यात्रा साहित्य का स्त्री पक्ष

प्रीति कुमारी                                                                                      

प्रस्तुत आलेख में यह देखने की कोशिश की गई है कि हिन्दुस्तान में स्त्रियों के लिए यात्रा क्यों कठिन है? हिन्दुस्तान में सामान्यतया भी यात्रा के प्रति घोर उदासीनता नज़र आती है, किन्तु स्त्रियों के लिए विशेषकर अकेली स्त्रियों के लिए यहाँ यात्रा असंभव की सीमा तक कठिन है| आलेख इस बात की पड़ताल करता है की किस तरह पितृसत्तात्मक संरचना में स्त्रियों के लिए यात्रा करना मुश्किल है|  

“कैसे निकल जाऊं घर से यों ही| घर वाले जाने देंगे? अकेले कैसे जाऊं? कितना सेफ है यों अनजान जगहों पर जाना? कितने पैसे लगेंगे? बिना पैसों के कैसे दुनिया घुमूंगी? कुछ हो गया तो? हथियार ले कर जाऊं? टिकट-विकेट की बुकिंग कैसे होगी? कहाँ रहूँगी? क्या खाउँगी? अकेले बोर तो नहीं हो जाऊँगी?”[i]

यह चिंता है एक बीस वर्षीय भारतीय (हरियाणा, रोहतक) लड़की की| यात्रा की आकांक्षी अनुराधा की| इसने अल्प वय में कई देशों की यात्रा कर ली है, वो भी अकेले| अनुराधा की  चिंताएँ ही मूल रूप से यात्रा के प्रति विशेषकर स्त्रियों की यात्रा के प्रति उदासीनता के प्रमुख कारण हैं| इसके यात्रा संस्मरण ‘आज़ादी मेरा ब्रांड’ अत्यधिक बिकने वाली किताबों में है| इस किताब ने लेखिका ने इस बात को रेखांकित किया है कि हमारे यहाँ जिस तरह एक  ‘अच्छी’ लड़की बनायी जाती है और उसे ‘बुरी’ लड़की से दूर रहने का उपदेश दिया जता रहा है, ऐसे परिवेश में एक स्त्री एक बिंदास यात्री बन ही नहीं सकती|

सुप्रसिद्ध यात्री और यात्रा साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान राहुल सांकृत्यायन स्त्रियों के लिए यात्रा के भारतीय परिवेश को लेकर चिंता व्यक्त करते हुए लिखते हैं, ‘जहाँ तक घुमक्कड़ी करने का सवाल है, स्त्री का उतना ही  अधिकार है जितना पुरुष का। स्त्री  क्यों अपने को इतना हीन समझे। उनके लिए यात्रा करना तो दूर घर की चारदिवारी से बाहर निकलना भी मुनासिब नहीं रहा। घर के अन्दर ही वो कई तरह के पर्दों, घेरो या आवरणों में कैद हो कर रह गई। अब वो साहित्य रचती नहीं बल्कि साहित्य के उपादान की वस्तु बन गयी, जिसको पढ़-सुनकर रसिक पुरुष समाज अपने अहम् और दमित कुत्सित भावों को तुष्ट करने लगा।’ जिस देश की आम स्त्रियों का सर्वाधिक पुनीत कर्तव्य पतियों और बेटों को नियमित तीन शाम भोजन तैयार करना ही एक मात्र लक्ष्य हो, और इसमें थोड़ी भी कोताही नाकाबिले बर्दाश्त हो, ऐसी स्त्रियों के लिए यात्रा करना असंभव है| क्योंकि अगर वह यात्रा पर जाएँगी तो घर के पुरुषों का भोजन कौन बनेगा| आम भारतीयों की पूरी दिनचर्या भोजन के इर्द-गिर्द घूमती है और आम औरतें सुबह से शाम तक भोजन विन्यास में लगी रहतीं हैं| उन्हें अपनी पूरी जिन्दगी में केवल दो या तीन बार तीर्थयात्रा की अनुमति मिल पाती है| इसलिए भारतीय आम स्त्री और पुरुष यात्रा के नाम पर तीर्थयात्राएँ करते हैं| यह आकस्मिक नहीं है कि हिंदी साहित्य के आरम्भ में केवल तीर्थयात्रा के संस्मरण ही लिखे गए| भारतेंदु ने ‘सरयू पार की यात्रा’ और ‘हरिद्वार की यात्रा’ का संस्मरण लिखा तो वीगू मिश्र ‘बदरी-केदार यात्रा ‘और ब्र’ज यात्रा’|

स्त्रियों को इस तरह की यात्रा की अनुमति और अधिक ‘अच्छी स्त्री’ बनाने के लिए दी जाती है| इन यात्राओं के दरम्यान धार्मिक बूढ़े-बुजुर्गों के वार्तालाप, पंडित, सन्यासियों और कथावाचकों की कथाएँ उनकी रूढ़िवादिता और पितृसत्तात्मक मानसिकता को और अधिक मजबूत बनाती हैं| यात्रा से लौटकर वे थोडा और अधिक ‘पति को परमेश्वर मानने वाली गृहणी’ बन जाती हैं| इस तरह भारतीय स्त्रियों की यात्रा पुरुषों के लिए  ‘एक पंथ दो  काज’ हो जाता है|

यात्रा मनुष्य को बेहतर मनुष्य बनने की सीख देता है|  यात्रा के दरम्यान अलग-अलग तरह के लोग और संस्कृति के संपर्क में आने से यात्रियों को उन लोगों और संस्कृतियों के प्रति नाना प्रकार के पूर्वार्ग्रह खंडित होते हैं और उन्हें लगता है जिन्हें हम अपने से अलग समझते थे वो तो ‘अपने जैसे ही निकले’| फलस्वरूप उन अन्य लोगों और संस्कृतियों के प्रति एक भाईचारा और बहनापा कायम होता है| तीर्थयात्रा में उस रूप में यह संभव नहीं हो पता, क्योंकि वहाँ लक्ष्य मात्र ईश्वर दर्शन और परिक्रमा होता है| समूह में तीर्थयात्रा करने के कारण वे एक जैसे लोगों के साथ ही घिरे रह जाते हैं| केवल स्थान परिवर्तन होता है व्यावहारिक रूप से वे जहाँ से आये होते हैं, उसी मानसिक दशा में होते हैं| इसलिए तीर्थयात्रा से यात्रा के असली मायने पूरे नहीं हो पाते|

भारत की स्त्रियाँ अपनी मर्जी से यात्रा नहीं कर सकतीं| आप जिस प्रदेश, क्षेत्र की यात्रा करना चाहें लेकिन न कर पाएँ और जहाँ की न करना चाहें वहाँ की यात्रा विवशता में करें, तो यात्रा का असली आनंद प्राप्त नहीं हो सकता| भारतीय स्त्रियों के डोर अत्यंत मजबूती से पति के डोर के साथ बंधे होते हैं| बहुत उदारतापूर्वक भारतीय पुरुष अपनी मर्जी से स्त्रियों को यात्रा करवाता है| अपनी मर्जी से यात्रा करने के लिएस्त्रियों को  अपार साहस चाहिए| वह साहस जो जोखिम उठाकर भी प्राप्त किया जा सके| ‘आज़ादी मेरा ब्रांड’ यात्रा संस्मरण में अनुराधा बेनीवाल इसी तरह के साहस की खोज करती हैं, “एक अकेली बेकाम, बेफ़िक्र, वेटैम फिरती लड़की में एक अलग-सी ताक़त होती है| एक अलग-सा साहस होता है| वह साहस जो किसी (बाप, भाई, पति) का हाथ पकड़कर निकलने में कहीं छुप जाता है| वह साहस जिससे हमारा समाज घबराता है| वह साहस जिसे कभी बाहर निकलने का मौका ही नहीं देया गया| वही साहस ढूँढने तुम निकलोगी| तुम फिरोगी उस साहस को जीने| वो तुम्हारा ही है| जब निकलोगी, तब पाओगी|”[ii]

आर्थिक परतंत्रता स्त्रियों को यात्रा नहीं करने देती| भारत की अधिकांश स्त्रियाँ आर्थिक रूप से अपने पति या बेटे पर आश्रित होती हैं| ऐसी हालत में वह यात्रा के लिए बोल ही नहीं सकती| अपनी मर्जी अपने पैसे से ही संभव है| आर्थिक परावलम्बिता  उनकी यात्रा-आकांक्षा को सपने बना देता है| दूसरी तरफ यह भी सच है कि हमरी जीवन-शैली और सोच यात्रा को अधिक व्ययशील बना देती है| वरना  यात्रा उतनी खर्चीली होती नहीं है जितना हम मानकर चलते हैं| अनुराधा के अनुभव भी इस बात की तस्दीक करती है| वह लिखतीं हैं, “मैंने काफी हद तक जाना था कि पैसा घूमने की प्री-कंडीशन  नहीं है| पैसा जरूरी है, लेकिन इतना नहीं जितना हमने बना दिया है| ज्यादातर दुनिया घूमने वालेवाले अमीर घरों में पले हुए लोग नहीं होते हैं| वे बस घूमने की आग में पके होते हैं| उन्हें सस्ते-से सस्ते ठिकाना, एक छत भर की तलाश होती है| वे स्विमिंग पुल वाले होटल नहीं ढूँढ़ते| वे पूरा दिन मूंगफली और केलों पर भी चला लेते हैं| उन्हें भारत में भी मिनरल वाटर की तलाश नहीं होती| वे ब्रांडेड कपड़े और बैग्स पर पैसे नहीं खर्चते| और न ही वे पैसे-जोड़-जोड़कर बुढ़ापे में आरामदेह जिन्दगी के ख्व़ाब बुनते हैं| वे आज के लिये जीते और दुनिया के सबसे खुश लोग होते हैं|”[iii]

स्त्रियों के यात्रा आख्यान अपने कथ्य और शिल्प दोनों में ही अलहदा हैं| उनमें पुरुष यात्रियों के बरक्स एक गजब की संवेदना, आत्मीयता, देखने का कलात्मक नजरिया होता है| स्त्री यात्रा आख्यान की विशिष्टता बताते  हुए औरन प्रकाश लिखते हैं,‘‘पुरुष और स्त्री आख्यान में भेद है। उनमें पुरुष यात्रियों वाले विजयी भाव के बजाए, सहभागिता, सद्भावना और समभाव मिलते हैं वे पुरुष से भिन्न दृष्टिकोण अपनाती ही हैं, उनकी संवेदना भी भिन्न होती है।’’ पूरे साहित्य में भी यह भाव देखने को मिलता है जो स्त्रियों के लेखन को पुरुष से अलग और महत्वपूर्ण बनाता है। इसके पीछे के कारणों की पड़ताल करते हुए अनामिका जी लिखती हैं कि- ‘‘स्त्रियाँ इस अतृप्ति का उपाय अधिक सर्जनात्मक और हंसमुख ढंग से कर लेती हैं। जिसे भी अधिक त्रास झेलने होते हैं वह विपरीत से विपरीत परिस्थिति में भी मस्त रहना सीख जाता है। ‘सिमिआॅटिक’ आत्मनिष्ठ और ‘सिंबालिक’ वस्तुनिष्ठ के बीच के द्वंद्वात्मक दोलन को सारी सार्थक गतिविधियों का आधार माना गया है, और यह प्रक्रिया स्त्रियों के त्रास नहीं, आनन्द के अतिरेक का द्योतक भी बन जाती है।’’

स्त्रियों द्वारा लिखे गए आरंभिक यात्रा साहित्य में स्त्री-दृष्टि का अभाव मिलता है, लेकिन बाद में नब्बे के दशक के बाद जो स्त्री लिखित यात्रा संस्मरण आये हैं उनमें उनकी व्यापक दृष्टि का परिचय मिलता है| पूर्व के स्त्री . लिखित आख्यानों को छोड़ दिया जाये तो आज भी जो सक्रिय है या जिनके आख्यानों में अपना स्वतंत्र वैचारिक आधार साफ दृष्टिगोचर होता है उनमें इंदु जैन का यात्रा आख्यान ‘पत्रों  की तरह चुप’ मृदुला गर्ग का ‘कुछ अटके, कुछ भटके’ पद्मा सचदेव का ‘मैं कहती आँखिन देखी’ मधु काकरियाँ का ‘बादलों में बारूद’ आदि उल्लेखनीय है। इसके अलावा ‘लोकमत समाचार’ के 2006 के दिपावली अंक विशेषांक में एक खण्ड यात्रा पर केन्द्रित हएै जिसमें 32 आख्यानों में से सात स्त्रियों द्वारा लिखे गये  हैं। यह सुखद भविष्य के आगम का सूचक है।

मृदुला गर्ग काफी साहसिक यात्री रहीं  हैं इन्होंने स्त्री  होने के नाते कुछ छूट नहीं चाही है और जहाँ पुरुष भी जाने से हिचकते हैं वहाँ भी यह अपने जुनून से जाती हैद्य ऐसा ही इनका यात्रा संस्मरण है ‘साँप कब सोते हैं’ और ‘असम में एक रात’। असम के असंतोष पर उनकी टिप्पणी द्रष्टव्य है-

‘‘हमेशा से यही होता आया है। लड़ाई रोटी की होती है पर ऊँचे  ख्यालात का जामा पहनाकर लड़ी संस्कृति के नाम पर जाती है। बेकारी, भूख, रोजी-रोटी में वह कशिश कहाँ, जो राष्ट्रीयता, परम्परा, सांस्कृतिक ध्रोहर, इतिहास आदि में है।’’  मृदुला जी के यात्रा आख्यान की सबसे बड़ी विशेषता है उनका वहाँ के तत्कालिक सामाजिक और राजनीतिक जीवन में हस्तक्षेप। वे समस्याओं को चुपचाप देखती नहीं उसे बर्दास्त नहीं करती बल्कि दृढ़ता से सच्चाई बयान करती है।

इसी कड़ी में पद्मा जी द्वारा लिखित ‘मैं कहती आँखिन देखी’ भी अपनी सुरुचि सम्पन्न और दृष्टि के टटकेपन की मिशाल है जिसमें इन्होंने गतिशील बिम्ब के द्वारा इसको और जीवन्त बना दिया है। जीवंतता की एक बानगी है- ‘‘वहाँ की सारी सड़के शांत, व्यवस्थित और ठंड से सिकुड़ी पड़ी थी… अभी हम पानी पीकर आश्वस्त ही हो रहे थे कि एक पतंगे-सा लड़का बदहवास हुआ भीतर आया और सवारियाँ गिनने लगा।’’  यहाँ निर्जीव सड़क को उनकी दृष्टि ने मानवीय प्रभाव दर्शाकर जीवंत बना दिया है ठीक वैसे ही पतंगे-सा से सींकिया जिस्म का बोध।

साहित्य की अन्य विधाओं यथा कविता, काहानी और उपन्यास आदि की अपेक्षा यात्रा साहित्य में स्त्री उपस्थति अत्यंत असंतोषजनक है| इसका सीधा कारण यात्रा के प्रति स्त्री उदासीनता है|  अनुराधा बेनीवाल ने  स्त्री यात्रा की सारी पारम्परिक अवधारणा को तोड़-ताड़कर भीषण यात्राएँ की और  इन्हीं यात्राओं की उपज है उनका  विलक्षण यात्रा संस्मरण ‘आजादी मेरा ब्रांड’| इस पुस्तक पर मुग्ध होकर अनामिका लिखतीं हैं, “आजादी मेरा ब्रांड नए सिरे से स्त्री-दर्शन का यह आधारभूत तथ्य रेखांकित कर रही है कि परिवार रक्त और यौन संबंधों के दायरे तक सीमित नहीं माने जा सकते| यौनिकता, नैतिकता और पारिवारिकता की नई परिभाषाएँ कोई पदानुक्रम नहीं मानतीं, न लड़का-लड़की के बीच, न पाठक-लेखक के… अनुराधा अपने वृत्तान्त में जिन चुनिंदा क्षणों का प्रति-संसार रचती है, उसका  बस एक ही सपना है  कि  किसी  के जीवन का स्वीच किसी और के हाथों में न हो …”|  आज़ादी मेरा ब्रांड की भाषा अत्यंत बेलौस और बोल्ड है, इतनी बोल्ड कि सुचिता वाले साहित्यकारों के कान के कीड़े झड़ने लगें| अनुराधा एक इतालियन यात्री लड़की रमोना का जिक्र करते हुए कहती है कि वह किस तरह सहजता पूर्वक मेरे और विकी की उपस्थिति में बिलकुल नंगे बाथरूम से निकली और हमलोगों से बात करते हुए एक एक कर कपडे पहनने लगी, “मैंने तब तक बिकनी में भी कोई लड़की नहीं देखी थी और यहाँ मेरे सामने रमोना एकदम नंगी खड़ी थी| हमारे होने से बेपरवाह|” वह इस वाकया को भारतीय लड़कियों की नैतिकता बोध की पड़ताल करते हुए बोल्ड भाषा में लिखतीं हैं, “ब्रा की स्ट्रेप तक को छुपाने वाली लड़की के सामने एक लड़की बगैर किसी कपड़े निःसंकोच खड़ी थी, खुली हुई, सजीव और स्वाभाविक| मेरा स्कार्फ जो मैंने अपनी टाईट टी शर्ट पर  ढांप रखा था, मेरा मज़ाक उड़ा रहा था| मेरी ब्रा का हुक मेरी पीठ में चुभने लगा था| कपड़े पहनते हुए वह हमसे बातें किये जा रही थी लेकिन मुझे उसकी आवाज सुनाई पड़ना बंद हो गई थी; बस कोनों में एक गूँज भर उतर रही थी| एक भीनी-भीनी खुशबू ने मुझे चौतरफ़ा घेर लिया था, वह आजाद आदम इच्छाओं की खुशबू थी जिसे मैं प्राणों में समोते हुए महसूस कर रही थी…उसने मेरे भीतर कुछ बदल दिया उस पल…इतने सालों से ‘अच्छी लड़की’ बने रहने की मेरी सारी मेहनत पर वह खुशबू फिर गई, एकदम पानी की तरह “आई वाज करेपटेड”|”

[i] आज़ादी मेरा ब्रांड –अनुराधा बेनीवाल, राजकमल प्रकाशन , पृष्ठ 16, पृष्ठ 13

[ii] आज़ादी मेरा ब्रांड –अनुराधा बेनीवाल, राजकमल प्रकाशन , पृष्ठ 16, पृष्ठ 13

[iii] उपर्युक्त, पृष्ठ 20
IVप्रकाश, अरुण- गद्य की पहचान, अंतिका प्रकाशन, संस्करण 2012, पृष्ठ 89

V अनामिका- कहती है औरते, इतिहासबोध् प्रकाशन, संस्करण 2007, भूमिका से

प्रीति ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं. 

 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here