आज गूगल ने जिस महिला को अपना डूडल बनाया है उनके बारे में प्रोफेसर सुधा सिंह की टिप्पणी

सुधा सिंह

जहाँ का समाज पितृसत्तात्मक हो और ब्राह्मणवाद, मनुवाद की सत्ता कायम हो वहां सबसे ज्यादा शोषण महिलाओं का होता है, उनके अधिकार, उनकी आज़ादी और खुद उनको सशरीर कैद कर लिया जाता है. ऐसे में एक महिला का शिक्षित होना रूढ़िवादी समाज के ऊपर गहरी चोट है और एक क्रांति की शुरुआत मानी जा सकती है.

Photo: Google

गूगल ने आज डूडल बनाकर ब्रिटिश भारत की पहली महिला ग्रैजुएट कामिनी राय को याद किया है। कामिनी राय अविभाजित बंगाल के एक संपन्न और शिक्षित परिवार की महिला थीं। उनके पिता ब्रह्मसमाज के अनुयायी थे और स्त्री शिक्षा के हिमायती भी। कामिनी राय ने कलकत्ता के प्रसिद्ध बेथुन कॉलेज से ग्रैजुएशन किया और वहीं अध्यापिका नियुक्त हुईं। उनकी अभिरुचि आरंभ में गणित विषय में थी लेकिन आगे चलकर उन्होंने संस्कृत भाषा में स्नातक की उपाधि प्राप्त की।
वे विवाह के बाद कुछ समय तक हजारीबाग में रहीं। वहाँ उनकी साहित्य चर्चा कई लोगों से होती थी। उनके संपर्क में वहाँ के नामचीन रचनाकार थे।

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राजनीतिक तौर पर भी वे काफी सक्रिय रहीं। इलबर्ट बिल वापसी के आंदोलन में बढ़ चढ़ कर भूमिका निभाई थी। 12 अक्तूबर 1894 को जन्मी कामिनी राय का विवाह उस समय की प्रथा के विपरीत 30 वर्ष की आयु में हुआ जो , लीक से हटकर था। उन्होंने 1886 से लेकर 1894 तक बेथुन कॉलेज में अध्यापन का काम किया। बेंगाल लेगिसलेटिव काउंसिल में बंगाली स्त्रियों के पूर्ण मतदान के अधिकार के लिए वे लड़ीं। वे सन् 1922-23 में स्त्री श्रम पर बनी समिति की वे सदस्या रहीं। 27 सितंबर सन् 1933 में आपका देहांत हुआ। उन्होंने विवाह और बच्चों के जन्म के बाद से कविता लिखना छोड़ दिया था , यह कहकर कि ‘‘मेरे बच्चे ही मेरी कविता हैं।’’ लेकिन पति और बड़े पुत्र की मृत्यु के बाद फिर से कविता के संसार की तरफ मुड़ीं।
उनकी एक कविता का अनुवाद जिसका शीर्षक ‘सुख’ है, प्रस्तुत है-

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सुख

सुख नहीं है क्या?
सुख कहीं नहीं है क्या?-
ये धरा क्या केवल विषादमय है?
मनुष्य जन्म पाकर केवल क्या-
पीड़ा में जलना रोना और मरना ही है?
छिन्न वीणा पर उँचे स्वर से बोलो,
ना, ना, ना, मानव जीवन के लक्ष्य उँचे हैं, सुख उच्चतर
सृजन रोता नहीं न कभी दुहाई देता है।
कार्यक्षेत्र प्रशस्त खुला है
युद्भभूमि है संसार यह ,
जाओ वीर भेष में सजकर इस युद्ध में,
जो जीतेगा सुख भी वही भोगेगा।
दूसरों के लिए अपने स्वार्थों की दो बलि
यह जीवन मन सब कुछ दे दो,
इस देने जैसा सुख और कहीं है क्या?
भूल जाओ अपने को।
दूसरों के लिए मरने में भी सुख है;
‘सुख’ ‘सुख’ कह और विलाप मत करो,
जितना रोओगे, जितना सोचोगे,
उतना ही बढ़ेगा हृदय भार !
यह क्रंदन निर्लज्ज है,
संसार से परे , कोई नहीं लौटा है,
सभी के पीछे सब हैं,
हर कोई दूसरे के पीछे खड़ा है।
-कामिनी राय,
अनुवाद –सुधा सिंह

फेसबुक से साभार
सुधा सिंह
दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्रोफेसर


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