल्पों के बाद उन्हें लाठी से क्यों पीटा गया? जान लेने की हद तक जाने का हत्यारों का मकसद क्या था- यह गुत्थी अनसुलझी है. सारे घटनाक्रम को बारीकी से जाँचें तो कुछ दूसरी सचाई झलकती नजर आती है.

     घटना 25 सितंबर 2019, बुधवार तड़के की है. भावखेड़ी गाँव मध्यप्रदेश राज्य के शिवपुरी जिले में सिरसौद थाने के अंतर्गत पड़ता है. तहसील शिवपुरी ही है. आमतौर पर यह इलाका शांत माना जाता है. जाति आधारित हिंसा की खबरें यहाँ से कम ही आती हैं. पिछले साल एससी एसटी एक्ट को परिवर्तित किए जाने के विरुद्ध भारत बंद का आयोजन हुआ था तब आसपास के इलाकों भिंड, मुरैना, ग्वालियर आदि से हिंसा की ख़बरें आयी थीं. उस समय भी शिवपुरी ने किसी उल्लेख्य हिंसक स्थिति का सामना नहीं किया था. वहाँ से दो दलित बच्चों की हत्या की खबर ने निश्चय ही चौंकाया. भावखेड़ी दलितों और पिछड़ों की आबादी वाली पंचायत है. यादव जाति-समुदाय का यहाँ प्रभुत्व है. दलितों में जाटव बहुसंख्यक हैं. इसके बाद शाक्य, परिहार और वाल्मीकि हैं. गाँव में वाल्मीकि का एक ही परिवार है. कल्ला वाल्मीकि के पाँच बेटे और तीन बेटियाँ हैं. मनोज वाल्मीकि सबसे बड़ा बेटा है. उम्र 35 वर्ष. इसके बाद सोनू 30 वर्ष, बंटी 28 वर्ष, संतोष 20 वर्ष, और धर्मेन्द्र 18 वर्ष. दो बहनों का विवाह हो चुका है. सबसे छोटी रोशनी 13 वर्ष की सातवीं में पढ़ती थी. करीब 5 वर्ष पहले मां का देहांत हुआ तो बड़े भाई मनोज ने बहन को पालने का जिम्मा उठाया. परिवार बड़ा था इसलिए मनोज वाल्मीकि ने अपनी अलग टपरिया (झोपड़ी) डाल ली. मूल निवास से 600-700 मीटर दूर एक छोटी सड़क के किनारे. बगल में गाँव का श्मशान है. मनोज की पत्नी का नाम संपतबाई है. मनोज-संपत की तीन संतानें हैं. 12 और 10 वर्ष की दो लड़कियाँ और तीसरी कक्षा में पढ़ने वाला बेटा अविनाश. घर से थोड़ी दूर पर प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय हैं. परिवार की कमाई का कोई स्थायी जरिया नहीं. मेहनत-मजदूरी करके परिवार अपना पेट भरता है. 24 सितंबर को मनोज की माँ का श्राद्ध था. पूरा परिवार इकठ्ठा था. अगली सुबह हत्या की घटना हुई. मीडिया में आयी खबरें दो तरह की थीं- एक यह कि जब परिवार के लोग शोर सुनकर बाहर पहुँचे तो उन्हें दोनों बच्चे लहूलुहान मरे मिले; दूसरा यह कि उन्होंने अपने बच्चे अविनाश की पुकार सुनी. बाहर निकले तो उसे खेतों में बचने के लिए भागते देखा. उसके पास पहुँचने से पहले उसे मार दिया गया था.

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     मुझे 26 सितंबर को इस घटना की सूचना सोशल मीडिया से मिली. 27 को दरयाफ्त किया तो घटना की भयावहता का अंदाज़ लगा. प्रिंट मीडिया में जो खबरें आ रही थीं उनका ज़ोर इस ‘तथ्य’ पर था कि यह एक सिरफिरे व्यक्ति का काम है. ऐसे में सच जानने हेतु घटना-स्थल पर जाना और सभी पक्षों से मिलना जरूरी लगा. ग्वालियर के साहित्यकार-संपादक ए. असफल को फोन किया तो उन्होंने शिवपुरी के वरिष्ठ पत्रकार-कथाकार प्रमोद भार्गव से संपर्क करने को कहा. शिवपुरी में प्रमोद जी का होना संबल की तरह था. वहाँ लेखक-पत्रकार जाहिद खान भी मिले. 3 अक्टूबर को शिवपुरी पहुँचा. जाहिद खान के साथ शहर के प्रतिष्ठित बुद्धिजीवी राजनीतिशास्त्री डॉ. पुनीत श्रीवास्तव से भी मुलाकात हुई. शिवपुरी और उसके आसपास के सामाजिक यथार्थ को समझने में इन तीनों बुद्धिजीवियों ने बहुत सहायता की. 4 तारीख की सुबह जाहिद खान के साथ शिवपुरी से भावखेड़ी गया. आने-जाने में करीब 50 किलोमीटर की दूरी मोटरसाइकिल से तय की. तथ्य-संग्रह करने के बाद हम दोनों शाम को शहर वापस लौट आए. जाहिद खान सुलझे विचारों वाले जन-प्रतिबद्ध पत्रकार हैं. उनके अनुभव और ज्ञान का लाभ पूरे वक्त मिला.

     मुख्य सड़क के बायीं तरफ भावखेड़ी गाँव पड़ता है और दायीं तरफ वाल्मीकि परिवार के दोनों घर. विभाजन साफ़ दिख जाता है. माध्यमिक स्कूल, आंगनवाड़ी केंद्र और पंचायत भवन के बाद कल्ला वाल्मीकि का घर है और उसके कुछ दूर आगे मनोज वाल्मीकि की टपरिया. करीब दो किलोमीटर पहले भावखेड़ी ग्राम पंचायत के ही अंतर्गत वीलारा गाँव है. इस गाँव में भी एक वाल्मीकि परिवार है. परिवार के मुखिया प्रकाश मेहतर (उम्र 55 वर्ष) से हमने बात की. उस समय वे अपनी बकरी का फोड़ा साफ़ करके दवाई लगा रहे थे. उनकी सहायता के लिए उनकी पत्नी और दो पोते वहाँ थे. पत्नी किंचित मुखर थीं जबकि प्रकाश थोड़े संकोच के साथ बोल रहे थे. उनके पास बीपीएल कार्ड है. इस कार्ड से अनाज के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिलता. उन्होंने बताया कि बच्चों के साथ भेदभाव नहीं होता. गाँव यादव बहुल है. सभी मेलमिलाप से रहते हैं. जाटव हमसे छुआछूत नहीं करते. शौचालय की बावत पूछने पर उन्होंने बताया कि हम सब पाखाने के लिए बाहर जाते हैं. शौचालय नहीं बना है. कोई सरकारी सहायता नहीं मिली. कई जाटव परिवारों के शौचालय बने हुए हैं.


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     जाटव मोहल्ले में हमने बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर की आदमकद मूर्ति लगी देखी और यहीं रुक गए. कई लोग बैठे हुए थे. उनसे बात की. पंचायत में सहायक सेक्रेटरी शिवसिंह जाटव (35 वर्ष) ने बताया कि वीलारा में जाटवों के करीब 50 परिवार हैं. इसके बाद यादव शाक्य, पंडित, परिहार, चिड़हार और सेन जातियाँ हैं. ब्राह्मण और सेन (नाई) के एक-एक परिवार हैं. आर्थिक जनगणना के बाद प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत कुछ कुटीर (आवास) मंजूर हुए हैं. 11 अनुसूचित जाति और एक ओबीसी को आवंटित हुए हैं. ये आवास अभी बनने हैं. कुछ इंदिरा आवास पहले से बने हुए हैं. सहायक सेक्रेटरी ने बताया कि गाँव में मनरेगा चल रहा है. जो काम माँगते हैं उन्हें मिलता है. भावखेड़ी में उत्पीड़न की जो घटना हुई है ठीक वैसी कोई घटना इस गाँव के निकट अतीत में नहीं घटी है लेकिन जाति आधारित दमन कोई अजूबा नहीं है. दमन-उत्पीड़न की घटनाएं पहले भी हुई हैं और आरोपियों पर एससी/एसटी एक्ट लगे हैं. स्कूलों में तो साफ़ तौर पर भेदभाव दीखता है. आपको वहाँ पानी पीने का कोई बर्तन नहीं दिखेगा. बच्चे उठ-उठकर हैंडपंप पर जाकर पानी पीते हैं. पानी पीने का कोई गिलास या जग होगा तो सभी जातियों के बच्चे उसे छुएंगे. इससे बचने के लिए बर्तन ही नहीं रखे जाते. गाँव में भी देख लीजिए. उनके हैंडपंप पर हम नहीं जाते और वे हमारे नलके से पानी नहीं लेते. यादवों की दबंगई है. हमारे लिए चाय का बर्तन अलग होता है. ऐसे अपमान से बचने के लिए हम उनके दरवाजे पर नहीं जाते. उन्होंने सेन परिवार को हमारे बाल काटने से रोक रखा है. हम जाटव लोग खुद ही एक-दूसरे की कटिंग करते हैं. वे भैंस के बाल काट सकते हैं लेकिन हमसे छुआछूत बरतते हैं. वैसे तो भावखेड़ी ओडीएफ (खुले में शौचमुक्त गाँव) घोषित किया जा चुका है लेकिन दबंग समुदाय की महिलाएं सुबह आपको सड़क किनारे झुंड में निवृत्त होते दिख जाएंगी. हर तरफ गंदगी फ़ैली है. नाली निकलने नहीं देते. हमारे हैंडपंप साफ़-सुथरे हैं लेकिन वे हमारे यहाँ से पानी नहीं ले सकते. जातिवाद सिर चढ़कर बोलता है.

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     मूर्तिकार हंसराज जाटव ने बताया कि वे 12वीं पास हैं. अपने पहले प्रयास में उन्होंने डॉ. आंबेडकर की आदमकद मूर्ति बनाई. यही मूर्ति गाँव में लगी है. “मूर्ति लगाने का यह मतलब नहीं कि हम डॉ. आंबेडकर की पूजा करते हैं. हम उनके विचारों को मानते हैं.” हंसराज कांग्रेस और भाजपा में ज्यादा अंतर नहीं देखते. उन्होंने शिव सिंह की इस मांग का पुरजोर समर्थन किया कि स्कूलों में मध्याह्न भोजन बंद होना चाहिए. दो रोटी में बच्चों का पेट तो भरता नहीं, उलटे पढ़ाई दुष्प्रभावित होती है. स्कूल के आस-पास गंदगी का ढेर लग जाता है. इस भोजन की क्वालिटी भी खराब है. प्राइमरी स्कूल आने वाले बच्चों के घर दूर नहीं होते. वे दोपहर का खाना अपने घर पर खा सकते हैं. मध्याह्न भोजन का बजट किसी बेहतर मद में लगाया जा सकता है. इसी तरह वहाँ उपस्थित लोगों ने गऊशाला बनवाने की एकमत से मांग की. गायें और अन्य मवेशी छुट्टा घूमते रहते हैं. “पहले ये बिक जाते थे. अब ये संकट बने हुए हैं और खुद संकट में हैं. इनकी व्यवस्था कीजिए.”

     भावखेड़ी हत्याकांड पर शिव सिंह जाटव ने कहा कि अगर बच्चों को मारने वाला हाकिम सिंह यादव पागल होता तो ऐसी घटना पहले भी हुई होती. पुलिस थाने में रिपोर्ट की जाती. वह अपने साथ चल रहे छोटे भाई रामेश्वर पर वार करता. ऐसा कुछ तो नहीं हुआ! “हम सरकार के भरोसे नहीं रहते हैं. भावखेड़ी वाली घटना यहाँ वीलारा में घटित होती तो अब तक न्याय हो चुका होता.”

     भावखेड़ी में दो-तीन जगह सिपाही खड़े दिखे. एक सिपाही से मनोज वाल्मीकि का पता पूछा और उनकी झोपड़ी पहुँचे. झोपड़ियाँ अक्सर बिना दरवाजे की होती है. मनोज की झोपड़ी में भी कोई दरवाजा नहीं था. ढंग की दीवाल हो तो दरवाजा लगाया जाए! कलक्टर और जिले के अन्य आला अधिकारी यहाँ आ चुके थे. बसपा प्रमुख मायावती भी विजिट कर चुकी थीं. एससी/एसटी आयोग के उपाध्यक्ष व उनके मातहत अधिकारी पीड़ित परिवार से मिलने आ चुके थे. अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं और नेतागणों का आना-जाना लगा हुआ था. बताया गया कि 30 से 40 लोग रोज आ रहे हैं. प्रशासन ने ऐसे में मनोज के घर के सामने एक टेंट लगवा दिया था और पानी का एक टैंकर खड़ा कर दिया था. जब हम पहुँचे मनोज टेंट के नीचे झिंलगा खाट पर लेटे हुए थे. पुलिस की बस थोड़ी दूर पर खड़ी थी. दो सिपाही ‘वज्र वाहिनी वाहन’ (पुलिस बस) के अंदर थे और दो (एएसआइ निरंजन तिर्की तथा टी. आर, कैन) टेंट के नीचे रखी कुर्सियों पर बैठे हुए थे. पूरे वातावरण में मरघट-सी खामोशी छायी हुई थी. गाँव का मरघट मनोज के घर के सौ कदम की दूरी पर दिख रहा था. मनोज ने बताया कि उनके पिता को प्रधानमंत्री आवास नहीं मिला जबकि उन्हें इसकी जरूरत थी. हाँ, उन्हें ढाई बीघे का एक पट्टा मिला है. पिता के यहाँ एक शौचालय बना था जो पहली ही बारिश में ढह गया. दो दिन पहले उज्ज्वला योजना के तहत गैस सिलेंडर मिला है. पाँच भाइयों में अब तक दो की शादी हो चुकी है. मनोज के तीनों बच्चे स्कूल जाते थे. बहन को स्कूल भेजना जारी रखा यद्यपि वहाँ छुआछूत होती है. रोशनी और अविनाश की हत्या के बाद दोनों बेटियों को स्कूल भेजना बंद कर दिया है. रोशनी सातवीं में पढ़ती थी, अविनाश तीसरी में. रोजगार गारंटी योजना के संबंध में पूछने पर उन्होंने कहा कि मनरेगा के तहत उन्हें कभी काम नहीं मिला. वे खेत मजदूरी करते हैं और ईंट-गारा का काम भी. काम करने के लिए तिघरी जाते हैं. तिघरी पास की एक ग्राम-पंचायत है.

     मनोज का कहना था कि हाकिम सिंह यादव का दिमाग खराब नहीं है. “उसके भी तो बच्चे हैं! यह खुले में शौच की नहीं, छेड़ाछाड़ी की घटना है.” मेरा सवाल था कि अगर छेड़खानी का मामला है तो क्या आपने पुलिस को यह बात बतायी? पुलिस तो इसे इस रूप में देख ही नहीं रही है और न मीडिया में इस तरह की बात जा रही है. मनोज का प्रत्युत्तर था कि बेटे और बहन की लाश देखकर वे अपनी सुधबुध खो बैठे थे और पुलिस से इतना ही कह पाए थे कि उनके बच्चों को मार डाला गया है. उन्होंने खुद ही हाकिम को बच्चों पर लाठी चलाते देखा. रामेश्वर हाकिम को रोक नहीं रहा था. रोकता तो हत्या न होती. वे कुल चार भाई हैं. घटना के बाद शेष दोनों भाई हठे सिंह और कमर सिंह घर छोड़कर सपरिवार कहीं चले गए है. सरपंच सूरज यादव भी तब से गाँव में नहीं हैं. आरोपी से पुरानी अदावत तो नहीं थी? इस सवाल पर मनोज ने कहा कि उनके पिता कल्ला 6 भाई थे. उनका परिवार सलौदा गाँव पौरी तहसील में रहता था. परिवार बढ़ा तो खटपट होनी शुरू हुई. तब कल्ला भावखेड़ी आ गए. यहाँ उनकी किसी से दुश्मनी नहीं. मुझसे भी किसी का कोई झगड़ा नहीं. कोई डेढ़-दो बरस पहले आरोपित परिवार से मजदूरी को लेकर अवश्य कहासुनी हुई थी. मेरी बहन के साथ एक महीने पहले उन लोगों ने छेड़खानी की थी. यह बात मेरी पत्नी संपत को मालूम थी लेकिन झगड़े की आशंका से मुझे बताया नहीं. पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिले तो खुलासा हो. मुझे लगता है कि बहन ने छेड़छाड़ का विरोध किया होगा तो उसे मारा गया. बेटा इसका चश्मदीद रहा होगा इसलिए वह भी मारा गया.

     मनोज वाल्मीकि ने गाँव में छुआछूत की स्थिति पर कहा कि वे पहली कक्षा से आगे इसलिए नहीं पढ़ सके कि उनके साथ भेदभाव होता था. आज भी स्कूल में उनके बच्चों के साथ बराबरी का व्यवहार नहीं होता है. हमारे बच्चों को दूर बिठाते हैं. कोई पूछे तो कहते हैं कि ये भंगी के बच्चे हैं. इस जिज्ञासा पर कि क्या गाँव के जाटव भी दूरी बरतते हैं, मनोज ने बताया कि ऊँच-नीच का भाव उनमें भी है. बच्चों की ‘लकड़ी’ (अंत्येष्टि) में यादवों में से कोई नहीं आया. इसे समझा जा सकता है. लेकिन, जाटव लोगों में से भी किसी का न आना क्या बताता है! सिर्फ़ हमारा वाल्मीकि समाज सहायता कर रहा है, साथ दे रहा है. जब कलक्टर मैडम आयीं और उन्होंने सरपंच सूरज सिंह यादव को फोन लगाया तो उन्होंने फोन उठाया ही नहीं. वे तब से फरार हैं. अन्य जातियों में परिहार परिवार ने हमारा साथ दिया. परिहार स्कूल में खाना बनाता है. “इस इलाके से जाति आधारित हिंसा की कितनी घटनाएं पुलिस तक पहुँचती हैं?” जाहिद खान के इस सवाल पर सब इंस्पेक्टर तिर्की के बताया कि यह इलाका अपेक्षाकृत शांत है. वे तीन वर्षों से सिरसौद थाने में पदस्थ हैं. इस दौरान जातिगत उत्पीड़न की यह पहली घटना उनके संज्ञान में आयी है. शिवपुरी पुलिस लाइन से यहाँ भेजे गए दूसरे अधिकारी टी.आर. कैन इस राय से सहमत दिखे. थाने में ऐसी रपटों की विरलता का एक अर्थ यह लिया जाए कि बड़ी घटनाओं की ही रपट दर्ज होती है. बहुत-सी घटनाएं ‘ऐसा तो होता आया है’ कहकर रिपोर्ट करने लायक समझी ही नहीं जातीं. 

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     “हमें न्याव चाहिए.” मनोज ने यह वाक्य एकाधिक बार ज़ोर देकर कहा. “न्याव से क्या मतलब लगाएं?” मनोज की मांग थी- हत्यारों को फाँसी देनी चाहिए. दंड ऐसा हो कि कोई दुबारा इस तरह करने की सोच भी न सके. हम अब भावखेड़ी में नहीं रहना चाहते. यहाँ हमें खतरा है. उन्हें फाँसी हुई तो हमारी जान का खतरा खतरा और फाँसी न हुई तो हमें गुस्सा आ सकता है. अब हमारा यहाँ रहना सुरक्षित नहीं है. एससी/एसटी कमीशन से आए अधिकारियों ने आवास मुहैया कराने का आश्वासन दिया है.

     मनोज के घर से हम गाँव की ओर बढ़े. सड़क पार पंचायती मंदिर था. एक बड़े कमरे का मंदिर. बिना पलस्तर की गई ईंटों का बना हुआ. दरवाजे पर बांयीं तरफ पीपल का पेड़. कमरे के दरवाजे पर टिन का शेड. तीन पुरुष बैठे आटा गूंथ रहे थे. चार युवा बैठे गपशप कर रहे थे. कोई पुजारी नहीं दिखा. वहाँ बैठे लोगों ने बताया कि यह मंदिर पूरे गाँव के लिए है. सातों जातियों के लोग यहाँ आ सकते हैं. बाद में अन्य स्रोतों से ज्ञात हुआ कि मंदिर के अंदर जाने का अधिकार यादवों तक है. शेष जातियों के लोग बाहर से दर्शन करते हैं.

    प्राइमरी स्कूल मंदिर से 100 मीटर दूर होगा. हम वस्तुस्थिति का अनुमान करने के लिए इधर चले गए. उस समय बच्चे दोपहर का भोजन करने गैलरी जैसे बरामदे में बैठे थे. जगह साफ़-सुथरी थी. नीचे लंबी पट्टी बिछी हुई थी. स्कूल में तीन अध्यापक हैं. तीनों शालीन व्यवहार वाले लगे. प्रधानाध्यापिका किरण माँझी सहित शेष दोनों अध्यापक मोती सिंह जाटव और परीक्षित जाटव अनुसूचित जाति से हैं. इनसे अनुमति लेकर मैंने लाइन से बैठे बच्चों का नाम पूछा. किसी-किसी से ढिठाई करके बिरादरी भी पूछी. ज्ञात हुआ कि सभी कक्षाओं और जातियों के बच्चे साथ बैठे खाना खा रहे हैं. खाने के बाद इन बच्चों से बात की. गणित और हिंदी के प्रश्न पूछे. शिक्षक अपने दायित्व के प्रति मुस्तैद लगे. बच्चे बेझिझक प्रश्नों के उत्तर दे रहे थे. मनोज वाल्मीकि से हुई बात को ध्यान में रखते हुए स्कूल में जातिगत भेदभाव की स्थिति पूछी. शिक्षकों ने कहा कि वे स्वयं जाति आधारित भेदभाव के विरुद्ध हैं, तब ऐसा बर्ताव क्यों होने देंगे. उन्होंने बताया कि मनोज का बेटा ‘अवि जमादार’ के नाम से स्कूल की तीसरी कक्षा में पंजीकृत था. कक्षा में रेगुलर नहीं था. कभी-कभी अपने पिता के साथ आता था. सरकारी योजनाओं का लाभ लेना ही उस परिवार का मकसद लगता था. अध्यापकों से मनोज कहते भी थे कि उनके घर में दरवाजा नहीं है इसलिए सुरक्षा के नाते वे बच्चे को स्कूल में छोड़ जाते हैं. तीनों शिक्षकों ने दृढ़तापूर्वक कहा कि इस विद्यालय में बच्चों के साथ जाति के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाता. मीडिया ने सिर्फ़ एक पक्ष को सुनकर स्कूल की नकारात्मक छवि बना दी है. शिक्षकों का पक्ष न तो ठीक से सुना गया और न उनके प्रत्याख्यान, आरोपों के खंडन को उद्धृत किया गया. स्कूल से निकलते वक्त शिक्षक मोती सिंह ने कहा कि अनटचेबिलिटी एक वास्तविकता है इसीलिए यह घटना एक मुद्दा है. “मैं भावखेड़ी इसीलिए आया कि यह इलाका शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ा हुआ है. हम दोनों (परीक्षित जाटव समेत) किसी अन्य स्कूल में जॉइनिंग ले सकते थे लेकिन हमने यही विद्यालय चुना.” मोती सिंह और परीक्षित मामा-भांजे हैं. साथ-साथ पढ़े हैं. एक साथ यह स्कूल ज्वाइन किया है. मोती सिंह ने अपनी शिक्षिका प्रो. संध्या भार्गव को बड़े आदर व आत्मीयता से याद किया. प्रो. संध्या से मिले संस्कार, स्नेह और संबल उन्हें गुरु के साथ माँ के स्थान पर भी प्रतिष्ठित करते हैं. मोती सिंह शिक्षण कार्य के साथ निर्वाचन संबंधी दायित्व भी निभाते हैं. वे बी.एल.ओ. (बूथ लेवल ऑफिसर) हैं. परीक्षित इसके पहले ग्राम पंचायत लोहा देवी में जी.आर.एस. (ग्राम रोजगार सहायक) थे. शिक्षक बनने की शुभेच्छा उन्हें यहाँ ले आयी. “मुझे यह (शिक्षण) कार्य करने में बहुत ही आनंद की अनुभूति होती है. बहुत सौभाग्यशाली हूँ कि मैं एक शिक्षक हूँ.” बड़ी शिद्दत से परीक्षित ने यह बात कही. तीनों शिक्षकों की लगन, प्रतिबद्धता और आनंदानुभूति ने हमें बहुत प्रभावित किया लेकिन विद्यालय भवन की जर्जर हालत ने भय का संचार भी किया. कमरे सीलन से भरे हुए, दीवारें व छत सीपेज युक्त और खस्ता हालत में श्यामपट्ट व अन्य उपकरण. ग्राम पंचायत की निगरानी में बना यह नया भवन विकेंद्रीकरण के स्वरूप पर पुनर्विचार करने को बाध्य करता लगा. बाहर बने शौचालय पर कोई छत नहीं दिखी. एक हैंडपंप सूख गया है.

     स्कूल के बाद गाँव के अंदर गए तो पहले जाटव मोहल्ले की ओर मुड़े. मोहल्ला गाँव के दक्षिण में है. मोहल्ले में घुसने के लिए एक मुख्य दरवाजा है. किंवाड़ रहित. दरवाजे से लगी दीवार पर ‘जय भीम जय भारत’ और ‘सुस्वागतम’ लिखा हुआ है. दूसरी तरफ वाली सीधी दीवार पर ओडीएफ (ओपन डेफिकेशन फ्री) वाली सरकारी उद्घोषणा लिखी गई है. ग्राम पंचायत भावखेड़ी के ‘सौजन्य’ से लगी इस ‘आवश्यक सूचना’ की इबारतें हैं- “ग्राम भावखेड़ी शौच मुक्त घोषित किया जाना है. यदि कोई भी ग्रामवासी अगर खुले में शौच जाता है तो उसके खिलाफ़ धारा 268, 277, 278, 336 का दोषी मानकर पुलिस प्रकरण दर्ज किया जावेगा.” इस सूचना के बगल का रास्ता यादव टोले का है. सूचना पर सभी गाँववासियों की निगाह पड़ती रहे, इसी से ऐसी जगह चुनी गई है. यह सूचना एक प्राकृतिक कृत्य को जिस तरह अपराध घोषित करती है उससे यह अनुमान लगाना स्वाभाविक है कि किसी अपराध को ढंकने के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है. जाटव मोहल्ले में अधिकाँश कोठरीनुमा मकान जर्जर हालत में दिखे. ज्यादातर में ताला लटका हुआ था. वहाँ हमारी मुलाक़ात धनीराम जाटव, सुल्तान जाटव और बच्चू जाटव आदि लोगों से हुई. हत्याकांड और मनोज के प्रकरण पर बोलने से लोग हिचक रहे थे. उन्हें नहीं पता था कि हाकिम यादव का दिमाग खराब है या नहीं. वे इन परिवारों के मध्य किसी पुरानी रंजिश को भी याद नहीं कर पा रहे थे. उन्होंने यह भले बताया कि वर्ष 2014 में जाटव समुदाय के गोपाल की छोटी बहन दुलारी की बारात को यादवों ने चौपाल पर रोक दिया था. वे दूल्हे को घोड़ी पर बैठकर जाने की अनुमति नहीं दे रहे थे. तब लड़ाई होनी थी. हुई. पुलिस आई. मामला रफा-दफा किया और बारात निकली. जाटवों में कुछ को जमीन के पट्टे मिले हैं. वे खेती करते हैं. शेष लोगों में कुछ खेत मजदूर हैं. कुछ मजदूरी करने शिवपुरी और ग्वालियर आदि जगहों पर जाते हैं. ट्रक चालक सुल्तान जाटव ने बताया कि दो-तीन साल पहले स्कूल में भेदभाव की घटना हुई थी. पुलिस में रिपोर्ट भी हुई थी. ज्यादा ब्योरा नहीं मालूम. धनीराम ने बताया कि ग्राम पंचायत में सरपंच यादव ही होते आए हैं. न सरपंच सुनते हैं और न सेक्रेटरी. बीपीएल कार्ड को एपीएल कर दिया है. राशन मिल ही नहीं रहा. यह पूछने पर कि मनोज वाल्मीकि के यहाँ अंत्येष्टि में क्यों नहीं गए, जवाब मिला कि उनके घर आने-जाने की परंपरा ही नहीं है. ‘फिर वहाँ तो कलेस हुआ था. कलेस में क्यों जाएं?’ यह बातचीत चल ही रही थी कि तब तक यादव टोले से भी कुछ लोग आ गए थे. बलबीर यादव, देवेन्द्र यादव आदि ने कहा कि हाकिम सिंह का दिमाग ही खराब है. उसने अपने भाई हठे सिंह का हाथ तोड़ दिया. (हत्याकांड के बाद हठे सिंह सपरिवार गाँव छोड़कर जा चुके हैं इसलिए इस सूचना की पुष्टि संभव नहीं थी.) यादव टोले के लोगों ने बताया कि घटना वाले दिन हाकिम सुबह चार बजे ही उठ गया था. नहाते हुए बोल रहा था कि उसे रामजी ने राक्षसों के विनाश का आदेश दिया है. भला ऐसी बात कोई दिमागवाला व्यक्ति कहेगा!

     वहाँ खड़े पैंसठ वर्षीय बच्चू जाटव को लगा कि मैं दिल्ली से आया कोई अफसर हूँ और उन्हें मेरे रजिस्टर में अपनी फ़रियाद लिखवा देनी चाहिए. शायद सरकार सुन ले. उनका मकान गिर गया है. उन्हें कोई आर्थिक सहायता नहीं मिली. वृद्धावस्था पेंशन भी नहीं मिलती. जमीन का पट्टा भी उन्हें नहीं मिला. किसी तरह मजूरी करके पेट भर रहे हैं. उनके तीनों बच्चे गाँव छोड़कर शिवपुरी चले गए हैं. ‘कुछ तो सरकारी सहायता आनी चाहिए’- उनका निवेदन था.

     श्रीराम कॉलोनी शिवपुरी शहर का पॉश इलाका है. इस कॉलोनी में आते हुए अगल-बगल दो दुर्गा मंदिर दिखे. प्रमोद जी से पूछा तो पता चला कि एक मंदिर ब्राह्मणों का है दूसरा वाल्मीकियों का. ब्राह्मण पुजारी वाले मंदिर में अपेक्षाकृत कम दर्शनार्थी जाते हैं. हमारे मेजबान की पत्नी भी वाल्मीकि मंदिर की श्रद्धालु हैं. आस-पास के जितने भी ब्राह्मण-बनिया परिवार हैं प्रायः वे सब वाल्मीकि मंदिर के भक्त हैं. भावखेड़ी घटना पर वाल्मीकि मंदिर के पुजारी का मत जानने के लिए मैं प्रमोद जी के साथ वहाँ गया. महंत भग्गूराम जी करोसिया मंदिर प्रांगण में ही कुर्सी पर बैठे थे. उनके बगल में फूल और प्रसाद की टोकरियाँ थीं. श्रद्धालु मंदिर में दर्शन करके बाहर निकलतीं/निकलते, महंत के पाँव छूते और प्रसाद लेकर बाहर जाते. नवरात्र का समय होने के कारण भीड़ ज्यादा थी. मैंने भी महंत जी का अभिवादन किया और एक कुर्सी लेकर पास ही बैठ गया. इन दिनों हर दिन भंडारा होता है और हर भंडारे को कोई न कोई भक्त आयोजित करता है. आज का भंडारा जैन साहब की तरफ से था. कल के लिए मगरौनी वाले गर्ग साहब ने जिम्मा लिया था. मंदिर का यह स्थान प्राचीन है लेकिन वर्तमान में जो दुर्गा मंदिर है उसका निर्माण रमेश खरे ने 1991 में कराया था. ‘खरे’ वाल्मीकि जाति का एक गोत्र है. महर्षि (वाल्मीकि) मंदिर 1980 में बना था. मंदिर के पीछे वाल्मीकि बस्ती है. पुजारी जी का छोटा बेटा सतीश शुरू से ही धार्मिक प्रकृति का रहा. आज वह हनुमान मंदिर का पुजारी है. किन्हीं चौहान जी ने इस मंदिर के निर्माण में विशेष सहयोग किया था. जब हनुमंत सिंह दाऊ मध्यप्रदेश के कृषि और सिंचाई मंत्री थे तब उन्होंने दुर्गा मंदिर प्रांगण में रैन बसेरा बनवाया था. महंत भग्गूराम आठ वर्ष की उम्र से ही पूजा-अर्चना करने लगे थे. सेवा निवृत्ति के बाद वे पूरी तरह इसी में रम गए हैं.

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     भावखेड़ी हत्याकांड पर दुःख जताते हुए उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी ऐसी घटनाएं घटती रहती हैं. गलती हमारी भी है. हम अपना पुराना धंधा नहीं छोड़ पा रहे हैं. पहले इस तरह की हिंसा नहीं होती थी. हत्या करना नया चलन है. स्कूलों में भेदभाव होता है. भावखेड़ी में भी होता रहा होगा. “सोचिए, बाबासाहेब उस जमाने में शिक्षा ग्रहण करने के लिए किन परिस्थितियों से गुजरे होंगे.” ‘आप बाबासाहेब को कब से जानते हैं?’ “जब से होश संभाला है, आंबेडकर साहेब को जानता हूँ.” ‘आपके कार्यक्रमों में राजनीति से जुड़े लोग आते हैं?’ “नहीं, ऐसे राजनीतिज्ञों को हम अपने कार्यक्रमों में बुलाने से परहेज करते हैं.” महंत जी ने बताया कि राजनेता अवसर का लाभ उठाने से नहीं चूकते. उन्होंने भावखेड़ी घटना पर चल रही राजनीति के संदर्भ में कहा कि यहाँ भी समुदाय का एक नेता लाभ उठाने के फेर में है. उन्होंने ऐसे कई समाजकर्मियों का नाम लिया जो सच्चे मन से समुदाय और समाज की सेवा कर रहे हैं. इन समाजकर्मियों में उन्होंने डॉ. रंजीत खरे से मिलने की सलाह दी. डॉ. रंजीत जिला चिकित्सालय में नेत्र रोग विभाग में हैं. उन्होंने ही उक्त हत्याकांड पर रैली निकाली. अधिकारियों को ज्ञापन दिया. वे पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने की कोशिश में लगे हुए हैं. मैंने महंत जी से डॉ. खरे का संपर्क नं. लिया. महंत जी ने मुझे कृपापूर्वक संध्या आरती में आमंत्रित किया. शाम साढ़े सात बजे होने वाली यह आरती पौन घंटे चलती है. इसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु जुटते हैं. मंदिर के पीछे वाल्मीकि बस्ती है. यहाँ करीब चार सौ परिवार रहते हैं. पूरे शहर में पाँच हज़ार परिवार होंगे. उन्होंने दो महानायकों से प्रेरणा लेने की बात की. महर्षि वाल्मीकि ने हमें कलम दी है और बाबासाहेब ने शिक्षा. इस अवसर पर महंत जी ने बी.एल. कान्ताराव को याद किया. कान्ताराव जी वाल्मीकि समाज के थे और शिवपुरी जिले के कलक्टर होकर आए थे. ऐसे लोगों से समाज को दिशा मिलती है. विदा लेते वक्त महंत भग्गूराम जी ने कहा कि मर्यादा बनी रहनी चाहिए. मर्यादा से उनका आशय मनुष्यता से था.

     भावखेड़ी से शिवपुरी लौटा तो डॉ. रंजीत से मिलने अस्पताल गया. सुबह जब उनसे समय लेने के लिए फोन किया था तब वे अस्पताल जाने को तैयार हो रहे थे. उन्होंने पहले अपना नाम सुधरवाया- डॉ. रंजीत सिंह करौसिया. कहा कि भावखेड़ी से वापस होते समय कॉल करना. मुझे लगा कि वे अभी ड्यूटी पर ही होंगे. अस्पताल के किसी कर्मचारी ने बताया कि शाम 6 बजे तक वे प्रायः चले जाते हैं. उनसे फोन करने पर ज्ञात हुआ कि भावखेड़ी घटना के संबंध में अभी तहसील में एक विरोध प्रदर्शन है. यहाँ सभी एक्टिविस्ट आए हुए हैं. उन्होंने मुझे तहसील आने की सलाह दी. जब तक मैं तहसील पहुँचता एसडीएम को ज्ञापन सौंपा जा चुका था. डॉ. रंजीत के कारण वहाँ कई प्रमुख समाजकर्मियों से मिलना संभव हो पाया.

     रवि महंत (36 वर्ष) वाल्मीकि महापंचायत शिवपुरी के अध्यक्ष हैं. इस महापंचायत की उपस्थिति पूरे मध्य प्रदेश में है. उन्होंने कहा कि ऐसा दर्दनाक हादसा किसी के साथ नहीं होना चाहिए. उनकी मांग थी कि हत्यारों पर पास्को के तहत केस दर्ज होना चाहिए और उन्हें फाँसी की सजा मिलनी चाहिए. सरकार उस परिवार को शिवपुरी में आवास मुहैया कराए. पीड़ित परिवार के दो लोगों को सरकारी नौकरी मिले और एक-एक करोड़ रुपए के साथ दस बीघे खेत. रवि महंत ने कहा कि यह मामला खुले में शौच का नहीं, कुकृत्य का है. बच्चे ने देख लिया तभी दोनों को मार डाला गया. डॉ. रंजीत सिंह करौसिया (39) ने प्रश्न किया कि आखिर ऐसी घटनाएं हमारे साथ क्यों हो रही हैं? उन्होंने रवि महंत से सहमति जताते हुए घटना की सीबीआइ जांच की मांग की जिससे सच सामने आ सके. एक्टिविस्ट आकाश खरे (30) ने इसे निंदनीय घटना बताते हुए कहा कि मुआवजे की कोई भी राशि बच्चे की पूर्ति नहीं कर सकती. उन्होंने भी इसे छेड़छाड़ का मामला कहा. सीबीआइ जांच और पॉस्को के अंतर्गत मुकदमा दर्ज करने की मांग उन्होंने भी दोहराई. हरीश कुमार वाघरी (49) किसी संगठन या पार्टी से जुड़े नहीं हैं. यह उनका कमिटमेंट है जो उन्हें ऐसे प्रदर्शनों में जाने और पीड़ित के पक्ष में खड़े होने को प्रेरित करता है. हरीश जी का सवाल था- ‘क्या तेरह साल की बच्ची एक नौ-दस साल के लड़के के साथ शौच के लिए जा सकती है? उन्होंने कहा कि गाँव में जातिगत दमन का इतिहास है. इस मामले में लाश को छिपाने की कोशिश की गई. गाँव में वाल्मीकि का एक ही घर है. यह दबा हुआ है. जाटव और परिहार समाज के लोगों ने हत्यारों को पकड़ा और पुलिस के हवाले किया. अवसाद भरी आवाज़ में उन्होंने कहा कि दबंगों के साथ-साथ भगवान भी हमारे खिलाफ है. वह बच्चे को राक्षस मानता है और एक दबंग को आदेश देता है कि वह राक्षसों का विनाश करे. अगर ऐसी कोई घटना हमारे समाज का आदमी करता तो अब तक हमारे घर जलाकर राख कर दिए जाते.

    वाल्मीकि समुदाय के घर जलाकर राख करने की एक घटना अभी दो साल पहले ही घटी. नवंबर 2017 में शिवपुरी जिले की पिछोर तहसील के अंतर्गत खनियाधाना नामक कस्बे में एक वाल्मीकि युवक पर दो वर्ष की बच्ची के साथ दुर्व्यवहार का आरोप लगा. आरोप को आज तक सही साबित नहीं किया जा सका है. लेकिन, इस आधार पर यादव समुदाय ने वाल्मीकि बस्ती घेर ली. महिलाओं और बच्चियों के साथ छेड़छाड़ की गई. 40 से अधिक घरों को लूट लिया गया और फिर उन्हें आग के हवाले कर दिया गया. यद्यपि दबंगों द्वारा यह सब किए जाने से पहले वाल्मीकि पंचायत ने आरोपित युवक को जाति बाहर कर दिया था और प्रशासन व पुलिस से अपराधी को कड़ी से कड़ी सजा दिलाने की मांग की थी. जब बच्ची के साथ यौन हिंसा की कोई पुष्टि नहीं हो पायी तो पुलिस को एफआइआर से यह धारा हटानी पड़ी. लूट लिए जाने, पीटे और घर जलाए जाने के बाद दहशतज़दा वाल्मीकियों के सामने पलायन करने के सिवाय और कोई रास्ता नहीं बचा था. वे वहाँ से उजड़ गए या उजाड़ दिए गए.

     सामूहिक हिंसा की किंचित पुरानी किंतु एक उल्लेखनीय घटना जाटव समुदाय के साथ सितंबर 1988 में घटी थी. शिवपुरी के थाना रन्नौत, तहसील बदरवास के गाँव हिनोतिया में दबंगों ने धावा बोलकर जाटवों की झोपड़ियाँ लूट लीं और 43 झोपड़ियों को आग के हवाले कर दिया. इनमें रहने वाले 200 से अधिक जाटव निर्वासित कर दिए गए. उनका अपराध यह था कि उन्होंने चरागाह की कुछ बीघे भूमि जोतकर फसल उगा ली थी.

     भावखेड़ी हत्याकांड का विश्लेषण करते हुए अपने अपेक्षाकृत विस्तृत लेख (‘बर्बर सोच का परिणाम, दलित बच्चों की हत्या’, दैनिक सन्मार्ग, कोलकाता, सोमवार 30 सितंबर 2019, पृ. 8) में प्रमोद भार्गव ने प्रधानमंत्री की सदाशयता की तारीफ की है. इस सदाशयता की एक मिसाल के रूप में उन्होंने इस बार कुंभ मेले में प्रधानमंत्री द्वारा पाँच सफाईकर्मियों के पाँव धोने को पेश किया है. समरसता के नाम पर दलितोद्धार में लगे संघ के कार्यों का भी उन्होंने प्रशंसापूर्ण उल्लेख किया है. यह सब लिखने के बाद उनकी टिप्पणी है- “(इसके) बावजूद ये उपक्रम सांकेतिक हैं, क्योंकि इनसे लाचार की बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं होतीं और न ही दलित परिवार में चल रहे दैनंदिन लैंगिक भेदभाव से महिलाओं को मुक्ति मिलती है.” ‘उद्धार’ के प्रतीकात्मक उपक्रमों से न दलितों का भला होने वाला है और न  देश का. लेकिन, बिडंबना है कि यह सरकार प्रतीकों के जोर पर देश को आगे ले जाने का दावा किए जा रही है. दलितों, अल्पसंख्यकों, स्त्रियों, आदिवासियों, विद्यार्थियों, मजदूरों और किसानों की बदतर होती स्थिति को बहुत दिनों तक ढांप कर नहीं रखा जा सकता.

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     सूबे की कांग्रेस सरकार ने इतना अवश्य किया है कि पीड़ित परिवार की मांग पर अक्टूबर के दूसरे सप्ताहांत तक उन्हें शिवपुरी शहर में अस्थायी आवास उपलब्ध करा दिया है. स्थायी आवास और परिवार के दो सदस्यों को सरकारी नौकरी का आश्वासन शायद शीघ्र पूरा कर दिया जाए.


हम सरकार और प्रशासन से पीड़ित परिवार हेतु समुचित फौरी राहत की मांग करने के साथ यथाशीघ्र दीर्घकालीन बंदोबस्त की अपेक्षा करते हैं. इस हत्याकांड की सक्षम एजेंसी/एजेंसियों द्वारा गहन, विस्तृत और प्रामाणिक जांच होनी चाहिए. सच का सामने आना बहुत आवश्यक है. वास्तव में पूरा दलित समाज लगातार हिंसा का शिकार होता रहा है. इसकी रोकथाम और स्थायी समाधान के लिए पुख्ता नीति बनाने और मुकम्मल व्यवस्था किए जाने की जरूरत है. न्यायपूर्ण समाज मात्र सपना न रहे. संकटापन्न इतिहास अथवा वर्तमान के इस मोड़ पर स्पष्ट राजनीतिक-आर्थिक समझ वाले सामाजिक आंदोलनों की भूमिका स्वयंसिद्ध है.

  
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