हवा व अन्य कविताएँ (डॉ. मिथिलेश)

डॉ. मिथिलेश ( पूर्व शोधार्थी जे.एन.यू)

हवा

हवा में, खून की सड़ांध…

हर कहीं, से आती एक चीख़

मुझे, जीने नहीं देती ।

निर्भया, आसिफा  और अनगिनत

शक्लें…

पूँछती हैं…

क्या यही – वह, सभ्य समाज है ?

जिस पर तुम्हें, नाज़ है !

क्या यही भारतीय संस्कृति है ?

जिस पर तुम्हें नाज़ है !

तो अफ़सोस है…!!!

जहाँ ढाई महीने की बच्ची के

यौनांगो से होता है – छेड़छाड़

अनगिनत बच्चियाँ झेलती हैं नरक

दिन दहाड़े

किलकारियाँ बदल जाती हैं

ख़ौफ़नाक शक्लों में

क्यों है तुम्हें नाज़ ?

जहाँ अपराधी इतराते हैं

सत्ता करती है ज़ुमलो की बौछार

हर क्षण होती हैं साज़िशें

… अँधेरा बुनने की।  

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समय

(1)

हर एक जान पर

हर एक चींख पर

सुखद, लेकिन झूठे शब्दों…

तंत्रों… का पहरा है।

जहाँ मंदिर बनाने की बहस

साल दर साल होती है

लेकिन, साँस ले सकें  खुलकर

जी सकें , कह सकें, सच

ऐसी बहस की इज़ाजत

ज़मीं से ग़ायब है।

ये सन्नाटा…

हर रोज़ का

चीत्कार भी नहीं तोड़ पाता

क्योंकि…

भगवान और सत्ता

अब एक ही शब्द हैं ।

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(2)

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ

नारे की सच्चाई

रोज़ पर्त – दर – पर्त

खुलती जाती है ।

ले-कि-न

घटनाएँ न रूकती हैं

न बदलती हैं …!!

औरतों – बच्चियों

की ज़िन्दगी में रोज़

एक दोज़ख़

की बढ़त ज़ारी है ।

मौन ही सता का नारा है

और तुम्हारा भी ?

बहनों ! हम

उन बेज़ान, चीज़ों के बीच हैं

जो हमें, ज़िन्दा दिखाई देती हैं।

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(3)

हम चाहते हैं हिटलर !

कि अब हमें

कंसंट्रेशन कैंप में मार दिया जाए

रोज़ रोज़ मरने की पीड़ा

और संघर्घ का पतन

अब सहन नहीं होता !

जितनी लड़ाई, लड़कर आगे बढ़े थे

उससे ज़्यादा, पीछे हो गए

कुचक्री नीतियों में ।

नारे बंद करो…

कि अब हर शब्द

Photo: Dailyhunt

सिर्फ़ झूठ हैं !

न बेटियाँ पढ़ेंगी, न जियेंगी ?

क्योंकि…

तुम कहते कुछ , करते कुछ हो

जो खौफ़ का साया

चस्पा कर दिया गया है

ज़ेहन में

उससे मुक्ति ही एक रास्ता है ।

बहुत कर लिया भरोसा

तुम्हारे वादों और नारों पर

हम जानते हैं, तुम उधर हो

जिधर अपराध है…

जिधर हत्यारे और बलात्कारी हैं ।

तुम्हें करना होगा ये काम तुरन्त

वरना …

एक भी औरत, बची रह गई

तो मनुष्य जाति के

जीवित होने की सम्भावना

बची रहेगी ।

हमने आज तक एक एक

पल की मौत झेली है

हज़ारों कानूनों के बावज़ूद

जब बलात्कारियों का

सीना चौड़ा होता है

तब खून खौलता है हमारा।

हमें अब ये मौत मंज़ूर नहीं

हम मरना चाहती हैं एक साथ

ताकि, तुम सबको मार सकें।

क्योंकि, रास्ता यही एक है

मेरी ज़ुबान ख़तरनाक, होने से तुम्हें दिक्कत हुई ?

और हमारे ख़तरे पे, उफ़ भी नहीं !!

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(4)

एक मृत समाज को

ज़िन्दा रखने का, ढोंग

लगातार जारी है

व्यस्तता हर रोज़

बढ़ती जाती है

लेकिन

ज़िन्दगी फिर भी

नज़र नहीं आती है ।

जहाँ नफ़रत ही कर्म है

हत्या ही धर्म है

जहाँ मसीहा ही ढोंगी है

और क़ैद में तुम सब हो ।

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(5)

हर पल पिछली ख़बर पड़ जाती है

पुरानी…

लेकिन, वक़्त ठहर – सा गया है

और ये भयावह, तस्वीरें ज़ेहन में

पर्त-दर-पर्त जमा हुई जाती हैं।

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