वीमेंस और जेंडर स्टडीज का सभी स्तरों पर हो पठन-पाठन, सावित्रीबाई फुले पीठ जरूरी: आशा शुक्ला

पिछ्ले दिनों स्त्रीकाल ने सामाजिक न्याय व अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास आठवले के साथ मानव संसाधन विकास मंत्री से सावित्रीबाई फुले पीठ की स्थापना की मांग की. डॉक्टर बीआर अंबेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय महू इंदौर की नई कुलपति आशा शुक्ला अपने यहाँ एक पहल ले रही हैं. उनसे स्त्रीकाल के लिए बातचीत की गयी. वे देश भर में जेंडर और वीमेंस स्टडीज पाठ्यक्रमों को पढाये जाने की बात कर रही हैं.

आपके विश्वविद्यालय में सावित्रीबाई फुले पीठ की स्थापना होने जा रही है?

जब मैं यहाँ आई तो जेंडर स्टडीज डिपार्टमेंट ही नहीं था. मैंने अभी खोला है. इसीके अधीन सावित्रीबाई फुले पीठ 3 जनवरी को विधिवत आकार ले और फिर उनके विचार, उनके काम आगे बढ़े, यह संकल्पना है. यहाँ महिला अध्ययन के लिए कुसुम त्रिपाठी सहयोग कर रही हैं, मनोज हैं, अस्मिता हैं. ये लोग मिलकर इस संकल्पना पर काम करेंगे.

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यह कोई अलग स्कूल की संकल्पना है या डिपार्टमेंट के भीतर ही है कोई व्यवस्था होगी?

डिपार्टमेंट के भीतर ही व्यवस्था होगी, उसी जेंडर स्टडीज डिपार्टमेंट के अंतर्गत ही सावित्रीबाई फुले पीठ की स्थापना की जायेगी.

अभी क्या आपके यहाँ स्त्री अध्ययन , और जेंडर स्टडीज दो विषय पढ़ाये जा रहे हैं अलग-अलग?

अंततोगत्वा जेंडर स्टडीज ही रखा जाएगा. वीमेनस स्टडीज कह देने मात्र से ऐसा भाव देता है कि अकेले कुछ महिलाओं का मामला है. जेंडर स्टडीज में सब समाहित है, एक व्यापक दृष्टि रखो, ज्यादा बेहतर है.

आपको नहीं लगता है कि अब तक भारत में जेंडर स्टडीज थोड़ी और देर की प्रक्रिया है वीमेनस स्टडीज के बाद. लेकिन वीमेनस स्टडीज या वीमेन मूवमेंट में सावित्रीबाई फुले या डॉ. अम्बेडकर आदि के स्त्रीवादी योगदान को लगभग इग्नोर किया गया या नोटिस नहीं ली गयी?

प्रोफेसर आशा शुक्ला, कुलपति , डॉक्टर बीआर अंबेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय महू इंदौर

दिक्कत इस बात की है, जैसा मैं समझती हूँ कि वीमेन स्टडीज का अभी वह स्वरूप ही नहीं बन पाया है. इसमें बहुत सारी स्थाई नियुक्तियां नहीं होने के कारण यह व्यवस्थित नहीं हो पाया. अगर स्थाई प्रोफेसर होता उसी विषय का, तो अपने विषय के साथ वह विभाग को विकसित कर सकता है. और एक दूसरा प्रसंग सामाजिक चेतना का भी है.

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इसके पीछे कारण क्या लगता है अकादमिक जगत में महिलाओं को लेकर द्वेष भाव या इसे न समझ पाना?

निश्चित तौर पर मैं इस मामले में सरकारों की सराहना करुँगी पितृसत्तात्मक समाज की व्यवस्था होने के बावजूद ये महसूस किया गया कि महिला मुद्दों पर उतना काम नहीं हो पाया जितना होने की जरुरत है, तो इन विभागों की स्थापना हुई. इस उद्देश्य से कि आप महिला मुद्दों पर, वीमेन इम्पावरमेंट, जेंडर सेंसिटाइजेशन और बहुत सारे मुद्दों पर स्थाई तौर पर काम करें. ये तो साफ दृष्टि है.  इसके बावजूद इनका उस तरह से डेवलपमेंट नहीं देख पा रही हूँ, क्योंकि अगर स्थाई नियुक्तियां हो जाती तो उसका डेवलपमेंट उस तरीके से होता. जब मैं बरकतउल्ला विवि में थी और हमलोगों की स्थाई नियुक्तियां थी तो अच्छा-बुरा जो भी दौर हुआ हमलोगों ने संघर्ष किया और आज वह मध्यप्रदेश का स्थाई विभाग है, हमलोग रहें या ना रहें ये आजीवन रहेगा.

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आपके अपने विषय का बैकग्राउंड क्या रहा है?

मैंने तीन विषयों पर काम निरंतर किया, एक एजुकेशन है, एक सोशल इशू है और एक है वीमेन इशू है. जब मैं इन तीनों विषयों पर काम कर रही थी, तभी पता नहीं था कि वीमेन स्टडीज डिपार्टमेंट हमारे देश में आ रहा है और उसमें इन तीनों की जरुरत हो जाएगी. यह हमें बहुत  मदद दे गया, लेकिन काम तो हम निरंतर इन तीनों विषयों में कर रहे थे.

वीमेनस स्टडीज आने के बाद आप इसके साथ जुड़ गयीं?

सौ प्रतिशत उसी में समर्पित हो गयी; और समर्पित होने का कारण केवल नियुक्ति नहीं थी. मुझे लगा कि ये वो विषय है जो किसी महिला की बात तो छोड़िये, पूरे समाज को, पूरे देश को सशक्त कर सकता है. निरंतर जेंडर सेंसिटाइजेशन की बात हो रही है लेकिन अब तो रेप से ज्यादा गैंगरेप की स्थितियां हम देख रहे हैं. लेकिन क्या कारण ही  पिछले दिनों सिर्फ निर्भया कांड में एक जन आन्दोलन हुआ. ऐसी घटनाएँ तो पूरे देश में हो रही हैं. अगर हमारी सोच बहुत मजबूत होगी तो हम उतना ही मजबूती से खड़े होंगे. मुझे निजी तौर पर महसूस होता है कि एक तो घटना घटित हो जाए उसके बाद का  काम है ये, लेकिन इन विभागों का काम है कि इस तरह की घटनाएँ कम की जा सकें और हम समाज की सोच बदल सकें.

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इस मसले में जितनी सजा के प्रावधान की जरुरत है उतनी ही जरुरत है कि रिसर्चेज हों और उन प्रवृतियों पर बात हो

निश्चित तौर पर सजा दंड-व्यवस्था है, उसको लोग कहते जरुर न्याय-व्यवस्था हैं, लेकिन वह तो दंड है. आदमी को दंड मिलता लेकिन जिस किसी लड़की के साथ ऐसा कोई कुकृत्य हुआ हो और समाज की सोच नहीं बदलती है तब तक वह लड़की दोहरा शिकार होती है, उसको न्याय कहाँ मिला? तो हमलोग जो काम करें, वह यह कि समाज की सोच का परिवर्तन का काम करें. सामाजिक परिवर्तन और दिमाग की सोच का परिवर्तन उतना आसन मुद्दा नहीं है. ये निरंतर महसूस होता है कि जेंडर का कोर्स स्कूल से लेकर यूनिवर्सिटी तक, एक तरीके से फाउंडेशन विषय या फाउंडेशन कोर्स के तौर पर इंट्रोड्यूस किया जाय.

वीमेनस स्टडीज या जेंडर स्टडीज को लेकर आप तुरत क्या देखती हैं? यूजीसी या सरकार को क्या करना चाहिए?

वीमेनस स्टडीज को ले कर यूजीसी से, केंद्र और राज्य सरकार से एक स्पष्ट अपेक्षा है कि जो पुराने हमारे विभाग हैं, जो अभी तक चलते आये हैं, उनको स्थाई तौर पर फैकल्टी दे दें तो वह मुख्य काम करेंगे. दूसरा जेंडर के विषय को हर विषय के साथ इंट्रोड्यूस किया जाना चाहिए और उच्च शिक्षा में तो निश्चित तौर पर. लेकिन स्कूल एजुकेशन से भी थोड़ी-थोड़ी बुनियाद पड़ेगी दिमाग में तो विचार का विस्तार होगा. ये उसी से संभव है, इसकी रिसर्च को प्राथमिकता दी जाये, ये महिला मुद्दा नहीं है, ये समाज का मुद्दा है, परिवार का मुद्दा है और देश का मुद्दा है.  हमारी बात कुलाधिपति और समस्त कुलपतियों के साथ मीटिंग में हुई है और मुझे यकीन है की समस्त विषयों के साथ जेंडर स्टडीज को जोड़ा जायेगा. महामहिम बेहद संवेदनशील हैं इन विषयों को लेकर. उन्होंने राज्य के सभी विश्वविद्यालय के लिए इस विषय का  फाउन्डेशन कोर्स तैयार करने को कहा है. यह उनकी सकारात्मक सोच और उनके प्रोत्साहन के कारण ही संभव हो पा रहा है.

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ये आपकी पहल अच्छी बात है, लेकिन जहाँ विभाग है, वहां यह सेल्फ फायनांस का कोर्स है, इससे तो यह विभाग और विषय मर जायेगा.

सेल्फ फायनांस से यह ख़त्म हो जायेगा. जब विभाग खुले हैं तो उन्हें बनाये रखना, उनका विकास राष्ट्र की जिम्मेदारी है.

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