इंकिलाबी तेवर की शौकत

नाइश हसन सामाजिक कार्यकर्ता,विभिन्न देशों में सेमिनारों में पेपर प्रस्तुति. ‘ एक किताब , स्वतंत्रता आंदोलन का एक विस्मृत सेनानी’ प्रकाशित. संपर्क :naish_hasan@yahoo.com

राह का खार ही क्या गुल भी कुचलना है तुझे

बन के तूफान छलकना है उबलना है तुझे

रूत बदल डाल अगर फूलना-फलना है तुझे

उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे।

19 बरस की हैदराबादी लड़की मुशायरे में जब एक नौजवान लड़के को ये ग़ज़ल पढते सुनती है तो उसे लगता है मानो ये सदा उसके लिए है, उसे कोई पुकार रहा है वो लड़का आगे उसी इंकिलाबी तेवर में पढता है

अपनी तारीख का उनवान बदलना है तुझे

उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे।

मुशायरा खत्म होते-होते शौकत अपना दिल उस नौजवान को दे बैठीं। कैफी से खत-ओ-किताबत का सिलसिला चला, खून से खत लिखे गए, मोहब्बत परवान चढती चली गई। दिन रात कैफी के खयालों में कटने लगे। इस सफर में एक दौर वो भी आया जब कैफी के ख़त सरदियों की धूप के मानिन्द आना कम हो गए, शौकत एक अजीब कैफियत से गुजरने लगी। एक रात एक सदी के बराबर लगने लगी, इस्तेराब का आलम बढता गया, तमाम जद्दोजेहद के बाद एक रोज़ शौकत अपने अब्बा के साथ हैदराबाद से बम्बई पहुँच गई। वो वक्त इस मायने में खास था, एक तरफ बरतानिया हुकूमत से आज़ादी की जंग आख़री पड़ाव पर थी, दूसरी तरफ एक नौजवान लड़की आज़ादी की जंग लड़ रही थी, अपनी पसंद के लड़के से ब्याह करने की आजादी के वास्ते। उसकी राह भी कोई कम दुश्वार नहीं थी। उसी आज़ादी के लिए जिसके लिए आज भी लड़कियॉं छटपटाती है और खानदान, समाज उसके पैरों में बेड़ियाँ डाल देने की हर मुमकिन कोशिश करता है। इंकिलाबी तेवर की शौकत की विरासत के आज कद्रदान बहुत है, जो दूसरी जंगे आज़ादी यानी औरत की मोकम्मल आज़ादी के लिए जद्दोजेहद कर रहे है।

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बम्बई में उनका निकाह कैफी आज़मी से कराने में सज्जाद ज़हीर का बडा़ अहम रोल था। कैफ़ी कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के होलटाइमर थे, कम्यून में रह रहे थे। जहाँ कई परिवारों के लिए एक ही शौचालय होता था, तंगदस्ती में गुजारा करना पड़ता था। शौकत भी उसी में रहने लगी। वह एक रईस खानदान में पली बढी उन्हें इस किस्म की जिन्दगी का कोई तजरबा नहीं था। एक रोज़ पी.सी. जोशी जो उसी कम्यून में रहते थे ने उनसे कहा तुम सही मायने में कैफ़ी की शरीक-ए-हयात बनो, तुम जो कुछ भी कर सकती हो करो। पी.सी. जोशी की बात शौकत पर खासा असर डालती थी। इसका जिक्र उन्होने कई बार अपनी किताब यादों के रहगुज़र में भी किया है। उन्होने सोचना शुरू किया कि मैं आखिर करूँ तो क्या करूँ। एक रोज़ काम की तलाश में आकाशवाणी चली गई। आना-जाना लगा रहा , बात चलती रही और बात धीरे-धीरे बनने लगी। विविध भारती की शुरूआत हो रही थी, ये भी इत्तेफाक था कि विविध भारती की शुरूआत उन्ही की आवाज में हुई। शौकत ने घर गृहस्थी चलाने के लिए उस वक्त पृथ्वी थिएटर में भी काम  किया, उन्होंने पहला नाटक भीष्म साहनी के निर्देशन में किया जिसका नाम था धनवा। उन्होंने परी, तनहाई, अफ्रीका हैरान-परेशान जैसे दर्जनो नाटकों में बहुत अहम किरदार निभाया। परी के तो पूरे महाराष्ट्र में 61 शो हुए और उन्हें बेस्ट एक्टर के खिताब से भी नवाज़ा गया। आप ने फिल्मों का भी रूख किया, जैसे गर्म हवा, उमरावजान, धूप छांव, फासला, जुर्म और सज़ा, वो मैं नहीं, हीर रांझा, हकीकत, बाज़ार, लोरी, सलाम बॉम्बे, साथिया आदि फिल्मों में बहुत मक्बू़ल किरदार निभाए। उमरावजान के उनके किरदार को तो लोग आज भी भुला नही पाए है।

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उनके तीन बच्चे हुए। अहमद रिजवी उर्फ बाबा आज़मी, शबाना आज़मी और सबसे बड़े बेटे का बचपन में ही तंगदस्ती में ठीक से इलाज न करा पाने की वजह से इंतेकाल हो गया था।

शौक़त और कैफी दोनो ही अंग्रेजी से दूर थे, लेहाजा बचपन में बच्चों को अंग्रेजी स्कूल में दाखि़ला कराने में उन्हें दूसरों की मदद लेनी पड़ी। शौकत ने तंगहाली में भी अपने बच्चों को बहुत बेहतरीन तालीम व तरबियत से नवाज़ा। जिसका असर उनके दोनो बच्चों पर दिखाई पड़ता है। उस वक्त कैफ़ी साहब को रोज़ एक ग़ज़ल लिखने का पांच रूपया मिलता था, वो सुहब उठ कर ये काम बड़ी शिद्दत से अन्जाम देते क्योंकि दिन में पार्टी के काम से उन्हें फुरसत न मिलती और बच्चों की पढाई के लिए पैसे जमा करने का कोई और ज़रिया उनके पास न था।

थियेटर की दुनिया में सभी उन्हें शौकत आपा के नाम से पुकारते थे। वो इप्टा में 1947 से ही जुड़ी रही। इसी का असर रहा कि वो ग़रीबों, मज़़लूमों और हाशिए की दुनिया के लोगों के बहुत करीब आ गई उनके दर्द में शामिल रहने लगी। उनके सवाल को समझने लगीं। वो एक नेहायत ज़िन्दादिल शख़्सियत थी। 1985 में जब दोबारा इप्टा का पुर्नगठन हुआ तो कैफी साहब ही उसके सद्र बनाए गए। इप्टा के हर सम्मेलन में वो ज़रूर शरीक होती थी। 1992 के पहले का वक्त जब अयोध्या में साम्प्रदायिक तनाव ज्यादा उभर रहा था, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया ने लखनऊ से अयोध्या तक एक मार्च निकाला, मार्च ऐसे-ऐसे पड़ावों पर रूकता जहॉं ठहरने का कोई खास इंतेज़ाम न होता, लेकिन शौकत आपा मार्च में पूरी गर्मजोशी से शामिल रहतीं।

बेगम अख्तर के गानों को वो बहुत पसन्द करती थी, उनके दिन की शुरूआत बेगम के गानों से ही होती । यह महज़ इत्तेफाक़ ही है कि बेगम अख्तर और शौकत आज़मी की शक्ल-सूरत भी बहुत यकसां थी।

वो हमेशा अपने काम अपने हाथ से ही किया करती थी, अच्छी खासी उम्र हो जाने के बाद भी वो ऐसा ही करती, यहाँ तक कि अपने कपड़े भी अपने हाथ से ही सिया करती थी।

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1978 में जब वो कैफी के साथ अपने गाँव मिजवां ( आज़मगढ ) लौटी, लोगों का तसव्वर था कि वो मुम्बई में आरामपसन्द जिन्दगी गुजारने वाली यहाँ कैसे रह पाएंगी। जहाँ उस वक्त न बिजली थी, न सड़क, न पानी का कोई इंतेज़ाम । उन्होने बहुत सादा अन्दाज में मिजवां में लम्बे वक्त तक क़याम किया। यहाँ भी वो गाँव के बच्चों और औरतों को खास सलीक़ा सिखाने , उन्हें तालीम देने, व गाँव की सफाई के काम में लग गई। वो गाँव की औरतों को मुख़्तलिफ़ किस्म के हुनर सिखाती, उन्हें दुनिया की तमाम चीजों से रूबरू कराती। उनकी हौसला अफ़ज़ाई करती। अपनी अम्मी से सीखे इस किरदार को शबाना आज़मी ने भी बखूबी निभाया और मिजवां को मिजवां बनाने में अपनी अहम भूमिका निभाई।

शौकत, कैफी साहब की अमली तौर पर भी शरीके हयात बनी । कैफी साहब के बागी ख़यालात, तरक़्क़ी पसन्दी के नज़रिए को खुद की शख़्सियत में ढाल लिया। देश में नई संस्कृति की ज़मीन तैयार करने वालों में जिसमें आवाम का दर्द शामिल था उसके लिए वो शाना-ब-शाना खड़ी रही। क़दम-दर-क़दम साथ चल के दिखाया। जिन्दगी के हर शोबे में उनका साथ दिया। ऐसी शख़्सियत मरती नही वो दिलों में जिन्दा रहती है। हालाकि तरक़्क़ी पसन्दों में उनका नाम शुमार नहीं किया गया जबकि उनकी पूरी ज़िन्दगी तरक़्क़ी पसन्दगी का इस्तियारा (प्रतीक) थी।  उनकी याद में जगह-जगह ताज़ियाती जल्सा मुनक्क़िद किया जा रहा है, एक सच्चे समाजी कारकुन की हैसियत से, इसके अलावा थिएटर और फिल्मों में उन्होने अपनी जो खि़दमात दी उन्हें हमेशा याद किया जाएगा। उन्हें हम खिराजे अक़ीदत पेश करते है।

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