विद्रोह: क्रांतिकारी परिवर्तन का उपन्यास.

‘विद्रोह’ युवा साहित्यकार कैलाश चंद चौहान का तीसरा उन्यास है। इससे पहले कैलाश चंद चौहान का पहला उपन्यास ‘सुबह के लिए’ तथा दूसरा उपन्यास ‘भंवर’ दलित साहित्य में खासी प्रसिद्धी पा चुके है। और अब पाठकों के सामने तीसरा उपन्यास ‘विद्रोह’ उपस्थित है।  लगातार लेखन कार्य से जुड़े कैलाश चंद चौहान बहुमुखी प्रतिभा के धनी है। वे सफल कहानीकार है। दलित साहित्य की प्रतिष्ठित पत्रिका “कदम” के संपादक है, जिसे वह अपने बलबूते अपने सीमित साधनों से लगातार निकाल रहे है। एक सामाजिक कार्यकर्ता के रुप में दलित समाज में प्रसिध्द है। एक सामाजिक कार्यकर्ता के रुप में और एक बेटे के रुप में उपन्यासकार कैलाश चंद चौहान अपनी माँ को अपना आदर्श मानते हुए अपना उपन्यास विद्रोह उनको समर्पित करते हुए लिखते है- “अपनी माँ अंगूरी देवी को समर्पित, जो अलीगढ़ (उ.प्र.) जिले के पिछड़े गांव से आई और हमसे पढ़ना लिखना सीखकर ढ़ेर सारी किताबें पढ़ी तथा अंधविश्वास के विरुध्द होकर दूसरों को भी समझाने लगी। सामाजिक सेवा के हमारे प्रयास व कार्य के लिए हमें कभी मना नहीं किया”। यही कारण है शायद कि उपन्यासकार कैलाश चंद चौहान “विद्रोह” उपन्यास में आए तमाम स्त्री पात्रों के चरित्र में पूरी तन्मयता के साथ अपनी सशक्त माँ के अक्स को पिरो देता है।

‘विद्रोह’ दलित समाज में व्याप्त खासकर दलित समाज के बाल्मीकि समुदाय के लोगों की पीड़ा, निराशा, उनके संघर्ष, उनकी जिजीविषा, उस समाज के अंदर बैठी कुरीतियों का बेबाकी से चित्रण करता हुआ अपने मंतव्य स्त्री स्वतंत्रता की मंजिल तक पहुँचता है। विद्रोह उपन्यास की कई विशेषताएं है जिनमें लगभग सभी पात्रों का डॉ. अम्बेडकर की विचारधारा से प्रभावित होकर अम्बेडकरवादी दिखाया है। सभी स्त्री पात्र सारे पुरुष पात्रों के अपेक्षा अधिक मुखर, बहादुर, सशक्त, ईमानदार, व्यवस्था विरोधी, क्रांतिकारी, तर्कशील, विवेकशील, पाखंड विरोधी और स्त्री चेतना से लबरेज है। अम्बेडकरवाद के सिद्धांतों को अपने नीजि जीवन में अपनाने में भी वह पुरुष पात्रों से कहीं आगे है। इस उपन्यास के बारे में बेबाक और त्वरित टिप्पणी यही की जा सकती है कि उपन्यास “विद्रोह” स्त्री चेतना और उसके विद्रोह का उपन्यास है। इस उपन्यास का नायक विक्रम है।वह बाल्मीकि समुदाय से है। विक्रम अतिशिक्षित है। पेशे से इंजीनियर है। वह डॉ. अम्बेडकर को मानता है। वह अपने समाज के  गरीब अनपढ़ बच्चों को पढ़ाने के लिए कोचिंग सेन्टर चला रहा है। वह अपनी सरकारी नौकरी लगने से पहले और बाद में भी लगातार कोचिंग सेंटर में और कमरे बनाने और उसको अधिक से अधिक बच्चों को लाभान्वित करने के लिए कार्य करता रहता है। वह एक सच्चे अम्बेड़करवादी की तरह अपनी छोटी बहन स्नेहा जो कि दिल्ली विश्वविद्यालय से एम.ए कर रही है, उसको भी वह एक स्नेहिल भाई के रुप में हर तरह से प्रोत्साहित करता रहता है। दोनों भाई-बहन का रिश्ता बहुत सुंदर है। भाई-बहन में बहुत प्यार है। उपन्यास में एक जगह- विक्रम साढ़े आठ बजे घर पहुँचा। उसके पहुँचने का समय घर में सभी को पता था। विक्रम घर पर पहले से ही कहकर गया था कि आज पहला दिन है, इसलिए घर पहुँचने में उसे देर हो सकती है। दरवाजा स्नेहा ने खोला। विक्रम को देखते ही तुरंत बोली, “बधाई भईया.” “तुझे भी,” विक्रम ने उसे गले लगाया। स्नेह से उसके सिर पर हाथ फिराया। उसके बाद उसने सामने दीवार पर लगी डॉक्टर अम्बेडकर साहब की तस्वीर के समाने खड़े होकर हाथ जोड़े। स्नेहा ने जोड़े। दोनों के तन और मन में ऊर्जा का संचार हुआ।” विक्रम से प्रेरणा लेकर स्नेहा भी कोचिंग सेन्टर में बच्चों को पढ़ाने जाती है। दूसरे शब्दों में कहे तो स्नेहा का आदर्श उसका स्वयं का बड़ा भाई विक्रम है। विक्रम किसी भी तरह के रीति रिवाजों, धार्मिक पाखंड के खिलाफ है। विक्रम ने अपनी शादी बहुत ही सीधे सादे तरीके से की है। विक्रम का विवाह अंतरजातीय विवाह है। उसकी पत्नी प्रियंका जो कि गुप्ता परिवार से आती है। प्रियंका के माता-पिता जातिवादी है। इसलिए वह प्रियंका की शादी विक्रम से नही होने देना चाहते। लेकिन जब प्रियंका की छोटी बहन अंजलि जब अपने पिता प्रमोद गुप्ता को प्रियंका और विक्रम की शादी के लिए मना लेती है तो प्रमोद गुप्ता में भी प्रियंका और विक्रम की साधारण तरह से विवाह करने की बात आ जाती है परंतु जब वह दुबारा जाति के नाले में डूबकी लगाने लगते है तो फिर वह सोचते है- बहुत देर तक वे ख्यालों मे डूबे रहे। लेकिन नींद थी कि आने का नाम नही ले रही थी। हारकर उन्होने पत्नी से विपरित करवट लेकर आँख बंद कर ली।अंदर, बाहर के माहौल की शांति के साथअपने मस्तिष्क को शांत कर सोने का प्रयास किया, तभी दलित की औलाद गुप्ती का लड़की के साथ सोएगा…. यह शब्द प्रमोद गुप्ता के कानों में गूंज गए, वह चीखे, “नहीं”…। परंतु प्रियंका एक विद्रोही लड़की है। वह किसी भी तरह की जाति पाति, कर्मकांड, ढोंग आडम्बर को नही मानती और अपने अपने माता-पिता से, पूर्ण रुप से घोषित विद्रोह करके विक्रम से शादी कर विक्रम के घर आ जाती है। प्रियंका भी इंजीनियर है। प्रगतिशील विचारों की है। वह विक्रम से प्यार करती है। और अपने प्यार में वह विक्रम को सुधारती भी है। विक्रम के रिश्वत लेने की आदत छुड़वाती है। उपन्यासकार ने प्रियंका के पात्र के माध्यम से गैर दलित स्त्री का बेहद सशक्त चित्र स्थापित किया है। प्रियंका का चरित्र में जितना उठान शुरु में दिखता है बाद में वह उठान कम हो जाता है। अंतत वह एक अच्छी गृहस्थन के रुप में बदल जाती है जो बडे जतन से अपने पति, बच्चे और सास-ननद को संभाल कर रखती है।

उपन्यास का एक और बहुत सुंदर पात्र है पूजा। पूजा विक्रम की फुफेरी बहन है। वह भी विक्रम को अपना आदर्श मानती है। विक्रम की बुआ और उनका पूरा परिवार पूजा पाठ वाला है परंतु पूजा पूरे परिवार में विपरित विचारों की है।वह भी विद्रोही प्रवृति की है। उसकी शादी एक बहुत ही कर्मकांडी और दहेज के लोभी परिवार में हो जाती है. पूजा समय समय पर उनका मुखर विरोध करती है और बदले में सास और पति से ताने सुनती है। वह ताने सुनती है पर उन तानों के सामने झुकती नही है। पूजा जिन चीजों में विश्वास नही करती उन बातों पर उससे कोई विश्वास नही करवा सकता। शादी के अगले दिन ही जब ससुराल वाले उसे धोक लगाने को कहते है तो वह मना कर देती है। वह भी अम्बेडकरवादी है। घर में पूजा पाठ और क्लेश जब बड़ जाता है और उसका पति जब उसपर हाथ उठाता है तो वह अपनी माँ के घर न जाकर अपने भाई विक्रम के घर आ जाती है। पूजा की यह हालत देखकर स्नेहा अपने प्रेमी राघवेन्द्र जो कि वह भी दलित है परंतु हाथ में कलावा बाँधता है और उसके घर में अनेक देवी देवताओं की मूर्तियाँ, पूजा पाठ और कर्मकांड देख स्नेहा संशय में पड़ जाती है कि यदि राघवेन्द्र से वह शादी कर लेगी तो उसकी जिंदगी उसकी फुफेरी बहन पूजा जैसी हो जायेगी। इसलिए वह राघवेन्द्र को अपने साथ विवाह के लिए साफ-साफ मना कर देती है। हालांकि यह बात जरुर चुभती है परंतु एक पक्का सिद्धांतवादी व्यकित यह काम कर सकता है। इसलिए स्नेहा इस उपन्यास का बहुत ही सशक्त पात्र है। अपने विचार के व्यक्ति के साथ शादी करना हमेशा से स्त्री के लिए बड़े कांटे का सौदा रहा है। लेकिन विक्रम इसका हल निकालता है और अपने आफिस में काम करने वाले दूसरे दलित इंजीनियर जो  बुधिस्ट है और ईश्वर को नही मानते उनके लड़के से अपनी बहन स्नेहा की शादी तय कर देता है। उपन्यासकार कैलाश चंद चौहान ने बाल्मीकि लड़की से जाटव लड़के से शादी दिखा कर दलित समाज में फैली उपजातीय भेदभाव की समस्या का हल इस उपजातीय शादी से दिखाया है।

विक्रम की माँ फूलों जिसने अपने जीवन में बहुत मुसीबते झेली है पर अपने बच्चों की उपलब्धियों पर गर्वित है। हालांकि फूलों का चरित्र उपन्यास में बिल्कुल यर्थाथवादी और व्यवहारिक है। वह स्नेहा और विक्रम के विचारों से कभी सहमत होती है कभी नही। जो भी हो फूलों आत्मविश्वासी और स्वाभिमानी स्त्री है जो तमाम दुख दर्द सहकर अपने बच्चों की पढ़ाई लिखाई की तरफ हमेशा प्रयासरत है।

उपन्यास में एक कहानी साथ साथ चलती है और वह है जाट जाति की स्त्री सोनी उसके पति बलदेव और उनके बेटे हेमंत की। जब सोनी को बलदेव से बच्चा पैदा नही होता तो वह अपने घर जानवरों की नाज-सानी करने वाले बाल्मीकि समुदाय के काले से माँ बन जाती है। हेमंत काले का बच्चा है और काले विक्रम का पिता है। जब जाट दलितों के घरों में आग लगा देते है तो सोनी अपने गांव के लोगों को रोकने की कोशिश भी करती है। परंतु इस लड़ाई के बाद सारे दलित परिवार गांव से पलायन कर जाते है। सोनी कभी काले से नही मिल पाती परंतु वह उसको देखने के लिए उससे मिलने के लिए हमेशा तड़पती है। जब हेमंत लड़कियां छेडने के कारण बुरी तरह पिटता है और मरने के कगार पर होता है तो सोनी किसी भी तरह विक्रम का पता ढूंढ विक्रम से मदद मांगती है। सोनी का पात्र का बहुत ही प्रभावशाली है। जातिवादी तो सोनी भी है परंतु क्रूर नही है। वह विक्रम को अपने बेटे की तरह ही समझती है।जब हेमंत दिल्ली के एक अस्पताल में कोमा में होता है तो सोनी को अपनी मदद के लिए के लिए केवल विक्रम ही याद आता है। वह विक्रम से मिलने के उसके घर खाना खाती है और उसे यह खाना खाने वाली बात किसी से भी बताने को मना करती है। विद्रोह उपन्यास अपने कथ्य कलेवर में अनूठा उपन्यास बन पड़ा है। इसे अनूठा बनाने में उपन्यकार कैलाशचंद चौहान की अम्बेडकरवादी दृष्टि ने काम किया है। उपन्यास पठनीय और संग्रहणीय है। निस्संदेह विद्रोह उपन्यास दलित साहित्य में मील के पत्थर का काम करेगा।

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