भाई न होता तो मैं सावित्रीबाई फुले को नहीं जान पाती

सोनम मौर्या, JNU में पीएचडी स्कॉलर

किसी अपने के बारे में कुछ भी लिखना कितना मुश्किल होता है यह मुझे आज समझ में आया। वैसे मैंने सोचा नहीं था कि भइया और उनके संघर्ष के बारे में कभी कुछ लिखूंगी। आज भइया ने जो सफलता हाशिल की है, उसके लिए मैं बहुत खुश हूँ। सोचती हूँ कि ऐसा क्या लिखूँ जिसमें उनकी खुशी, सफलता और संघर्ष तीनों बयां हो सकें? ऐसा लगता है कि जैसे सारे शब्द उनके संघर्ष के सामने छोटे हो गये हैं, शब्दों ने जैसे अपनी सार्थकता ही खो दी है…सच में आज सारे शब्द निरर्थक एवं सतही प्रतीत हो रहे हैं। मुझे आज भी याद है जब भइया गाँव के प्राथमिक विद्यालय में पढ़ने जाते थे, आप कक्षा पाँच में थे और मैं कक्षा दो में। वहाँ के दो मास्टर साहब गणेशी लाल और कीढ़ीलाल बहुत प्रसिद्ध थे। हालाँकि उस स्कूल की बिल्डिंग तब नहीं बनी थी बाग में जमीन पर टाट की बोरी बिछाकर बच्चे बैठते थे और तब पढ़ाई करते थे। मेरे घर से यह स्कूल बहुत ही पास में था इसलिए इसका फायदा भी भइया उठाता था जब मास्टर साहब को साइकिल से स्कूल की तरफ जाते हुए देखता तब वह घर से बस्ता-बोरी लेकर भागता। भइया का यह स्टाईल हम सबने आगे चलकर कॉपी किया यानी कि हम सब भी यही करते। एक और दिलचस्प बात बताऊं कि बचपन में मेरे पापा खाद की बोरी का बस्ता बनवा देते थे जो खूब चलता था, कभी-कभी तो ऐसा होता था कि दीदी जिस बस्ते में पढ़ती वह जब उसे ले जाना बंद कर देती तो उस बस्ते को भइया ले जाता। इसके साथ ही किताबों को भी हम इसी तरह पढ़ते थे एक से दूसरे, दूसरे से तीसरे और तीसरे से चौथे तक यानी पाठ्यक्रम जब तक बदल नहीं जाता तब तक हम सब बड़े भाई-बहन की ही किताबों को पढ़ने के लिए बस्ते में ले जाते। पैसे के अभाव में कभी-कभी तो यह भी होता कि उन किताबों में नए पाठ्क्रम के जो चैप्टर मिलते उन्हें पढ़ लेते बाकी के चैप्टर दोस्तों से मांग कर पढ़ते। भइया भी यही प्रक्रिया अपनाकर पढ़ा है।इसके अलावा मेरे घर में एक ही तख्ती (लकड़ी का एक चिकना टुकड़ा, जिस पर बच्चे खड़िया से अक्षर बनाने की प्रेक्टिस करते हैं, जिसे आज की भाषा में स्लेट कहते हैं) थीउस पर मेरे चाचा, बुआ जी से लेकर भइया और हम सबने पढ़ाई की है। वैसे इस बात के लिए हम सभी भाई-बहन अपने माता-पिता के जिंदगी भर शुक्रगुजार रहेंगे कि घर में चाहे जितनी गरीबी आई, उनको चाहे जैसे दिन देखने पड़े लेकिन उन्होंने हम सबको पढ़ाना नहीं बंद किया, हाँ यह जरूर था कि वे हम सबको बहुत अच्छे स्कूल में नहीं पढ़ा पाये क्योंकि उन दिनों घर की हालत बहुत खराब थी। इसके बावजूद मेरे माँ-पापा को शिक्षा की अहमियत पता थी इसलिए उन्होंने शिक्षा को प्राथमिकता दी और हम सबको पढ़ाया।

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राहुल मौर्या

कक्षा पाँच के बाद भइया को पापा ने अपने ही स्कूल (महर्षि त्यागी उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, जिसकी कोई बिल्डिंग नहीं थी, बाग में ही पढ़ाई होती थी।) में,जो गरीबों के हित के लिए उन्होंने खोला था उसमें पढ़ाना उचित समझा। साथ ही यह बात भी बताना बहुत जरूरीहै कि मेरे पापा के स्कूल में न सिर्फ भइया ही बल्कि चाचा, बुआ जी से लेकर हम सभी भाई-बहन वहीं पढ़े। भइया ने भी कक्षा छह से लेकर आठ तक वहीं पढ़ाई की। उसके बाद उसने घर से लगभग 10-12 किलोमीटर दूर एक राजकीय विद्यालय था टिकैतगंज में वहाँ पढ़ना शुरू किया। वह रोज सुबह उठकर 10-12 किलोमीटर साइकिल चलाकर जाता और शाम को वापस आता। मुझे आज भी याद है कि एक बार भइया को घर आने में देर लग गई मेरी माँ हर रोज उसका इंतजार करती थी और थोड़ी-सी भी देरी हो जाती तो वह घर-से-बाहर और बाहर से घर का चक्कर लगाने लगती। उस दिन भी मेरी आँखों के सामने कुछ ऐसा ही घट रहा था। जब भइया और थोड़ी देर नहीं आया तो माँ ने पापा और बड़े भइया को बड्डूपुर चौराहे तक उसके बारे में पता करने तथा उसको खोजकर साथ लाने के लिए भेजा। कुछ देर बाद जब भइया घर आया तो पता चला कि उसको साइकिल चलाने के कारण बुखार हो गया है। खैर भइया ने किसी तरह नवीं और दसवीं कक्षा तक वहीं पढ़ाई की। फिर बड़े भइया बी.एस.सी. करने के लिए लखनऊ आए और उन्होंने छोटे भइया को भी अपने पास बुला लिया। लखनऊ में एक कॉलेज है ‘जुबली इंटर कॉलेज’ भइया ने वहाँ से 12वीं पास किया। उसके बाद लखनऊ विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। यहाँ यह बात बताना बहुत ही आवश्यक है कि हम सबने जहाँ से पढ़ाई की है वहाँ अंग्रेजी का क्या हाल होता है। पाँचवी तक तो वहाँ के बच्चों को अंग्रेजी के अल्फाबेट तक नहीं पता होते हैं…यानी अंग्रेजी का वहाँ की शिक्षा से बहुत दूर का नाता होता है। भइया की भी हालत कुछ-कुछ ऐसी ही थी। सरकारी स्कूलों से पढ़े हुए को अंग्रेजी से बहुत भय लगता है वह भय कुछ-कुछ आज भी मेरे अंदर रह-रहकर झांकता है। हालाँकि भइया ने बड़ी मेहनत की इससे निपटने की। वह जब यूनिवर्सिटी जाता तो रास्ते में लगे बोर्डों पर लिखी अंग्रेजी को एक पर्ची पर लिख या अपने मन में याद कर लेता और घर आकर डिक्शेनरी में उसका अर्थ और प्रयोग देखता। आज मैं कह सकती हूँ कि न सिर्फ मेरे गांव में बल्कि पूरी चौहद्दी में मेरे भइया जैसी इंग्लिश कोई नहीं जानता। खैर उसने बी.ए. किया फिर एम.ए. में उसने दर्शनशास्त्र को अपना मुख्य विषय चुना।

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मुझे आज भी याद है जब भइया दाखिला लेकर घर आया तो बड़े भइया बड़ा नाराज हुए उनका कहना था कि इस विषय में ज्यादा स्कोप नहीं है हालाँकि उनकी चिंता जगजाहिर थी। इस तरह बड़े की डांट खाते हुए वह अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ता रहा और 2008 में लखनऊ विश्वविद्यालय से एम.ए. पास किया। और हाँ एक बात और वह यह कि लखनऊ विश्वविद्यालय में भइया के एक सर हैं, चंद्रा सर। जिन्होंने भइया को जेएनयू का सपना दिखाया और भइया ने उस सपने को जीने के लिए तमाम कोशिशें की। आखिरकार 2008 में भइया ने जेएनयू के दर्शनशास्त्र विभाग में एम.फिल.एंट्रेंस निकाल लिया। अब फिर क्या था यहाँ से शुरू हुआ भइया का विचारधारात्मक संघर्ष। जिसे भइया अपने साथ ऐसे लिए घूमता है जैसे दुष्यंत कुमार अपनी गजलों को। वह जहाँ जाता है जेएनयू को अपने साथ ले जाता है। बिल्कुल दुष्यंत कुमार की इस गजल की तरह ‘जिसे मैं ओढ़ता-बिछाता हूँ वह गजल आपको सुनाता हूँ।’ भइया भी जिसे जीता है जिसको अपने जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा मानता है, जिसे अपने जीवन में उतारता है वह कोई और नहीं जेएनयू जैसी संस्था है, उसके मूल्य हैं। उसे वह ओढ़ता भी है और बिछाता भी तथा वक्त आने पर दुश्मनों को धूल भी चटाता है।

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जब 2008 में भइया जेएनयू आया तो वह पारंपरिक भाई ही था लेकिन 2010 तक वह बिल्कुल बदल चुका था, जिससे अपनी जरूरतों का सामान मांगने पर भी डर लगता था अब वह मेरे जीवन की तमाम समस्याओं को बहुत ही जिम्मेदारी से हल करने लगा था, मुझे क्या चाहिए क्या नहीं, मेरे दर्द को, मेरी परेशानियों को वह बिना बोले ही समझने लगा था। मेरे लिए घर में बहस करने लगा था आगे चलकर इसका परिणाम यह निकला कि मेरा भी दाखिला 2010 में हिंदी एम.ए. में हो गया। उसने न सिर्फ अपने विचार बदले बल्कि मेरे और मेरे साथ मेरी बहन तथा मेरे कजिन भाई के भी विचार बदले। हम सबकी प्रेरणा तो बना ही वक्त आने पर ढाल भी बना। भइया ने संगठन किया और मुझे भी संगठन करना सिखाया। यह बात अलग है कि धूर्त और निहायत ही ब्राह्मणवादी लोगों ने भइया की ईमानदारी का फायदा उठाया और उनके संघर्ष पर अपनी जीत की इमारत खड़ी कर ली। फिर भी भइया ने हार नहीं मानी, वह थका नहीं और न ही कभी निराश हुआ बल्कि वह और उत्साह से संघर्ष करते हुए आगे बढ़ता रहा। परिणामस्वरूप उसका डीयू के ‘जाकिर हुसैन कॉलेज’ में गेस्ट हुआ। एक साल यहाँ पढ़ाने के बाद डीयू के मेन फैकल्टी में भी उसे तीन महीने पढ़ाने को मिला और फिर एमटी में हुआ। वहाँ पढ़ाने के बाद उन्होंने डीयू के ही एक और कॉलेज ‘जानकी देवी मेमोरियल कॉलेज’ में लगातार चार साल तक अध्यापन कार्य किया।

आज देश के कुछ प्रसिद्ध विश्वविद्यालों में से एक ‘बनारस हिंदू विश्वविद्यालय’ में परमानेंट असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर नियुक्ति हुई। फिर भी देखा जाय तो भइया के लिए गाँव वाले प्राथमिक विद्यालय से लेकर एलयू, जेएनयू, एमटी, डीयू होते हुए बीएचयू तक का सफर आसान नहीं था बल्कि बहुत ही कठिन और चुनौतीपूर्ण था। पर किसी ने यह सच ही कहा है कि अगर जिंदगी में कुछ करना है तो रिस्क लेना पड़ेगा और भइया ने यह रिस्क लिया। जिसके कारण वह आज इस सफलता पर पहुँचा है। इस समय मुझे पता नहीं क्यों पापा की एक बात याद आ रही है वह यह कि बचपन में अपनी गरीबी एवं माली हालत को देखकर यदि भइया, मैं और शुचि किसी अमीर खानदान के बच्चों और छात्रों से अपनी तुलना कर पापा के सामने अपनी फरमाइश करते तो पापा एक कहानी सुना देते जो मुझे आज भी याद है। वह कहते जिस स्कूल में मैं पढ़ता था वहाँ मेरे एक सीनियर पढ़ा करते थे उनके पास एक ही जोड़ी पायजामा-कुर्ता था। वह हर रोज वही पायजामा-कुर्ता पहनकर पढ़ने आते थे और कुछ छात्र हर रोज एक नया कपड़ा पहनकर आते थे। कुछ लोगों ने तो उनको चिढ़ाने तथा उनका मजाक उड़ाने के लिए उनका नाम ही ‘पायजामा वाला’ रख दिया था लेकिन जब परीक्षा का रिजल्ट आया तब उन्होंने पूरे स्कूल में टॉप किया। लोग एक-दूसरे से यह कह रहे थे कि पायजामा वाले ने टॉप किया है। इसलिए अपनी पहचान अपने पहनावे से नहीं अपनी पढ़ाई एवं अपने व्यक्तित्व से बनाओ। आज भइया की सफलता को देखकर मैं यह कह सकती हूँ कि उसने पापा की कही हुई इस बात को सच करके दिखाया है, उसने भी अपनी पहचान मंहगे पहनावे से नहीं बल्कि अपनी पढ़ाई की लगन, मेहनत एवं संघर्ष की चमक से बनाई है।

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आपको पता है कि एक भाई होने के नाते मेरी जिंदगी में कितना योगदान है उनका। यह सच है कि अगर वेमुझे यहाँ नहीं लाते तो मैं जिंदगी की तमाम सच्चाईयों से कभी रू-ब-रू न हो पाती, मैं यह कभी नहीं जान पाती कि समाज में सावित्रीबाई फुले जैसी कोई स्त्री भी रहीं जिन्होंने तमाम प्रताड़नाएं झेलते हुए स्त्रियों को पढ़ना-लिखना सिखाया, मैं ज्योतिबा फुले, पेरियार, बी.पी. मण्डल, बिरसा मुंडा, फातिमा शेख, फूलन देवी आदि ऐसी तमाम शख्शियतों को कभी नहीं जान पाती, जिन्होंने समाज में अपना बहुमूल्य योदगदान दिया। न ही यह जान पाती कि डॉ. अंबेडकर ने ‘हिंदू कोड बिल’ लाकर तथा देश का संविधान लिखकर महिलाओं के लिए बराबरी का रास्ता खोला था। उन्होंने स्त्रियों को दोयम दर्जे के प्राणी से ऊपर उठाकर बराबरी का अधिकार दिलाया। इसके अलावा मैं छात्र-आन्दोलनों का कभी भी हिस्सा नहीं बन पाती और न ही यह सीख पाती कि शोषण करना जितना बड़ा गुनाह है, शोषण के खिलाफ आवाज को न उठाना उससे बड़ा गुनाह है। एक बात कहूँ जो अतिशयोक्ति नहीं बल्कि मेरी जिंदगी की खांटी सच्चाई है वह यह कि जिस दिन दुनिया का हर भाई आप जैसा हो गया उस दिन सभी बहनें अपना हक खुद-ब-खुद लड़कर ले लेंगी, उन्हें किसी सहारे की जरूरत नहीं पड़ेगी। आज जब मैं यह सोचती हूँ कि अगर भइया नहीं होते तो मेरा क्या होता? यह सोचकर ही मेरी रूह अंदर तक कांप जाती है। यह सच है कि मैं किसी अतार्किक जिंदगी के सड़े-गले ढेर पर पड़ी होती जिस पर सामंती व्यवस्था एवं पितृसत्ता का मोटा लबादा ओढ़े तमाम भेड़िए मुझे नोचखाने के लिए घात लगाए बैठे होते और तब बचाने वाला भी शायद कोई न होता। सच में मुझे आपने जेएनयू का रास्ता दिखाकर ऐसी गलीच भरी जिंदगी जीने से बचाया है। इसलिए आज मैं जो कुछ भी हूँ आपकी वजह से ही तो हूँ।

अब शायद आगे कुछ और नहीं लिख पाउंगी…सिवाय इसके कि आप वह भाई हैं जिन्होंने परिवार में, रिलेशन में, समाज में अपनी बहनों की पढ़ाई को डिफेंड कर दिया, अब कोई यह नहीं पूछेगा कि तुम दोनों बहनों ने जेएनयू में इतने साल पढ़कर क्या किया? आखिर क्या मिला तुम्हें? क्योंकि इन सवालों के जवाब तो आप खुद हैं।

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