माँ मैं आपकी गुनाहगार हूँ!

डॉ. कौशल पंवार

मैं बारस्लोना स्पेन में उस वक्त फ़ेसबुक पर लाइव थी. वेस्ट मैटिरियल की बनी प्रसिद्ध बिल्डिंग को देख रही थी और अपने फ़ेसबुकिया मित्रों को भी दिखा रही थी. मेरे साथ लीला, संतराम (जनरल सैक्रेटरी अम्बेदकराइट बुद्धिष्ट सोसाइटी स्पेन) और एक ओर साथी थे जो मूलरूप से इंडिया से ही थे. तभी मेरे फोन की घंटी बजी तो मैने फ़ेसबुक के लाइव के दौरान ही अपना फोन उठा लिया. फोन मुकेश का था. भारी सी आवाज लगी थी थी मुझे मुकेश की. फोन कट गया था. मैने फ़िर मिलाया. मैने एक बार फ़िर से सबका हाल चाल पूछा –“मां कैसी है” पूछा, तो बस इतना ही कहा कि-“ मां ठीक नहीं है, तुम्हे याद कर रही है”. बहुत हल्के तरीके से उन्होने कहा. मां जो अक्सर मेरे विदेश यात्रा के दौरे के दौरान कहा करती.  स्पेन पहुंचकर मैने मां को फोन किया था तो रश्मि (मेरी भतीजी) ने बताया कि मां बाहर गयी हुई है बगल में  तो मैने कहा कि वह उनके आते ही शाम को मेरी बात करवा दे. मैने ये भी बताया कि मां को बोल देना मैं मैं आ ही रही हूं दो दिन बाद. मैने फोन पर उससे कह तो दिया पर मेरे पूरे बदन में सीहरन सी दौड़ गयी ठीक उसी तरह जो 18.12.2001 में महसूस हुई थी. वही मुझे आज उससे बात करते हुए हुई थी. मेरे हाथ से फोन भी नीचे जमीं पर गिर गया. संत कुमार ने मुझे पास में ही पत्थर की बनी कुर्सी पर बिठाया और अपने फोने से फोन मिलाने को कहा. मुकेश ने फोन नहीं उठाया. मैं कांप रही थी. मेरे साथ ये लोग भी चिंतित हो गये और पूछा तो मैं कुछ भी बताने की स्थिति में नहीं थी. फ़िर से फोन मिलाया तो मुकेश ने फोन उठाया और इतना कहा कि सब सब ठीक है. मां भी अब ठीक है थोड़ा बुखार हो गया था पर अब ठीक है. आगे बात नहीं हो पायी. मुझे मेरे अन्तर्मन ने सब कुछ बता दिया था. सच कहूं तो फोन करने की हिम्मत नहीं हुई कि ओर पूछूं मुकेश से. मेरी आंखों से अपने आप पानी निकलना शुरु हो गया.  संत कुमार ने मुझे वहां से आगे चलने को कहा और हम उस जगह से हट गये थे. चौराहा था आगे. उस बीच चौराहे पर ढेर सारी कलाकृतियों के बीच में बने छोटे से पार्क में हम आ गये थे.  मैने अपने आपको बहुत रोक कर रखा हुआ था तो बैठते ही मेरी चीख निकल गयी. वे भी समझ गये थे कि कुछ हुआ है जरुर लेकिन उनकी हिम्मत नहीं हो रही थी कि मुझसे कुछ पूछें. मैने थोड़ा शांत किया अपने आपको और फ़िर अपने छोटे भाई सुरेश को फोन मिलाया तो उसने कहा कि- मां एक दम ठीक है. एक एक करके मैने सबसे बात की लेकिन कोई भी कुछ भी बताने को तैयार नहीं था. मैने फ़िर रश्मि को फोन मिलाया तो उसके भरे हुए गले ने मेरी अन्तर्मन की आवाज को ओर पुख्ता कर दिया. मेरी चीख निकल गयी और मै मां- मां- मां करके चिखने लगी. इतनी बेबस की बस अभी पंख लग जाये और मैं उड़ जाऊं मां के पास. सबको लगा था कि जैसा मैं सोच रही हूं, हो सकता है, ऐसा न हो. बीमार हो गयी हो और बस ऐसे ही मुझे याद कर रही हो. मैने भरी हुई आंखों से उनकी ओर देखा. काश ऐसा हो.

मुझे कुछ नहीं सुझ रहा था. मैने सुशील राजौरिया को फोन मिलाया. मैं रोती रही और कहा कि मेरी अभी की तुरंत की टिकट बुक कर दे मैं यहां स्पेन से तुरंत निकलना चाहती हूं इंडिया के लिए. भाई साहेब ने बस इतना ही कहा कि हो जायेगा और मैं परेशान न हो इसके लिए. जितनी जल्दी की टिकट मिलेगी, तुरंत ले लेंगे. उन्हे मुझे धर्य रखने को कहा और मेरे लिए एक उम्मीद की किरण भी जगाई कि हो सकता है कि तबीयत ठीक हो और कुछ न हुआ हो ठीक हो जायेगी. मैने सुरेश और मुकेश दोनों को नम्बर उन्हें दे दिया और कहा कि मुझे साफ़- साफ़ बता दें जो भी हुआ है. मैं बच्ची नहीं हूं. लेकिन मुझे पता तो चले कि हुआ क्या है? गिड़गड़ाने की हद तक मैने भाईसाहेब को कहा कि पूछकर मुझे बता दे. भाईसाहेब ने भी मुझे चुप कराते हुए बस इतना कहा कि- मुझे ये किसने बताया दिया कि मां…. मैने कहा किसी ने भी नहीं. फ़िर उन्होंने कहा कि ऐसा अपने आप नहीं सोचते. कुछ नहीं हुआ है. आना चाहती हो तो आ जाओ. कोई बात नहीं, अभी टिकट मिल जायेगी.

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ठीक चार घंटे बाद की टिकट मुझे सुशील भाई साहेब ने मेरे ईमेल पर भेज दी. हम सब वापिस आ गये संन्तराम जी के दफ़तर जहां से हमने प्रिंट लिया. मेरे होटेल की ओर बढ रहे थे कि समुद्र की इतनी भयानक हवायें उठ रही थी फ़िर भी मुझे पसीना आ गया. बेमौसम तुफ़ान मुझे झकझोर रहा था कि सब जैसे मुझे कुछ बताना चाह रहा हो. मैं हवा को चीर कर आगे निकलने की कोशिश कर रही थी परंतु मेरे पैर मुझे पीछे खींच रहे थे. मेरा संदेह पुख्ता हो रहा था. वही सब कुछ घट रहा था जो चाचा के वक्त हुआ था. ये कुदरत मुझे क्या कहना चाह रही थी कि सब लुट चुका है. मैंने देर कर दी. भायनक द्वंद चल रहा था. हम होटल पंहुच गये. मैने जो सामान मेरे सामने दिखाई दिया उसे बैग में डाला और सीधा ऐयरपोर्ट आ गयी. मुझे रास्ते भर सब सांत्वना देते रहे कि कुछ नहीं होगा सब ठीक हो जायेगा. इनकी सोशायटी ने भी मुझे लिफ़ाफ़ा दिया सहयोग के लिए, कहीं मुझे रास्ते में जरुरत न पड़े. मेरी मनःस्थिति सब देख चुके थे.

ऐयरपोर्ट पहुंचकर भी मुझे लगता रहा कि कुछ नहीं हुआ होगा. मां को याद आ रही होगी तो मुकेश ने बोल दिया होगा. पर दूसरा विचार फ़िर मुझ पर हावी हो जाता. फ़िर अपने आपको संभालती कि कुछ नहीं हुआ होगा. ऐसा कुछ हो ही नहीं सकता.

“माँ, मेरा इन्तज़ार करना, मत छोड़कर जाना. मैं आ रही हूँ मुझे इतना टाइम दे दें. चाचा की तरह हाथ छुड़ा, चल मत देना. मैं आ रही हूँ मेरा इन्तज़ार करना” 5.11.2018 को ये पोस्ट मैने लिखी थी facebook वॉल पर. लिखते वक्त भी एक आस कहीं जिंदा थी.

लुफ़्थांसा फ़्लाईट थी जो शाम को चलनी थी और अगले दिन दिल्ली पहुंचनी थी. बस यही फ़्लाईट थी जो मुझे दिल्ली पंहुचा सकती थी. सुशील भाईसाहेब ने मेरी टिकट दी थी. उस समय में साथ मिला जब मेरी स्थिति ऐसी थी कि मैं किसी को कुछ भी कहने की स्थिति तक में नहीं थी. उनका अहसान है ये नहीं कहुंगी. बस पता नहीं कौन सा रिश्ता बना था कि अधिकार से मैने उन्हें ही कहा था कि मेरी टिकट भेजे, जो सबसे पहले मिले और उन्होंने भेज दी. कोई शब्द नहीं हैं आज भी मेरे पास उनके लिए लिखते हुए भी. रिश्ते केवल साथ रहने से या लम्बा समय बिताने से नहीं बनते, ये मैने उस दिन जान लिया था.

मेरी टिकट इकोनोमी क्लास की थी परंतु उस दिन मेरी सीट को बिजनस क्लास में कन्वर्ट कर दिया गया था जो मेरे रोने के लिए सबसे उपयुक्त था. मैं फ़्लाईट में बैठ गयी. रो-रो कर आंखे थक गयी थी मेरी. मुझे हल्की सी हंसी भी आई कि मैं रो क्यूं रही हुं. बुखार तो मां को आ ही जाता है. हट्टी- कट्टी भी है. मैं दशहरे पर ही तो मां को मिली थी. उल्टा मैं बीमार थी तो मां और मुकेश मुझे दवाई दिलाकर लाये थे मोहन डाक्टर से. ऐसा तो हो ही नहीं सकता. मैं कहीं कल्पना तो नहीं कर रही. मैने एक दफ़ा के लिए विचार भी झटक दिया था कि मैं ये क्या और क्यूं सोच रही हूं? अपने आपको समझाने लगी थी मैं. आखिर उस समय मेरे पास था भी कौन जो मुझे और मेरे इस सच को नकार दें मैं अपनी सीट पर फ़ैल गयी. इतने में एयर होस्टेस आयी और उसने कहा- आर यू आल राईट मैम, ऐनिथिंग य़ू वांट. मैने नथगिंग कहा केवल और आंखे बंद कर लेट गयी.

मेरे सामने एक- एक कर सब चीज घूम रही थी बल्कि यूं कहूं कि मैं अपनी यादों के सहारे की कढियां जोड़ रही थी कि मेरा अन्तर्मन जो मुझे बार- बार कजोट रहा है कि सब खत्म हो गया. वो सही है भी या नहीं. मुझे मां को छोड़कर नहीं आना चाहिए था. मां के पास होना चाहिए था.

मेरा पेपर बार्सिलोना स्पेन की यूनिवर्सिटी के लिए सलेक्ट हुआ था. मुझे वहां जाना था. उससे पहले मुझे कर्नाटक में एक बौद्ध विहार के द्वारा आयोजित चर्चा में भी जाना था. यानि कि 30.10.2018 से 6.11.2019 तक मैं बाहर रहने वाली थी. मां मेरे गांव राजौंद गयी हुई थी. मुझे मां से मिलने की तड़प थी तो मैने मुकेश को बताया कि मुझे विदेश जाने से पहले मां से मिलने जाना है. मुकेश ने कहा भी कि आने के बाद चली जाना. मेरा मन नहीं माना और मैने मुकेश को कहा कि नहीं पहले मां से मिलूंगी तो ही स्पेन जाऊंगी. दशहरे की छुट्टियां भी थी तो कोई दिक्कत नहीं भी होगी

 इसलिए हम राजौंद में आ गये मां के पास. मां दो- तीन महिने से गांव में गयी हुई थी. हम गांव आ गये. मैं बहुत श्रृंगार करके गयी थी उस दिन गांव मे. जामुनी रंग की साड़ी भी पहनी जो भाई ने दी थी. उससे मैच करता गले का हार और कानों में झुमका डाला. मां को मैं सजी- संवरी ज्यादा अच्छी लगती हूं. मां खुश हो जायेगी देखकर इसलिए मैं उस दिन सब कुछ करके गयी थी. मां को खुद भी तैयार होकर रहना अच्छा लगता है. कपड़े बदलने में मां को कोई आलस नहीं आता. एक एक चीज को धोकर रखती. यहां तक की अपनी चप्पलों को भी खुब साबुन से धोकर चमका देती. अपने हाथ पैरों को खूब मल- मल कर धोती. गुलशनखाने में नहीं बल्कि तसले में पानी डालती और बाल्टी लेकर अलग से पानी रखती. घर के बीच में पटड़ी पर बैठकर मलती रहती. मैं उनकी इस आदत से शुरु से परिचित रही थी इसलिए मुझे उन्हे ऐसे देखकर बस हल्की मुस्कराहट आती.दिल्ली में तो बाथरूम बना हुआ है लेकिन फ़िर भी मां ड्राइंगरूम में ही बैठकर हाथ पैर धोती. उन्हे ऐसे करता देख सब थोड़ा सा टेड़े टेड़े हंसते. मां गांव में भी जब सुअरों को चाट (खाना) आदि खिलाना होता तो उसके लिए अलग से सूट पहनती. चाट देकर आने के बाद घर आकर फ़िर दूसरा सूट बदल लेती. अगर उन्हे टहलने जाना होता तो अलग से सूट बदलती. बाजार जाना होता तो अलग. जितने भी सूट थे सब अलग -अलग समय के लिए होते. कपड़े साफ़ तह लगाकर रखती. सिर धोकर रखती. सूट के नीचे बनियान या ब्रा जरुर पहनती जिस कारण नई बहुएं कई बार मजाक भी करती. चाहे घर के हालात कैसे भी हों, उन्होंने कभी अपनी इन आदतों को नहीं छोड़ा. कई बार झुंझलाहट भी होती थी मुझे जिसे मुझे स्वीकार करने मे कोई दिक्कत नहीं. मैं कई बार डांट भी देती थी कि मां जल्दी करो, बाद में कपड़े बदल लेना. मां उतने ही प्यार से जवाब देती कि-“तेरी तरैइयां नी मै बाग सकती, सलवार कोई, झंप्फ़र कोई. खुद तो ऐसी ही रहणा है और दुसरों को भी नी करण देणा कुछ”. मैं झक मारकर रह जाती और धड़ाम से खाट (चारपायी) पर बैठकर उनका इंत्जार करती. ऐसी मेरी ये मां थी.

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गांव में मैं एक दिन ही ठीक से रही, अगले दिन मुझे बुखार हो गया. मां ने मेरा सिर प्यार से सहलाया और दवाई लेने के लिए कहा. मैने पेरासिटामोल ले ली थी. थोड़ा आराम किया तो बुखार उतर गया. मां चिंता में रही. गांव मे मेरे घर में अब रसोई भी बन गयी है और बाथरूम भी बन गया है. उन दोनों के बीच में कुछ जगह है जहां पर खाट बिछाकर हम बैठ जाते है. मां और मैं साथ में बैठे थे. मां ने धीरे से मेरा सिर अपनी गोद में रख लिया था. मैं और मां ऐसे ही बहुत देर तक बैठे रहे. मैने मां को स्पेन जाने के बारे में बताया और कर्नाटक के बारे में भी बाताया. मां ने बालों में हाथ फ़ेरते हुए ही कहा कि कब जाना है तो मैने अपनी डेट बता दी कि 30.10.2018 को कर्नाटक और फ़िर अगली रात यानि दो को स्पेन जाना है. मैने लेटे लेटे ही कहा कि-“अब की बार तू मेरे पास नहीं थी इसलिए मैं आ गयी जाने से पहले मिलने”. मेरी हर विदेश यात्रा में जाने से पहले मां मेरे साथ रही है लेकिन अब की बार नहीं थी मेरे पास दिल्ली में.

मां के साथ होते हुए भी मुझे कुछ अलग सा लग रहा था. कुछ अजीब सा महसुस हुआ तो मुझे लगा कि बुखार के कारण ऐसा लगा होगा. मैं और मां देर रात तक ऐसे ही बैठे रहे. बतियाते रहे. खाना भी नहीं खाया था. कई बार कुछ होता है जो हमे अहसास करवा जाता है. ऐसा ही कुछ उस दिन हो रहा था. अगली सुबह मुझे वापिस दिल्ली आना था. बुखार हो गया था सुबह ही तो मां, मुकेश और मैं डाक्टर मोहन के पास दवाई लेने गये. मां ने बिना मोहन अंकल के पूछे ही बता दिया कि “अच्छी दवाई देना इसे, विदेश जाना है. तबीयत ठीक नहीं रहेगी तो मुश्किल हो जायेगी तेरी बेटी को”. मोहन अंकल ने भी विदेशी की यात्रा के बारे में विस्तार से पूछा. उन्हें अच्छा लगा. मुझे उन्होने दवाई दे दी. अंकल मुझे बाहर गली तक छोड़ने आये. मोहन अंकल डाक्टर तो हैं ही लेकिन बहुत अच्छा संबंध भी रहा है. बेटी की तरह मानते है मुझे. अंकल जब साथ- साथ चल रहे थे तो मैने अंकल को मां का ध्यान रखने को कहा कि मेरी मां का ख्याल रखे और किसी भी तरह की मां को कोई प्रोब्लम हो तो मुझे तुरंत फोन करें. मां और मुकेश हमसे आगे- आगे चल रहे थे. मां ने सुन लिया था और पीछे मुड़कर हल्के से मुस्करा दिया था. अंकल ने कहा कि –क्यूं चिंता कर रही हों. जयपाल के जाने के बाद कुछ तो हमारा भी हक होगा कुछ तुम्हारी मां पर. मेरी तो भाभी है ये, तुम इनकी चिंता न करो. मां सुनकर हंस पडी थी और कहा-“लै बिमार तो खुद ओरी, फ़िक्र मेरी कररी”

हम घर आ गये थे. मैने दवाई ली. हम गाड़ी की ओर बढ गये दिल्ली के लिए. मां गली तक छोड़ने साथ- साथ आयी थी. मैं गाड़ी में बैठने से पहले मां को गले मिली तो घबराहट सी महसूस की मानो अखिरी बार मिल रही हो. मां को छोड़ते हुए डर सा लगा जो पहले कभी नहीं हुआ. मैं तो ज्यादातर बाहर ही रही थी. भावुकता मुझ पर हावी कम ही हुआ करती है पर उस दिन मैं अन्दर तक कांप गयी. मैने मां को ओर जोर से गले लगा लिया था. जैसे हाथ अपने आप उन्हे जकड़ रहा हो. मुकेश ड्राइविंग सीट पर बैठ चुका था. मैंने मां को छोड़ दिया. फ़िर सबसे मिली थी. सीट की ओर बढी तो, वापिस मुड़ गयी मां की ओर. फ़िर मां ने कहा –’अच्छा जाओ’. मैं मां से फ़िर से गले मिली तो धमनियों में एक बार फ़िर वही सीहरन महसूस की. घबराहट और डर दोनों महसूस किया था मैने उस दिन. सीट पर बैठ गयी थी. शीशा नीचे किया और मां की ओर भीगी हुई आंखों से निहारा था. मां जैसे मेरे ही चेहरे को देख रही थी. आंखों में समा रही थी मेरी तस्वीर को और मैं मां की. मैने जाते- जाते कहा कि आते ही मैं उसे लेने आऊंगी और फ़िर पलक का ऑपरेशन करवायेंगे. ऑपरेशन मैने मां की दोनों आंखों का पहले ही करवा रखा था. बाल उग आते थे पलक के और वे अंदर की ओर मुड़ कर मां की आंखों को तकलीफ़ देते थे इसलिए डाक्टर ने ऑपरेशन की सलाह दे रखी थी. मैने जाते- जाते मां को मेरे वापिस आते ही उसे ले जाने को बोल दिया था कि स्पेन से आते ही मैं आ जाऊंगी लेने के लिए. मैं दिल्ली आ गयी थी. तय समय के साथ मैं अपने प्रोग्राम में चली गयी थी पहले कर्नाटक फ़िर उसके बाद मैं स्पेन पहुंच गयी थी.

एयर होस्टेस ने मुझे उठाया तो मैं हूं हां करते हुए उठी. मुझे याद ही नहीं रहा कि मै फ़्लाईट में हूं. उन्होंने खाने के लिए जगाया तो मैने खाना खाने को मना कर दिया. मेरी आंखे और दिमाग थक चुके थे. कई बार बीच बीच में ध्यान आता कि मैं जो सोच रही हूं वह गलत हो तो मैं उतरते ही सीधा मां के पास जाऊंगी और मां को दिल्ली लेकर आऊंगी. कभी नहीं दोबारा अपने से दूर होने दूंगी. चाचा के जाने के बाद मां को मैं संभालकर रखूंगी ऐसा मैने चाचा के जाने के बाद खुद से वायदा किया था.  मैने अपने आपसे वायदा किया था कि मां को मैं सब कुछ दूंगी जो चाचा देता. चाचा मां को कभी अपने से दूर नहीं करता था. मां मायके जाती तो चाचा भी साथ जाता. जितने दिन मां रूकती तो चाचा भी रुकता. इसलिए मां कभी ज्यादा दिन अपने मायके नहीं रुकती थी. लड़ता-झगड़ता लेकिन दूर नहीं भेजता था. मैं भी कभी नहीं भेजूंगी अपने से दूर उसे. मैं कहकर फ़फ़क फ़फ़क रो पडी. दहाड़ मारकर रोने का मन हुआ तो मैने अपने मुंह को जोर से भींच लिया जिससे मेरी आवाज दूसरी सीट को न सुनाई दे. मैं अपने इस दुख में बिल्कुल अकेली थी. रोना भी मुझे खुद था और चुप भी अपने आपको खुद करवाना था. ये सफ़र अकेले काटना कितना मुश्किल था इसे शब्दों से बयां करना बहुत मुश्किल है. मैं अपने आपसे लड़ भी रही थी. अब की इस यात्रा पर मुझे अफ़सोस हो रहा था. मैं क्यूं नहीं सारे ईशारे समझ पायी थी जो मुझे मिल रहे थे. मैने आंखे बंद कर ली.

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पता नहीं कैसे मैने अपने तन मन को एकाग्र कर चाचा का ध्यान किया कि मुझे सच्चाई दिखाये, चाहे कितनी भी कड़वी क्य़ूं न हो. आखिर मुझे जानने का हक था. जो मेरे सामने आया उसने मुझे हिलाकर रख दिया. वो सीहरन, घबराहट, मेरा डर और कंपन सब साथ मिलकर गवाही देने लगे थे तो मुझे उस सच्चाई को स्वीकार करना ही पड़ा. मैने लम्बी सांस खींची और आंखे बंद कर ली. चाचा और मां जैसे मेरे सामने थे. दोनों साथ- साथ दिखे और खुशी भी. मेरे साथ की यात्रा यहीं तक थी बस. अब आगे का सफ़र मुझे अकेले तय करना होगा. तुम बहादुर हो कमजोर नहीं’ अपने आपसे लड़ों मत, सम्भालों और सच्चाई को स्वीकार करो यही सच है.

मैं सफ़र में थी और ऐसा सफ़र भी तय कर रही थी जो मेरी दुनियां को बदल रहा था जहां मैं न केवल एक मां और चाचा की बेटी रही थी बल्कि एक मां भी थी. मां को मैने मां बनने के बाद पहचाना था.

मेरे घर की एक-एक चीज में मां की महक है. ये घर भी एक तरह से मां के सपने का ही घर था. मां बार- बार कहती थी कि अपना घर ले लूं. भले ही छोटा सा लूं. मेरी आर्थिक स्थिति इतनी नहीं थी कि मैं खरीद सकूं पर मां जरुर चर्चा करती थी महीने दो महीने मे एक बार. कहती कि किरायें में भी तो किस्त जाती है लोन की किस्त भी चली जाया करेगी ऐसे ही. लगता है कि मां रसोई से अभी मेरे लिए पानी का गिलास लेकर आ जायेगी. कई बार कालेज से लौटती हूं तो घर खाने को आता है. मन करता है कि घर में जाऊं ही न. जैसे कोई नहीं है जबकि सब है. बच्चे है मुकेश है लेकिन फ़िर भी घर जाने का मन ही नहीं होता. मैं इन दिनों बिमार हूं. सारे टैस्ट करवा चुकी हुं लेकिन फ़िर भी बिमार हूं. शारीरिक से ज्यादा मानसिक रूप से बिमार हो गयी हूं. मां को गांव गये लगभग तीन महिनें होने को आये थे. बहुत बार मन करता कि मैं उड़कर चली जाऊं मां के पास गांव मे. मां मेरे गांव राजौंद मे थी. आज फ़्लाइट में सब कुछ तस्वीरों की तरह घूम रहा था एक एक करके सब कुछ याद आ रहा था. मैं याद कर करके कभी रो पड़ती थी तो कभी हंस रही थी. मुझे मां और चाचा की चुगलबंदी याद आ जा रही थी. कैसे छोटी छोटी चीजों पर लड़ते थे. थोड़ी देर में फ़िर से खाट पर बैठे दिखते एक साथ.

मैने बी.ए. कैथल से तो एम. ए. कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से किया था. जिस दिन मुझे मेरी एम.ए. संस्कृत की पहली डिग्री मिली थी तो मां बहुत खुश हो गयी थी. बच्चे की तरफ़ उल्टती-पलटती रही उस कागज के पन्ने को फ़िर मेरा माथा चुम लिया था उन्होने. चाचा ने झूठी नाराजगी दिखाई कि- पहले तो मेरे पढने से खुश तक नहीं थी और आज देखों कैसे फ़ूल रही है.

मां की अलग तरह की दुनियां थी. हमेशा मेहनत मजदूरी करते हुए अपनी जिन्दगी खुशी -खुशी बिता दी उन्होंने. कभी चाचा से कोई शिकायत नहीं की बल्कि चाचा के कंधे से कंधा मिलाकर उनके साथ दिया. उनके साथ काम किया. जब चाचा छोड़कर गये तो मुझे टूटने नहीं दिया मां ने, बिखरने नहीं दिया. मां मेरे सामने रोती तक नहीं थी. यूं कहूं कि मां ने मुझे समभाल लिया था. मेरे दोनों भाई मेरे साथ हो गये थे. चाचा के जाने के बाद सारे निर्णयों में मेरे भाई मेरे साथ रहे चाहे, मुकेश को जीवम साथी बनाने का हो या मेरे दहेज न लेने का, घूंघट का रहा हो या पाखंड़वाद का विरोध या फ़िर मेरे आगे की पढाई. भाई मेरे चाचा के बाद अब मेरे साथ चलने लगे है. पता नहीं मां ने ऐसा क्या घुट्टी मे पिलाया कि भाईयो ने मेरे साथ देने का वायदा सा कर लिया.

मां इतनी जीवन्तता कहां से लाती थी आप. एक स्त्री में पूरा समाज समाहित रहता था. हर हाल में खुश रहती एक दम चाचा की तरह. काश आपका ये रत्ती भर भी मैं ले पाती. जब तुम थी तो तुमसे बहुत बार लडाई और नाराजगी होती थी पर अब किसके साथ……….

मैं 2.11.2018 को बार्सिलोना स्पेन में पहुँच गई थी. ऐयरपोर्ट से भोला राम जी, हरभाज़ और सुरजीत जी लेने के लिए आ गये थे. दिनांक 2.11.2018 को समय दो बजे Univetsity of Abat Oliba CEU Barcelona Spain में पहुंच गयी थी. मुझे “The Role of the Caste System in Dharmshastra: An Analysis” विषय पर मेरा व्याख्यान था. Inaugural session of the Human Science congress in the University Abat Oliba CEU Barcelona Spain मे था जहां पर कुछ अपने विषयों से सम्बंधित India of Post colonial period पर एक research scholar ने जो  university of Seville Spain से था दिया. बहुत कुछ नया जानने का अवसर मिला था मुझे. “Role of the caste system in Dharmashastra : An analyses” in the university of Abat Oliba CEU Barcelona Spain,dated 2.11.2018. पर मैने अपना व्याख्यान दिया.

मैं दुनियाँ के कोने-कोने से आये हुए डेलीगेशन के साथ थी. भव्य हॉल था. चारों ओर पत्थर की तरासी हुई नक्कासियां थी. जिसे देखकर मेरा मन पुलकित हो उठा था. अपने ऊपर और मां और चाचा की मेहनत पर नाज हुआ था उस दिन मुझे.  कहां तो गांव की गलियों में गोबर बटोलती लड़की और कहां आज यहां इतने विदेशी बड़े बड़े विद्वानों के बीच. ऐसे ही ये शब्द कागज पर लिख दिये थे. मेरा माथा झुक गया था मां और चाचा को याद करके. भीगी हुई आंखों से मैने उस समय अन्यास ही कुछ पंक्तियां लिखी –

फ़क़्र क्यूँ न करूँ ख़ुद पर
थाली में परोस कर नही दिया किसी ने.

प्रोफ़ेसर शोफ़िया और भी कई अकेडमिशियन वहां पर थी. परंतु शोफ़िया मेरे नजदीक आयी और प्यार से मुझे कुछ कहा. जो कहा वह तो नहीं समझ पायी थी लेकिन उन अंखों की भाषा को मैने पढ लिया था. उनका बस इतना ही समझ आया था. ब्रेव गर्ल. मैं कोने में बैठ गयी तो उन्होंने मुझे अपनी ओर इशारा किया और एक तस्वीर ली. उनके साथ एक जैण्ट्स प्रोफ़ेसर भी थे. थोड़ी देर ब्रेक में मस्ती भी हुई.

अकेलपन से भी मोहोबत की है हमने
और भीड़ से भी.
शुक्रिया प्रोफ़सर शोफ़िया
इस इश्क़ के लिए.

तीन नवम्बर सुबह की सैर के वक्त समुद्र के किनारे- किनारे घुमते हुए समुद्र से उठती गिरती लहरों को देखकर मैने फ़िर कुछ पंक्तियां लिखी:

दिल तो दिल है, हिलोरे मार ही लेता है
इन उठती गिरती लहरों की तरह.

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मेरा होटल समुंदर के किनारे पर था. वह जगह बड़लोना के नाम से थी. समुद्र के किनारे किनारे पर खड़ी बड़लोना की मूर्ति मानो मुझसे कुछ कर रही है. बड्लोना स्पेन में इस मूर्ति को देख मेरे बचपन की यादें ताजा हो गयी. हम भी ऐसे खेलते थे बचपन मे. हूबहू वैसी ही मूर्ती थी जैसे हम खेलते हुए बनाते थे. टाप टाप हम इसे बोलते थे. इसमे दो जन आमने सामने बैठते और पैरों की ऐड़ी के सहारे खड़ा करते फ़िर उसके ऊपर दूसरा पैर रखते फ़िर् उसके उपर हाथों को फ़ैलाकर सबसे छोटी उंगली के ऊपर दूसरे हाथ की ऊंगली रखते ताकि उंचाई ज्यादा हो जाये. फ़ोर जिसकी बारी होती वह इस पर से जम्प करता. अच्छे से करने के बाद फ़ोर दोनों आमने सामने बैठे हुए अपनी गर्दन नीचे करते और फ़िर बारी वाला उनके ऊपर से जम्प करता. वैसी ही उपर को उछलते हुए वहां एक बच्चे की मूर्ती थी किनारे पर. जैसे कोई झुका हो और दूसरा उसके ऊपर से जम्प जैसे मुद्रा में हों. बहुत मनमोहने वाली तस्वीर थी वह.

बड़लोना स्पेन में भाई मंगतराम जी, भाभी राज रानी और बेटा सन्नी मिलने के लिए आये. मेरे लिए इससे बड़ी ख़ुशी और गर्व की बात हो ही नहीं सकती कि मेरे समाज के लोग मेरे आने की ख़ुशी मे मुझे मिलने आते है, यही मेरे लिए सबसे बड़ा सम्मान हो जाता है. हम सब साथ साथ घूमे समुद्र के किनारे. हम लोग खाना खाने के लिए रेस्ट्रोरैंट में चले गये. मैने देखा कि वाल्मीकि समाज का रेस्टोरैन्ट बार्सिलोना स्पेन में था, झाड़ू से ऊपर उठकर सबको खाना खिला रहे है जितेंदेर (बिल्ला) और उसकी स्पेनिश पत्नी दोनो मिलकर शानदार होटेल चला रहे है. मैने उनको बहुत बहुत बधाई. आज अपने समाज के होटल में खाना खाया था. गर्व और फ़क्र दोनों था. तीन की रात को सभी अम्बेडरवादियों से भेंट हुई और डिनर भी वही किया. बहुत सारे लोगों से मुलाकात हुई थी उस दिन. बहुत सारे बिंदूओं पर चर्चा हुई. जैसे स्पेन देश के कुछ रोचक तथ्य का पता चला जैसे यहाँ पर हर व्यक्ति को मेडिकल की सुविधा मुफ़्त दी जाती है। किसी भी व्यक्ति के पास काम न हो तो उसे तब तक बेरोज़गारी भत्ता दिया जाता है जब तक उसे काम नही मिल जाता। यहाँ हर व्यक्ति को टैक्स देना होता है चाहे वह सरकारी नौकर हो या प्राइवेट। यहाँ पर पेंशन की सुविधा हर नागरिक को मिलती है।

 चर्चा में कम ही ध्यान था मेरा, मन कहीं से बैचेन जरुर था. इस बार की यात्रा कुछ बुझी बुझी शुरु से हो गयी थी जिसका मुझे अहसास भी हो रहा था. चार नवम्बर university of Abat Oliba CEU Barcelona Spain में थी. हालांकि मेरा सैशन हो गया था. और मैं फ़्री थी. वहां से घुमने जाने का प्रोग्राम पहले ही तय किया हुआ था. शाम को अम्बेडकराईट सोशायटी ओफ़ स्पेन ने सम्मान समारोह रखा हुआ था जहां पर मेरा सम्मान और मेरा भाषण होना था. दिन भर घूमकर शाम को छः बजे प्रोग्राम में पहुंचना था. इसलिए हम लोग बार्सिलोना घूम ही रहे थे कि फोन की घंटी बज गयी थी.

मैं झटके से फ़िर अपनी सीट से उठी थी. इतनी जल्दी क्या थी जाने की माँ,अब की बार उठकर मुझे डाँटोगी नहीं. एक बार तो सोचती घर की चौखट पर मेरी आँखे और गले में डालने के लिए बाँहें तुम्हारा इंतज़ार किया करती थी मेरे विदेश या प्रदेश से लौटते ही. कुछ तो कह जाती, जाते जाते. अब मेरी धौंस किस पर चलेगी. किस पर गुमान करूँगी. माँ से मायका, आज तेरे बिना मेरा मायका सूना रह गया. चल दी मुझे अकेला छोड़कर.

मैं दिल्ली पहुंच गयी थी. मुकेश लेने आ गये थे. मैने भी कुछ नहीं पूछा उन्होंने भी कुछ नहीं कहा. गांव आ गये थे. एक दिन माँ ने कहा था कि मुझे हँसते हुए विदा करना और अंतिम विदाई में मेरे साथ रहना.लो मैंने तो ये भी पूरा किया. तुमने कहा था :-
औरत सृजन करती है,
तो अंतिम विदाई भी दे सक़ती है.
ये ताक़त तुमने भरी थी मुझमें माँ ,पर अब कैसे समेटूँ अपने आपको. आपने मेरे लौटने तक का भी इंतज़ार नहीं किया माँ. कैसे सम्भालू, कैसे सब्र करूँ. मुझे भी अपने पास बुला ले.अब ओर जीने की इच्छा नहीं. माँ को अंतिम विदाई देना बहुत ही दुखदायी है. यूँ अचानक चली गयी और मेरे हिस्से में शांत सोयी असीम “शांति” अपने नाम की तरह व केवल अंतिम विदाई आयी अच्छा होता मैं अब की बार ये स्पेन की विदेश यात्रा न करती. कुछ समय ओर आप ही के साथ रह जाती. जब आपसे मिलकर चली थी तो भनक तक नहीं लगी कि ये अंतिम बार गले मिलना हो रहा है. एकदम से स्वस्थ थी.मुझसे बिछुड़ने का कारण केवल दो दिन का बुखार. मुझे माफ़ कर देना. मैं आपकी गुनहगार हूँ. ये क़र्ज़ अब मेरे साथ जाएगा.

डॉ. कौशल पंवार
सामाजिक कार्यकर्ता हैं और मोती लाल नेहरू कॉलेज,
दिल्ली विश्वविद्यालय, में संस्कृत की असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं.

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