बौद्ध देश की यात्रा

डॉ. कौशल पंवार

अमेरिका, कनाडा, लंदन, जेनेवा, पेरिस की यात्रा के बाद यह मेरी जापान की पहली यात्रा थी. मैने इण्टरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन सोशल साइंस एन्ड ह्युमैनटिजी 2019 की ओसका जापान में होने वाली कॉन्फ्रेंस के लिए पेपर का अब्सैट्रक्ट भेजा. मुझे मेल से सूचना मिली कि मेरा पेपर प्रजेंटेशन  के लिए स्वीकार कर लिया गया है। अगर मैं चाहूं तो पेपर पब्लिशिंग के लिए अपना पूरा पेपर भेज दूं जो उनके प्रसिद्ध जर्नल में छापा जायेगा। उसका ब्लाईंड रिव्यू होगा. अगर एक्सपर्ट को ठीक लगा तो आपका पेपर आगामी कॉन्फ्रेंस के बाद पब्लिश किया जायेगा. मैने अपना पूरा पेपर उनके दिये गये टैम्प्लेट के हिसाब से भेज दिया. जो एक्सपर्ट के कमेंट के साथ मुझे मेल से भेजा गया कि आपका यह पेपर उनकी कमिटी के द्वारा स्वीकार कर लिया गया है। मेल में एक्सपर्ट के कमेंट भी साथ में अटैच किये गये थे। मुझे फिर से फ़ाइनल पेपर उन कमेंट के साथ फिर से भेजने के लिए कहा गया। एक शोधार्थी के लिए इससे खुशी की बात हो ही नहीं सकती थी कि कोई एकदम बाहर के लोग उनके काम को स्वीकार करें और उसे स्वीकार करें जिनको आपने न देखा हो और न सुना हो। मुझे यह पेपर कॉन्फ्रेंस में प्रजेंट  करने के लिए कहा गया जिसे मैने खुशी-खुशी स्वीकार कर यह निर्णय कर लिया कि मैं जापान में अपना यह पेपर प्रजेंट करने जरुर जाऊंगी. अब समस्या थी फाइनेंशियल। मैने यू.जी.सी. में इसके लिए अप्लाई कर दिया। यू.जी.सी. एस.सी. वर्ग के अध्यापकों को दो साल में सौ प्रतिशत इण्टरनेशनल ग्रांट देता है। ये मुझे पता था क्योंकि 2012 में य़ू. एस.ए. भी मैं अपनी इसी संस्था से ग्रांट लेकर गयी थी। मेरे पास इसके अलावा तो कोई साधन है ही नहीं कि विदेश की यात्रा व्यक्तिगत रूप से की जाये। यही सरकारी संस्थाएं होती है जो मुझ जैसों का सहारा बनती है और हम विदेश के शिक्षण संस्थाओं में अपना योगदान और काबिलियत साबित कर पाते हैं। या तो विदेशी यूनिवर्सिटी अपने खर्चे पर बुला लेती है या फ़िर हमारी ये संस्थाएं हमें योगदान देती हैं, जिसका मैं धन्यवाद देती हूं.

कॉन्फ्रेंस अप्रैल में 10-12, 2019 को ओसाका के इण्टरनेशनल कन्वेन्शन सैंटर में थी, जिसमें मेरा पपेर का विषय था- “Socio-Cultural Attitude: A Study of Woman and Shudras in Ancient Age (Special Reference with dharmshastra)। मैंने आई.जी. एयरपोर्ट दिल्ली से शाम के 7.30 PM पर जापान ऐयरलाइंस के विमान ने उड़ान भरी और नरेता ऐयरपोर्ट टोक्यो सुबह के टोक्यो समयानुसार 9.30 AM पर मेरी फ़्लाइट लैंड की। वहां से मैंने फ़िर जापान एयरलाइन ली और कन्सायी एयरपोर्ट ओसाका जापान की धरती पर उतर गयी। ये उड़ान मेरे लिए पक्षी की तरह रही जैसे कोई पक्षी दूर आसामान में उडकर उसे छुने की कोशिश कर रहा हो। मुझे घूमना बहुत अच्छा लगता है। अलग-अलग जगहों पर भ्रमण करना मुझे आनंद से भर देता है। पहले ये ख्वाब रहे हो ऐसा भी नहीं है। गुजरते समय और जॉब की सुरक्षा के साथ ये एक जुनून सा कब बन गया, मुझे पता ही नहीं चला। हां अपनी साइकल पर जब मैं चलती थी और ऊपर परछाई में कुछ उड़ने वाली चीज की तरह उड़ने की कोशिश जरुर करती थी। मेरी माँ ने बताया था कि जब में पैदा हुई थी तो दाई ने मेरे पैर देखकर कहा था: ”छोरी के पैर मैं फिरकी है, बार घुमया करेगी, देख लेना” जवाब में मेरे चाचा ने मुझे गोद में लेकर कहा था: ”री ताई चिंता ना करय, मेरी छोरी अम्बर मैं घुमाई करेगी” बात आयी गयी हो गयी थी। पर ये सच में हो रहा था माँ के जीते जीते तो माँ ने ये बात मुझे एक दिन जब मैं यूएसए के लिए निकल रही थी, अपने पास बैठकर बतायी थी। क्या ज़ुबान से निकला ये शब्द मेरे लिए ब्रह्म वाक्य था। (ज्ञानी लोग इसे अन्यथा न ले. शाब्दिक अर्थ जिसे कभी पलटा न जा सके. इसका अर्थ बस केवल इतना ही है)। एक शोधार्थी होने के नाते मेरी नजर जापान में बौद्ध धर्म के आगमन और उसकी स्थानिक प्रतिक्रिया को जानने व समझने की रही थी क्योंकि जापान तो एक बुद्धिस्ट देश रहा है। बौद्ध धर्म के आने के बाद उसकी स्थानीय प्रतिक्रिया क्या रही होगी इसकी जिज्ञासा थी। यहां भी अगर है तो पितृसत्ता की सामाजिक जड़े पर बौद्ध धर्म का क्या प्रभाव पड़ा होगा, ये सब जानने की इच्छा थी।

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बौद्ध धर्म जापान के सामाजिक आर्थिक विकास की प्रकिया में सहायक बना होगा, यह जानने की उत्सुकता थी हालांकि मेरे पास समय का अभाव था। मैं बुद्धिस्ट नहीं हूं। ऑन पेपर, हिन्दू धर्म ही लिखा हुआ है। वह अलग बात है कि लगभग सभी सो कोल्ड हिन्दुओं के रिति-रिवाज को मैं नहीं मानती।  मुकेश और मैं इन सब से दूर हैं लेकिन मेरे परिवार मतलब मेरा मायका और ससुराल में सब कुछ किया जाता है इसलिए हम समाज से लगभग बहिष्कृत जैसे ही हैं। मैं बुद्ध धम्म को आस्था की तरह न देखकर उसके सारे पहलुओं पर नजर रखती हूं। मैं जब जेनेवा गयी थी तो वहां के बौद्ध विहार का स्त्री और पुरुष को अलग-अलग तरह से देखे जाने का अनुभव किया था लगभग सामंती सोच वाला जहां स्त्रियों को बौद्ध विहार में भिक्षुओं से अकेले में बात करने का अधिकार नहीं और न ही आप उनसे अकेले में मिल सकती हैं। मुझे अटपटा लगा था देखकर और सच कहूं तो बौद्ध धम्म में जो थोड़ी बहुत विश्वास था वह भी जाता रहा था कि ये धर्म किस काम का जो स्त्री को अधिकार  न दे सके। क्या अंतर है फिर हिंदू में और बौद्ध धर्म में? ये तो एक कुआं और दूसरा खायी जैसे ही हुआ न? खैर, मेरे लिए धर्म केवल मरने के बाद प्रयोग आने वाला एक कार्यक्रम भर है इससे ज्यादा मुझे किसी धर्म की कोई जरुरत नजर नहीं आती और न ही मैं ज्यादा आस्था भी रखती हूँ। मेरे लिए मेरा काम और मेरी जिम्मेदारी ही मेरा धर्म है। जापान में आकर बहुत कुछ नया देखना था। समय कम था, तीन दिन तक तो कॉन्फ्रेंस ही थी और ओसाका के लिए केवल एक दिन ही था। उस दिन में भी रात की फ़्लाइट थी। कन्सायी ऐयरपोर्ट से नरेता के लिए जहां मेरे पास केवल 14 April का ही दिन था। इतने कम समय में सब जानना और देखना चाहती थी जो मुश्किल था लेकिन फिर भी मैने ज्यादा से ज्यादा देखने और सीखने का प्रयास किया। मेरा पेपर 11.04.2019 को लंच के बाद था, इसलिए मैने अपने तीनों दिन को सुरक्षित रखा अकादमिक कार्यों के लिए और शेष दिन घुमक्कड़ी, जो डेलिगेशन के साथ थी। एक दिन का टूर सबके साथ। यह यादगार पल रहे।

ओसाका में चहल-पहल टोक्यो की अपेक्षा कम दिखी बल्कि टोक्यो से ज्यादा शांत मुझे ओसाका लगा। यहाँ के लोग अपनी भाषा जापानी में ही बात करते है। आम लोगों में यहाँ इंग्लिश का चलन न के बराबर है। बुद्धिज्म के मायने क्या है, इसे मैंने जापान में अनुभव किया है। व्यवहारिकता में देखा है कि यह धर्म केवल बौद्ध विहार में जाना और भिक्षु बन जाना ही बौद्ध बन जाना नहीं है, बल्कि उसे अपने जीवन में धारण कर उसी पथ पर चलना ही बौद्ध है. यहा धर्म की आस्था की तरह यह धर्म है ही नहीं बल्कि मानव मात्र के कल्याण के लिए ही समाज बना और उसे मनुष्यों ने अपनी आवश्यकता अनुसार धारण कर लिया, ऐसा जाना मैने इसे। भारतीय बौद्धों को जापान से सीख लेने की ज़रूरत है अन्यथा भारत के बुद्धिस्ट तो यही देखने में लगे रहते है कि कौन क्या पहन-ओढ़ रहा है। यही हमारा पैमाना बन गया है बुद्धिज्म का। जापान के हफ़्ते भर के प्रवास के दौरान यहाँ बहुत कुछ नया देखने और सीखने को मिला। स्पष्ट रूप से यहां पर जो भी सहिष्णुता दिखाई दी वह बौद्ध धर्म के यहां होने पर ही दिखी। यहां के लोग बहुत संवेदनशील है। एक मनुष्य दूसरे मनुष्य की कद्र करता है। एक दूसरे की समस्याओं और मजबूरियों को समझते हैं यहां के लोग। मानवाता अभी जिन्दा है यहां महसूस किया जा सकता है। जिसे मैने अनुभव किया जब ओसाका के क्न्सायी एयरपोर्ट पर पंहची तो वहां से मुझे अपने होटेल फैमिली इन जाना था जहां पर मेरा रूम बुक था। यह मेरे कान्फ़्रैस के आठ मिनट की दूरी पर था. मैं जापान एयरलाइन से ओसाका टोक्यो होते हुए गयी थी। टोक्यो से ओसाका की दूरी एक घंटा तीस मिनट की थी। जब फ़्लाइट में बैठी तो बार बार ध्यान ऐयरपोर्ट से होटल तक कैसे जाऊंगी, सोचती रही थी।

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मेरे साथ एक लड़का भी सफ़र कर रहा था जो विंडो वाली सीट पर था. बाहर का सीन मुझे भी दिखाई दे रहा था। मैने ओर थोड़ा सा खिसकर देखा था. मुझे नीचे समुद्र की तस्वीर खिंचनी थी जो मैं थोड़ा आगे होकर लेने का प्रयास कर रही थी, उसने जापानी भाषा में मुस्कराकर कहा जिसका मतलब तो मुझे बिल्कुल समझ नहीं आया लेकिन अर्थ समझ गयी थी और उसे मैने अपना मोबाइल दे दिया. फोटो लेने के बाद उसने फ़िर इन्ग्लिश में बोला प्लीज चेक। शायद उसे अंदाजा हो गया था कि मुझे जापानी नहीं आती। वह ओसाका जा रहा था। थोड़ा विश्वास होने के बाद मैने उसे एयरपोर्ट से होटल तक जाने का ठीक रास्ता पूछा जो आसान हो। उसने मैप निकालकर कुछ चेक किया और मुझे ट्रेन या बस ज्यादा ठीक रहेगी बताया। ट्रेन के तीन स्टॉप थे और बस का एक स्टाप। मैंने टैक्सी लेने के बारे में पूछा तो उसने बताया की टैक्सी इक्स्पेन्सिव है यहाँ। परंतु बस का नाम सुनते हुए मेरा ध्यान अपने समान की ओर गया। मेरा साथ एक बड़ा सूटकेस, एक पिठू बैग और मेरा पर्स था। कैसे सामान उठाऊंगी? फिर भी मुझे लगा कि देखा जाएगा जो होगा। आज तो पूछते हुए ही पहुँचेंगे है होटल। ये भी नया अनुभव ही रहेगा। मैंने कातासुताका सैतो से पूछा कि बस कहाँ मिलेगी। कातासुताका उस यात्री का नाम था जो मेरे साथ जहाज में था। मैने उससे उसका नाम पूछा तो उसने ये बताया. मैं अटक-अटक कर उसका नाम बोलने की कोशिश करने लगी तो उसने झट से कहा की आप मुझे सैतो कह सकती है। कुछ बातें हुई। भारत और जापान के बारे में भी बात की। हमारी फ़्लाइट कन्सायी ऐरपोर्ट पर लैंड कर चुकी थी। उसने मेरा इन्तजार किया बेल्ट से बैग लेने के लिए मुझे लगा कि शायद इसे भी बैल्ट से अपना बैग लेना होगा लेकिन उसके पास तो कोई बैग ही नहीं था। वह तो अपने दोस्त के पास ओसाका घूमने के लिए जा रहा था। मेरे बैग लेने के बाद वह मुझे बस स्टॉप तक छोड़ने आया जहां से मुझे बस लेनी थी। जबकि उसे ट्रेन पकड़नी थी। मुझे बस का रास्ता नही पता था तो वह मेरे साथ साथ चला। उसने ही मेरे लिए टिकट कांउटर से टिकट खरीदी। मुझे अपना फोन नम्बर दिया। अपना ध्यान रखने को कहा कि किसी भी तरह की कोई प्रोब्लम हो तो फोन कर लूं। ऐसी मेहमान नवाजी देखकर मन बाग़ बाग़ हो गया.. फिर एक बात कहाँ छुटती और वो थी सेल्फ़ी लेना। झट से ले ली। उसने बाय की और चला गया। बस रूकी तो उसमें से दो व्यक्ति नीचे उतरे। सब ने अपने अपने बैग लाईन में लगा दिये थे। देखा-देखी मैने भी लगा दिये। फ़ुल युनिफ़ार्म में उतरे व्यक्ति ने मुझे एक नम्बर वाला टैग दिया और बस में चढ़ने की ओर इशारा किया। जैसे ही बस में चढी तो ड्राइवर ने मेरा टिकट ले लिया। बस में बैठे तो पता चला कि ये बस होटेल तक नहीं जाएगी। ड्राइवर ने अपने फ़ोन से ऐड्रेस खोजा और बताया कि ये बस ओसाका स्टेशन तक जाएगी फिर वहाँ से दूसर रूट लेना होगा। उन्होंने मुझे रास्ते तक छोड़ा और फिर मुझे तय करना था कि कौन सा ऑप्शन लूँ। रास्ते की जानकारी तो थी नहीं तो मैंने फिर पूछ लिया। जिनसे पूछा वे ग्रुप में थे तीन लड़कियाँ और एक लड़का। उन लोगों ने केवल टैक्सी का रास्ता बताया बल्कि दस मिनट की वॉकिंग के साथ मुझे टैक्सी स्टैंड तक लाये। फिर टैक्सी वाले को समझाकर मुझे टैक्सी में बैठाया। इतना अपनापन एक अजनबी के साथ मैंने ज़िंदगी में पहली बार देखा। इतने देशों की यात्रा के अनुभव के साथ इस नतीजे पर पहुँची हूँ कि ये शायद बुद्ध की देसना है। मैं अपने तय स्थान पर पहुँची तो टैक्सी वाले ने न केवल मेरा सामान उतारा बल्कि बुकिंग तक वही खड़ा रहा। सबसे ज़्यादा कमाल की बात जिसके लिए इस पोस्ट को लिख रही हूँ कि उन्होने मुझसे पैसे लेने से मना कर दिया। मैंने इसकी कल्पना भी नहीं की थी कि एक व्यक्ति अपने पेशे में भी इतना सहिष्णु और नैतिक हो सकता है। मैंने पूछा तो उनका एक ही जवाब था कि उसने ये सर्विस की है। आश्चर्यचकित हो गयी ये देखकर कि आज भी ऐसे व्यक्ति मिलते हैं। होटेल पहुंच गयी। थोड़ी देर आराम किया।

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ओसका में भयानक ठंड थी। ऊपर से बारिस भी हो गयी, पर मन था कि रूम में रुकने के लिए तैयार नहीं था। इसलिए निकल गयी बाहर। जैसे ही रिसेप्शन पर पहुँची और बाहर निकलने के लिए दरवाजा खोला तो होटेल में रिसेप्शन पर बैठे बुज़ुर्ग ने कहा (जापानी भाषा में बोला था) बाहर बारिश हो रही है, छाता कहाँ है? मैंने कहा कि मेरे पास छाता नहीं है। उन्होंने झट से मुझे छाता पकडा दिया और ले जाने के लिए कहा। सच में मैं हैरान थी कि यहाँ के लोगों में इतनी उदारता है। मैं होटल से बाहर रोड पर आ गयी थी. घूमती रही। चौड़ी-चौडी सड़के, दोनों तरफ़ फ़ुटपाथ. लाईटों की ऐसी व्यवस्था कि चाहकर भी आप बदमाशी नहीं कर सकते। गोपनीय सीसीटीवी कैमरे जो झट से चालान काटकर आपके पते पर पहुंचा देते हैं अगर आपने किसी नियम का पालन नहीं किया तो। जापान में यहाँ की ये ऊँची-ऊँची अट्टालिकाएँ ही ख़ूबसूरत नहीं है बल्कि लोगों के दिल और दिमाग़ इनसे भी ज़्यादा ख़ूबसूरत हैं। यहाँ आय के अनुसार स्कूल में जाने वाले बच्चों के अभिभावक से फ़ीस ली जाती है। अगर कोई अधिकारी का बच्चा है तो उसे उसकी आय के अनुसार फ़ीस देनी होगी और अगर कोई सामान्य काम करने वाला होगा तो उससे उसकी आय अनुसार ही फ़ीस स्कूल लेगा न की अधिकारी जितनी। सबको एक जैसी शिक्षा लेकिन फीस सब की अपनी आय अनुसार। मुझे तो ये योजना बहुत पसंद आयी। क्यूँकि स्कूल कम या इतने महँगे हो कि एक ग़रीब का बच्चा या उसके माँ बाप भी जब इन चमकते फ़ाइव स्टार जैसे स्कूलों को देखे तो ये उनके लिए चाँद तारे तोड़ने जैसे लगे। “यत्र विश्वं भवत्येकनीडम” पूरी दुनियाँ में मानव जाति सामाजिक समझी गयी है। यहां पर आकर चरितार्थ होती दिखाई दी।

मैं 9.04.2019 को 3.30 PM के आसपास अपने होटेल तक पहुंच गयी थी। पहुंच कर अपना सामान व्यस्थित किया और थोडी देर आराम किया। वाईफाई के कारण नेट चल रहा था तो मुकेश को ठीक से पहुंच जाने का मैसेज कर दिया था। फ़िर वेद प्रकाश जी का मैसेज आ गया। ठीक से पंहुचने की सूचना मिलने के बाद उन्होंने मुझसे मिलने आने के लिए बोल दिया। विदेश में कोई अपना मिल जाये इससे बेहतर क्या हो सकता है। हमने समय निर्धारित कर लिया। शाम को वेद प्रकाश जी अपनी पत्नी रूपा के साथ मुझसे मिलने मेरे होटेल में आये। न केवल मिलने आये बल्कि भारतीय रेस्टोरेंट (जिसे हिन्दू फ़ूड कहा जाता है) में खाना भी खिलाया जो खाना मुझे दो दिन बाद मिला था। इतना लज़ीज़ खाना ख़ूब भरपेट खाया, कुछ न कुछ तो खा ही रही थी लेकिन फिर भी खाने की मानसिक उत्कण्ठा ज़्यादा थी। खाना खिलाने वाली मित्र बनी जो नेपाल से आयी हुई थी। जापान के भोजन का स्वाद लगभग भारत जैसा ही लगा। वेद और रूपा जी की मेहमाँ-नवाज़ी से मन खिल उठा. ऐसे

मित्र हर देश में मिल जाए तो क्या कहने! फिर तो विदेश जैसा अहसास ही नहीं होता। रात को जाते-जाते उन्होंने रास्ता दिखा दिया था कि जब भी भूख लगे तो मैं यही आकर खा लूं। मुझे भी आत्मविश्वास हो गया था कि मैं अपने होटेल से निकलकर अकेले ही इस रेस्टोरेण्ट को खोज लूंगी। नाश्ता होटेल में ही मिलना था तथा लंच और डिनर कॉन्फ्रेंस में मिलना था। सुबह-सुबह नाश्ता करके, तैयार होकर मैं इण्टरनेशनल कन्वेन्सन सैंटर की ओर निकल गयी। वहां की सचिव ने बडे सौम्य तरीके से स्वागत किया। पंजीकरण तो पहले से ही करवा रखा था इसलिए वहां के स्टाफ़ के द्वारा कॉन्फ्रेंस बैग, और दूसरा जरूरी सामान मुझे प्रदान किया गया। यहाँ भी लोगों से मिलकर अपनापन लगा। थोड़ा सभी सहभागियों से भी जान-पहचान व मेल-जोल हुई। कुछ समय बिताकर मैं वापिस अपने होटेल आ गयी।

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मेरे पास 10.04.2019 को दोपहर बाद का समय खाली था तो रूम में आकर थोड़ा आराम किया और फ़िर घूमने की इच्छा जगी। सर्दी से बचने के लिए जैकेट पहना और रिसेप्शन पर आ गयी तो देखा कि बाहर तो बारिस हो रही थी। मुझे बारिश बहुत पसंद है। परन्तु मुझे ठंड भी बहुत लगती है। फ़िर भी घूमने के लिए बाहर आ गयी थी। ओसाका के इस रास्ते से परिचय तो हो ही गया था। अगर फ़िर भी भटकी तो फोन तो था ही, वह काम करेगा। बाहर निकल गयी। फ़ुटपाथ पर चलती रही। दूर तक निकल गयी। मेरे होटल के पास ही नदी थी जिस पर पुल था और हल्की बारिश में बहुत ही सुंदर लग रहा था। ऊँची-ऊँची इमारतें, साफ़ स्वच्छ सड़कें, जगह-जगह बिन और लम्बी-लम्बी गाड़ियाँ, ग्रीन लाईट का इन्तजार करते लोग; मैने तो खड़े होकर देखा सब। सड़क पार करने का अलग सिस्टम। मैं घूमते-घूमते स्टेडियम तक आ गयी। खिलाड़ी खेल रहे थे अपने-अपने निश्चित स्थान पर। थोड़ी देर यहां रुक कर देखा और बरबस मयंक की याद आ गयी। मेरा बेटा मयंक ऐसे ही अब अपने प्लेग्राउंड में खेल रहा होगा फ़ुटबाल। आगे बढ़ गयी तो एक पार्क दिखाई दिया जहां पर गुलाबी पेड़ों पर फूल। कहते हैं कि जापान के लोग इन फूलों का साल भर इन्तजार करते हैं। सड़क किनारे खड़े ये पेड़ गुलाब के फूलों की वरमाला की तरह लगते हैं। बहुत खुशनुमा लग रहा था सब कुछ। चलते-चलते ध्यान एक मशीन की ओर गया। यह छपाई मशीन थी। कैसे छापती हैं मशीनें, यह भी तो जिज्ञासा रहती है एक मेरे जैसी थोड़ा बहुत अपनी मर्ज़ी की मालिक की तरह लिखने वाली को। इसलिए ध्यान से देखा उसे। फिर घूमते-घूमते आगे निकल गयी। हमारी घुमक्कड़ी तो ऐसे ही होती है। मुझे अकेले घूमना बहुत अच्छा लगता है। पार्क तक पहंच गयी। पार्क में झूलों को देखकर कौमु की याद ने एक बार के लिए तो तड़पा दिया था मुझे। मन किया कि इस झूले को झुलाऊं। लगा कि मां कौमु को झूले पर बैठाकर झुला रही है। मैं झूले के पास गयी और उसे प्यार से निहारा। अगर कौमु मेरे साथ होती तो इसे झुलाती। कुछ पल के लिए आंखे नम हो गयीं। मां की याद में कब आंखों ने धोखा दिया, मुझे तब पता चला जब एक पंछी अपने फड़फड़ाते पंखों मे मुझे यादों की नींद से जगाया। मेरा ध्यान समय की ओर गया। समय भी अंधेरे की ओर बढ रहा था। अब मुझे होटेल पहुंचना चाहिए ये सोचते हुए मैं वहां से निकलर सड़क पर आ गयी। चलते-चलते महसूस हुआ कि ये रास्ता तो नहीं था! मैं रास्ता भटक गयी थी! फोन पर हाथ गया तो उसमे तो नेट था ही नहीं! अब चिंता बढ़ गयी थी। कभी इस रास्ते तो कभी उस रास्ते भटकती रही। किससे पूछूं, यहां के लोग तो इंग्लिश नाममात्र ही समझते हैं। जापानी ही बोलते और समझते है। ऊपर से मेरी हरियाणी अंग्रेजी।

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आज तो गयी काम से! ये घुमकड्डी महंगी पडेगी; सोचती रही। अपनी जिन्स की जेब में हाथ डाला तो जापानी मुद्राएँ साथ थी। जेब टटोलकर थोड़ी सांस में सांस आयी। अगर रास्ता नहीं मिला तो ये जापानी नोट मेरे काम आने वाले है। अब मेरा हौसला बढ़ गया था। निराशा और नाउम्मीदी के बादल मेरे मन के आकाश से छँट गये. ऐसे में ताऊ जी की कही बात याद आ रही थी—“साथी साथ का, पिस्सा गैंठ का” मतलब विदेश में पैसा काम आता है। परंतु इसकी जरुरत ही नहीं पडी। खुद पर खुद से ज्यादा भरोसा था। होटेल का रास्ता मिल ही गया। रास्ते में सोचती रही कि न इन लोगों को इंग्लिश समझ आये और न मुझे जापानी समझ आये तो कैसे मैं इनसे अपनी बात करूँ? चार पंक्तियां सूझी तभी जिसे मैने खड़े होकर फोन में नोट कर लिया— “ना तुजे इंग्लिस समझनी आवे, ना मुझे जापानी समझनी आवे, फ़िर भी मोहब्बत हो….. हो तो कैसे हो”। ओसाका की दीवारों पर जापानी में ही सब कुछ लिखा हुआ है जिसमें थोड़ी बहुत ही अंग्रेजी होगी। काला अक्षर भैंस बराबर। कितना मुश्किल है अशिक्षित के लिए जीना बिना अक्षर ज्ञान के। आज चाचा का दर्द और अनपढ़ रहने की टीस और ज्यादा समझ में आ रही थी। क्योंकि मैं भी उसी दौर से यहां अनजान शहर में अनजाने लोगों के बीच से गुजर रही थी। लगा कि बाबा साहेब ने जो पहला मूल मंत्र शिक्षित बनो दिया है, शायद इस कारण से भी बनाया होगा कि बिना भाषा बोली के हम अपनी सांस्कृतिक धरोहर को संजो नहीं पायेंगे। बिना अक्षर ज्ञान के हम अपने पुरखों के योगदान को कैसे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पंहुचायेंगे? मेरे चाचा और मां तो दोनों ही अशिक्षित थे। आज मैं जब रास्ता भटकी और किसी से भी रास्ता नहीं पूछ सकी तो ज्यादा अच्छे से महसूस कर सकी कि अक्षर ज्ञान के बिना व्यक्ति कितना पंगु है। किसी भी समाज को खत्म करना हो तो उससे उसकी भाषा छिन लो तो वह समाज अपने आप खत्म हो जायेगा। ये मैने कहीं पढा था, आज उसे प्रक्टिकल में देखा और समझा था यहां जापान में।

क्रमशः जरी…

डॉ. कौशल पंवार
सामाजिक कार्यकर्ता हैं और मोती लाल नेहरू कॉलेज,
दिल्ली विश्वविद्यालय, में संस्कृत की असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं.

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