औरत को अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी

संगीता सहाय विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित संपर्क:sangitasahay111@gmail.com

सृष्टि की रचना के आरम्भ में समाज के संचालन की जिम्मेदारी स्त्री-पुरूष दोनों को समान रूप से थी। उसे एक साथ मिलकर चलाने और बढाने का अधिकार और कर्तव्य भी दोनों को समान ही था। आज भी आधुनिक कृत्रिम सामाजिक व्यवस्था से दूर रहने वाले हमारे जनजातीय समाज में हमे एक समतामूलक समाज का स्वरूप  देखने को मिलता है। ज्यों-ज्यों वक्त बढ़ा लोगों की जरूरतें भी बढ़ी। बदलते परिवेश ने आर्थिक और सामाजिक स्वरूप को विस्तारित किया। नित नए अन्वेष्ण और लोगों की बदलती सोच ने समाज के बनावट को  बदला। और इसी बढ़ते शक्ति, सत्ता तथा अर्थ के महत्व ने पुरूषों को शेष सारी संज्ञाओं का केंद्र बनाना आरंभ कर दिया। धीरे-धीरे पुरूष, स्त्री के भावनात्मक पक्ष और अपनी मजबूत शारीरिक गठन का लाभ उठाकर उस पर हावी होता गया। सत्ता और सम्पत्ति दोनों पर कब्जा जमाता गया। अपनी झूठी सत्ता और सर्वोच्चता को कायम रखने के लिए नये-नये नियम गढ़ता गया। उसके द्वारा बनाए गए नियम और कानून उसे ज्यादा-से-ज्यादा सशक्त एवं औरत को और कमजोर बनाता गया। शास्त्रों, पुराणों तथा अन्य ग्रंथो आदि में भरे गए क्षद्म ईश्वरीय संदेशो, कथ्यों, मुहावरों के जालो में उलझती, जकड़ती औरत अपनी वास्तविक स्थिति और शक्ति को भूलती गयी। अंततः विभिन्न प्रकार  के आडम्बरों से परिपूर्ण जीवन को ही सत्य मान बैठी। वह मनुष्य से वस्तु बनती गई। जिसका उपयोग पुरूषसत्तात्मक समाज जब, जहां, जैसे चाहा वैसे करने लगा। ठीक यही मकड़जाल तथाकथित रूप से शुद्र कहे जाने वाले वर्गों के लिए भी गुना और बुना गया। एक महत्वपूर्ण बात है कि कोई व्यक्ति तभी तक राजा है जब तक लोग उसकी प्रजा बनने को तैयार हो या फिर कोई तभी तक श्रेष्ठ माना जाता है जब उसकी श्रेष्ठता को मान्यता मिलती रहे। उपरोक्त सारे मकड़जाल इसी झूठी श्रेष्ठता को सिद्ध करवाने और प्रजा बनवाने के लिए रचा गया। औरत हो या समाज के तमाम कमजोर वर्ग सभी उसी कपटपूर्ण चाल के शिकार हुए। आज भी यही हो रहा है और तब तक होता रहेगा जब तक हमारे  समाज के सारे वर्ग वास्तविक ज्ञान और चेतना की बदौलत एक समतामूलक समाज के निर्माण की दिशा में अग्रसर नहीं होते एवं स्वयं आगे बढकर अपने अधिकार और कर्तव्य की पहचान नहीं करते। तमाम अभिवंचितो को अपनी प्रगति की मशाल अपने हाथो में लेनी  होगी।

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यद्धपि आज स्थितियां कुछ बदली हैं। दशकों तक चले और चल रहे महिला आंदोलनों, शिक्षा के प्रसार, पत्र-पत्रिकाओं, टेलीविजन, फिल्मों और विभिन्न  सरकारी प्रयास आदि के माध्यम से स्त्री के अधिकारों, उसे पुरूषों के बराबर तरजीह देने की बात ने समाज में बदलाव के संकेत दिए हैं। औरत धर्म, परम्परा और संस्कार रूपी कछुए के सख्त खोल से सर निकालकर कुछ कहने, सुनने लगी है। परम्पराओ  की सख्त दीवारों में भी दरारें आ रही है। परन्तु गौरतलब है कि सबकुछ चंद बड़े नामों और मुट्टी भर लड़कियों/औरतों तक ही सीमित है। और उनके लिए भी समाज द्वारा बनाए गए स्त्री के लिए वर्जित क्षेत्र के भीतर प्रवेश करना गुनाह ही है। आम स्त्रियों के लिए तो सारे नियम, कानून लगभग वही है।

विवाह स्त्री, पुरूष दोनों के लिए सामाजिक, जैविक जरूरत होने के साथ-साथ संतानोत्पत्ति का भी माध्यम है। यह सामाजिक सरंचना की नींव है। गौरतलब है कि थोथी परम्पराओं ने दोनों के इस समान जरूरत को जहां एक के लिए वरदान बना दिया है वहीं दूसरे के लिए अभिशाप। यदि किसी परिवार में बेटे-बेटी दोनों समान रूप से योग्य हों या फिर लड़की अपने भाई से बेहतर स्थिति में हो, तो भी विवाह के सन्दर्भ में जहां लडके के लिए, लड़की वाले पूरे साजो-सामान के साथ बिछे जाते है, वही लड़की के विवाह के लिए परिवार वालो को सैकड़ो चौखट देखने पड़ते हैं। कही दहेज़ की लम्बी-चौड़ी लिस्ट, कही सौन्दर्य, कही कुछ तो कही कुछ…..! बात रूकती ही जाती है। यदि सौभाग्यवश(?) कही बात बन जाती है और भावी वर लड़की की तुलना में कमत्तर हो, तो भी परिवार वालों, उस लड़की और अन्य सबके मनोभाव ऐसे होते है मानो  उन्हें सारे संसार भर की खुशी मिल गई हो। यदि गलती से लड़की अपना सम्मान करना जानती हो, अपनी नुमाईश और दहेज़ की विरोधी हो, तो विवाह के मंडी में उसका रखवाला/खरीदार मिलना मुश्किल ही होता है। पर यह तो बात हुई उस लड़की की जो कमाऊं है। और जरूरत पड़ने पर अपनी जिंदगी अपने दम पर जी सकती है। वो अधिसंख्य लड़कियाँ जो इसी एहसास के साथ उम्र की सीढियां चढ़ती हैं कि आने वाले वक्त में उनके सपनों का राजकुमार आयेगा और उन्हें उनके ख्वाबो की दुनिया में ले जाएगा, जिसपर सिर्फ उनका अधिकार होगा। जहां उन्हें अपने लड़की होने का दंड नहीं भोगना पडेगा। ये लड़कियाँ जन्म ही लेती है विवाह के लिए। उनकी पढाई, उनका ज्ञान, हँसने, बोलने, चलने और खड़े होने का तरीका  सब कुछ विवाह के उद्देश्य से तय होता है। उन्हें उनके बड़ो से यही सीख  मिलती है कि विवाह ही तुम्हारे जीवन का अंतिम सोपान है। उसकी प्राप्ति और सफलता में ही तुम्हारे जीवन की सफलता है। ऐसे में उनके सपने उस समय लहूलुहान होने लगते है जब वो अपने अनकिये दोष के लिए खुद को और अपने अपनो को परेशान होते देखती और सहती है। वो बिना किसी अपराध के शर्मशार होती है, और स्वंय को मनुष्य न मान लड़की होने का सबब ढूँढ़ने लगती है।

फोटो: पंजाब केशरी

यह सिलसिला लम्बे समय से बदस्तूर जारी है और आने वाले समय में भी जारी रहेगा।  क्योंकि दहेज़ आज संपत्ति उगाही का सुविधाजनक माध्यम बन चुका है । बढ़ते दहेज़ ने वैवाहिक समीकरण को जटिल बना दिया है । इसके कारण बेमेल विवाह, बाल विवाह, दहेज़ हत्या, आत्महत्या जैसी विभत्स घटनाए आम हो गई है । कन्या भ्रूण को गर्भ में ही ख़त्म करने की साजिश में ‘दहेज़ प्रथा’ की भूमिका सबसे बड़ी है । देश की बढ़ती जनसंख्या का भी एक बड़ा कारण यही है, क्योंकि पुत्र प्राप्ति की चाह में दंपत्ति अपने संतानों की संख्या बढाते जाते है । हमारे देश में कुछेक कालो को छोड़ स्त्रियों की स्थिति बहुत बेहतर कभी नहीं रही । परन्तु उसके समूल नाश का प्रश्न जैसा आज उभर कर आ रहा है वैसा कभी नहीं उभरा। देश का घटता लिंगानुपात इसका प्रमाण है।

इन सबका कारण है, सदियों पुरानी वह विकृत सोच जिसमे पुत्र को सत्ता, संपत्ति और शक्ति का द्योतक माना गया। उसके मुखाग्नि देने को ही जीवन की मुक्ति का मार्ग माना गया।  संसार की सारी क्रियायों-प्रक्रियायों की रचना पुरूष वर्ग के हित को केंद्र में रखकर की गई और सारी संज्ञायो को उसका हेतु बना दिया गया। कहा जा सकता है कि पुरूषसत्तात्मक व्यवस्था की विकृतियां ही वर्तमान  समाज की कुरूपताओ और बदहाली का कारण है। औरत की दोयम स्थिति इन आंकड़ो के नजरिये से देखने पर स्पष्टता से नजर आती है.

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आंकड़े बताते हैं कि देश में प्रति हजार पुरूषों पर स्त्रियों का अनुपात 919 है और यह अनुपात 0-6 वर्ष के बच्चो में देखे तो मात्र 916 । करीब 45 फीसदी लड़कियों की शादी 18 वर्ष से कम उम्र में कर दी जाती है। भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा प्रकाशित ‘बच्चे भारत की शक्ति’ नामक पत्रिका में बताया गया है कि देश में प्रतिवर्ष 1 लाख 25 हजार महिलाएं गर्भ धारण के कारण मौत की शिकार हो जाती है। प्रति वर्ष 1 करोड़ 20 लाख लड़कियां जन्म लेती है लेकिन इनमे से 30 फीसदी अपना सोलहवां जन्मदिन नहीं देख पाती। कक्षा एक में प्रवेश लेने वाली प्रत्येक दस में से केवल छह लड़कियां पांचवी तक पहुँच पाती है, जबकि 63.5 फीसदी किशोर लड़कियां स्कूल छोड़ देती है। आंकड़े ये भी बताते है कि महिलाएं पुरूषों से छह घंटे ज्यादा काम करती है, बावजूद उनके काम को महत्वहीन समझा जाता है साथ ही आर्थिक तौर पर वो हमेशा दूसरो की मोहताज रहती है। कामकाजी महिला जनसंख्या में से सत्तर फीसदी अकुशल कार्य में लगी है। पूरी दुनिया में काम के घंटो में स्त्रियों का योगदान साठ फीसदी से ज्यादा है, जबकि संपत्ति में उनकी हिस्सेदारी न बराबर। उपरोक्त आंकड़े देश और पूरी दुनिया की महिलाओं के प्रति असमानता के चंद नमूने भर है। वास्तविक स्थिति इससे कही ज्यादा भयावह और असमानताओं से भरा है।

सदियों से भारत में महिलाओ की यौन-शुचिता को जीवन-मृत्यु का सवाल माना गया है। बावजूद इस देश में प्रत्येक वर्ष लाखों महिलाओं के साथ बलात्कार होता है। जिनमें से अधिकांश मामले पुलिस और कानून की चौखट तक नहीं जा पाते और जो जाते भी है वो उन पेचीदे  गलियोँ में भटकते-भटकते दम तोड़ देते है या तुड़वा दिए जाते है। हाल के वर्षो में मीडिया और आम लोगो की जागरूकता की वजह से बलात्कार एवं अन्य यौन अपराध संबंधी मामले थानों तक पहुंच रहे है, कुछेक मामलों में अपराधियों को सजा भी मिली है। समाज के नजरिये में बदलाव के संकेत भी दिख रहे है; परन्तु अधिकांशतया ये बदलाव कुछ हाई-प्रोफाईल बन चुके मुद्दों और रसूखदार लोगो के लिए ही है।

एक महत्वपूर्ण सवाल यहाँ ये है कि आखिर बलात्कार होता क्यों है? क्यों हजारो-हजार वर्षों से लेकर अब-तक गाहे-बगाहे होने वाले युद्धों, दंगो, आपसी रंजिशो, वर्गीय झगड़ो आदि में किसी कौम, जाति, वर्ग-विशेष या परिवार को सबक सिखाने के तौर पर इसे हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है? क्यों एक बलात्कार का अपराधी सरेआम सीना ताने घूमता है और जिसके साथ अपराध हुआ है वह येन-केन-प्रकारेण गर्दन झुकाने और स्वयं को छुपाने पर मजबूर होती है? और क्यों तमाम सामाजिक व्यवस्थाएं समस्या की जड़ तक जाने के बजाय स्त्री को ही कर्तव्यों और नसीहतो की पोटली थमाने को आतुर दिखती है?

मेरी समझ से इसका वजह है हमारे परिवारों, समाजों का पितृसत्तामक नजरिया। जहां पुत्री को जन्म के साथ ही शर्मो-हया, संस्कारों के सींखचो से जकड़ दिया जाता है। उसके उठने, बैठने, चलने, बोलने, हंसने के तरीको, उसके सोच-विचार, पढाई-लिखाई सहित जीने के तमाम तौर-तरीको पर परम्पराओं की कीलें ठोक दी जाती है और धर्म-अधर्म की पाबंदिया लगा दी जाती है। जबकि  पुत्र को सारे नियमो, धर्म-संस्कारों से परे उसके जन्म से वृद्धावस्था तक की अवस्था को नाना प्रकार से महिमामंडित किया जाता है। एक ओर उसका नंगापन भी दीवारों पर तस्वीर बन कर टंगता है तो दूसरी ओर यह कहा जाता है कि मर्द ‘साठा में पाठा’ होता है या मर्द और शेर कभी बूढा नहीं होता। हमारे सामाजिक बनावट में जहां औरत का औरतपना उसे शर्म का एहसास कराता है, वहीं पुरूष का पुरूषत्व उसे गर्व और जीत का दर्प देता है। मर्द को यह एहसास कराया जाता है कि मर्दानगी सर्वोपरी है और दुनिया की हर शै उसके जरूरतों की पूर्ति के लिए बनी है। वह समाज के बंधनो, नियमो, परम्पराओं से ऊपर है।  ऐसे में वह तमाम इच्छित वस्तुओ की प्राप्ति, चाहे सहजता से हो या बलस्वरूप को अपना अधिकार मानता है। औरत चाहे सात वर्ष की हो या सत्तर वर्ष की वह उसे सिर्फ अपना शिकार मानता है और अपनी तमाम उपभोग की वस्तुओ में से एक।

गौर करने की बात है कि लगभग सारा पुरूष वर्ग कहीं न कहीं, कभी न कभी छेड़खानी या बलात्कार करता है या इसकी कोशिश में रहता है। उसकी भूमिका तब बदलती है जब वह पिता, भाई या पति के रूप में रक्षक बनकर सामने आता है। बलात्कार रोकने की बात भी सामाजिक बदलाव के रूप में नहीं होता बल्कि उसे पुरूषबल या मर्दाना-प्रोटोकॉल से ही रोकने की बात होती है। हमारे सामाजिक व्यवस्था की जड़ में यह सोच व्याप्त है कि औरत के लक्ष्मण-रेखा का निर्धारक पुरूष होता है। ‘रेखा लांघी नहीं कि कोई रावण उठा ले जाएगा। फिर जीती रहना सारी उम्र निर्वासित जीवन, या फिर समा जाना धरती की गोद में’।

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हमारी सामाजिक सुचिता का वास बहन-बेटी की योनि में ही माना जाता है। और पुरूष-बाहुबल उसपर पहरा, उसके बचाव को अपना दायित्व समझता है। बात वैवाहिक परम्पराओं के अंतर्गत स्त्री को  एक हाथ से दूसरे हाथ को सौंपे जाने की हो, नथ उताड़ने की हो या भाई-बहन के तीज-त्योहारों की, सबों के मध्य में औरत की योनि के बचाव को ही केंद्र में रखा गया है। औरत की जान भले ही चली जाए परन्तु उसकी कथित ‘इज्जत’ बची रहनी चाहिए।

गौरतलब ये भी है बलात्कार के सन्दर्भ में भी शोर तब उठता जब बात पुरूष के अपने घर, समाज की बहन-बेटी की होती है। कमजोर, दलित, आदिम और गरीबी की जाल में फंसी औरतों, वेश्यालायों में दो वक्त की रोटी के लिए नारकीय  जीवन जीती महिलाओं के साथ होने वाले बलात्कारो पर हमारा समाज पूरी तरह चुप्पी साधे है। क्योंकि यह तो सबों के लिए उस बहते नाले के समान है जिसमें  जो जब चाहे दूसरे की नजर बचाकर उतर जाता है और डुबकी लगाने के बाद किनारे आकर कान पर जनेऊ चढ़ा लेता है। वास्तव में हमारे यहाँ बलात्कार कोई मुद्धा नहीं है बल्कि मुद्दा है औरत के शरीर पर पुरूष का हक़ और पहरा का। औरत अपने शरीर को अपनी इच्छा से किसी को नहीं दे सकती। पुरूष की इच्छा और अनिच्छा ही सर्वोपरी है। उसके इच्छा का सम्मान करने पर उत्सव मनता है और नकारे जाने पर निर्वासन का दंड। पुरूषों के भीतर यह भय है कि यदि औरत अपनी मर्जी चलाने लगेगी तो उसकी सत्ता और शक्ति को नकारते हुए सशक्त हो जायेगी। और अपनी मुक्ति और विकास की राहे स्वयं तलाशने लगेगी।

बलात्कार की जड़े हमारे सामाजिक सोच और उसकी बनावट में है। और इससे निवृति का रास्ता उसके आमूल-चूल परिवर्तन में, समतामूलक सामाजिक व्यवस्था के निर्माण में और औरत के सम्पूर्ण विकास में निहित है। जिसमें सभी को समानतापूर्वक  अपने इच्छित को चुनने और अनिच्छित को पूरे अधिकार के साथ ना कहने की आजादी हो।

मीडिया के बारे में कहा जाता है कि इसने औरत की स्वतंत्रता और समानता की दिशा में अहम भूमिका निभाई है । इससे बहुत हद तक सहमत हुआ जा सकता है । परन्तु गौर करे तो हम पायेंगे की ज्यादातर बिन्दुओं पर मीडिया ने औरत को यही एहसास कराया है कि तुम सिर्फ भोग्या हो, तुम्हारे उड़ान की  सीमाएं तुम्हारे आकाओं की हदों तक ही है। दृश्य मीडिया ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मल्लिका सहरावत, राखी सावंत, विपाशा वशु, सन्नी लियोनी सहित अन्य तमाम नामचीन सिने तारिकाओं के माध्यम से उनके चाहे-अनचाहे कला और आधुनिकता के नाम पर जो कुछ परोसा जाता है वह औरत के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगाता है। सरकती पैंटों और बित्ते भर की ब्रा में लिपटी इन मेनकाओं पर सहस्रों इन्द्रों को प्रसन्न करने का बोझ रहता है। इसके लिए ये किसी भी सीमा तक जा सकती है। ध्यातव्य है उस सीमा का निर्धारक भी पुरूष ही होता है।

फोटो: अर्जुन वैष्णव के ट्विटर से

विभिन्न टी.वी. चैनलों पर दिखाए जाने वाले अधिकांश सिरियलों में औरत को जिस रूप में दिखाया जाता है वह वास्तविकता से कोसों दूर होता है। माडर्न कपड़ो और गहरे मेकअप से लिपी-पुती वो जिस किस्म के घृणित कारनामे करती है, उसकी एक सामान्य औरत कल्पना भी नहीं कर सकती।  इन सिरियलो का टी.आर.पी. रेटिंग इन्ही वैम्प पात्रो की बदौलत बढ़ता है। नायिकाओं का जीवन पति और ससुराल से शुरू होकर उन्ही पर खत्म हो जाता है। सीता, सावित्री, अहिल्या जैसी पौराणिक स्त्री पात्रों को केंद्र में रखकर बूने गए इन चरित्रों के रोते-बिसूरते जीवन में सुख की छाया बमुश्किल आती है। और आम जनभावना इन्हीं चरित्रों को आदर्श भारतीय स्त्री के प्रतीक के रूप में देखता है। सोचने की आवश्यकता है कि इन औरतों के लिए आधुनिकता और विकास के मायने क्या है? जिसने अपने शरीर के भाव-भंगिमाओं तक को बिकाऊ बना डाला, पुरूषों के स्त्री देह दर्शन की लिप्सा को तुष्ट करने के लिए खुद को सरेआम नंगा कर डाला, क्या वो आधुनिकता और समानता का अर्थ तक जानती है? कहा जा सकता है कि अपने दिल दिमाग को परे हटा उसने सिर्फ वही किया जैसा पुरूष वर्ग ने चाहा। तमाम आधुनिकता का दावा करने के बावजूद वह कठपुतली ही बनी रही।

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उपरोक्त वर्णित तथ्यों के जाल में उलझकर औरतों की अधिकांश आबादी अब तक विकास के अंतिम पायदान पर ही ठिठकी है। साथ ही गौरतलब ये भी है कि आधी आबादी के लिए बूना गया यह मकड़जाल पूरे समाज के विकास को अवरूद्ध कर रहा है। अपने आधे हिस्से को आगे बढ़ाकर हमारा समाज एक लंगड़े वर्तमान और भविष्य का ही निर्माण कर रहा है। जरूरत है कि हर वर्ग इस पर गहराई से विचार करे और निदान के लिए पहल करे। परन्तु इसके लिए सर्वप्रथम स्त्रियों को मजबूती से आगे आना होगा। उन्हें मीमांसा करनी होगी कि किस प्रकार उन्हें गुलाम बनाने के लिए परम्पराएं गढ़ी गई, ग्रन्थ लिखे गए, मनगढ़ंत तथ्यों को बनावटी सच का जामा पहनाकर औरत के दिल, दिमाग, शरीर हर चीज को पुरूषों के लिए घोषित कर दिया गया। यह सब क्यों और कैसे हुआ इस पर गहराई से विचार करने की जरूरत है। इसके लिए दिल पर दिमाग को तरजीह देते हुए उन तमाम झूठी मान्यताओं को तिलांजली देनी होगी जिन्होंने औरत से उनके इंसान होने के हक़ को छीनकर उन्हें शक्तिहीन, दोयम और भोग्या बनाया। स्त्री को पवित्रता-अपवित्रता, यौन-शुचिता, सम्मान-असम्मान, शर्मो-हया की हदों से बाहर निकलना होगा। औरत घर और बाहर दोनों को बखूबी संवार सकती है, शक्ति और सत्ता हासिल कर उसका सही उपयोग कर सकती है, यह सत्य हर काल में सिद्ध होता रहा है। बावजूद इसके उसे कमजोर और कमअक्ल शाबित करने की साजिशें भी हर युग में रची जाती रही है। इसी साजिश को समझने और मिटाने की जरूरत है।

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स्त्री के हक़ और अधिकार की बातें कानून की किताबो से निकलकर पूरे दुनिया में पसरे इसके लिए समाज और व्यवस्था को सार्थक प्रयास करना होगा। बलात्कार या अन्य किसी अपराधिक कृत्य के बाद औरत को अनावश्यक शर्म और जिल्लत की छाया से निकलकर पूरे दम ख़म के साथ अपराधी को सजा दिलाने की पहल करनी होगी। ‘सर्वप्रथम जिन्दगी की अहमियत है, उसके बाद ही कुछ और’- इस तथ्य को औरत को सिरे से ग्रहण करना होगा। अपनी चाहतो के लिए उसे भी उपभोक्ता बनना होगा। सन्दर्भ संपत्ति का हो, सम्मान का हो, न्याय का हो या अन्य का… उसे अपने सम्मान, अधिकार और हितो के लिए पहल करना सीखना होगा। उसे अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी। स्वयं को पुरूष के खोल में समाकर  इतराने के  बजाय अपने ‘औरतपने’ पर नाज करना होगा।

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