अपनी वैचारिकी को समसामयिक आंदोलनों से जोड़ने को तत्पर दिखे लेखक संगठन

पिछले दिनों अपने संयुक्त कार्यक्रमों के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए तीन लेखक संगठन, जलेस (जनवादी लेखक संघ), दलेस (दलित लेखक संघ) तथा जसम (जन संस्कृति मंच) ने कनाट प्लेस, नई दिल्ली के संत रविदास सभागार में ‘प्रगतिशील आन्दोलन की विरासत और हमारा समय’ विचार पर गोष्ठी का आयोजन किया था. यह आयोजन वर्तमान समय की चुनौतियों को देखते हुए लेखक संगठन के रूप में एक महत्वपूर्ण पहल था, बशर्ते कि लेखक संगठन आयोजनों की खानापूर्ती भर नहीं करें. गोष्ठियों से आगे बढ़कर संगठनों को लेखकों की अपनी भूमिका, सत्ता-संस्थानों से उसके संबंध आदि के नियामक तय करने होंगे. इस आयोजन की शुरुआत में ही कतिपय कारण से प्रलेस ने घोषणा के बाद इस कार्यक्रम से खुद को अलग कर लिया था.

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इस अवसर पर बोलते हुए हुए वरिष्ठ आलोचक मुरली मनोहर प्रसाद सिंह ने कहा कि अब यह बात स्वीकार कर लेनी चाहिए कि वाम आन्दोलन के आरंभिक दौर में दलित और स्त्रियों के सवाल पीछे धकेल दिए गए थे| उन्होंने कहा कि इस आन्दोलन को केवल लेखकों तक सीमित न करके फिल्मकारों, चित्रकारों और रंगकर्मियों के आन्दोलन के रूप में देखा-समझा जाना चाहिए| मुरली मनोहर प्रसाद सिंह का यह वकतव्य उस दौर में आया है जब प्रगतिशील लेखक संघ में दलितों और महिलाओं के प्रतिनिधित्व के सवाल पर संगठन ने अपने संगठन की एक वरिष्ठ लेखिका को ही ट्रोल किया था. अशोक भौमिक  ने कहा कि हम वामपंथियों का पिछला इतिहास समझौतों का इतिहास है| हमने विभाजन के वक़्त अपनी भूमिका न ठीक से पहचानी न अपने दायित्व का निर्वाह किया| नास्तिकता हमारी जमीन हो सकती थी लेकिन हम ऐसा करने से बचते रहे|  रवि सिन्हा ने ‘कॉमनसेंस’ को प्रश्नांकित करने की जरूरत बताई| उन्होंने कहा कि समाज पूँजीवादी नहीं है बल्कि पूँजीवाद एक व्यवस्था है जो किसी भी समाज के साथ अपना तालमेल बैठा लेती है| यह कहना कि केवल पूँजीवादी आधुनिकता ही संभव है, सही नहीं है| हीरालाल राजस्थानी ने कहा कि प्रगतिशीलों ने डॉ. आंबेडकर को नहीं समझा| उन्होंने कहा कि दलित आन्दोलन में संगठन तो खूब बने हैं लेकिन लोग संगठित नहीं हुए हैं| उनका कहना था कि समान सोच वाले संगठनों में एकता होनी ही चाहिए|

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इस विचारगोष्ठी की प्रस्तावना करते हुए प्रेम तिवारी ने विरासत के प्रश्न को बड़े दायरे में देखने की जरूरत बताई| प्रमुख वक्ताओं में से एक आशुतोष कुमार, ‘ अब हमारे लेखकों पहचान बदली जा रही है| चाहे सूरदास हों , निराला हों, उनसब को ‘हिन्दू राष्ट्रवादी’ सिद्ध किया जा रहा है|’ उन्होंने आन्दोलन को आंबेडकरी बनाने और आंबेडकर (विचार) को रेडिकल बनाने की आवश्यकता बताई| धीरेन्द्र नाथ के पर्चे का वाचन संजीव कुमार ने किया| धीरेन्द्र ने उन स्रोतों की तरफ फिर से जाने की बात की जिन्हें हम अति प्रगतिशीलता के दबाव में अनदेखा करते आए हैं| जैसे गाँधी का संदर्भ लिया जा सकता है| मुक्तिबोध की वैचारिकी को दर्शनशास्त्र से जोड़ते हुए उन्होंने कांट के असर को रेखांकित किया|  प्रमुख नवगीतकार जगदीश पंकज ने कहा कि प्रगतिशीलता को मार्क्सवादी विचारों तक सीमित नहीं किया जा सकता है| बुद्ध, फुले, अछूतानन्द, नरेन्द्रदेव, लोहिया आदि के विचारों को मानने वाले भी इस प्रक्रिया में शामिल हैं| उनका कहना था कि दलित साहित्य को धराशायी करने की कोशिश के बाद उसे मरे मन से स्वीकार गया है| रंगकर्मी व वरिष्ठ लेखिका नूर ज़हीर ने इप्टा के इतिहास पर रोशनी डालते हुए कहा कि इसकी शुरुआत महिला आत्मरक्षा समिति (मार्स) से हुई है| उन्होंने प्रगतिशील आन्दोलन को महिलाओं और दलितों से जोड़ने की जरूरत बताई| सुभाष गाताडे ने साम्प्रदायिक फासीवाद को नए ढंग से देखने का प्रस्ताव किया| उनका कहना था कि हम मानवद्रोही ताकतों से भी सीख सकते हैं| क्रांति की यांत्रिक समझ नुकसानदायक साबित हुई है| रेखा अवस्थी का मानना था कि आज रामराज्य के विरुद्ध जोर से बोलना चाहिए| भूस्वामित्व का सवाल नेपथ्य में ठेल दिया गया था| उसे सामने लाने की कोशिश होनी चाहिए| चंचल चौहान ने  कहा कि कोई आन्दोलन, संगठन व्यक्ति से नहीं बनता| वह समय की हलचलों से पैदा होता है| आज तार्किक प्रक्रिया को ख़त्म किया जा रहा है|  हमें इसी समय के विरुद्ध लड़ना है|  कार्यक्रम में स्वागत वक्तव्य के. पी. चौधरी का था उन्होंने कहा कि लेखकों, कलाकारों को निर्भय होकर जनजागरण करना चाहिए| धन्यवाद ज्ञापन करते हुए दलेस के महासचिव कर्मशील भारती ने कहा कि संगठनों के संयुक्त कार्यक्रम नियमित रूप से होने चाहिए| गोष्ठी में दिल्ली के रचनाकारों, बुद्धिजीवियों, शिक्षकों और शोधाथियों की जबरदस्त उपस्थिति थी। गोष्ठी का संचालन बजरंग बिहारी ने किया.

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