प्यार से आपलोग किन्नर बुलायें तो अच्छा लगेगा

हेमंत कुमार

आप अपना जीवन परिचय विस्तार से बताइयें ?

 मेरा नाम अन्नू श्री गौरी है. मेरा जन्म स्थान कांदिवली, मुंबई है.मेरा जन्म 16 सितम्बर 1987 को हुआ था. मैं अपने माता-पिता और दो बड़े भाइयों, भाभियों एवं उनके बच्चों के साथ मिल-जुल कर प्यार से रहती हूँ.

 आपकी शिक्षा किस स्तर तक हुई है ? नहीं हुई तो किस कारण से? थोड़ी शिक्षा की प्राप्ति हुई तो किन-किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा ?

मेरी शिक्षा 12वीं  तक हुई है. सन् 2003 में श्री रघुवीर विद्यालय मुंबई से दसवीं पास की तथा सन् 2005 में प्रकाश कालेज मुंबई से 12वीं पास की. पढ़ाई के दौरान मुझे अपने सहपाठियों द्वारा विद्यालय में मानसिक प्रताड़ना का शिकार होना पड़ता था. क्योंकि मैं अपने आप को खुद लड़की समझती थी. लड़के की वेशभूषा में रहते हुए लड़कियों जैसा व्यवहार करती थी. मुझे बचपन से ही चूड़ी पहनना, साड़ी पहनना, लाली,पाउडर, काजल लगाना लड़कियों जैसे  सजना सवरना अच्छा लगता था. घर पर भाइयों के नहीं रहने पर साड़ी पहन कर नाच गाना करती थी. नवरात्रि के समय गरबा खेलती थी. भाइयों को यह सब मेरा कार्य अच्छा नहीं लगता था. समाज में मेरे भाइयों का नाम ख़राब होता था. सभी लोग मेरे भाइयों को ताना मारते थे कि तुम्हारा भाई तो गुड़ है, मामू है, छक्का है, किन्नर है. इसी कारण मेरे भाई मुझे  डाटते थे कि तुम लड़का होने के बाद भी ऐसा काम क्यों कर रहे हो ? परंतु मेरे भाइयों को यह नहीं पता था कि मेरे शरीर में स्त्री की आत्मा निवास करती है. इन सबके बावजूद मम्मी से बराबर सहयोग मिलता रहा. मम्मी मेरे भाइयों से कहती की बड़ा होकर सुधर जाएगा मगर मैं सुधरी नहीं और बिगड़ गई. विद्यालय में मेरा हाव – भाव देखकर मेरे सहपाठी मुझे मामू, छक्का, हिजड़ा बुलाते थे. विद्यालय और आस-पड़ोस के लोगों द्वारा चिढ़ाने वाली बात मैं डर से अपने घर नहीं बताती थी. ताकि घर वाले भी घर से निकाल न दें. इन्हीं सब कारणों से प्रभावित होकर आगे पढ़ने की इच्छा रहने के बाद भी हमने अपनी पढ़ाई छोड़ दी|

आपका पहले नाम क्या था और अब क्या है ?

पहले मेरे घर का नाम सोनू था परन्तु अपने गुरु से शिक्षा लेने के बाद से मेरा नाम अन्नू श्री गौरी हैं.

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क्या आप बचपन से स्त्री वस्त्र पहनती हैं ?

मेरी कोई बहन नहीं थी, तो माँ मुझे प्यार से लड़की की पोशाक पहनाती थी. जो मुझे अच्छा भी लगता था. बड़े होने पर जब मैं स्त्री वस्त्र पहनती तो मेरे बड़े भाई कहते जब तुम लड़की नहीं हो तो लड़की का वस्त्र क्यों पहनते हो ? इसी कारण मेरे भाई को अगल-बगल के बच्चे चिढ़ाते थे. मुझे मेरे घरवाले लड़का समझते थे. अब घर में सब सामान्य है मेरे भाई के छोटे-छोटे बच्चे कभी मुझे चाचा तो कभी बुआ तो कभी चाची बुलाते हैं, मुझे उनका संबोधन अच्छा लगता है.

क्या आपको किसी से प्यार हुआ ?

हाँ, मुझे एक लड़के से प्यार हुआ है, मगर मैं इस संबंध में कुछ बताना नहीं चाहती. क्योंकि मुझे लड़कियों में रुचि तो है नहीं मैं अपने आप को खुद लड़की मानती हूँ. मुझे लड़कों के प्रति आकर्षण तो होता है कि उनसे बात करने का, प्यार करने का, भले वह शारीरिक हो या कुछ और हो.

 क्या आपको सामाजिक परिस्थिति से व्यथित होकर आत्महत्या का ख्याल भी आया ?

नहीं, समस्याएं तो बहुत थी मगर मैं अपने दोस्त श्री जो की मेरे जैसी थी हम दोनों आपस की दिल की बातें, समस्याओं का समाधान आपस में ही करते थे. क्योंकि हम अपनी समस्या किसी और से तो कह नहीं सकती. हम दोनों मिलकर अपनी – अपनी समस्याओं का समाधान खुद करते थे. मरने का ख्याल तो जीवन में कभी आया ही नहीं. आगे चलकर मैनें एन जी ओ ज्वाइन कर लिया.

किन्नर के संबंध में “अर्धनारीश्वर” शब्द का प्रयोग किया जाता है. इस संबंध में आप क्या कहना चाहेंगी ?

प्रत्येक व्यक्ति की अपनी – अपनी सोच होती है. अर्धनारीश्वर शब्द का अर्थ आधा शंकर भगवान और आधा पार्वती होता है. अर्थात एक व्यक्ति में स्त्री और पुरुष दोनों का साथ होना. जैसे हम ऊपर से तो दिखते हैं आदमी मगर अंदर की जो पार्वती है वह हमारे दिल में है. हम अपने बारे में सोचते हैं कि हमें एक अच्छी लड़की बनना है, लंबे-लंबे बाल हो, कान के गहने पहने, तैयार हो आदि सजने – सवरने के बारे में सोचते हैं.

सामान्य तौर पर आप लोगों को किन्नर, छक्का, हिजड़ा आदि नामों से बुलाया जाता है. क्या आप लोगों को इन नामों से आपत्ति है ?

नहीं बाबा,  प्यार से आप लोग ‘किन्नर’बुलाएँ तो अच्छा लगेगा. हाँ, छक्का, हिजड़ा कहने पर कुछ गुस्सा जरूर आता है. किन्नर, छक्का, हिजड़ा आदि नाम तो हम खुद रखें नही हैं यह तो समाज के लोगों द्वारा रखा गया है.

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आपको कब महसूस हुआ कि आप लड़का-लड़की से अलग हैं ?

जब मैं 12 या 13 साल की हुई तो मुझे लड़का-लड़की से अलग महसूस होने लगा था. वैसे तो मैं बचपन से ही लड़कियों के साथ गुड्डा–गुड्डी, भांडी–भांडी,रस्सी उड़ी, खो-खो खेलती थी. जब मैं 13 साल की हो गई तब मेरा लड़कों की ओर आकर्षण और बढ़ने लगा. तब मुझे महसूस हुआ कि मैं लड़का-लड़की से अलग हूँ.

अपने सुख– दुःख की घड़ी में आप अपने दिल की बात किससे करती हैं ?

 सुख – दुःख दोनों ही समय में मैं अपनी बातें परिवार के साथ करती हूँ. खासकर मम्मी से मैं कोई भी बात छुपाती नहीं हूँ. कभी – कभी घर में भाइयों द्वारा डांट पड़ती थी जिसको मैं अपनी दोस्त श्री से बताती थी जो कि मेरी तरह है.

 क्या टीवी पर किन्नरों की जिंदगी से जुड़े जो सीरियल या फिल्म दिखाया जाता है, उसका समाज में सकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है ?

 जी हाँ, सकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है. ऐसा मैं इसलिए कह रही हूँ क्योंकि खुद मेरे घर में मम्मी-पापा और भाई ने “कंचना” फिल्म देखी जो की किन्नरों के जीवन पर आधारित है. इस फिल्म को देखने के बाद से मेरे घर वालों के व्यवहार में मेरे प्रति काफी सकारात्मक बदलाव आया है.अब मै  काम – धंधे पर भी जाती हूँ. घर के लोग मुझे काफी प्यार करते हैं.

किन्नरों में तीज – त्यौहार किस प्रकार मनाया जाता है ?

हम सबका एक धर्म है. हम ईद, बकरीद भी मनाते हैं और होली, दीवाली भी. किसी मरे हुए किन्नर “गुरु माता” की बरसी पर सभी किन्नर लोग इकट्ठा होती हैं. उस वक्तहम  साथ-साथ नाच – गाना भी करते हैं. किन्नरों का कोई अलग से त्यौहार नहीं होता है. हाँ, ज्यादातर किन्नरों का झुकाव इस्लाम धर्म की तरफ होता है.

 क्या किन्नरों में ऊँच -नीच की भावना पाई जाती है ?

 नहीं, हम सभी समान हैं. कोई भी कार्य मिलकर एक साथ करते हैं.

किन्नरों के बारे में कहा जाता है कि यह लोग जबरदस्ती ज्यादा पैसे की माँग करती हैं ?

सामान्य तौर पर ऐसा कुछ भी नहीं है. हमारी बहुत से किन्नर दोस्त राजस्थान में रहती हैं जो किसी के यहाँ बच्चा पैदा होने पर या शादी होने पर मात्र ₹100 ही लेती हैं और कुछ अनाज भी लेती है.

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कुछ खास बातें जो आपके जीवन से जुड़ी हो उसे बताएं ?

सन् 2009 में मैंने “सखी चार चौकी”एन जी ओ ज्वाइन कीजहाँ मेरी दोस्त श्री पहले से नौकरी करती थी. उस वक्त जॉब जाते समय लोग मुझे चिढ़ाते थे. जबकि मुझे कंप्यूटर एकाउंटिंग सब आता था.प्रारंभ में मुझे अच्छा नहीं लगा पर मैं हिम्मत नहीं हारी. मैं जॉब जाना जारी रखा. बाद में वहाँ मुझे अच्छा लगने लगा क्योंकि वहाँ काम करने वाले सभी लोग किन्नर थी. जब मैं अपने घर पर होती थी तोपुरुष पोशाक में होती थी जो कि मेरी मजबूरी थी. परन्तु एनजीओ ज्वाइन करने के बाद मैं अपने मनपसंद स्त्री वस्त्र के कपड़े पहन सकती थी जो मुझे अच्छा लगता था.“सखी एन जी ओ” में जॉब करने के दौरान मुझे किन्नरों से जुड़ी तमाम प्रकार की बातें जानने को मिलीं| इस एनजीओ में एच.आई.वी एड्स पर काम होता है.

किन्नरों में गुरु-शिष्य की क्या अवधारणा है ?

किन्नरों में गुरु-चेला की परंपरा चलती है. गुरु की बातों का ध्यान रखना होता है. हम अपने गुरु के विपरीत नहीं जा सकते. जो मनमानी करता है उसको आर्थिक दंड भी भरना पड़ता है. पहले हमें मोटरसाइकिल पर घूमना भी मना था पर अब समय के साथ बदलाव आया है अब हम बाइक पर घूम सकते हैं. गुरु माता- पिता की मुख्य भूमिका निभाते हैं. वे हमारे सुख– दुःख में हमेशा साथ होते हैं. हम सभी उनकी इज्जत करते हैं. हम आपस में रिश्ता बनाते हैं बहन – बहन का, मौसी का जिससे एक परिवार की भांति प्रेम बना रहे. हम लोग गुरु माता के पास रहते हुए भी अपने माता-पिता को फोन करके बुला कर मिल सकते हैं.

नेग माँगनेके बाद जो समय आप लोगों के पास बचता है. उस समय आप लोग क्या करती हैं ?

 समय व्यतीत करने के लिए हम ढोलक बजाते हैं, नाच – गाना करते हैं, कुछ लोग पत्ते भी खेलते हैं.

“किन्नरों की मृत्यु के बाद उन्हें चप्पलों से मारने के बाद दफनाया जाता है.” इस बात में कितनी सच्चाई है ?

नहीं, यह सब बहुत समय पहले होता था. मैंने पहले ही बताया कि किन्नर लोग इस्लाम धर्म को ज्यादा मानते हैं. इसलिए इनके शरीर को दफनाया जाता है परंतु रात में चप्पलों से मारने के बाद दफनाया जाता है यह बात आज के संदर्भ में गलत हैं. अब समय के साथ हालात में काफी सुधार हुआ है किन्नरों के दाह संस्कार में उनके घर परिवार वाले भी शामिल हो सकते हैं.

“किन्नरों को बुलाते समय कोई स्त्री तो कोई पुरुष बोधक शब्दों का प्रयोग करता है.” इस संदर्भ में आप क्या कहेंगी ?

 सामान्यतौर पर हमें स्त्री बोधक शब्दों से बुलाया जाये तो हमें अच्छा लगेगा. मेरे छोटे-छोटे भतीजे मुझें कभी चाचा तो कभी चाची तो कभी बुआ बुलाते हैं. मुझे बुरा नहीं लगता हाँ जब बच्चे बड़े होंगे तब मेरे ऊपर क्या गुजरेगी अभी मैं बता नहीं सकती.हाँ यह अलग बात है कि हमारे घर में मेरे रहते हुए भी भाइयों की शादी में कोई दिक्कत नहीं हुई.

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बधाई माँगना, नेग माँगना, नाच- गाना के आलावा भी आप लोग कोई व्यवसायिक कार्य करते हैं ?

जी हाँ,  हम करने की कोशिश तो करते हैं परंतु हमें समाज स्वीकार नहीं करता है. बहुत से  किन्नर लोग ब्यूटी पार्लर का कोर्स करते हैं, कुछ लोगों को बहुत अच्छा खाना बनाने आता है पर क्या फायदा जब कोई किन्नर ब्यूटी पार्लर की दुकान या खाना खाने का होटल खोलता है तो उसमें सामान्य आदमी सेवा लेने से बचता है लोग हिजड़े के हाथों से खाना नहीं खाना चाहते हैं. हम लोग मुंबई में कुछ समय पहले इटली की दुकान खोले थे परन्तु हमारी दुकान पर लोग खाते नहीं थे जो आते भी फ्री में खा कर चले जाते थे. यदि सरकार हम लोगों को दुकान खोल कर दे कुछ नियम कानून भी बनाए तो हम लोगों के लिए अच्छा रहेगा.

 किन्नरों को लेकर जो समाज में भेद-भाव होता है. इस संदर्भ में आप समाज को क्या संदेश देना चाहेंगी ?

 हमारा मानना है किहमारे संविधान के निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर ने सबको एक समान माना है तो हम भेद-भाव क्यों सहे. हमें भी भारत के समान नागरिकों की भांति क्यों नहीं समझा जाता है. क्या हमारी कोई इज्जत नहीं है ? जब लंगड़े, अंधे, गूंगे, भीख माँगते है तो लोग उन्हें भीख देते है. वहीं जब एक हिजड़ा भीख माँगता है तो लोग गाली देते हुए कहते हैं साले तुम्हें कोई काम – धाम नहीं है. हम लोग समाज में काम करेंगे पहले आप काम देना तो शुरू करिये, हमें स्वीकार करना तो शुरू करियें. हाँ यह अच्छी पहल है कि कुछ पढ़े-लिखे हिजड़े अब सरकारी ओहदे पर भी जा रहे हैं, कुछ वकील तो कुछ जज तो कुछ पायलट भी बन रहें हैं . हम लोगो का अब पहचान पत्र (आधार कार्ड) भी बनना शुरू हो गया है. अंत में मै समाज से यही अपील करना चाहती हूँ कि ज्यादातर अनपढ़ – गवार हिजड़ों को स्वीकार करें उनके कार्यों का सराहना करें. खासकर उनके प्रति भेद – भाव मत करें.

हेमंत कुमार, (शोध छात्र) केरल केन्द्रीय विश्वविद्यालय, केरल

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