वह कैसी अजनबियत थी माँ!

डा.कौशल पंवार

डा.कौशल पंवार माँ के साथ

उम्र के साथ-साथ मैं और मां बड़े हो चले थे. मां को अब लगने लगा था कि मैं बड़ी हो गयी हूं. न केवल उम्र में बल्कि पद और यश में भी. जब बड़े- बड़े लोग (उनके अनुसार) मेरे साथ बात करते या फ़िर मैं बहुत बडी़ सी भीड़ में भाषण देती तो उन्हे मैं औरों से ओर बड़ी लगने लगती. फ़ूली नहीं समाती थी वह देख कर. बहुत बार वे मेरे साथ होती थी सामाजिक समारोह में. दिल्ली में और कई बार दिल्ली से बाहर भी. इस फ़ासले ने कई बार मुझसे मेरी मां को छिन भी लिया था. फोन पर मां कई बार मुझे आप कहकर बुलाती तो मुझे खराब लगता था. मै मां को ड़ाट देती थी कि ऐसे क्यूं बोल रही है. वैसे मां थैंक्यू और हेलो कहना अच्छे से सीख गयी थी. पर मां खुलकर बात करना बंद करने लगी थी अब थोड़ा-थोड़ा. मेरे काम और मेरी व्यस्तता को देखकर खुशी तो उन्हें मिलती थी लेकिन अपने मन की बात अब वो छुपाने लगी थी. कई बार मैं जब भी ड्राइव कर रही होती अकेले में तो रो भी पड़ती थी याद करके. मुझे बहुत बार अपराध बोध होता था मां को लेकर कि मैं उन्हे समय नहीं दे पाती. मां साथ में मेरे घर रहती थी.इसलिए भी मुझे तसल्ली रहती थी तो यही लगता कि कोई बात नहीं बाद में आराम से बैठकर बात कर लूंगी. फ़िर भी बहुत ज्यादा बात नही हो पाती थी जितना मैं करना चाह रही होती थी. घर आकर भी बच्चों और मुकेश या दूसरी जिम्मेदारियों में उलझी रहती. पर कई बार खूब बतियाती थी. हम साथ बैठकर गाने गाते लोक गीत. मां गाती तो मैं भी साथ में गुनगुनाती. मां हसंती और कहती-“ तेरे इबी बी याद अंय ये गीत” मै हां में मुंड़ी हिलाती. फ़िर हम दोनों ओर जोर- जोर के गाते. एक बार तो मैने चुपके से मां को गाते हुए रिकार्ड कर लिया था. मां ने जब महसूस किया तो शर्मा कर गाना बंद कर दिया. फ़िर भी मैने कुछ तो रिकार्ड कर ही लिया था. जो आज मेरे पास बचा है. जब भी सुनती हूं तो मन कचोटता है कि मैंने क्यूं नहीं सारी आवाज सहेज ली होती उस वक्त जो आज कम से कम मेरे पास पूरी तरह से होती और मुझे संबल देती रहती.

मै जब छोटी से बड़ी होने लगी थी तो मैंने चाचा के साथ सोना बंद कर दिया था. पर मां के साथ सोती थी. मेरी एक टांग और एक बाजू मां के ऊपर होती थी. चिपक कर सोती थी. बड़ी होने के साथ -साथ मेरी टांग का बोझ भी बढने लगा था तो मां मेरी टांग को परे धकेल देती मेरी तुरंत आंख खुलती और मैं फ़िर ऐसा करती. वो मुझे डांटती कि-“ अब उनसे मेरा बोझ नहीं उठाया जाता, तो मैं जोर के हंसती कहती-“तुम्हे तो मेरा बोझ सारी उम्र उठाना है मेरी मां और तु अभी से थकने लगी. अभी तो तू जवान है”. मां भी मेरे साथ जोर ओर के हंसती.

यह भी पढ़ें: स्त्रीकाल शोध जर्नल (33)

दिल्ली आने से पहले मां मेरे साथ चंडीगढ में रही थी. मैं, मां और मयंक हम साथ में थे. मेरी पहली नौकरी वहीं लगी थी. साथ साथ पीएच.डी जे.एन.यू. से चल ही रही थी. (इस पर चर्चा कभी किसी दिन ओर करुंगी) दूसरी नौकरी मेरी दिल्ली विश्वविद्यालय के मोतीलाल नेहरू में लगी जो अभी तक है. पी.एच.डी से लेकर दिल्ली विश्वविद्यालय तक का सफ़र मां के कारण ही हो पाया था. फ़िर चला अंतर्राष्ट्रीय यात्राओं का दौर जो बिना मां के संभव ही नहीं था. मां ने जिस उंचाई पर मुझे देखना चाहा. मैने उसे पूरा किया था उनके देखते देखते. मां अकसर मुझे वीडियों के जरिये जहाज की यात्रा करते देखती तो झुम उठती थी कई– कई बार मेरा माथा चूमती. मैं जब भी बाहर निकलती विदेश जाने के लिए और चाचा की तस्वीर के आगे झुकती तो उनकी आंखे बस चाचा से मानो एक ही शिकायत करती कि देखों वे देख पा रही हैं जो चाचा नहीं देख पाये थे. चाचा के खून पसीने की कमाई को भरपूर ब्याज के साथ पूरा कर रही है उनकी ये चांद. लेकिन मजाल  बहार से मैंने मां की आंखों में कोई नमी देखी हो पर मुझसे वो आंखे छुपती कहां थी और मां मुझे अपने सीने से लगा लेती. ध्यान रखना अपना, मैं इंतजार करूंगी. कहती और जाने की ओर ईशारा करती. यात्रा पर  तो अब भी थी. मां ने कहा भी था कि इंतजार करुंगी लेकिन मेरे वापिस लौटने का इंतजार नहीं किया और चली गयी हाथ छुडाकर. शायद कहीं दूसरे लोक में मेरे आने का इंतजार कर रही होगी. कई बार मां को छोड़ते हुए लगाता था कि एक दिन मैं मां को जहाज की यात्रा करवाऊंगी विदेश की पर समय ने मेरा साथ नहीं दिया. हां इतना जरुर हुआ कि मां ने अपने देश में यात्रा जरुर कर ली थी. और उन पलों को मैं शब्दों में ब्यान नहीं कर सकती. मेरे पास उन कैद हुए क्षणों को कागज पर उतारने के लिए शब्द नहीं है.

मां के सामने मैं एक मां बन चुकी थी. बेटा भी उन्ही के सामने पैदा हुआ था और बेटी भी. मयंक, और मेरी पहली नौकरी को तो पाला ही मां ने था. तब मुकेश रोहतक में रहता था. मां ही मेरे पास थी. मेरी पीएच.डी. मां के कारण ही हो पायी थी क्योंकि मां ही मेरे साथ महानदी छात्रावास जे. एन.यू. में रही थी. फ़िर चडीगढ और उसके बाद फ़िर दिल्ली मेरे साथ रही थी. यहां तक पहुंचने का ये सफ़र मां के बिना संभव ही नहीं था.

यह भी पढ़ें: दलित स्त्रीवाद अंतरजातीय विवाह को सामाजिक बदलाव का अस्त्र मानता है -रजनी तिलक

मेरी ये हाड-मांस की बोडी मां और चाचा की खून पसीने, उनकी भावनाओ, उनके सपनों, उनकी उम्मीदों और उनके तप से बनी है. मेरा तो इसमे कुछ है ही नही. ये शरीर तो उनसे ही निखरा था जिन्होंने अपने सुख को त्यागकर उसे मुझ पर लूटा दिया था. चाचा ने मेरा साथ मेरे एम.ए. (संस्कृत) तक दिया. फ़िर हाथ छुडाकर चल दिये. मां ने उस वक्त कहा था-“मैं हूं ना” उस वक्त किया ये वायदा उन्होंने उम्र भर नहीं तोड़ा. मैने उनसे किये बहुत से वादे तोड़ दिये लेकिन वे कभी अपने वायदे से पीछे नहीं हटी. दुनियां के रीती-रिवाजों को तोड़ मेरे साथ रही, मेरा साथ दिया. गांव में बहुत से लोगों ने उन्हे उल्हाने भी दिये कि बेटी के घर रह रही है. बाप मर गया तो उसकी पास रहेगी. जबकि बेटी के घर का दाना पानी तक नहीं पिया जाता और मां मेरे साथ रह रही है. लेकिन उसने कभी परवाह नहीं की. यहां तक कि अपने बेटे बहुओं की भी नही. हालांकि मेरे भाईयों और मेरी भाभियों ने भी इसमे मेरा साथ दिया था.

मैं बहुत बार सोचती थी कि मां ने पहले मुझे पाला और अब मेरे बच्चों को पाल रही है. कहीं ऐसा ना हो कि मेरा काम पूरा हो जाये, मेरी जरुरत पूरी हो जाये और मैं मां को फ़िर वापिस गांव भेज दूं. मैं कांप उठती थी ऐसा सोचकर.

मेरी विड़ंबना देखिए वही हुआ. मयंक अब बड़ा हो गया था. मुकेश और हम साथ रहने लगे थे. मां भी साथ मे थी. पर अब मयंक का व्यहार बदलने लगा था. बात – बात पर मां को अब वो ड़ाटने लगा था और खिजने लगा था. कई बार मेरे सामने भी हुआ. मैने उसे दमकाया भी कि वह ऐसे मां से बात न किया करे. मां को उसी की सभी से ज्यादा फ़िक्र रहती थी क्योंकि उसी ने उसे पाल पोसकर बड़ा किया था. मै तो अपनी पीएच.ड़ी, नौकरी और दूसरे कामों मे लगी रही थी लेकिन मां, मां तो केवल और केवल मयंक को देखती थी. नापती रहती थी कि कब बड़ा होगा ये. मेरे ससुर भी कई बार कमैंट करते थे उसे खिलाते और पालते हुए देखकर कि राजौंद वाले कितना भी कुछ कर ले पोता तो उन्ही के नाम से जाना जायेगा. मुझे इससे बहुत दुख होता था. मेरी सास ने भी एक दिन मां की इस कुर्बानी को  (कुर्बानी इसलिए क्योंकि मां अपना मायका और ससुराल दोनों को छोड़कर मेरे साथ कभी जे.एन.यू., कभी चंडीगढ तो कभी दिल्ली रही थी यहां तक कि मेरी सास की बहन के घर भी मेरे कारण ही रही थी) कहा कि- इसे तो रोटी ही खानी है, यहां खा ले या वहां क्या फ़र्क पड़ता है. (चाचा की तब तक डेथ हो चुकी थी) अंदर तक चीर के रख दिया था इन शब्दों के बाणों ने मुझे. मां ने कुछ भी नहीं कहा. चुपचाप सुन लिया. उस दिन जमीन पैरों के नीचे से खिसकने से लगी थी मेरी. मेरी मां और मेरा ये अस्तिव था उन सब के सामने. घुम गया था मेरा सिर. सारी की सारी प्रोग्रेसिव सोच धरी की धरी रह गयी थी मेरी. मैं उस दिन मेरी सोच एक पायदन से नीचे खिसक चुकी थी. मुझे रिलाइज हो गया था कि समाज की हकीकत कुछ ओर हैं और फ़साना कुछ ओर है.

यह भी पढ़ें: दम तोड़ते रिश्ते

घर में “मां”, अब मां कम, बुजुर्ग ज्यादा हो गयी थी. मुकेश मां का ख्याल मां की तरह रखता था. मेरी पूरी कोशिश रहती थी कि मां को किसी चीज की कोई कमी न हो. पूरा प्यार, सम्मान और अधिकार मैं मां को देना चाहती थी. मुकेश मां को मां की तरह मान-सम्मान और प्यार देता था. मेरी अनुपस्तिथि में मेरे से ज्यादा मां का ख्याल रखा है मुकेश ने, ये मैं जानती हूं. पर मयंक बच्चा तो था साथ साथ दिल्ली जैसे बड़े शहरों के स्कूल में भी पढ रहा था जहां एकल परिवार ज्यादातर होते हैं. वहीं वह भी सीख रहा था. हम दोनों तो नौकरीपेशा बन गये थे. दिल्ली शहर की जरुरत भी तो है दोनों का नौकरी करना. जीरो से शुरु किया था हम दोनों ने तो मेहनत भी दूगनी चाहिए. पढाई, नौकरी, सामाजिक कामों मे उपस्तिथि जितना कर सकती थी करती थी आखिर सामाज के प्रती भी एक जिम्मेदारी तो बनती ही है. इन्ही सब में मुझसे कुछ छुट भी रहा था जिसे मैं महसूस तो कर पा रही रही थी लेकिन हल नहीं निकाल पा रही थी. सतही निकालती भी थी तो मेरी मजबूरी आड़े आ जाती थी कि घर को फ़िर कौन देखे. इतने पैसे नहीं कि किसी को रखा जा सके और फ़िर विश्वसनियता की भी तो कमी रहती है. मां तो मां है, उनका अपना घर है उनसे बढिया अपनापन और दे भी कौन सकता था. मैं भी मां को अब अपने से दूर नहीं करना चाहती थी. एक- एक पल उनके साथ जीना चाहती थी. मैं अब संतुष्ट् भी तो थी. मां के कारण पीएच.डी. होकर डाक्टर बन गयी थी. मयंक और कौमुदी बड़े हो गये थे, मुकेश भी अब दिल्ली विश्वविद्यालय में पढाने लगे थे और मेरे साथ रहते थे. सब तरह से खुश और संतुष्ट थी मैं. मां के कारण मैं फ़ल फ़ूल रही थी. सामाजिक दायरा भी बढ रहा था. पे बैक टू सोशायटी जो मैं शुरु से ही कर रही ओर ज्यादा इन्वोल्व हो गयी थी. पर मां वहीं थी जहां से चली थी. एक अन्तराल के साथ- साथ मां भी अब धीरे -धीरे उम्र के दौर से गुजर रही थी जहां आदमी अपने लिए एक सुरक्षा चाहता है पर वो पल तो मां ने मेरे लिए कुर्बान कर दिये थे मुझ पर. मुझे बनाने के लिए. चाचा के सपनों को पूरा करते करते उसने अपने आपको मुझ पर ही खर्च कर दिया था. मां का चाचा के जाने के बाद सबसे ज्यादा समय तो मेरे ही हिस्से में आया. दोनों भाईयों के हिस्से में कम आया था.

एक दिन मैं थकी हारी कालेज से लौटी तो मां सोफ़े पर ही बैठी थी. मैने सोफ़े पर ही पर्स फ़ैंका और मां के बगल में बैठ गयी. मां रोज की तरह पानी का गिलास देने के लिए उठी तो मैंने मां का हाथ खींच लिया और उन्हे वापिस सोफ़े पर बिठा लिया. मां ने कहा कि चेंज नहीं करेगी? मैने ’ना’ में गर्दन हिलायी. मैं मां की गोद में सोफ़े पर ही पसर गयी. मां थोड़ा डर सी गयी थी मुझे देखकर जो उनके चेहरे से भी झलक गया थी . मैने मां के हाथ को पकड़ लिया था. फ़िर तो मां मेरे चेहरे और बालों में हाथ फ़ेरने लगी. सकून सा मिला थी जैसे गर्मी में छांव मिलने से राहत मिलती है. कुछ देर हम दोनों ही चुप थे. बस महसूस कर रहे थे एक दूसरे की ढड़कन को. बच्चे स्कूल गये थे और मुकेश कालेज में था. स्वीटी भी कालेज गयी थी. ये समय केवल हम दोनों के लिए था. दोनों ही एक दुसरे से कुछ कहना चाह रहे थे पर कह नहीं पा रहे थे. मैं मां से कहना चाहती थी कि वो मयंक के व्यवहरा से दुखी तो नहीं होती. बात- बात पर मां के साथ मयंक की बतमीजी बढती जा रही थी. मुकेश भी उसे कुछ नहीं कहता था. मैं डांटती तो उसे लगता कि मैं मां का ही साथ देती हूं और वह मेरे साथ भी अब धीरे धीरे वही व्यवहार करने लगा था. कई बार चुप रहती तो कई बार मां को मैं भी ड़ाटने लगी थी कि जैसे अब मुझे मां से ज्यादा मयंक लाड़ला हो गया हो. पर ऐसा था नहीं क्योंकि मेरे लिए दोनों ही मेरे प्राणों की तरह थे. मैं फ़स सी गयी थी इन रिश्तों की अधेड़बुन में. मुकेश के साथ भी इस पर बात करती तो वह बच्चा कहकर टाल जाता. मैं अंदर से घुट सी गयी थी जब भी मां के साथ मयंक इस तरह से पेश आता तो मेरा मन तो करता कि मैं मयंक को जोर से चांटा मारूं लेकिन फ़िर भी बोलकर ही रह पाती. मां मुझे ही समझाती कि कोई बात नहीं बच्चा है सीख जायेगा. मैं मां को अब उसे किसी भी चीज के लिए टोकने से मना करने लगी थी कि चाहे ये रोटी खाये न खाये, दूध पिये न पिये कुछ मत कहना इसे, मुझे ये बिल्कुल अच्छा नही लगता कि वे तुमसे ऐसे बात करें. मैं ऐसे कहकर बाहर निकल जाती. मां तो मां थी फ़िर उसे किसी न किसी बात पर टोक ही देती. फ़िर ऐसे ही बोलता तो मैं छटपटा कर रह जाती. मेरे सामने मां से ऐसे बात करे ये मुझे मां का अपमान करने जैसे लगता. पर ये मैं कहूं तो किससे कहूं. खुब रो लेती. कई बार लगता कि क्या मैं मां को घर छोड़ आऊं तो कई बार ये भी लगता कि कहीं मां ये तो न समझ ले कि अब मुझे इनकी जरुरत नहीं इसलिए भेज रही है. मां को मेरे साथ साथ रहते रहते बहुत से बदलाव आ गये थे. शहरी कल्चर में मां ने अपने आपको ढा लिया था. पहले से ओर साफ़ सुथरा रहना, बोलना, पहनना सब सीख गयी थी. गांव में मां का मन न लगता हो ऐसा नहीं था लेकिन यहां भी मां घर जैसा ही सुख और सकुन महसूस करती थी. मैं मां की गोद में पडे पड़े सोच रही थी. मां ने ही चुप्पी तोडी. मां ने प्यार से मुझे कहा कि –“वह अब घर जाना चाहती है गांव में. तेरा काम अब ठीक चल रहा है. स्वीटी भी अब यहीं है ज्यादा खर्चा भी हो रहा है. मुकेश को भी लगेगा कि मां और स्वीटी दोनों रह रही हैं. ये ठीक नहीं है. फ़िर गांव मे भी अब सारे टोकते हैं कि अब तो बच्चे बड़े हो गये है अब उसे गांव में रहना चाहिए”. इतना कह मां चुप हो गयी थी. सुनकर रो पड़ी मै. बहुत रोयी. मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं मां को कैसे और क्या कहूं. अंदर से फ़ट पडी थी मैं. मां कितनी व्यवाहिरक थी. कितना जानती थी मुझे. झट सारी बात पकड ली थी. आज मैं बहुत छोटी हो गयी थी मां के सामने.

यह भी पढ़ें: इसलामपुर की शिक्षा-ज्योति कुन्ती देवी

मैने एक बात मां से पूछी जो कि मां के लिए बहुत पीड़ादायक थी और मैं ये जानती थी. फ़िर भी पूछी कि अगर मेरी जगह बेटा होता तो क्या मां तब भी यही करती या कहती. थोडी देर मां खामोश रही थी. पूचने के बाद मैं यही चाहती रही थी कि मां जवाब न दे लेकिन मेरी सोच के विपरीत मां ने जवाब दिया. मेरे साथ रह रहकर मां भी तो बेटा और बेटी में फ़र्क भूल ही गयी थी लेकिन फ़र्क तो था न. उनके या मेरे भूलने से समाज की सच्चाई नहीं बदल जायेगी. मां ने कहा कि-बेटा मुझे बुढापा तो वहीं पर बिताना है, लोग क्या कहेंगे कि मैं जयपाल के मरने के बाद अपनी बेटी के घर पर पडी रही, बहुएं क्या कहेगी कि अब बूढी आ गयी है. सारी उम्र जब काम करने लायक थी तो बेटी के पडी रही और अब आ गयी”. तडफ़ उठी मैं और मैने मां को चुप करा दिया. हकिकत को सुनने और उसे स्वीकार करने के हिम्मत नहीं जुटा पायी थी उस दिन मैं. मां बनना कहां इतना आसाम है. मैने अपने आपको देख ही लिया था अब मां बनकर.

मां गांव में आ गयी थी. बहुत रोई थी मैं. रह रह कर मुझे वही याद आ रहा था कि कैसे कैसे मां ने मेरे लिए सब कुछ छोड़ दिया था. मुझे बनाने के लिए. ये उल्हाने तो मां को तब भी याद थे न जो आज मां ने मेरे सामने कहे थे. आज भी मां ने अपने अंदर सब समेट लिया था और बहाना भी खुबसूरत था जबकि सच्चाई मैं भी जानती थी और मां को तो पता ही था.

मेरी मां मेरी दोस्त बन गयी थी. हम जब घर में साथ होते तो खूब मस्ती भी करते थे. मां खाने के लिए भी कुछ न कुछ बोल देती थी. मैं मां की ख्वाइश सुनकर हंस पड़ती थी और वही मंगवा लेती थी. फ़िर साथ बैठकर खाते थे. आज अब समझ आ रहा है कि उनका मकसद हमे साथ खाते बैठते देखने का होता था. मां जब भी कोई चीज मंगवाती तो अकेले ही थोड़े खाती थी सब खाते थे. आज उनके जाने के बाद अहसास हुआ कि वो ऐसा क्युं करती थी. जबकि हम सारे कहते कि मां तो चटोरी है. वैसे मां थी भी खूब खाने पीने, सजने संवरने, पहनने और घूमने की शौंकिन. उन्हे सबसे बाते करना बहुत अच्छा लगता था. मेल मिलाप करना उन्हे खूब आता था. झ्ट दोस्ती कर लेती थी. सबके साथ शान्ति से बात करना उनकी खूबी थी अपने नाम की तरह. नाम भी तो था शान्ति, सचमुच की शांत. मैं उनकी बेटी बिल्कुल उनकी उल्ट. मां खुद कहती थी कि –“अपने बाप पर गयी है, मेरा तो कुछ नहीं मिलता, ना चेहरा, ना रंग और न चाल-चलन”.

यह भी पढ़ें: गिरह

 स्वीटि और कौमु के आने से पहले हम घर मे दो जन थे बल्कि यूं कहे कि हम दो स्त्री थी. एक दिन मां ने मेरी ब्रा देखकर कहा कि ये तो अच्छी है. इसमे कपडे पहने हुए ठीक लगते है. मैंने मां को टेड़ा टेड़ा देखा कि कुछ गड़बड़ है. मैंने मां से पूछा कि पहनी है तुम्हे. मां ने कहा “ना” लेकिन मेरे लिए दूसरी वाली ला दो जिसमे वो तनी सी नही होती. मैं समझ गयी मां बिना स्टैप वाली ब्रा की बात कर रही है. जो गले में डालकर पहनी जाती है. मैने अपनी अलमारी में से स्पोर्टस वाली ब्रा मां को देखाई (जो मां पहले से ही देख चुकी थी) कि ऐसी वाली चाहिए. मां ने हां कहा तो मैं मां के साइज के हिसाब से ले आई. मां बहुत खुश थी उसे पहनकर. इतना जितना सूट पहनकर नहीं होती. बार बार यंग लड़की की तरह सीसे में झांक कर कर देखती रही. मुझे मां को देखकर अच्छा लगा था. मैने पूछा-“मां क्या कभी ऐसी भी पहनी है’, पैडड़ वाली ब्रा दिखाकर मैने कहा. मां ने कही नही तो मैने मां को वो भी पहनने के लिए दे दी. मां ने उसे पहना तो ओर अच्छा लगा. मैने मां के साथ मजाक किया कि अगर आज चाचा होते तो मां को तुरंत घुमाने ले जाते. मैं और मां रुंआसे हो गये थे. फ़िर मां ने ही महौल को हल्का किया और कहा पागल है तू, तेरा बाप कभी नहीं पहनने देता कि जो सूट मे से दिखे उसे पहने. हमारे टाइम में ब्रा व्रा नहीं होती थी अगर होती होंगी तो हमे पता नहीं. बड़े बड़े लोगों की महिलाएं पहनती थी. हम नही. ये मेरे लिए अलग जानकारी भी थी. मैने मां से पूछा कि तो फ़िर तुम क्या पहनती थी, उन्होने कहा कि हम तो सूट मे ही कट ऐसे बनवाती थी कि इसकी जरुरत ही नहीं पड़ती थी. सारा दिन खेतों के कामों मे कहां ऐसी ब्रा पहनी जाती थी. सारा दिन कौन जुड़ा-जकड़ा रहे इस ब्रा मे. इसलिए तो कामकाजी महिलायें इसे नहीं पहनती थी, बल्कि जो घरों में रहती थी वो ही इसे पहनती थी. आजकल ये जो महिनों में तुम लोग बरतते हो ये भी नहीं करती थी बल्कि गंदे कपड़े ही इस्तेमाल करती थी. आज कल तो बहुत सुधार हो गया है तुम लोगों के लिए. बच्चा होने पर भी कोई फ़टी पुरानी रजाई ही काम में आती थी. अंदर से सारा सूज जाता था, लाल हो जाता था. बिमारियां फ़ैल जाती थी पर बस ऐसे ही सब चलता था. मां ने मेरी ओर देखा जैसे धन्य हो गयी हो कि वो सब मैने नहीं झेलना पड़ा. मैने तो कौमु के होने से पहले ही सब सामान लाकर मां को थमा दिया था जिसे देख मां अपने अपको धन्य समजने लगी थी कि मुझे कम से कम वो सब नहीं झेलना पड़ा जो उसने झेला था. इसलिए मां मुकेश को अपने दामाद के रूप मे पाकर गर्व से फ़ूली नहीं समाती थी.

आसान कहां होता है मां का मां बनने का सफ़र सारी उम्र तक. मां के जमाने के दर्द की दास्तां कुछ ओर थी और मेरे जमाने के दर्द की दास्तां कुछ ओर ही थी. आखिर थी तो दोनों मां ही.

लिंक पर  जाकर सहयोग करें . डोनेशन/ सदस्यता
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकाशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  पढ़ें . लिंक पर जाकर ऑनलाइन ऑर्डर कर सकते हैं:‘द मार्जिनलाइज्ड’ अमेजन ,  फ्लिपकार्ट
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016, themarginalisedpublication@gmail.com

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here