अरुणा  सिन्हा 

74वां स्वतंत्रता दिवस का वर्ष! लेकिन आज जितना अंग्रेजी राज का दौर याद  आ रहा है,और दिमाग में यह भ्रम पैदा कर रहा है कि गुलामी से, अंग्रेजों के अत्याचारों से क्या हम वाकई मुक्ति पा चुके हैं या शासकों का केवल चोला बदला है?

ऐसा ही कुछ अनुभव किया 10 फरवरी को जामिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं ने । 10 फरवरी की शाम को 6 बजे वे  विश्वविद्यालय के बाहर जमा हो रहे थे सीएए-एनआरसी का विरोध करने के लिए। प्रदर्शनकारियों की भीड़ लगातार बढ़ती जा रही थी। भारी संख्या में पुलिसकर्मी वहां जमा होकर बैरिकेड लगा चुके थे। और फिर शुरू हुआ दिल्ली पुलिस का शांतिपूर्ण तरीके से जमा छात्र-छात्राओं पर प्रहार। इसके बाद जो घटित  हुआ उसकी जांच करने के लिए भारतीय महिला फेडरेशन(NFIW) ने अपनी एक तीन सदस्यीय जांच दल-कोनिनिका रे,रूशदा सिद्दीकी और सुप्रिया  छोटानी (सभी भारतीय महिला फेडरेशन की कार्यकारिणी की सदस्याएं)-का गठन किया। इस जांच दल ने अपनी रिपोर्ट 10 अगस्त को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में जारी की गयी जिसमें संगठन की अध्यक्षा एवं महासचिव भी उपस्थित थीं।

10 फरवरी 2020 की घटनाओं पर भारतीय महिला फेडरेशन (NFIW) की फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट

10 फरवरी की शाम को जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों और सिविल सोसाइटी के लोगों ने सीएए, एनआरसी के खिलाफ जारी प्रदर्शन के हिस्से के रूप में  संसद मार्ग की ओर प्ले कार्ड हाथ में लेकर एक शांतिपूर्ण जुलूस निकालने का फैसला किया था।

शाम के 6:00 बजे तक विरोध का समर्थन करने वाले स्थानीय नागरिक और समर्थक वहां जमा हो गए थे ।पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को आगे बढ़ने से रोकने के लिए बैरिकेड लगाने शुरू कर दिए। प्रदर्शनकारी वहीं रुक गए और उन्होंने तय किया कि वह वही बैरिकेड के पास बैठकर शांतिपूर्ण धरना देंगे। लेकिन पुलिस कार्रवाई में उतर आई और  जमा हुई भीड़ को तितर-बितर होने की चेतावनी दिए बिना या  कोई घोषणा किए बिना प्रदर्शनकारियों पर हमला बोल दिया। 3 महीने के छोटे अंतराल में यह तीसरी बार हो रहा था जबकि सीएए- एनआरसी-एनपीआर के खिलाफ प्रदर्शनकारियों को  कैंपस में हिसा का शिकार बनाया गया ।लेकिन इस बार यह हमला बेहद  हिंसक था।

भारतीय महिला फेडरेशन की फैक्ट फाइंडिंग टीम ने पीड़ितों, अन्य छात्रों ,प्राध्यापकों कार्यकर्ताओं , मेडिकल क्षेत्र के लोगों ,प्रशासन के लोगों और कानून से जुड़े लोगों द्वारा प्रदर्शनकारियों पर बरपा की गई निर्मम हिंसा के संबंध में दिए गए विवरणों के आधार पर अपनी रिपोर्ट तैयार की है।

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जामिया के छात्रों और अध्यापकों ने दो मुख्य मुद्दों पर जोर दिया:

  1. शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर रासायनिक गैस का इस्तेमाल
  2. महिलाओं को खास तौर पर यौन हिंसा का शिकार बनाना।

   दिए गए विवरणों और साक्षयों में जो चौंकाने वाली बात थी वह थी पुलिस तथा सादे कपड़ों में अथवा  पुलिस की वर्दी पहने(  संदिग्ध रूप से आर एस एस  से जुड़े गुंडे) लोगों की इस हमले में भूमिका। जैसा कि पहले भी जेएनयू और  स्वयं जामिया मे पहले भी देखा गया था, उनमें बिना बैच के और बिना नेमप्लेट के पुलिसकर्मी मौजूद थे। और कुछ हमलावर जींस पहने थे, बिना पुलिस हेलमेट के थे और सादे कपड़ों पर वेस्ट पहन रखी थी। हमलावरों में नफ़रत और मजा चखाने की भावना कुछ ज्यादा ही भरी हुई थी। पीड़ितों की बात सुनने के बाद हम उन्हें हिंसा से बच निकले लोग  ही कहेंगे । जिस अमानवीय तरीके से और निर्ममता से हमला किया गया था उससे साफ जाहिर था कि हमलावर यह जताना चाहते थे कि सीएए का विरोध सत्ता का विरोध है।

 10 फरवरी 2020 की शाम को जो कुछ हुआ उसे समझने के लिए हमलों के तरीकों और पीड़ितों को आए जख्मो तथा उसके बाद की स्थिति को देखने की जरूरत है।

पीड़ितों,  डॉक्टरों और नर्सों, कार्यकर्ताओं ,कानून से जुड़े लोगों और अन्य लोगों से बातचीत करने के बाद हम लगभग 70 -80 ऐसे लोगों की पहचान कर पाने में  सफल हुए जिन्होंने हिंसा  झेली। उनकी उम्र 15 से 60 वर्ष के बीच थी। गंभीर रूप से घायल लोगों में 30 से 35 पुरुष और 15 से 17 महिलाएं थी।

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हमले का तरीका

प्रत्यक्षदर्शियों ने हमें बताया कि लगभग 6:30 बजे कुछ धुंधलकी सी हवा दूर से दिखाई दे रही थी। पास पहुंचने पर उन्होंने पाया कि एक गंधहीन छिड़काव प्रदर्शनकारियों पर किया जा रहा था।

रासायनिक हमला

किया गया छिड़काव आंसू गैस का नहीं था क्योंकि किसी ने भी आंखों में जलन या आंखों में पानी आने की शिकायत नहीं की। प्रदर्शनकारियों ने हिलने डुलने में दिक्कत, सुस्ती और भयंकर सर दर्द की शिकायत की।उन्होंने दम घुटने और मांसपेशियों में दर्द का भी अनुभव किया।  छिड़काव के बाद ज्यादातर  कई घंटे तक खड़े भी नहीं हो पाए। कुछ छात्र जो उस जगह से दूर चले गए थे जहां गैस का छिड़काव किया जा रहा था ,उन्होंने भी मिचली, सरदर्द और मांसपेशियों में दर्द की शिकायत की  जिसकी वजह से उनका चलना फिरना मुश्किल हो गया था। जब उन लोगों ने दूसरों की मदद के लिए बैरीकेड के पास जाने की कोशिश की है तो  उनकी पिटाई की गई या उन पर फिर वही स्प्रे  किया गया जिसने  उन्हें हिलने डुलने से लाचार कर दिया। साफ था कि यह स्प्रे सेहत पर गम्भीर असर डालने वाला कोई केमिकल था।

[17:23, 8/21/2020] Aruna Nfiw: जब प्राध्यापकों,कार्यकर्ताओं और छात्रों  ने पुलिस से इस जहरीली गैस के बारे में पूछा तो उन्होंने कोई भी  साफ जवाब देने से इनकार कर दिया। उन्होंने बड़ी बेशर्मी से छात्रों पर अत्याचार करने ओर किसी भी तरह का  रसायन इस्तेमाल करने को नकार दिया। उन्होंने दावा किया कि यह होली फैमिली अस्पताल से मच्छरों को मारने के लिए किया गया छिड़काव था जो बैरिकेड की वजह से यहां पहुंच गया था। उनका दावा पूरी तरह से झूठा था क्योंकि वह अस्पताल बैरिकेड से लगभग 1 किलोमीटर दूर था इसके अलावा हॉस्पिटल प्रशासन ने कार्यकर्ताओं ,अध्यापकों और छात्रों को बताया की शाम को या पूरे हफ्ते कोई भी मच्छर भगाने की दवा का छिड़काव नहीं किया गया है।। पुलिस का दावा इस बात से भी झूठा साबित होता है कि मच्छरों के लिए किया जाने वाला छिड़काव उस तरह की प्रतिक्रिया नहीं करता जिस तरह कि पीड़ितों ने झेली।

[17:24, 8/21/2020] Aruna Nfiw: अपनी जांच के दौरान हमने यह भी पाया कि दम घुटने की समस्या उलटी और ठीक से चल फिर ना सकने की समस्या हमले के 1 हफ्ते से ज्यादा समय तक होती रही। मरीज घबराहट की , मांसपेशियों के खिंचने की,ऐंठन की समस्या को लेकर आस पास के विभिन्न मेडिकल सेंटर्स में और हॉस्पिटल्स में जाते रहे। डॉक्टर केवल जख्मों के आधार पर  इलाज करते रहे  लेकिन उन्होंने जो रसायन मरीजों के अन्दर घुस गया था उस समस्या पर या इसके लंबे समय तक रहने वाले इसके असर के बारे में कुछ भी कहने से इनकार कर दिया।  कुछ लक्षण  लोगों को उनके यौन अंगों  और और पेट में लगे गहरे जख्मों की वजह से हो सकते हैं लेकिन यह लक्षण उनमें भी देखे गए जिनके शरीर   पर  हमला नहीं किया गया था ,लेकिन  जो बैरिकेड के नजदीक  थे जहां पर रसायन का सप्रे किया गया था । जो बैरिकेड से दूर थे उन पर इस तरह का असर नहीं हुआ था।

हमले के लगभग 2 सप्ताह बाद भी हमें  उन छात्रों में  , रसायन जिनके अंदर पहुंच गया था ,सांस लेने में तकलीफ ,कमजोरी ,चलने में दिक्कत या हिलने डुलने में परेशानी की शिकायतें मिल रही थी। यहां हम इस बात की ओर ध्यान खींचना चाहेंगे कि  पीड़ितों का कोई भी टिशु सैंपल या खून का सैंपल  नहीं लिया गया ताकि जहरीले द्रव के बारे में पता लगाया जा सके। जिन लोगों से हमारी बात हुई उनमें किसी की भी  खून या मूत्र की जांच नहीं की गई थी ।डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ ने मरीजों से कहा कि ऐसी कोई जांच कर भी लेते हैं तो भी उस रसायन के बारे में कुछ भी पता नहीं चल पाता-यह ऐसा रसायन था जिसके  कोई निशान नहीं बचते। पहले तो हमें डॉक्टरों की इस प्रतिक्रिया पर आश्चर्य हुआ। लेकिन जब हमने पीड़ितों से और विभिन्न अस्पतालों  व क्लीनिक के प्रशासन से बात की तो हमें बताया गया कि डाक्टरों को सादे कपड़ोंवाली पुलिस से कोई भी जांच ना करने की धमकी मिल रही है। इस इलाके के सरकारी अस्पतालों से लेकर निजी अस्पतालों तक के मेडिकल कर्मी, जांच के संबंध में और इस बारे में पूछताछ करने वालों से बात ना करने के अलिखित हिदायतों का पालन कर रहे थे। एक के बाद एक पीड़ित के जांच ना करने के पीछे यही मुख्य वजह थी। कोई भी डॉक्टर  अपने पैड पर इस संबंध में कुछ भी लिख कर देने को तैयार नहीं था।

नतीजे के तौर पर हमारे सामने सिर्फ वही मरीज थे जिनके शरीर पर लगी चोटों के आधार पर लक्षणों का ही इलाज किया गया। क्योंकि रसायन के प्रकार का पता नहीं चल सका इसलिए मरीजों का उसके अनुसार इलाज मुश्किल था। महत्वपूर्ण बात यह है कि इसके दीर्घकालिक असर और प्रभाव के बारे में पता नहीं लग पाएगा।

हमें नहीं पता कि कई सप्ताह बीत जाने के बाद इस रसायन के बारे में कुछ पता कर पाना संभव है कि नहीं -ऐसी कोई जांच ही नहीं की गई है।

हम यहां इस ओर ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं कि निहत्थे नागरिकों पर किसी भी तरह के रसायन का इस्तेमाल एक आपराधिक कार्रवाई है तथा  संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न कन्वेंशनों  में इसे गैरकानूनी घोषित किया जा चुका है। इसके अलावा,  संविधान में ऐसी कोई कमजोरी नहीं है जिसका फायदा उठाकर सशस्त्र बल या पुलिस अपनी इस हरकत को उचित ठहरा सकती है।

बुरी तरह से पिटाई

जिन चिकित्साकर्मियों से हमने बात की, सबने एक ही बात कही कि उन्होंने प्रदर्शनकारियों पर ऐसा अमानवीय  और नृशंस हमला इससे पहले कभी नहीं देखा। कुछ डॉक्टरों ने यह बात स्वीकार की कि घायलों के शरीर पर लगी चोटे उससे भिन्न थी जैसी कि आमतौर पर देखी जाती हैं। पीड़ितों को बहुत बुरी तरह से पीटा गया था। इलाके के डॉक्टर टूटी हुई पसलियों, टखनों और हड्डियों का इलाज कर रहे थे। यहां एक बड़ी बात कहने की जरूरत है कि पीड़ितों पर हमला बहुत ही भयंकर था।

लिंग के आधार पर हमने किए गए। पुरुषों के घुटनों  पर प्रहार किया गया । वो नीचे गिर गिर गए तो उन पर हल्का सा द्रव छिडका गया जिससे वे हिलने लायक नहीं रहे। उनके यौन अंगों पर भी प्रहार किए गए।  बहुत से बोल नहीं पा रहे थे और दम घुटने तथा सरदर्द के कारण  बेहोश भी हो गये थे।

महिलाओं पर कुछ अलग तरीके से हमले किए गए । पहले उन पर स्प्रे किया गया और जब वे गिर गई तब उनकी पिटाई की गई। लगभग सभी ने यौन हमले  की शिकायत की जैसा कि रिपोर्ट के  अगले भाग में बताया गया है।

हमले किसी  धारदार चीज से नहीं किए गए जिसकी वजह से गहरी चोटें नहीं थी। पिटाई के लिए लातों डंडों, चमड़े के जूते ,कोहनी,  घुटनों और उंगलियों की हड्डियां का इस्तेमाल किया गया। चोट पहचानने में वक्त लग गया क्योंकि क्योंकि खून नहीं सहा था,कोई निशान नहीं थे। लगभग सभी चोटें अंदरूनी थीं। बाद में एक्सरे के जरिए ही फ्रैक्चर और अन्य जख्मों का पता लग पाया।

सभी चोटें मुख्यतया 4 विशेष स्थानों पर थीं :छाती , नाभि ग्रॉइन और पैर पर। इनके अलावा बहुतों के सिर और गले पर भी चोटें आई थीं। ज्यादातर ने हमले की भीषणता की शिकायत की। ऐसा लग रहा था कि पुलिस उन्हें अपंग बना देना चाहती थी ।उनके सर फोड़ देना चाहती थी या उन्हें पंगु बना देना चाहती थी क्योंकि वह रीढ़ की हड्डी पर चोट कर रहे थे। एक छात्र ने जिस पर हमला बोला गया बताया कि  उसकी तिल्ली फट गई है जिसकी वजह से पेट में सूजन और दर्द है तथा पैरों के जोड़ों की हड्डी खिसक गई है। इसके अलावा पैरों के नीचे स्लिप की वजह से चलने में असमर्थ है। बहुत सी लड़कियों ने भी हमें बताया कि किस तरह पुलिस ने रॉड और  जूतों से हमारे पैरों को कुचला ।हम तलवों पर चोट के की तो बात  ही नहीं कर रहे। लेकिन पैरों में ऊपर से मारा गया ताकि हमारे जोड़ों की हड्डियां टूट जाए और पैर फ्रैक्चर हो जाए। जेएनयू पर हुए हमले की याद दिलाने वाली घटनाएं भी हुईं जहां दिव्यांगों और शारीरिक रूप से अशक्त लोगों को भी नहीं बख्शा गया था।उनकी भी उसी  बुरी तरह से पिटाई की गई जिस तरह अन्य प्रदर्शनकारियों की।

सभी पीड़ितों ने पुलिस कर्मियों द्वारा गाली गलौज की भाषा का इस्तेमाल करने और मुस्लिम विरोधी जुमलों का , जैसे पाकिस्तानी, मुल्ला आदि का, खुलकर इस्तेमाल किया। इसके अलावा हमला करते समय वे एक दूसरे को यह भी बताते जा रहे थे कि किस तरह से मारना है और कहां मारना है:” गांड में मार”, “,च** में घुसा दे” ,”मार् चूत में रंडी है “। उन्हें ऐसी गालियां बार-बार दी गई।

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यौन हमले

हमें 15 ऐसी महिलाएं और 30 ऐसे पुरुष मिले जिनके गुप्तांगों पर चोट की गई थी।

पुरुष पुलिसकर्मियों ने महिलाओं को मॉलेस्ट करने की कोशिश की जिन्होंने उनके कपड़े फाड़ने की, उनकी छातियों पर प्रहार की और जूतों से वार करने की कोशिश की। साथ ही अपनी बंदूकों की नोक को उनकी वजाइना में डालने की भी कोशिश की ।कम से कम 15 महिलाओं  के गुप्त अंगो पर चोट की  गयी थी और जिनके वजाइना में चोटें आई थी। हम कुछ ऐसी महिलाएं से मिले  जिनके वजाइना में जख्म आए थे क्योंकि उसमें डंडों के नुकीले हिस्से को घुसा दिया गया था।  दर्द ,मवाद और खून बहने की वजह से वह हफ्तों तक बिस्तर पर पड़ी रही ।16 वर्ष की कम आयु से लेकर 60वर्ष तक की महिलाओं को यौन हिंसा का शिकार बनाया गया जिनमें से कई अब तक  गाएनालॉजिकल परेशानियों से जूझ रही हैं ।एक महिला जिसका ऑपरेशन से बच्चा हुआ था ,बार-बार पिटना बंद करने की गुहार लगाती रही लेकिन उस पर  हमले जारी रहे जब तक कि पुलिस को पीछे नहीं खींच लिया गया।

 हम एमएससी नहीं देख पाए इसलिए हमें सर्वाइवरों  द्वारा दी गई जानकारियों पर ही  निर्भर करना पड़ा है ।यहां हमें मेडिकल छात्रों ने मदद की जिन्होंने सर्वाइवरो द्वारा दिए गए बयानों को समझाने का प्रयास किया ।हम यह बात फिर दोहराना चाहते हैं कि हमारी रिपोर्ट सर्वाइवरों, उनके प्रवक्ताओं मेडिकल प्रैक्टिशनर्स ,लीगल व मेडिकल सलाहकारों द्वारा दिए गए साक्ष्यों पर आधारित है। हम किसी भी डॉक्टर अथवा वकील को उसकी गोपनीयता की शपथ तोड़ने पर बाध्य नहीं कर सकते थे और ना ही हमने किया। हमने उनकी राय  ली और पीड़ितों द्वारा बताई गई कहानी की सच्चाई उसके आधार पर जांचने की कोशिश की।

महिलाओं के साथ हम उन पुरुषों के संपर्क में भी आए जिनके यौन अंगों पर चोटें आई थी। पुरुषों पर भी यौन हमले उतने ही भयंकर थे। ग्रोजन और रेक्टम पर हमलों से गहरे जख्म आए थे।। पुरुष और महिलाओं ,दोनों ,पर ही हमले भीषण थे और उनमे समान बात यह थी कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर अपनी असीमित ताकत दिखाने का प्रयास  किया।

बस में हमले

भयावहता और आतंक बैरिकेड तक सीमित नहीं रहे। लगभग 30 छात्र-छात्राओं को उठाकर पुलिस स्टेशन ले जाया गया।  लगभग 40 मिनट में बस पुलिस स्टेशन पहुंची ।बस में लगातार लड़कों की पिटाई की जाती रही। उनके ग्रॉइन पर जूतों से मारा गया। यह बात हमें ज्यादातर पीड़ितों के रिश्तेदारों और दोस्तों ने बताई क्योंकि डॉक्टर और वकील पेशेंट के विवरण गोपनीयता के चलते  हमें नहीं बता सकते थे। हमें बताया गया कि लड़के चल नहीं पा रहे थे जब उन्हें पुलिस हिरासत से रिहा किया गया और वह दर्द के मारे गिर पड़े। लोगों की शर्म और डर की वजह से भी  उनके डॉक्टर उनकी चोटों के बारे में ज्यादा नहीं बता पाए ।इसके अलावा जिन छात्रों को ज्यादा चोट लगी थी उन्हें 48 घंटे के अंदर घर भेज दिया गया ताकि उन्हें ज्यादा सवालों के जवाब ना देने पड़े।

यह बात याद करना महत्वपूर्ण है कि हम उन मामलों की जांच कर रहे थे जो हमले के शुरुआत की रात से तीन-चार दिन के अंदर विभिनन अस्पतालों में आते रहे। अगले 3 दिनों तक अस्पताल और डॉक्टर जख्मों का इलाज कर रहे थे। चूकि ज्यादातर चोटें उन छात्रों को आई थी जो स्थानीय नहीं थे, उनके रिश्तेदार, लोकल गार्जियन ,दोस्त या अध्यापक

ने उन्हें उनके घर वापस भेज दिया जहां पर अभी उनका इलाज चल रहा है।

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मुख्य मुद्दे

जांच पड़ताल में कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे सामने आए जिनको हम इस रिपोर्ट में हाईलाइट करना चाहते हैं:

1. सबसे पहले हम यह साफ कर कर दे हमारी हमारी छानबीन और साक्षरता करने में लंबा समय लग गया क्योंकि पीड़ित उनके रिश्तेदार या उनके प्रवक्ता तथा उनसे जुड़े लोग लगातार वर्दी वाले और सादे  कपड़े वाले पुलिस कर्मियों न्यू के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष धमकियां मिल रही थी कि बाहर किसी से भी बात ना करें। फोन पर हमसे बात करने मैं डर इस बात से भी जाहिर था कि हमें संदेश सीधे नहीं भेजे जा रहे थे क्योंकि उन पर वर्चुअल  निगरानी रखी जा रही थी।

2. महिला होने के नाते हम महिलाओं से दो उनके गुप्तांगों में हुए तुम्हें लगी चोटों के बारे में बात कर सके लेकिन पुरुष अपनी इस तरह की चोटों के बारे में बात करने में झिझक रहे थे उनकी चोटें अभी उतनी ही गंभीर थी जितनी की महिलाओं की। कोई भी डॉक्टर उनके बीच के तुलनात्मक ध्यान नहीं देगा और चुके चोटों की पूरी जानकारी केवल एमएससी में थी इसलिए कोर्ट यह जांच आयोग ही उन तक पहुंच सकता है। हम उनके कुछ मित्रों वकीलों और चिकित्सा जिस से जुड़े लोगों द्वारा दी गई गवाही पर ही निर्भर है पर निर्भर रहे हैं हैं।

3. पुलिस बल द्वारा की गई बर्बरता के संबंध में वह कोई भी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है। जामिया टीचर्स एसोसिएशन( जेटीए )ने 11 फरवरी को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में पुलिस द्वारा भीड़ के साथ किए गए  गैर पेशेवराना व्यवहार पर सवाल उठाए। ऐसी अप्रत्याशित निर्ममता सभी के लिए चौंकाने वाली थीं।  जीटीए ने स्थिति को नियंत्रण से बाहर जाने देने के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की ।

4. पुलिस किसी भी तरह के गैस के इस्तेमाल से इनकार कर रही हैं। लेकिन गवाहों और जामिया कोआर्डिनेशन कमेटी जैसे ग्रुपों ने  किसी रसायन के इस्तेमाल के संबंध में साक्षय इकट्ठे किए। हम भी निहत्थे नागरिकों पर रासायनिक गैस के इस्तेमाल के बारे में साक्षय और प्रत्यक्षदर्शियों से विवरण इकट्ठे करने में कामयाब रहे।

5. अस्पतालों ने आधिकारिक रूप से कोई भी बयान देने से मना कर दिया।

फेडरेशन की मांगें

भारतीय महिला फेडरेशन कड़े शब्दों में लोकतांत्रिक तरीके से किए जाने वाले प्रदर्शन  पय  हिंसा के इस्तेमाल की दो-टूक शब्दों में निंदा करती है और निम्नलिखित मांग करती है:

  1. गृह मंत्रालय10 फरवरी को  बैरिकेड लगाए जाने से लेकर छात्रों को पुलिस थाने में बंद रखने तक की घटनाओं पर श्वेत  पत्र जारी करे और रास्ते में चुन-चुन कर  छात्रों पर हमले करने , और उन्हें हिरासत में रखने पर भी, जो हिरासत में यातनाएं देने की धारा में आता है, अलग से श्वेत पत्र जारी करे।
  2. वर्दी वाले लोगों द्वारा किए गए गंभीर किस्म के अपराधों  की जां विशेष न्यायिक जांच कराएई जाए।

3.रिटायर्ड जजों के अलावा, हम चाहते हैं कि डॉक्टरों की एक टीम भी इसकी छानबीन करें और प्रदर्शनकारियों पर किए गए रसायन के इस्तेमाल तथा पीड़ितों  की  चोटों की  सार्वजनिक रिपोर्ट जमा करें।।

4.हम पुलिस और न्यायिक अधिकारियों को यह याद दिलाना चाहते हैं कि  निहत्थे प्रदर्शनकारियों को आईं चोटों

 के संबंध मेंआज तक कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई है । उन्हें और उनसे जुड़े ग्रुपों को धमकाये जाने का तत्काल नोटिस लिया जाए ।उन्हें परेशान करना और धमकियां देना बंद किया जाए ।न्याय पाने का अधिकार सभी को होना चाहिए ।हम राजनीतिक नैरेटिव से  वाकिफ हैं जो सभी सीएए- एनपीआर- एनआरसी विरोधों  को, महिलाओं ,खासकर मुस्लिम महिलाओं ,से जोड़ने की कोशिशों करता हैं। यह तथ्य कि मीडिया इन सभी प्रदर्शनों को महिलाओं का नेतृत्व वाला बता रही है, खासकर मुस्लिम महिलाओं के नेतृत्व वाले और उनके खिलाफ बरपा किए गए हिंसा को सही ठहरा रही है  एक झूठ और खतरनाक तथ्य है।

  1. वर्दी वाले लोगों के द्वारा इस तरह के अपराध और ज्यादातियां ना हो इसके लिए हम चाहते हैं कि न केवल पुलिस सुधारों की नीति लाई जाए,बल्कि जस्टिस वर्मा कमिटी की रिपोर्ट को कार्यान्वित भी किया जाए जिसकी एक के बाद एक आने वाली सरकारों ने बड़ी सहजता से उपेक्षा  कर दी है। वर्मा कमिटी ने सशस्त्र बलों अथवा वर्दी वाले कर्मियों द्वारा किए जाने वाले महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा को सामान्य आपराधिक कानून के अंतर्गत लाने की; सशस्त्र बलों द्वारा की गई यौन हिंसा  के मामले में शिकायतकर्ता या गवाह महिला की सुरक्षा को सुनिश्चित करने पर विशेष ध्यान देने की तथा महिलाओं की  सुरक्षा के लिए विशेष कमिश्नर गठित करने की सिफारिश भी की  थी।ऐ

6.जामिया मामला ना केवल पुलिस द्वारा की गई निर्ममता का बल्कि इस्लामोफोबिया की विचारधारा का भी मामला है  जो पुलिस द्वारा चलाया जा रहा है। इ इस पर  तात्कालिक रूप से ध्यान देने की जरूरत है । पुलिस का काम जनता की सेवा करना है, धर्म ,वर्ग ,जाति इत्यादि के किसी भी भेदभाव के बिना ,सभी लोगों के अधिकारों की  रक्षा करने के लिए संविधान का पालन करना है। और हमें ऐसी पुलिस नहीं चाहिए जो आबादी के एक तबके को अपना दुश्मन मानती हैत और उनके मानव अधिकारों का उल्लंघन करती है।

7.अंत में ,हम घायलों के लिए मुआवजे की मांग करते हैं।

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किसी लोकतंत्र में किसी को इस तरह की हिंसा नहीं झेलनी पड़े जैसी इन शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को झेलनी पड़ी।
अरुणा रॉय, अध्यक्ष
एनी राजा, महासचिव

परिचय –
राष्ट्रीय सचिव, भारतीय महिला फेडरेशन (NFIW)

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