संघर्ष और सफलता की कड़ी

डॉ. कौशल पंवार

आज के दिन मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय के मोतीलाल नेहरु महाविद्यालय के संस्कृत विभाग में ज्वाइन किया था, पूरे बारह बरस आज बीत गये, समय कैसे पंख लगाकर उड़ जाता है लगता है जैसे कल ही की बात हो, मेरी कर्मस्थली मेरा कालेज, हमारे प्रींसिपल डॉ. रमेशा शर्मा जी और वर्तमान प्रींसिपल डॉ . श्री वत्स शास्त्री जी, मेरा विभाग और मेरे सभी कलीग। हमारा नोन टीचिंग स्टाफ जो हमेशा स्नेह देते हैं जो अब तक के सफ़र में साथ दे रहे हैं और मुझे आशा और विश्वास है की आगे भी ऐसे ही देते रहेंगे, उन सबकी मैं हृदय से आभारी हूँ ।                                                               

यहां तक के इस सफ़र में मुकेश जो पग पग पर मेरे साथ रहे, मयंक और कौमु जो हमेशा ताजगी देते हैं, मेरे तमाम मित्र और सबसे बढकर मां और चाचा, जिनके खून पसीने से सींची  हुई मैं आज कुछ कर सकी। मां तो बस मां है, चाचा और भाई सुभाष ने तो केवल सपने दिखाये थे पर उन सपनों को पूरा करना तो मां ने सिखाया था, कैसे कर्ज उतारूंगी मां ये !बाबा साहेब ना  होते तो यहां पहुंच ही नहीं सकती थी , उँगली पकड़कर चाचा ने जहां रास्ता दिखाया वह तो आपका ही था बाबा, ऐसे ही मेरी ताकत बने रहे आप,चाचा के रूप में मैंने आपको ही देखा था आभारी हूँ  कोशिश करुंगी कि अपने सामर्थ्य के अनुसार आपके दिखाये रास्ते पर चल सकूं और पे बैक टू सोसायटी पर चलूं, आज याद आ रहा है वो एक एक पल जो  मैंने यहां तक पहुंचने में बिताया था।

मैं अपने आपको सफ़ल एवं संतुष्ट महिला कह सकती हूँ पर इस सफ़लता के पीछे कितना लम्बा संघर्ष, दुख-तकलीफ़ पीड़ा और अकेलेपन का दर्द छिपा है उसे केवल महसूसा जा सकता है कुछ दोस्त हैं  इस संघर्ष के गवाह जिन्होंने सहयोग किया था। मैं मां के साथ थी, कभी  चंडीगढ़ तो कभी महानदी होस्टल जे.एन.यू में मां जो राजौंद से बाहर कभी अकेले कदम नहीं रखती थी, यहां तक की अपनी ससुराल से मायके तक भी चाचा के बिना नहीं गयी थी, जब मैं चंडीगढ़ से दिल्ली इंटरव्यू देने आयी थी, जे.एन.यू. छोड़े दो साल पूरे होने को थे, पर मेरे मित्र वहीं थे, जो आज भी दिल्ली के आस पास में ही हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय में मैने सत्रह बार        इंटरव्यू दिए फिर भी सफलता नहीं मिली, नौकरी तो थी मेरे पास चंडीगढ़ में पर दिल्ली वापिसआने की मेरे पास दो वजह थी, एक मेरी जिद्द (छोरी जिद्दी शुरु से रही है) दिल्ली वापिस लौटने की और दूसरी थी जरुरत,जरुरत इस रूप में की मैंने और मुकेश ने ये तय किया हुआ था कि जब भी किसी एक की भी स्थाई नौकरी लग जायेगी तो हम साथ रहेंगे परंतु मुकेश मेरे साथ चंडीगढ़ नहीं गया जबकि मेरी नौकरी लग चुकी थी,कहता रहा कि दिल्ली आ जाओ तो साथ रहेंगे, दिल्ली रोहतक के पास में है, मुकेश रोहतक में नौकरी करते थे जो स्थाई नहीं थी, चडीगढ़  जाने के लिए मुकेश तैयार नहीं हुए, मेरे लिए वो दिन कितने तकलीफ़ देय थे उसे शायद ही शब्दों में पिरों ना  सकूं ।

जे.एन.यू. से पीएच.डी चल रही थी, नौकरी चडीगढ़  में थी, मयंक छोटा था,नया शहर किराये के मकान में रहना, जब चाहे मकान मालिक खाली करा ले, मां जो गांव से बाहर नहीं गयी थी उनके साथ मैं और मयंक।  मयंक की सारी जिम्मेदारी मां की, ऊपर से दो महिलाएं अकेली, वो भी क्या दिन थे लेकिन इक आस और एक जुनून था जिसे मां और मैं पूरा करते रहे, मैं अकेले मां को मयंक के साथ छोड़कर दिल्ली आती अपने पीएच.डी के काम को पूरा करने तो कभी इन्ट्र्व्यू देने। बहुत दिक्कत होती थी, मुकेश से क्या शिकायत करती, कभी कभी थक जाती थी भागते- भागते, कभी घर का सामान, कभी सिलेंडर  खत्म हुआ तो उसके लिए परेशानी, बहुत कुछ अकेले करना होता था । कुछ दोस्त वहां बने और उन्होंने  मदद भी की परंतु एक सीमा तो थी ही मदद करने की ।

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मुकेश बीच-बीच में एक -आध दिन के लिए आते तो बड़ा अच्छा लगता, उसके वापिस लौटने के बाद फ़िर वही मेरा काम, फिर तय हुआ कि दिल्ली विश्वविद्यालय में नौकरी लगते ही हम साथ मे रहेंगे, शादी के बाद से हम अलग अलग ही रहे, मुझे अपनी पढ़ाई  पूरी करनी ही थी और कुछ सपनें थे जिसे हर हाल में पूरा करना था, मुकेश ने प्रोत्साहन दिया, हौंसला भी दिया, भागती रही और एक दिन वो समय आ ही गया कि हम साथ साथ दिल्ली में रह सके।

मेरा दोस्त रजनीश और मैं मेरा इंटरव्यू  देने मोतीलाल नेहरु महाविद्यालय में पहुंचे, मेरा कोई गॉड़ फ़ादर नहीं था, न कोई लैफ़्ट और न राइट और न बीच का, बस था तो अपना हौंसला और खुद पर विश्वास, माँ  की मेहनत और चाचा का चेहरा आँखों के आगे रहा था, मुकेश का सुनहरा साथ कि हम साथ साथ रहेंगे, ये सपना पूरा हो बस यही पूंजी थी, दिल्ली विश्वविद्यालय में किसी से कोई जानकारी नहीं थी  एक दिन पहले प्रो. तुलसी राम सर से मिलने गयी थी जो मैं अकसर जाया करती थी, सर ने ऐसे ही पूछा था कि चंडीगढ़  में सब कैसा चल रहा है ? मैंने उदास भाव से कहा कि सर ठीक है,पर मैंने  अपने इंटरव्यू  की बात नहीं बतायी सर ने यूं ही पूछ लिया तो मैंने  बता दिया,दोनों  ने इस पर कोई बात नहीं कही, बस ऐसे ही पूछा था कि कैसे कैसे होता आ रहा है मैने बता दिया। सर के रूम में स्पेशल चाय बनती थी जो वे हमेशा पिलाया ही करते थे, मैंने  उस दिन भी पी और मैं वापिस आ गयी, मन मे न तो उत्साह था और न उत्सुकता, बस सहज था क्योंकि थक चुकी थी इंटरव्यू  दे देकर।  ये भी ऐसा ही रहेगा इसलिए ज्यादा कुछ नहीं तैयारी की, रजनीश से भी इस पर बात नहीं हुई जैसे ही हम दोनों ऑफिस घूसे तो सामने से एक जैन्टलमैन  सूट बूट मे आते दिखे। रजनीश ने मजाक किया कि अगर ये भी इंटरव्यू  देने आया है तो इसी का होगा। हम हँस दिये, मैंने  चैलेंज की तरह लिया इस बात को और यूं ही मेरे मुंह से निकला कि अगर इस से पहले मैं इंटरव्यू  देने अंदर गयी तो मेरा ही होगा और अगर ये चला गया तो इसका, रजनीश ने कहा कि होगा तो तुम दोनों मे से ही ओरों में तो दम नहीं नजर आ रहा । खामोशी पसर गयी थी क्योंकि इंटरव्यू  शुरु हो गया था, इत्तेफाक  से मेरा नाम वहां बैठे कर्मचारी ने बोल दिया और मैंने रजनीश की ओर देखा, मैं अंदर गयी मेरा इंटरव्यू  सबसे लम्बा गया था वैसे ऐसा हर बार ही होता था अब की बार भी ऐसा ही हुआ,मैं इंटरव्यू देकर  गेट से बाहर निकलने लगी तो मुझे उसी कर्मचारी ने कहा कि मैडम आपका ही होगा,सबसे ज्यादा टाइम आप पर ही लगा है, मैं हंस दी। हम दोनों बाहर आ गये थे, मैं अपना सामान भी साथ लायी थी,रजनीश यूनिवर्सिटी  गया और मैं बस में बैठकर चंडीगढ़  की ओर चल दी। 

रास्ते भर बेचैन सी रही, कई बार आंखों में पानी आया, पास बैठे लोगों से छूपाकर आंसूं पोंछे , कभी मां की उदास सी आंखे दिखाई देती तो कभी मयंक का चेहरा नजर आता, मां जो हर बार के इंटरव्यू  में तसल्ली देती कि कोई बात नहीं फ़िर हो जायेगा।  मैं रो पड़ी थी, दुख इस बात का ज्यादा रहता कि मां हर बार एक ही सपना देखती कि चलो अब तो मियां बीबी साथ रहेंगे, उसने मुझे अकेले रोते-लड़ते-थकते देखा था।  कई बार अकेले में मां उदास रहती और मैं मन मसोस कर रह जाती, क्या कहूंगी मां उनको कि उन्हें भी अभी ओर इंतजार करना पडेगा, मां जो गांव में सबके साथ मिलजुलकर रहने वाली थी यहां पर अकेली थी, न तो भाषा समझ पाती थी और न ही किसी को अपना दुख बांट सकती थी, ऐसा नहीं था कि मैं नहीं समझ रही थी लेकिन मैं मजबूर थी, मां के अलवा था भी कौन जिसके दम पर मैं उछल सकती थी। मुकेश आने को तैयार नहीं, अगर मैं नौकरी छोड़ दूं तो बच्चों को क्या भविष्य दूंगी, क्या होगा सपनों का जो अभी तक सहेज कर रखे थी।  मैं मां के साथ पहले हॉस्टल महानदी में थी और अब मां के साथ चंडीगढ़ में फ़िर भी मां ने कभी मजाक में भी मुझे ताना नहीं मारा, हमेशा मुझे पॉजिटीव सोचने को कहती। मैं थक जाती तो माँ मुझे अपने चाचा और मुकेश का सपना याद दिला देती, मयंक का भविष्य उज्जवल होगा ये याद दिलाती और मैं फ़िर से नये सिरे से जुट जाती। उस दिन बस में बैठे हुए बस यही सोचती जा रही थी कि मां का सामना कैसे  पूरा करुंगी, क्या कहूँगी  कि  तभी सर्च से जहां मुकेश काम करते थे फोन आया राजेन्द्र कुमार का, उन्होने मुझे कहा कि कॉलेज से फोन आया है वापिस चली जाओ अगर सम्भव हो तो, मैंने कहा क्या हुआ तो उन्होंने मुझे बधाई दी, मैं आवाक थी कुछ समझ नहीं आया, थोडी देर में कॉलेज से भी फोन आ गया था, मुझे यकीन नहीं हुआ मेरी सारी समस्या का समाधान एक झटके में मिल गया, मन किया कि दहाड़ मारकर रो पडूं।

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सुभाष का,चाचा का सपना पूरा हो गया था, मुकेश को ये खुशखबरी कैसे दूंगी सोचकर रोमाचिंत हो गयी थी, मैं कॉलेज  नहीं जा सकती थी वापिस, देर भी हो रही थी और मयंक और मां को अकेले छोड़े एक दिन पूरा निकल गया था, स्कूल भी जाना था छुट्टी केवल एक ही दिन की ली थी इसलिए मैंने सोमवार की आने के लिए बोल दिया था।  मनोज शर्मा जी उस वक्त पी.ए. हुआ करते थे, डॉ. रमेश शर्मा जी प्रींसिपल थे, डॉ. जे.पी.मिश्रा जी वाइस प्रींसिपल थे जो संस्कृत विभाग के थे।

मैं सोमवार को कॉलेज पहुंच गयी थी,उस दिन वाइस प्रींसिपल ही थे तो उन्होंने मुझे जॉइन करने से मना कर दिया ये कहकर कि पहले अपने स्कूल से एन.ओ.सी लेकर आओ, मैंने  कहा भी कि मैं जमा करवा दूंगी लेकिन वे नहीं माने और मुझे वापिस जाना पड़ा,एक हफ़्ता निकल गया। इस प्रोसेस में पर मुझे एन.ओ.सी मिल गया, मैं वापिस कॉलेज आयी और उन्ही वाइस प्रींसिपल को लेटर देने लगी तो उन्होंने कहा कि इसकी जरुरत नहीं है, मुझे गुस्सा तो बहुत आया कि अगर इसकी जरुरत नहीं थी तो मुझे दिल्ली से  चंडीगढ़  तक दौड़ाया क्यों? पर मैं ये कह न सकी, उन्होंने ये बात किसी और  को भी बताने से मना किया कि मैं किसी से न कहूं कि स्कूल में पढाकर आयी हूं. मुझे फ़िर से खराब लगा कि क्यूं नहीं बता सकती, उनका तर्क था कि मेरा इम्प्रेशन खराब होगा  खैर मुझे लगा कि ठीक ही कह रहे होंगे,उन्होंने एनओसी को भी रिकार्ड पर नहीं लिया कि इसकी जरुरत नहीं । मुझे इन सब की  टैक्नीकल  जानकारियां थी नहीं इसलिए मैंने भी किसी से शेयर नहीं किया। अब जब मैं महाविद्यालय मे पढ़ा  रही हूं तब पता चला कि मेरी सिनियोरटी उन्होंने जानबूझकर पीछे करवायी थी  जॉइनिग न देकर क्योंकि कईयों ने कॉलेज जॉइन किया था जिसमे मैं पीछे हो गयी, दूसरा स्कूल की मेरी यूनियन टैरिटरी की जॉब थी तो उसका अकादमिक लाभ मुझे नहीं मिलना था लेकिन सरकारी जॉब की काउंटिंग मेरी होती पर ऐसा उन्होंने नहीं होने दिया।

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कैसे जातिवाद का जहर अपना काम कर जाता है मुझे ये देर में समझ आया, सच ही कहा है कि किसी भी दिशा में मुड़े जातिवाद का राक्षस आगे खड़ा मिलता है पग पग पर इसका सामना किया है और आगे भी इसी तरह करती रहूंगी । 

डॉ. कौशल पंवार सामाजिक कार्यकर्ता हैं और मोती लाल नेहरू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, में संस्कृत की असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं.

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