कमला और प्रभावती: दो मित्रों की कहानी

प्रेमकुमार मणि

जवाहरलाल नेहरु और कमला नेहरु
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जवाहरलाल  नेहरू (1889-1964 ) और जयप्रकाश नारायण ( 1902-1979 ) आधुनिक भारतीय इतिहास  की ऐसी हस्तियां हैं, जिन्हे किसी परिचय की दरकार नहीं है. दोनों जुझारू स्वतंत्रता सेनानी रहे और इस क्रम में दोनों ने  जेल की लम्बी यातनाएं झेलीं. दोनों की शिक्षा विदेशों में हुई थी. नेहरू इंग्लैंड  में पढ़े और जेपी (इसी नाम से उन्हें मित्रों के बीच पुकारा जाता था )संयुक्तराज्य अमेरिका में. दोनों स्वप्नदर्शी और समाजवादी तबियत के थे. नेहरू का समाजवाद निर्गुण किस्म का था तो जेपी का सगुण किस्म का. लेकिन मैं यहां उन दोनों की दास्ताँ नहीं सुनाने जा रहा हूँ. मैं इन दोनों की पत्नियों की मैत्री और उससे  जुड़े सन्दर्भों पर बात करना चाहता हूँ. कमला जवाहरलाल नेहरू की पत्नी थीं और प्रभावती जयप्रकाश नारायण की.

कमला का जन्म 1899 में नयी दिल्ली में हुआ. माँ राजपति कौल और पिता जवाहर मल्ल कौल थे. यह कश्मीरी पंडित परिवार था, जो दिल्ली में बस गया था. 1916 में 17 साल की उम्र में कमला का विवाह इलाहबाद के मशहूर वकील मोतीलाल नेहरू के इकलौते विलायत पलट बेटे जवाहरलाल के साथ हुआ. अगले साल 1917 के नवंबर में उन्हें एक बिटिया हुई. नाम रखा गया इंदिरा प्रियदर्शिनी. यह इंदिरा गांधी के नाम से जानी गयीं और लगभग सोलह वर्षों तक भारत की प्रभावशाली प्रधनमंत्री रहीं. 1924 के नवंबर में कमला- जवाहरको एक बेटा भी हुआ था, लेकिन कुछ ही रोज बाद उसकी मृत्यु हो गयी थी. 1920 के बाद ही कमला के पति जवाहर स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े और फिर उनके ज्यादातर वर्ष जेलों में बीते. इस बीच कमला को बराबर इलाहबाद के एक ऐसे घर में रहना पड़ा, जो स्वतंत्रता आंदोलन का केंद्र था. उनकी ननदों, सास और दादी सास की अपनी दुनिया थी, जिसमे कमला स्वयं को अलग-थलग महसूस करती थीं. उनकी भावनाओं का थोड़ा ख्याल रखने वाले उनके ससुर मोतीलाल जी का निधन फ़रवरी 1931 में हो गया. इसके बाद वह और अधिक असहाय हो गयीं. बीमार तो वह पहले से ही रहती आयी थीं, अब कुछ अधिक रहने लगीं. 1934 में उन्हें ट्यूबरक्लोसिस की मरीज घोषित किया गया. भुवाली में कुछ महीने रहने के पश्चात सुभाषचंद्र बोस के प्रयासों से उन्हें स्वीट्ज़रलैंड के बोडवेल्कर अस्पताल में भर्ती कराया गया. अक्टूबर 1935 में जवाहरलाल को पत्नी के देखने केलिए अचानक जेल से रिहा कर दिया गया. वह कमला के पास गए और तीमारदारी की.लेकिन 28 फ़रवरी 1936 को कमला की मृत्यु हो गयी. जवाहरलाल ने अपनी मशहूर आत्मकथा कमला को ही समर्पित किया है.

प्रभावती का जन्म 1906 में बिहार के सीवान जिले में एक मशहूर कायस्थ परिवार में हुआ. पिता ब्रजकिशोर प्रसाद बिहार के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे. माता फूल देवी घरेलु महिला थीं. 1920 में जेपी से उनका विवाह हुआ, तब वह 14 साल की थीं, जेपी 18 के थे. विवाह के दो साल बाद अपनी पढाई केलिए जेपी अमेरिका चले गए, जहाँ कैलिफोर्निया   के बिस्कोनिया यूनिवर्सिटी   में उन्होंने कृषि -विज्ञान की पढाई की. लेकिन उनकी दिलचस्पी राजनीति में अधिक थी. अमेरिका में वह मार्क्सवाद से प्रभावित हुए और 1929 में भारत लौटने पर इस सोच की बुनियाद पर  राजनीति शुरू की. 1934 में कांग्रेस पार्टी के भीतर ही कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी (सीएसपी ) का गठन किया और फिर देश की राजनीति को समाजवादी तेवर देने का प्रयास किया.

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जे.पी. जब पढ़ने केलिए अमेरिका गए, तब ब्रजकिशोर बाबू ने अपनी बेटी प्रभावती को गांधीजी के आश्रम साबरमती भेजा, जहाँ वह जल्दी ही गांधीजी  की पत्नी कस्तूरबा से घुल मिल गयीं. कस्तूरबा को चार बेटे थे, लेकिन कोई बिटिया नहीं थी. उनने प्रभा को अपनी पुत्री के रूप में अपनाया और प्रभा ने भी उस आश्रम को ही अपना घर मान लिया. आश्रम में रहते हुए प्रभावती गांघी से इतने प्रभावित हुईं की उनने ब्रह्मचर्य की शपथ ले ली. इस शपथ पर वह आजीवन बनी रहीं. जे.पी. और प्रभा साथ अवश्य रहे, लेकिन कुछ खास अर्थों में. आज़ादी  के बाद समाजवादियों ने जब कांग्रेस से हट कर सोशलिस्ट पार्टी बनाई, तब जेपी इसी खेमे मेंर हे. 1952 के चुनाव में पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिलने से हताश जेपी विनोबा के भूदान आंदोलन से जुड़ गए.प्रभावती महिला चरखा समिति जैसे गांधीवादी अभियानों में लगी रहीं. 15 अप्रैल 1973 को कैंसर की व्याधि से उनकी मृत्यु हुई.

        कमला और प्रभा दो बड़ी हस्तियों की उदास पत्नियां थीं. जैसा  बता चुका हूँ प्रभा साबरमती आश्रम में रहती थीं. इस आश्रम में जाने की इजाजत केलिए उन्हें अपने ससुराल वालों से संघर्ष करना पड़ा. लेकिन अंततः वह गयीं और रहीं. साबरमती के उस आश्रम में नेहरू परिवार की महिलाओं का भी जाना होता था. कमला नेहरू पहली दफा 1920 के दिसम्बर में वहां गयीं. इंदिरा  तब तीन साल की थीं. उसके बाद वह कई दफा वहां गयीं और कुछ-कुछ समय तक वहां रहीं भी. नेहरू परिवार की महिलाओं पर गाँधी  का बहुत प्रभाव था. सब उन्हें भगवान समझते थे. आश्रम में कुछ समय तक रहना उनके लिए पुण्य-कार्य था.

इस साबरमती आश्रम में ही कमला और प्रभावती मित्र बनीं. उनकी मित्रता कमला के अवसान तक तो बनी ही रही, उनके अवसान के बाद भी स्मृति रूप में बनी रही. 1958-59 में प्रभावती ने अपनी सखी कमला की स्मृति में पटना में कमला शिशु विहार बनवाया. इसका उद्घाटन वह तत्कालीन प्रधानमंत्री और कमला के पति जवाहरलाल नेहरू से कराना चाहती थीं.लेकिन जवाहरलाल ने संकोच करते हुए इंकार कर दिया. हाँ, उस संस्था केलिए ढाई सौ रुपये का चेक चंदा रूप में अवश्य भेजा.

प्रभावती देवी
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कमला और प्रभावती के बीच हुए पत्राचार को ‘प्रभा-स्मृति ‘पुस्तक में मुझे देखने का अवसर मिला.इसे पटना  महिला चरखा समिति ने पहली दफा 1974  में और पुनः परिवर्धित रूप में 2006 में प्रकाशित किया है. इसमें वे चिट्ठियां संकलित हैं जो कमला ने प्रभावती को लिखे हैं. कुछ चिट्ठियां जवाहरलाल द्वारा भी प्रभा को लिखी गई हैं, जिसमे एक दिलचस्प चिट्ठी ( जिस पर तारीख  अंकित नहीं है ) यह भी है- ‘प्रिय प्रभा, कमला तरकारी काट रही है,इसलिए मुझे लिखने को कहा. 50/ भेज रहा हूँ. दर्ज़ी अभी आया नहीं है. तस्वीर तुम्हारे लिए रख ली जाएगी. जल्दी अच्छी हो जाओ. बीमारी फिजूल चीज है. तुम्हारा भाई, जवाहरलाल’

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चिट्ठी छोटी है, लेकिन इससे दोनों परिवारों की आत्मीयता या अंतरंगता तो स्पष्ट होती ही है. 50 रूपये, दर्ज़ी,  तस्वीर और वह बीमारी जिसे जवाहर फिजूल कह रहे हैं. लेकिन इन सब के ऊपर यह कि कमला तरकारी काट रही है और उसके एवज में मैं लिख रहा हूँ. मैं समझता हूँ यह पत्र 1933-34 का होना चाहिए.क्योंकि इन दोनों के बीच पत्र के यही साल रहे हैं. 1935 की गर्मियों में ही कमला इलाज केलिए स्विट्ज़रलैंड चली जाती हैं, जहाँ फ़रवरी 1936 में उनका निधन हो जाता है.

  पहली जो चिट्ठी मिलती है वह रेलगाड़ी से लिखी गयी है और इस पर तारीख है 8-2- 33.सम्बोधन में  लिखा है-‘  प्यारी प्रभा, प्यार ! ‘ फिर’ ‘ जवाहर 12 सितम्बर को निकलेंगे. तीन दिन इलाहबाद में रहेंगे. फिर पूना इन्दु के पास जायेंगे. मैं भी उनके साथ ही आउंगी. उनके जाने पर तुम और मैं संग हो जायेंगे. माताजी इस समय रेल में हैं. मिलने पर बातें बताउंगी. ‘

मिलने पर बताने केलिए कमला के पास हमेशा बहुत कुछ रहता था. 6-5-34 को आनंदभवन से लिखा-’ प्रिय प्रभा, प्यार! ता. 4 को चंदा लेने गयी. जब घर आयी तो कुछ करने को जी नहीं चाहा. तो मैंने नौकरों से कहा कि हिसाब पीछे देखना, इस वक़्त मैं सोती हूँ. लेटने के पहले थर्मामीटर लगाया तो 102 डिग्री था. जवाहर का खत शाम की डाक से मिला. लिखा अच्छे हैं. उनको कुछ लोग फल भेजते थे, बंद करने को लिखा है, कुछ वजह है, इसलिए. लिखने को भी कागज वगैरह नहीं मिला.खत भी बेतुके जेल के कागज पर आया है. ईश्वर  के भरोसे हैं. जो होना होगा, होगा. उनको शायद वहीँ रखे.जयप्रकाश कैसे हैं ? और कब तक वहां रहेंगे ?- कमला’

ऐसा लगता है कमला बहुत दुखी रहा करती थीं. वह बराबर लिखती हैं,  कोई उन्हें प्रेम नहीं करता. संसार से उदासीन वह ईश्वर की खोज में लगी होती हैं,  जैसे जवाहर भारत की खोज में लगे होते हैं. 30-6-33 को नैनी रोड से लिखा- ‘ तुम्हारा प्रेम से भरा हुआ पत्र देख कर मुझ को बड़ा आनंद हुआ. संसार में तुम तो मुझ से स्नेह करती हो, ख़ुशी हुई. किन्तु मुझ से प्रेम करने से तुम्हे क्या लाभ होगा? ऐसे आदमी से प्रीति करनी चाहिए जो प्रीति के एवज में प्रीति करे. मैं तो पत्थर मरती हूँ, बोलना भी नहीं आता. ज्यादा प्रीति बहन मुझसे मत करो. पीछे तुम को पछताना पड़ेगा. ‘

इसके कुछ ही रोज पहले का एक पत्र 16-6-33 का है, जिस का समापन करते हुए कमला लिखती है.’ मैं अच्छी हूँ. कुछ खाना भी पकाती हूँ. हाथ पहले से अब कुछ अच्छा है. न भी अच्छा हो तो चिंता क्या ? इस शरीर का क्या मोह जो मिटटी में मिलने वाला है. मेरे लिए प्रार्थना करो  कि मुझे आत्मज्ञान हो जाय. और मुझे कुछ इच्छा नहीं है. ‘ कमला के दुःख का विस्तार होता ही जा रहा है. 17-9-33 को वह अपनी प्यारी सखी को फिर लिखती हैं- ‘ तुम मेरे लिए क्यों दुखीऔर चिंतित होती हो? मैं इस योग्य नहीं हूँ कि कोई मुझ से प्रेम करे.’

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कमला के पत्रों की व्याख्या कोई मनोवैज्ञानिक ही कर सकता है. खास कर पत्रों में वक्रोक्तियों की व्याख्या आसान नहीं है. वह पत्थर मारती है, या उसे बोलना नहीं आता, जैसी बातें संभव है उसे घर में सुनने को मिलती हो. वह गहरे अवसाद में उतरती चली जा रही है.इसी मनःस्थिति में वह अनुभव करती हैं कि मुझ से कोई प्रेम नहीं करता. यह केवल कमला की कहानी नहीं थी. उन तमाम स्वतंत्रता सेनानियों की पत्नियों की कहानी भी थी, जो एक कहीं बड़े जेल में एक कहीं बड़ी आज़ादी  केलिए संघर्ष कर रही थीं. रवीन्द्रनाथ टैगोर के उपन्यास’ घरे-बाइरे ‘ की विमला में भी हम इस संघर्ष  को देख सकते हैं.  14-3-34 को कमला लिखती है- ‘ मेरे पास मेरा भगवान रहता है, दूसरे की क्या जरुरत हो सकती है.’   कुछ ही रोज बाद 31-4 को लिखती हैं – ‘ प्रभा,  अगर तुम यहां आ रही हो तो बिहार खादी भंडार की सस्ती साड़ियां अच्छे  किनारे की दिखने केलिए ला सको, तो लेती आना. मुझे इन्दु केलिए चाहिए. वह शांति निकेतन में साड़ियां ही पहनेगी. मैं महंगी तो पसंद नहीं करती कि पहने. 5-7 तारीख तक आ सको तो अच्छा रहेगा. इन्दु पसंद कर लेगी. ‘

कमला नेहरु

कमला कांग्रेस के काम में भी  सक्रिय रहती थी. जवाहर जेल में थे. सखी प्रभावती को वह पत्र लिख कर गांधीजी से एक सलाह मांगती है कि पूछ  कर बतावे. पत्र  27-5-34 का है, आनंदभवन से.’ सुनो,  बापू से यह बात पूछ कर खत को देखते ही मुझे जवाब दो. बात यह है कि अगर गवर्नमेंट कोई चीज को, तस्वीर को, हमारे यहां या किसी दफ्तर से हटाने को  कहे तो कांग्रेस वालों को क्या करना चाहिए ? उसे हटा दे या कुछ करे. दूसरी बात,  अगर कोई प्रोसेसन निकले और वह गैर-क़ानूनी कर दिया जाय तो कांग्रेस वालों को ऐसी हालत में क्या करना चाहिए ? यहां तस्वीर का झगड़ा आने वाला है.वहां मैं भी मेंबर हूँ, मेरी राय में तो नहीं हटनी चाहिए. आगे जैसा बापू बताएं. जरा जल्दी जवाब देना. जवाहर का खत आया था. अपना कुछ नहीं लिखा. उनको वहां टहलना नहीं मिलता. ‘

1935 के आरम्भ में ही कमला भुवाली चली गयी थीं. उन्हें यक्ष्मा था. भुवाली में रहना, उन दिनों यक्ष्मा के मरीजों के स्वास्थ्य  केलिए फायदेमंद माना जाता था. 29-3-35 को वह भुवाली से लिखती है-‘ यह संसार जाल है. फंसने में दुःख ही दुःख है. मैंने बड़ी सख्त गलती की, जो 35 वर्ष की जिंदगी गृहस्थी में  ख़राब की. इस वक़्त ईश्वर को ढूंढती तो वह मिल जाता. खैर जो भी हुआ अच्छा हुआ.-कमला’

भुवाली से ही 7-4-35  को वह लिखती है- ‘ ईश्वर पर अगर पूरा भरोसा हो दुःख पास नहीं आता है,  और आदमी शांति से रहता है. माताजी देहरे (देहरादून  ) में हैं. एक दफे यहां मिलने आयी थीं. … साल भर बाद क्या करोगी ? बहुत अच्छा कर रही हो, जो पढ़ रही हो. तुम तो बापू के पास हो और क्या चाहिए ? ऐसे मनुष्य का साथ बड़े भाग्य से मिलता है. बापू तो ऐसे व्यक्ति हैं, जो आसानी से नहीं मिल सकते. यह तो लोगों के अच्छे भाग्य हैं जो ऐसा व्यक्ति हमारे पास है.लेकिन हमलोग ऐसे हैं, उसकी कदर नहीं करते हैं. पीछे पछतायेंगे. बापू-सा होना बड़ा कठिन है. ‘

इस बीमारी में कमला की हताशा बढ़ती ही जा रही है. अवसाद सांद्र से सांद्र होता जा रहा है. हालत यह हो गयी है कि अब वह देश की  आज़ादी से अधिक ईश्वर की तलाश पर बल दे रही है. भुवाली से ही 15-4 को लिखती है—‘ मेरी तो पहले इच्छा थी कि देश को आज़ाद करवाऊं.लेकिन अब तो मेरी बस यही इच्छा है कि मैं अपने ईश्वर की तलाश करूँ और उसको ढूँढ निकालूँ. मुझे दुनिया की कोई चीज नहीं चाहिए. ‘ इसी पत्र में उनकी हताशा और गहराती है–‘..कौन हमारा, हम किस के ? यह सब धोखे की टट्टियाँ हैं. सब चलाचली का खेल है.’

  लेकिन इस स्थिति में भी वह सरकार का कोई अनुग्रह नहीं लेना चाहतीं. 8-5-35 को लिखती हैं– ‘ जवाहर को जहाँ तक मेरा ख्याल है, गवर्नमेंट ने कोई ऑफर नहीं किया. अख़बार वाले फिजूल लिख रहे हैं. अगर कोई शर्त लगाए तो मैं संग जाने को तैयार नहीं हूँ. मुझे मरना मंजूर है, लेकिन किसी तरह  की अंडरटेकिंग  मैं जवाहर को नहीं लेने दे सकती हूँ. वह भी कभी नहीं  देंगे. मैं ऑपरेशन से डरती नहीं हूँ. अगर मेरी मौत यूरोप  में होनी होगी तो हो. जवाहर संग होंगे तो क्या बचा लेंगे ? ‘   कमला और जवाहर की यही जोड़ी  है, जिनकी देशभाक्ति पर कुछ लोग आज सवाल उठाते हैं. उन्हें यह  चिट्ठी एक बार पढ़नी चाहिए. उन्हें सावरकर की वह  चिट्ठी  भी पढ़नी चाहिए, जो  सशर्त रिहाई केलिए उन ने गिड़गिड़ाते हुए ब्रिटिश सरकार को भेजी थी और अंदमान से रत्नागिरी आये थे.

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प्रभा के नाम कमला का यह आखरी खत  है. कमला इलाज केलिए यूरोप गयीं और लौटीं नहीं. लेकिन प्रभावती का नेहरू परिवार से संपर्क बना रहा. 9-4-37 को इलाहबाद से जवाहरलाल नेहरू प्रभावती को लिखते हैं- ‘ प्रिय प्रभावती,  तुम्हारा खत मिला. अब मेरी तबियत कुछ ठीक है. 14 तारीख की सुभे (सुबह ) में पटना इन्दु के साथ पहुंचूंगा. शाम तक रहूँगा. राजेंद्र बाबू शायद रहने का इंतजाम करेंगे. तुम्हारा भाई- जवाहरलाल.’ 1940 में भी लिखा गया एक खत है जो 16 अक्टूबर को इलाहबाद से लिखा गया है. इसमें राजनीतिक खबरों के अलावे इन्दु की चर्चा है. बतलाया गया है वह स्विट्ज़रलैंड में है और अच्छी है.

आज़ादी के बाद समाजवादियों का कांग्रेस से अलगाव हो गया. गांधीजी की हत्या हो गयी.  नेहरू और जेपी  की राजनीति अलग हो गयी. बाद में जेपी भूदान से जुड़ गए.  एक तरह से सब कुछ गड्ड-मड्ड हो गया. इस बीच प्रभावती चुपचाप महिला चरखा समिति के कार्यों में लगी रहीं. लेकिन अपनी सखी को भूली नहीं. 1959 में उन्होंने सखी की स्मृति में पटना में कमला शिशु विहार  बनवाया. इस सन्दर्भ में 25-9-59 को प्रभावती के नाम नेहरू का एक पत्र है- ‘ प्रियप्रभा,  तुम्हारा खत 20 तारीख का मिला. पढ़ कर ख़ुशी हुई. जब कभी तुम दिल्ली आओ तो जरूर मिलने आओ. तुम जानती हो कि मुझे बच्चों से बहुत प्रेम है, इसलिए मुझे तुम्हारा विचार एक शिशु विहार खोलना बहुत पसंद आया और मैं आशा करता हूँ कि इस काम में तुम को पूरी सफलता मिलेगी. लेकिन उसका उद्घाटन करने का सवाल दूसरा है. जिस चीज का संबंध कमला से हो, उसका उद्घाटन मेरा करना उचित नहीं है. मैंने बहुत दिनों से यह नियम बना रखा है-कमला केलिए और पिताजी केलिए.  हाँ, जब मैं पटना आऊं तो शिशु विहार को देखना जरूर चाहूंगा. इसलिए मुझे उद्घाटन में मत फंसाओ.शिशु विहार के कोष केलिए एक चेक 250 / का भेजता हूँ. (चेक को जयप्रकाश के नाम कर दिया है, क्योंकि उनकी अपील तुम ने भेजी है.) तुम्हारा,  जवाहरलाल नेहरू’

और इस तरह प्रभावती ने अपनी सखी की स्मृति का एक बिरवा अपने बिहार में लगाया और उसे पालती-पोसती रहीं. यह एक अलग कहानी है कि इन्ही प्रभावती के पति जेपी ने कमला की बेटी इंदिरा की राजनीति के खिलाफ एक जनांदोलन का नेतृत्व किया. लेकिन इससे  इन दो सखियों की कहानी प्रभावित नहीं होती. बहुत संभव है प्रभावती होतीं तो इन्दु  के खिलाफ जे.पी. को उतरने नहीं देतीं. लेकिन इतिहास की अपनी चाल होती है. ऐसा नहीं भी हो सकता था.

प्रभावती की मृत्यु पर इंदिरा गाँधी ने जो भावोद्गार व्यक्त किया था ,  उस में उनने अपनी माँ से उनकी मित्रता का जिक्र करते हुए कहा था -‘वे दोनों दृढ धरना वाली महिलाएं थीं  और उनका आत्म-संयम और  भी दृढ था. स्वतंत्रता-संग्राम में अपने पतियों के साथ एक होकर उन्होंने परम्परानुसार पति-धर्म को निभाया. साथ ही विचारों में दोनों पूरी तरह आधुनिक थीं.’

प्रेमकुमार मणि राजनैतिक-सांस्कृतिक विचारक हैं
चर्चित साहित्यकार एवं बिहार विधान सभा के पूर्व सदस्य रहे हैं.

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