बौद्ध देश की यात्रा-2

डॉ. कौशल पंवार

दिनांक 11.04.2019 को 9:00AM पर कॉन्फ्रेंस का उद्घाटन था जिसमें कीनोट स्पीकर्स ने अपना-अपना वक्तव्य दिया। दोपहर में मेरा था। अच्छा हुआ हालांकि मुझे उम्मीद थी कि मुझे बेस्ट प्रजेंटेशन का अवार्ड मिलेगा जो मिलना भी चाहिए था क्योंकि मेरे अनुसार ही नहीं बल्कि दक्षिण अफ्रीका और नेपाल के डेलिगेशन का भी यही मत था कि मेरा बेस्ट था। विदेशों मे भी एक तरह का ये भेदभाव होता है वे भारतीय प्रतिभागियों को ज्यादातर नहीं चुनते हैं। हो सकता है मैं गलत हूँ लेकिन ये मैने महसूस किया है। मैने आपत्ति भी दर्ज कराई कि आपने जिसे अवार्ड दिया उसमे आपको क्या नजर आया जिसका वो जवाब नहीं दे पाये। इसकी खबर सबको हो गयी थी। खैर फिर उन्होंने मुझसे ही एक सेशन को चेयर करवाया। मुझे थोड़ा सा अब ठीक लगा और मैने स्वीकार किया कि शायद मुझमे अभी कमी बाकि है जिसे मैं दूर करूँगी।

मेरे पेपर के जैसे ही पेपर दूसरे लोगों के भी थे। जैसे नेपाल से टिकाराम गौतम थे। सोशल साइंस के प्रोफ़ेसर हैं और इन्होंने अपने देश में असमानता पर अपना पेपर पढ़ा। मेरे पेपर और इनके पेपर में जो एक बात सामान्य थी वो थी असमानता पर आधारित भेदभाव। सभी ने यही कहा। आख़िर पड़ोसी हैं तो कमियाँ भी तो एक-दूसरे के हिस्से आएगी। डिनर भी कॉन्फ्रेंस की ओर से ही था जिसमें जापानी भोजन परोसा गया। जापानी मिठाई हमने भी ऐसे ही खानी सीख ली थी अपनी नई चीनी दोस्त ज़ैन से। इस मिठाई के ऊपर चावल का कवर रहता है और अन्दर चोकलेट का स्वाद। मिठाई तो कमज़ोरी है हमारी तो अपने आपको कैसे रोकते मिठाई खाने से? अगले दिन हम सभी प्रतिभागी ओसाका भ्रमण के लिए गये। रास्ते में खूब मस्ती भी की। प्रेमभाव में भाषा बाधा नहीं बनती। यहाँ पर सबकी अपनी-अपनी भाषा थी फिर भी प्रेम से ख़ूब मस्ती की। जब व्यक्ति दुःख में होता है या बहुत ख़ुश होता है तो वह अपनी ही भाषा में बोलता है ऐसा मेरा मानना है। हम लोग कई बार अपने अपने देश की भाषा में बोले जो एक दूसरे को बिलकुल समझ नहीं आती थी, फिर भी ख़ूब हँसे।

सबसे पहले हम ओसाका के पुराने बौद्ध विहार Osaka Castle गये जहाँ से पूरा ओसाका दिखाई देता है जो आठ मंजिल ऊँचा था। ऊपर जाने के लिए सीढ़ियाँ और अलिवेटर दोनों थे। हमारे ग्रुप से कुछ लोग सीढ़ियों से गये तो कुछ अलिवेटर से। मेरी सांस फ़ूलती है ऊपर चढने से तो मै सीढ़ियों से गयी, मेरा साथ ज़ैन और तीन और साथी थे। जब हम लिफ़्ट में थे तो मुझे मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं लगी थी। मेरे पास कुछ था भी नहीं। बैग भी मैने जिस गाड़ी से हम लोग आये थे, उसी में छोड़ दिया था। मैने ज़ैन को बताया। उसने इतने अच्छे से मुझे समझा जिसका कोई उदाहरण आज तक मैने स्त्रियों के बीच में नहीं देखा। इतना बहनापा, हम तो केवल नारे लगाते हैं यहां भाईचारा जिन्दाबाद, आदि-आदि। पर असल में कितना भाईचारा हम लोग निभाते है, कितना भाई बहनचारा निभाते हैं; हम सब जानते हैं। हम तो टुकडों में बंटे रहकर ही अपनी शान समझते हैं। ज़ैन ने तुरंत मुझे कहा कि आओ कुछ करते है वो और मैं जानती थी कि हमारे पास घूमने का निश्चित समय हमने तय किया हुआ है। फिर भी उसने सब कुछ छोड़कर मेरे लिए रैस्टरूम ढूंढा। उसे पता था कि मुझे भाषा की समस्या होगी, इसलिए उसने मुझे एक पल भी नहीं छोड़ा। मेरा हाथ पकड़कर मुझे चिन्ता न करने को कहती रही। जब कुछ नहीं मिला तो उसने कहा कि जब तक कुछ नहीं मिलता तो मैं ये टोयलेट पेपर यूज कर लूं। मैं थोड़ा सा हिचकी तो उसने कहा गो एण्ड यूज। इतना अपनेपन से कि मेरी आंखे एक पल के लिए तो नम हो गयी। ये इतना कारगार रहा कि हम दोनों खिलखिलाकर हंस पड़े। मुझे रिलैक्स फ़ील हुआ। घुमने का समय खत्म हो गया था।

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हम बिना ज्यादा देखे केवल झांका था फिर हम दोनों पूरे ग्रुप में जा मिले। नीचे आने से पहले ज़ैन ने मेरा हाथ अपनी ओर ये कहते हुए खींचा कि क्या पता, हम इस जगह पर दोबारा कभी न आ सकें। इसलिए उसने फिर सेल्फ़ी ली। मुड़ने लगी तो फ़िर उसने मुझे अपनी ओर धकेला और कहा कि नई चीज देखते हैं जो हम दोनों के साथ हमेशा रहेंगी। वह एक मशीन की ओर ले गयी, यहाँ के गोल्ड सिक्के ओसाका कसटल पर अपना नाम खुदा कर दिया हमारी इस दोस्त ज़ैन ने। गाँव में पहले सहेलियाँ अपनी बाजू पर एक-दूसरे का नाम खुदवा लिया करती थी, आज हमने भी सिक्के पर एक दूसरे का नाम खुदवा लिया। बेशक़ीमती यादें रहेंगी। यादगार लम्हें संजोये ढेर सारी तस्वीर हमने वहां की ली मेरी इस चीन की दोस्त बनी जैन ने। उसने मुझे बताया कि आईफोन से मैं कहीं भी आइमैसेज कर सकती हूं। उसने मेरे नम्बर पर मैसेज भी करके दिखाया। सच में यह मेरे लिए नया था जबकि आईफोन तो मेरे पास पहले से ही था। जैन ने मुझे मेरे फोन में एक एप डाउनलोड करने को कहा और झट से लेकर खुद ही डाउनलोड कर दिया जिसका नाम था ब्यूटी कैम। क्या गजब की फोटो आयी उसमे। मैने जैन को गले लगा लिया। गजब का अपनापन उसके साथ बन गया था। वैसे तो सबके साथ अच्छा बना लेकिन जैंन की बात ही कुछ और थी।

हम लोगों के नाम अलग-अलग किस्म के थे सो हमने कोड वर्ड बनाये जैसे किसी को बुलाना हो तो इण्डिया, यू.एस.ए, बारसलोना आदि आदि देश के नाम से हम बुलाते फ़िर धीरे-धीरे नाम भी याद हो गये। हम सब ने अपने-अपने देश की सामाजिक, आर्थिक लोकतंत्र की भी खूब चर्चा की। भारत में हो रहे चुनावों में सब की रुचि थी। जापान की चर्चा सबसे ज्यादा की। ओसाका में castle park को देखते हुए ग्रुप से स्पेन से आये हुए Jordi Gonzalez पीछे छूट गये थे जो बाद में हमें गेट पर मिल भी गये। फिर हम लोग Shinsaibashai-Suji में शॉपिंग के लिए गये। बहुत सारी चीज नयी मिली यहां की मार्केट में जो महंगी भी थी। मैंने तो केवल एक पीस वाली ड्रेस खरीदी जो केवल याद के लिए ले ली। क्योंकि महंगी बहुत थी। मन तो था कि एक ब्रा खरीदूं क्योंकि विदेशी ब्रा कितनी कम्फर्ट होती होगी, ये महसूस करना चाहती थी लेकिन महंगी होने के कारण नहीं खरीदी। दूसरी बात, मेरे साथ फ़्लोरिडा के Prof. Hussaina Kettani जो सोशल साइंस के प्रोफ़ेसर है, उस वक्त मेरे साथ ही थे इसलिए भी थोड़ी असहज थी। भले ही मैं अपने आपको कितना भी फ़्रैक मान लूं लेकिन कुछ चीजों को लेकर संकुचित तो हूं ही और मुझे इसे स्वीकार करने में कोई प्रोब्लम नहीं है। इसलिए नहीं खरीदी।

मार्केट के बाद हम लोग Shitennoji Temple (बौद्ध विहार) गये जहां पर हमने ग्रुप फोटो एक चाइनिज व्यक्ति से खिंचवाया। बौद्ध विहार के अन्दर जाने से पहले मेरा ध्यान बाहर खड़े एक आदमी की ओर गया जो वहां के गेट पर कटोरा जैसा कुछ हाथ में लेकर खड़ा था जैसा अक्सर हमारे भारत में भीख मांगने के लिए लोग मन्दिर या किसी भी धार्मिक स्थल पर गेट के बाहर खडे होते हैं। मुझे हैरानी भी हुई कि इतने विकसित देश में भी ऐसा उदाहरण दिख रहा है। मैने उसकी तस्वीर भी ली। हम लोग अन्दर गये। बौद्ध विहार में घूमते हुए ये देखा कि यहाँ पर भी घंटा बजाने की परम्परा है। इच्छा पूर्ति के लिए प्रार्थना भी की जाती है। जैसे गुरुद्वारे में पहले पानी से हाथ पैर धोते हैं ठीक यहाँ भी ऐसा देखने को मिला। और भी तथ्य देखने को मिले।मैं अपने आपको एक शोधार्थी ही मानती हूँ और तमाम जगह पर घूमती हूँ। चाहे वह भारत के तिरुपति का मंदिर हो, कामाख्या मंदिर हो, लुम्बिनी हो, बौद्ध विहार हों, नालंदा या फिर तक्षशिला, जैन मंदिर, फ़तेहपुर सीकरी ताजमहल, या विदेश के तमाम मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे या फिर तमाम देशों के बौद्ध विहार हों। इन सब पर एक पुस्तक यात्रा संस्मरण के रूप में विस्तार से लिखूँगी।

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बौद्ध विहार में एक तालाब मिला जिसमें ढेर सारे कछुए थे। इसका क्या अभिप्राय रहा होगा, इसकी जानकारी नहीं मिल पायी लेकिन एकदम ठीक बौद्ध विहार था मेरे लिए आश्चर्यजनक भी था। इसे देखने के बाद हम फ़िर से अपनी गाड़ी से रवाना हो गये मिनी एफिल टॉवर जिसका नाम Tsutenkaku है, देखने के लिए गये। मैने तो पहले ही फ़्रांस का एफिल टावर देखा हुआ था इसलिए थोडी उत्सुकता कम थी लेकिन जिवंत मार्केट को देखकर बहुत अच्छा लगा। रंगीन मार्केट, रंग ही रंग। थोड़ी सी समानता आप जयपुर शहर और दार्जलिंग के साथ कर सकते है लेकिन यहां का मार्केट ज्यादा सजा-धजा था। दिन भर की घुमक्कड़ी के बाद अब हम सब थक भी गये थे और इन पलों को आंखों और कैमरें में कैद करने के बाद हम सब अपने-अपने होटल चले गये। खुशनुमा शहर और यहां के लोगों की आत्मीयता ने मन को मोह लिया था।

इतना अनुसाशन कि केवल कहने भर के लिए अनुशासित नहीं है बल्कि वहाँ के लोगों में वो अनुशासन हर चीज़ में दिखाई देता है। चाहे बाथरूम हो, घर हो, रेस्टरूम हो, सार्वजनिक जगह हो या कोई अपनी व्यक्तिगत प्रॉपर्टी ही क्यूँ न हो। रेस्टरूम जो मेरे जहन के सबसे करीब रहता है। शायद इसलिए की इसके अनुभव मेरे जीवन का अहम हिस्सा रहे हैं। इसलिए किसी भी देश में जाऊं मेरा ध्यान बरबस ही इस ओर चला जाता है। इसलिए रेस्टरूम की बात करूँ तो वहाँ की टॉयलेट सीट पर कई तरह के सिम्बल आपको नज़र आ जाएँगे। एक सिम्बल में आपको प्रेस करने से लेडीज़ और जेंटेस का पिछवाड़ा धोने का दिया है, दूसरा आपको लेडीज़ के लिए दिखाई देता है जो फ़्रेंट साइड और बैक साइड को धोने के काम आता है इसमें बक़ायदा लेडीज़ का छोटा सा चित्र भी अंकित किया गया है जो शायद निरक्षरों को समझाने के लिए बनाया होगा। जैसे अपने यहां शौचालय पर अंकित होता है. यही वहां सीट के बाजू में दिखाई देता है। एक सिम्बल छोटे बच्चों के लिए है, एक ओर कॉमन सिम्बल जो सब उम्र के लिए बनाया गया है।

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रेस्टरूम में सब ज़रूरत का समान रखा गया है चाहे वह टॉलेट पेपर हो, डेस्टबिन हो या हाथ धोने के लिए सनिटाइजर। एक और बात मुझे अन्य देशों से अलग लगी, वह थी कि वहाँ रेस्टरूम में सनेटरी नैपकिन के लिए अलग से पोलिथिन और अलग ही डेस्टबिन रखा होता है ताकि सनेटरी नैपकिन को उसमें डाला जाए जबकि टॉयलेट पेपर के लिए अलग बिन बनाया गया है। स्वच्छता और रेस्टरूम की सफ़ाई करने के लिए कितना सुविधाजनक होता होगा यह। मैं तो देखती ही रह गयी। ये मेरे लिए शायद इसलिए ज़्यादा महत्वपूर्ण रहा होगा क्योंकि मैंने ख़ुद मैला सिर पर ढोया है जहाँ लैट्रिन करने के बाद उस पर राख डालकर एक पलटे से उठाकर अपने टोकरे में डालकर सिर पर उठाकर फेंक कर आना होता था। आज सोचती हूँ तो वह भयावह दृश्य याद करके मेरी रूह काँप जाती है। और अब मैं यहाँ जापान के रेस्टरूम को देख रही हूँ और इसे साफ़ करने वाले के लिए अजीब सी उत्सुकता भी महसूस कर रही हूँ। यहाँ की सीट पर बैठकर ही स्वर्ग (स्वर्ग मतलब सुख से है) जैसी अनुभूति मिलती है।

रेस्टरूम की तापमान एकदम सामान्य रखा जाता है जिसे आप अपने अनुसार गर्म कर सकते हैं वो भी केवल एक बटन दबाकर। जब बहर ठंड हो और रेस्टरूम की जरुरत पड़े तो बठते ही सिंकाई जैसा अनुभव होता है जो बहुत सुकून देता है। हमारे यहां तो आप इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। भारत में कभी निर्मल अभियान तो अब स्वच्छता अभीयान में अरबों रुपये खर्च हो रहे हैं लेकिन जापान के शौचालयों की सुविधा तक पहुंचने के लिए तो भारत को कई सौ साल और लगेंगे और शायद तब भी ये सुविधा यहां सभी को न मिले। जापान में सार्वजनिक जगहों के इस्तेमाल के लिए कोई पैसा नहीं लिया जाता जबकि हमारे यहां तो इस मूलभूत आवश्यकता के लिए ही पांच रुपये लिये जाते हैं और सुविधा के नाम पर फ्लश तक ऑन नही किया जा सकता उन सुलभ शौचालयों में या दूसरे सार्वजनिक शौचालयों में।

विदेशी यात्राओं में मैने पहला ऐसा देश देखा है जहां दूसरे देश का झण्डा आप लगा सकते हैं। मैने लगा हुआ देखा है। जब मैं होटल ओसाका पहुंची तो वेद जी के साथ रात का भोजन साथ करने की योजना बनी। यहां पर एक इण्डियन रैस्टोरैंट खोजा मैप से ही। यहां पर हिन्दू फूड के नाम से जाना जाता है। हिन्दू फूड के बारे में मुझे फ़्लाइट में भी बताया गया था। हम तीनों खाना खाने गये। उस रैस्टोरैंट के बाहर इन्डिया का झंडा लगा देखा तो मुझे बहुत अच्छा लगा लेकिन आश्चर्यजनक भी कि जापान में किसी और देश का झंडा कैसे लगा हो सकता है! ये बात मैने वेद जी से भी पूछी और जब हम लोग खाना खा रहे थे तो जिसने हमे सर्व किया उनसे बात की थी। वह नेपाल से थी। हालांकि उस रैस्टोरैंट का मालिक कोई और था मतलब नेपाली नहीं था। उनसे भी मैने झंडे के बारे में पूछा तो उन्होंने भी यही कहा कि आप अपने देश का झंडा लगा सकते हैं । फ़िर जब हम घूम रहे थे तो वहां पर भी हमने एक पाकिस्तानी रैस्टोरैंट को देखा तो उसके बाहर भी पाकिस्तान का झंडा लगा था। इतनी सहिष्णुता मैने कभी भी कहीं नही देखी थी। ये मेरे लिए किसी अचम्भे से कम नहीं था।

जापानी भाषा की तीन लिपियाँ है हिरागाना, काताकाना, और कांजी लिपि। कांजी जिसका मतलब चीनी होता है। ये चीन से आयात की गयी लिपि है जिसे बाद में जापानी लोगों ने दो लिपियाँ भी अपनी सुविधा अनुसार निर्मित की और कांजी को मिलाकर मतलब तीन लिपियों से जापानी भाषा बनी। तीनों लिपियों के जाने बिना आप जापानी भाषा लिख-पढ़ नहीं सकते। कांजी के बिना बोलचाल में आप काम चला सकते हैं। जैसे हिंदी और संस्कृत भाषा की लिपि तो एक ही है लेकिन आम बोलचालों में हिंदी या हरियाणा या कोई और बोली आप समझ सकते है लेकिन लेखन में उसके व्याकरण का ज्ञान आवश्यक है। हुई न जापानी भाषा की लिपियाँ मज़ेदार? जो मैने अभी तक नहीं जानी थी। मेरे लिए चौंकाने वाला तथ्य यह भी रहा कि यहाँ पर जापानी भाषा की एक लिपि जिसे किंग की भाषा या जिसे आधिकारिक भाषा कह सकते है, उसकी कांजी लिपि को पढ़ने का अधिकार स्त्रियों को नहीं था वे केवल जापानी भाषा की दूसरी दो लिपियों में लेखन कर सकती थी. इस पर और शोध करने की जरुरत लगी मुझे। वैसे तो जापान में डैमोक्रेसी है लेकिन राजा तो अभी भी है जिसे आदर की दृष्टि से न केवल देखा जाता है बल्कि उसे राजसी सम्मान देकर सम्मानित किया जाता है। सरकार के द्वारा राजा के जन्मदिन पर घोषित छुट्टी की जाती है। किंग के जन्मदिन को गोल्डन डे के रूप में मनाया जाता है। अब की बार मई में यहाँ के किंग का जन्मदिन है तो यहाँ पर अब की बार दस दिन का अवकाश रहेगा यानि गोल्डन डे दस दिन तक चलेगा।

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ओसाका के भ्रमण के बाद 13.04.2019 को मैने कन्सायी ऐयरपोर्ट के लिए टैक्सी ली और टोक्यो के लिए शाम 7.30 की फ़्लाइट ली। टोक्यो में बाबा साहेब की जन्मशाताब्दी प्रोग्राम का आयोजन किया गया था जिसमे मैं भी वक्ता के रूप में शामिल थी। यहां तक जो पंहुची हूं तो मेरा मां और चाचा के बाद सारा क्रेडिट तो इन्ही को जाता है। अगर बाबा साहेब न पैदा हुए होते तो हम यहां तक कहां पंहुच पाते? इसलिए सारी कठिनाईयों के बावजूद भी मैं बाबा साहेब के प्रोग्राम में हिस्सा बनने पहुंच गयी थी। 14.04.2019 की तारीख तो मन पर अंकित है इसे कैसे यूं ही जाने देती? प्रवीन मेश्राम जी मुझे अपनी गाड़ी से ऐयरपोर्ट पर लेने आ गये थे। वहां से हम लोग योसोकामा गये। रात उनके परिवार के साथ बिताई। उनके बच्चों से मिलकर बहुत अच्छा लगा।

अगले दिन कुंदन, जो मेरे मित्र संजीव चंदन का भाई है, मिलने के लिए वहीं घर पर आ गये। फिर हम लोगों ने थोड़ा घूमने का प्रोग्राम बनाया क्योंकि कार्यक्रम शाम को था इसलिए मैं, प्रवीण मेश्राम और कुंदन, हम गाड़ी लेकर घूमने निकल गये। हम पास के बौद्ध विहार भी गये और वहीं पास में शमशान घाट था बौद्ध विहार के नजदीक ही। वहां पर देखा कि मरने वालों की समाधियां बनायी गयी है। कई समाधियों पर ग्लास और शराब कीबोतल भी देखी जो मुझे मेरे गांव की याद दिला गयी। हमारे यहां ये कहावत थी कि “ जो जिसको ज्यादा पसंद हो जैसे कोई शराब पीता हो तो मजाक में उसके बारे में कहा जाता था कि मरने के बाद शराब भी साथ में ले जाना।” आज उस मजाक में कही बात सच हुई अपनी आंखों के सामने देख रही थी इन समाधियों पर जहां किसी पर कुछ रखा था तो किसी पर कुछ वो भी अपनी-अपनी नेमप्लेट के साथ। शाम को प्रोग्राम के लिए निकल गये जो यहां से एक घंटे से ज्यादा की दूरी पर था एक क्मयुनिटी सैंटर पर। बुद्ध वन्दना से प्रोग्राम शुरु हुआ। विश्व ज्ञान के प्रतीक डॉ. बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर को नमन करते ह्ए, अपने चाचा और मां जो आज इस दुनियां में नहीं हैं, याद करते हुए मैने अपना वक्तव्य दिया। सबसे ज्यादा खुशी इसी बात को लेकर मुझे थी कि पूरे विश्व में अम्बेडकर जयंती मनायी जा रही है और एक देश में तो मैं स्वयं भी उपस्थित थी।

अगले दिन मैने 5.30 बजे पर बस पकड़ी और नरेता एयरपोर्ट पंहुच गयी। मेरी इन्डिया वापसी की फ्लाइट 15.04.2019 को 9:30AM पर थी जो समय पर दिल्ली पहुंच गयी। मैं जापान की यात्रा के बाद अपने देश वापस लौट आयी। अंतिम रूप से बस मैं यह कह सकती हूँ कि अपने देश पर गर्व करते हों तो गर्व करने के लिए और अपने देश पर गर्व करवाने के लिए अपने कर्तव्य के प्रति सचेत रहना चाहिए और उनका पालन करना चाहिए। आपके देश का नाम पूरी दुनिया जाने और कहे कि उस देश के लोग इतने जिम्मेदार और ईमानदार हैं कि आप बेहिचक वहां जाकर रह सकते हो जहां चोरी, छेड़खानी का डर नहीं, जहां लोग बेईमानी नहीं करते और ऐसा संदेश वहां का हर एक नागरिक आगन्तुक व्यक्तियों को देना चाहता है कि वह कल्पना करने लगता है कि हमारा भी देश ऐसा होना चाहिए।

डॉ. कौशल पंवार
सामाजिक कार्यकर्ता हैं और मोती लाल नेहरू कॉलेज,
दिल्ली विश्वविद्यालय, में संस्कृत की असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं.

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