प्रथम शिक्षिका सावित्रीबाई फुले एक अच्छी कवयित्री थीं

सुमित कुमार चौधरी 

वर्ष 2019 के जाते-जाते देशभर में जो राजनीति और शैक्षणिक बहस छिड़ी हुई है वह हमारे भविष्य के लिए बहुत ही विशेष महत्व रखती है । आज देश में सीएए और एनआरसी का मुद्दा जिस तरह पूरे विरोध के चरम पर है वह शिक्षा के बदौलत ही है । इस एक्ट का विरोध अगर कहीं सबसे ज्यादा दिखाई दिया तो वहविश्वविद्यालयों में दिखाई दिया । जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय,जामिया और अलीगढ़ विश्वविद्यालय इसके उदाहरण हैं । इस आंदोलन को अगर एक खास नजरिए से देखा जाए तो इसमें छात्राओं की संख्या बल बहुत अधिक मात्र में उपस्थित रही जो हमें गर्व का बोध कराती है । असल में सरकार द्वारा चलाया जानेवाला साक्षारता मिशन हमारे ज्ञान परंपरा को विकसित नहीं कर सकता । बल्कि हमें अपनी ज्ञान परंपरा को विकसित करने के लिए शिक्षित होने की जरूरत है,जिसे हम विश्वविद्यालयों में देख पा रहे हैं । इस संदर्भ में हमें आधुनिक भारत की प्रथम शिक्षिका सावित्रीबाई फुले को नहीं भूलना चाहिए जिनकी ज्ञान परंपरा में हम जी रहे हैं । जिनसे हम कुछ न कुछ सीख रहे हैं । असल में सावित्रीबाई फुले कर्मकांडी ज्ञान का बहिष्कार करते हुए अंग्रेजी शिक्षा की हिमायती थी । उनका मानना था कि हमारे जीवन का विकास और सामाजिक समानता आधुनिक शिक्षा से ही संभव है । इसलिए हमें हर संभव प्रयास करना चाहिए कि  अंग्रेजी शिक्षा ही प्राप्त किया जाए । यही कारण रहा है कि सावित्रीबाई फुले ने सबसे पहले महिलाओं के लिए 14 जनवरी 1848 में स्कूल खोला और शिक्षित करने का जिम्मा उठाया । एक बात यहाँ और बताते चलूँ कि इसी आधुनिक शिक्षा का समर्थन (जिसकी नींव सावित्रीबाई फुले रखी हैं) डॉ. भीमराव अंबेडकर भी करते हैं और शिक्षा को शेरनी के दूध के समान मानते हैं । अंबेडकर ने आधुनिक शिक्षा के प्रति सभी समाज के लोगों को जागृत किया और तर्कशील होने पर बल दिया ।

बहरहाल, आज आधुनिक भारत की प्रथम शिक्षिका सावित्रीबाई फुले का जन्मदिन (3 जनवरी 1831) है इसलिए हमें उन्हें न केवल प्रथम शिक्षिका और समाजसेविका के रूप में याद करने कि जरूरत है बल्कि उन्हें प्रथम कवयित्री के रूप में भी याद करने की जरूरत है । इसलिए सावित्रीबाई फुले को हमें उनके इस जन्मदिन के अवसर पर उनकी कविताओं के माध्यम से स्मरण करना चाहिए जिससे उनके चिंतन का शैक्षणिक रूप हमारे सामने आ सके ।

सावित्रीबाई फुले ने अपनी अधिकांश कवितायें शिक्षा को केंद्र में रखकर लिखी हैं । उन्होंने अपनी कविताओं में अंग्रेजी शिक्षा का समर्थन खूब किया है । अंग्रेजी शासन के आने के बाद उन्होंने अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित किया ।उनकी कवितायें बच्चों को शिक्षा के प्रति सजग करती हुई नज़र आती हैं ।इस संदर्भ में उनकी एक कविता है ‘बच्चों का स्वागत’ जिसमें वह बच्चों को शिक्षा देने के लिए प्रेरित करते हुए दिखाई दे रही हैं-

“भोर सुनहरी चमक उठी
आओ प्यारे प्यारे बच्चो
स्कूल में आओ आज
खुशी खुशी करूँ स्वागत तुम्हारा
दुलार दूँ, शिक्षा दूँ, आज इसी क्षण ।”1

उन्होंने विद्या को श्रेष्ठ धन माना है । वह बच्चों को उपदेश देती हैं कि विद्या दौलत से बढ़कर है । यह धन जिसके पास होता है वह सबसे धनवान होता है । उसे समाज के लोग सबसे ज्यादा धनवान मानते हैं । असल में शिक्षा ही हमारे जीवन का अंधकार दूर करती । शिक्षित होकर ही देश और समाज के लिए बेहतर कार्य किया जा सकता है । इसलिए सावित्रीबाई फुले शिक्षा पर बहुत ज्यादा ज़ोर देती हैं । “श्रेष्ठ धन विद्या” कविता की दो पंक्तियाँ देखिये-

“विद्या धन है बच्चे । सभी दौलत से बढ़कर । ।
विद्या धन का संचय जिसके पास । धनी मानते हैं उसे सब जन । ।”2

ज्ञान और समानता के आधार पर अंग्रेजी शिक्षा का समर्थन करते हुए उन्होंने अपनी कविता में लिखा है कि इस शिक्षा से हमें समानता और सम्मान का अधिकार मिलता है । हम अज्ञान और अंधविश्वास से दूर निकल जाते हैं । असल में सावित्रीबाई फुले यह सब इसलिए लिखीं हैं क्योंकि उनको अपना पूर्व इतिहास पता था । उन्होंने अपने समय का पूरा सामाजिक वातावरण देखा हुआ था । वो समझ रही थी कि कर्मकांडी ज्ञान से शूद्रों का विकास होना मुश्किल है । जिस विद्या और मंत्रों को हम सुन नहीं सकते उसमें हमारे ज्ञान का बोध होना असंभव है । इसीलिए उन्होंने अंग्रेजी शिक्षा की वकालत करते हुए ‘अंग्रेजी मैया’नामक कविता लिखी । कविता का एक अंश देखिये-

“अंग्रेजी भाषा नष्ट करे
शूद्रों की अज्ञानता
पशुता अमानवीयता हरके
सिखावे इंसानियत
दिलावे समानता और सम्मान ।”3

सावित्रीबाई फुले के विषय में एक बात साफ तौर से जान लेना चाहिए कि उन्होंने सत्तर के दशक के नारीवादियों से पहले स्त्री सशक्ता पर बल दिया था । लेकिन आकादमिक जगत में इनके नारीवाद के संघर्ष का कहीं कोई जिक्र नहीं किया जाता । जबकि उन्होंने 14 जनवरी 1848 को स्त्रियों के लिए पहली बार स्कूल खोला । शिक्षित करने का जिम्मा उठाया । शिक्षित करने के लिए प्रेरित किया । जिसमें सभी समुदाय की स्त्रियाँ शिक्षा प्राप्त कर सकती थीं । बावजूद इसके उनके द्वारा किये गए कार्यों का मूल्यांकन नग्ण्य माना जाता है । गौर करने वाली बात यह है कि सावित्रीबाई फुले द्वारा किया गया यह कार्य और उनका लेखन आज के नारीवाद का सिद्धान्त नहीं हो सकता तो नारीवादी आंदोलन में कुछ कमियाँ हैं जिसे सही करने की जरूरत है । शायद यही कारण रहा होगा कि जिसे हम मुख्य धारा का नारीवाद कहते हैं उससे अलग होकर दलित स्त्रियाँ अपना अलग स्त्रीवादी आंदोलन शुरू कर चुकी हैं और सैद्धांतिकी के रूप में सावित्रीबाई फुले को प्रमुख स्थान पर रखती हैं । स्त्रीवादी चेतना के रूप में सावित्रीबाई फुले बच्चियों और स्त्रियों को शिक्षा के प्रति सजग करती हुई एक कविता लिखती हैं जो ‘संगीत नाटिका’शीर्षक माध्यम से लिखा गया है । जिसमें बच्चियों को उनकी जीवन यात्रा के बारे में समझाते हुए सावित्रीबाई फुले कहती हैं कि आप लोगों को शिक्षा के प्रति अग्रसर होना चाहिए । कविता का एक अंश देखिये-

“स्वाभिमान से जीने हेतु
बेटियों पढ़ो-लिखो खूब पढ़ो
पाठशाला रोज जाकर
नित अपना ज्ञान बढ़ाओ
हर इंसान का सच्चा आभूषण शिक्षा है
हर स्त्री को शिक्षा का गहना पहनना है
पाठशाला जाओ और ज्ञान लो
चलो आओ शिक्षा पाने में ही
हमारा कल्याण है
सुनो सुनो बालिकाओं
पहला काम है तुम्हारा
पढ़ना-लिखना, शिक्षा पाकर ज्ञान बढ़ाना बाद
उसके बाद फिर खेलना-कूदना
वक्त मिले जरा तो
माँ का हाथ बँटाओ गृह-कार्य में
परन्तु सबसे पहले शिक्षा
इसलिए चलो चलें स्कूल”4

सावित्रीबाई फुले की सामाजिक चेतना किसी खास वर्ग के लिए नहीं बल्कि संपूर्ण स्त्री जाति के लिए है । बावजूद इसके उन्हें मुख्य धारा के नारीवादियों की तरफ से अलग कर देखा जाता है । फिर भी उनका  व्यक्तित्व धूमिल नहीं पड़ता,बल्कि और निखर कर समाज के सामने आता है । इसका सबसे बड़ा उदाहरण आज की शिक्षित युवा पीढ़ी है । खासतौर से छात्राएँ जो समाज के भीतर हो रहे अंधविश्वासों, कुरीतियों और सरकार द्वारा अपनाएं गए गलत नियमों का विरोध करते हुएसड़कों पर उतरती हुई दिख रही हैं । अत: यह कह सकते हैं कि सावित्रीबाई फुले के लिए इससे बढ़ियांसम्मान और क्या हो सकता है कि उनकी ज्ञान परंपरा आगे बढ़ रही है ?

संदर्भ सूची-

  1. रजनी तिलक (संपादक), सावित्रीबाई फुले रचना समग्र, द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन, दिल्ली, संस्कारण, 2017, पृ. सं. 30.
  2. वही, पृ. सं. 54.
  3. वही, पृ. सं. 56.
  4.  वही, पृ. सं. 74-75.
    शोधार्थी, भारतीय भाषा केंद्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here