नबनीता देव सेन की कविताएं

7 नवंबर 2019 को कैंसर की वजह से नबनीता देव सेन नहीं रहीं. बंगाल की कवयित्री, गीतकार, व्यंग्य लेखिका राधारानी देबी की बेटी पद्मश्री से सम्मानित नवनीता देव सेन (यह नाम इनको रवींद्रनाथ टैगोर ने दिया था) बंगाली भाषा की कवयित्री  उपन्यासकार, लघुकथा लेखिका के रूप में जानी जाती रही हैं.  इनका जन्म कोलकाता  में 13 जनवरी 1938 को एक बंगाली परिवार में हुआ।. इनके पिता नरेन्द्र देव भी कवि थे. जादवपुर विश्वविद्यालय, कोलकाता में तुलनात्मक साहित्य के प्रोफेसर के पद से वे सन 2002 में सेवानिवृत्त हुईं थी. नबनीता देव सेन को ‘नटी नबनीता’ के लिए साल 1999 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। पढ़ें पापोरी गोस्वामी द्वारा उनकी कविताओं का अनुवाद:

नबनीता देव सेन

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आदि- अंत

मेरे अलावा और कौन है तुम्हारा ?
उन्होंने कहाँ- नीला आकाश
आकाश के अलावा और कौन है बोलो
उन्होंने कहाँ- खेतो की हरियाली, अनाज
हरे अनाज और ?
गहरी नदी
नदी के बाद ?
पंचवटी
पंचवटी के अलावा ?
स्वर्ण-हिरण
हिरण के बाद ?
तूफ़ान
तूफ़ान के बाद भी ?
अशोक वन
अशोक वन के अलावा बोलो और कौन है
काली मिट्टी
काली मिट्टी के बाद ?
तुम तो हो.

नबनीता देव सेन

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जब बारिश आती है

जब बारिश आती तो पूरा घर नीला पड़ जाता है
फिर कांपता हुआ नीचे धंसने लगता है घर
जैसे कही से अनंत समय आकर घर में भर जाता हैं
जैसे असीम हवाएं खिसका देती है पूरा घर नदी तट तक
मैं नाव बनकर नदी में तैरती हूँ
भींगती हुई डोलती हूँ
कांपती हुई चलने लगती हूँ
वो सामने क्षितिज की रेखा है
जैसे चारों तरफ उफन रहा है
जैसे कही कोई नहीं है
जैसे जार जार रोने के साथ बंद हो जाती घर की आवाज़
कैसा अद्भूत नए इन्द्रजाल में
एक ही पल में दसों दिशाएं आलोड़ित
जैसे सभी बदल जायेंगे असल रूप में
जैसे ये सब नृत्य है, छंद है, उज्जवल रंग है
निद्रा खुल जाने के बाद प्रवाहित ये बारिश
कभी कभी ऐसा होता है
तभी मैं प्रार्थना करती हूँ
हे आकाश
घर स्वप्न देखने लगे और बारिश हो.

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द्वीपांतर

अब मैं बिना प्रतिवाद सभी अभियोग सर ऊँचा करके मान लुंगी
स्पस्ट रूप से शुन्य ह्रदय एक प्रस्तर-फलक बन जाउंगी
हमारे प्रीतिहीन पाप को खुद ही स्वीकार कर अपने इलाके में चली जाउंगी
एकदिन निर्जन रात को अचानक खाली अदालत में
विचारक, वादीपक्ष, वकील, क्लर्क
एकसाथ चाय के मेज पर गोल होकर बैठ गए
मुझे अकेले, निःसंग, नग्न
कठघरे में खड़े कर दिए गए
किसी दुसरे द्वीप में ठेलकर
दल बांधकर वो लोग चाय के मेज पर बैठे है
आजीवन इस चाय के मेज ने तुमलोगों को बंदी बना रखा है
मैं चप्पू चलाकर तैरते तैरते दुसरे द्वीप में चली जाउंगी
ह्रदय कभी था भी, या नहीं था
ये कहना अब गैरज़रूरी है
तुम्हे वो सब मिला जो मेरे ह्रदय में था
अब बिना कोई उम्मीद लिए, बिना कोई प्रत्याशा
वो सब जेब में भरकर अब मैं दूसरी द्वीप में चली जाउंगी.
उस द्वीप में तुमलोगों का जहाज़ नहीं जा सकता.

बंगला से अनुवाद-  पापोरी गोस्वामी.

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