बाबू राज के नायर

दलितों के उद्धार की बात आते ही केरल के एक महान समाज सुधारक की याद ताजा हो आती हैं। अस्पृश्य मानकर समाज से बहिष्कृत दलितों के उत्थान के लिए अपना जीवन समर्पित कर देने वाले वो महात्मा हैं अय्यन काली। उनके जन्म के समय केरल मलबार, कोच्ची एवं तिरूवितॉंकूर के नाम से तीन भागों में बँटा हुआ था। मलबार पर अंग्रेजी हुकूमत चलती थी तो तिरूवितॉंकूर तथा कोच्ची अंग्रेजों के नियन्त्रण वाले राज शासन के अधीन थे।

सम्पूर्ण भारत में सदियों से चातुर्वण्र्य व्यवस्था कायम थी, लेकिन केरल में ‘सवर्ण-अवर्ण’ नाम से बँटे हुए समाज की जाति व्यवस्था उससे भी कईं अधिक बुरी थी। केरल में ब्राह्यण एवं क्षत्रीय (नायर) सवर्ण तथा वैश्य एवं शूद्र अवर्ण कहलाए जाते थे। समाज में जातिवाद के तहत व्याप्त अस्पृश्यता के कारण ‘अवर्ण’ जनता के प्रति ‘सवर्ण‘ जनता के अत्याचार इतने भयानक थे कि उन्हें अपनी रोज़मर्रा की जिन्दगी के हर क्षेत्र में अत्यधिक कठिन यातनाएँ सहनी पड़ती थी। ‘सवर्ण’ उन्हें मनुष्य ही नहीं समझते थे। उनकी ज़िन्दगी जानवरों से भी बदतर थी।

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तिरूवितॉंकूर के वेंगानूर गॉंव में प्लावत्तरा घर में अय्यन और मााला के पुत्र के रूप में 28 अगस्त 1863 को केरल के महान दलित नायक अय्यन काली का जन्म हुआ था। उनके जन्म के समय हिन्दुओं के बीच की जाति व्यवस्था
इस कदर बुरी थी कि अस्पृश्यता का प्रचलन अपनी चरम सीमा पर था। समाज जातिवाद से कलुषित था। दलित जाति ‘पुलायर’ जिसमें अय्यन काली का जन्म हुआ था, के साथ ‘परायर’, ‘कुरावर’, ‘मण्णान’ जैसे कईं अन्य शूद्र जातियों को भी ‘अवर्ण’ व ‘अस्पृश्य’ घोषित करके अपने आप को सवर्ण जाति के मानने वाले समाज के धनाढ्य लोगों ने उन्हें उनके सामाजिक अधिकारों से वंचित कर रखा था।

अन्धविश्वास तथा अनाचार रूपी अन्धकार में डूबे उस काल की सामूहिक व्यवस्था एवं जीवनचर्या ऐसी थी कि उसके बारे में सोचते हुए आज भी मन में सिहरन सी पैदा हो जाती है। जाति के नाम पर समाज में व्याप्त शर्मनाक भेदभाव को देखकर भारत भ्रमण के लिए निकले स्वामी विवेकानन्द ने केरल को ‘पागलखाना’ कहा था। जाति के नाम के इस भेदभाव को मिटाकर सामाजिक अधिकारों से वंचित जन समूह को उनका हक दिलाने के लिए अय्यन काली ने सवर्णों के विरूद्ध अपना मोर्चा संभाला। जाति के परे सभी मनुष्यों के साथ मनुष्यता के साथ व्यवहार कराना, विद्यार्जन के माध्यम
से दलितों को अन्य जनसमूह के साथ सामूहिक स्वतन्त्रता प्राप्त कराना आदि उनकी लड़ाई के अहम मुद्दे थे। हीन जातियों की मानी गई दलित जनता को मन्दिर प्रवेश की अनुमति प्राप्त होना तो दूर, उन्हें मन्दिर की तरफ जाने वाली सड़कों से होकर गुज़रने तक की अनुमति नहीं थी। कुत्ते और गाय जैसे जानवरों के उन रास्तों से होकर जाने पर कोई रोक नहीं थी, लेकिन मनुष्यों पर पाबंदी लगाई गई थी। अर्थात् अवर्णों की ज़िंदगी जानवरों से बदतर थी। तिरूवितॉंकूर के शासक भी इसका बहुत अधिक ध्यान रखते थे कि उनके शासन के अधीन जाति व्यवस्था का सख्ती से पालन हो।अय्यन काली को
अपने बचपन से ही, जातिवाद के तहत व्याप्त अस्पृश्यता के चलते जो सामूहिक भेदभाव सबसे अधिक खटकता था, वह था¬ राहों पर चलने की अस्वतन्त्रता। आम राहों से होकर सवर्णों के आने की सूचना मिलते ही अवर्णों को वहॉं से हटकर उनके लिए निश्चित की गई दूरी पर जाकर छिपकर खड़ा होना पड़ता था। दूर हटकर खड़े होने की दूरी जाति के अनुसार निश्चित की जाती थी। अर्थात् जो जितना ज्यादा अछूत जाति का माना जाता था उसे उतनी ही अधिक दूरी पर जाकर खड़ा होना पड़ता था। अवर्णों के शरीर पर ही क्या उनकी परछाई तक पर नज़र पड़ना भी सवर्ण अपने लिए अपवित्र मानते थे।

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अय्यनकाली ने इस सामूहिक भेदभाव को मिटाकर दलितों को राहों पर चलने की स्वतन्त्रता प्राप्त कराने के लिए संघर्ष करने का फैसला किया। उन्होंने सबसे पहले सन् 1893 में सवर्णों के अहंकार एवं गर्व का उन्हीं की रीति से सामना करने के लिए एक बैल गाड़ी खरीदी। धोती बॉंधकर, कुर्ता पहनकर तथा सिर पर पगड़ी बॉंधकर वे गाड़ी में सवार हो गए और अत्यधिक साहस का प्रदर्शन करते हुए दलितों के लिए निषिद्ध राहों पर गाड़ी बढ़ाई। सवर्णों ने उनकी राह रोकने की कोशिश की तो उन्होंने खंजर निकालकर उन लोगों को ललकारा, लेकिन किसी में भी उनका सामना करने की हिम्मत नहीं
थी।बिना किसी डर के रोकटोक के वो आगे बढ़ते रहे। उनकी इस यात्रा से उत्तेजित उनके अनुयायी एकजुट होकर पैदल ही उनके साथ गाड़ी के पीछे¬पीछे बढ़ते रहे। इस घटाना के बाद उनके अपने समुदाय के लोग उन्हें ‘अय्यन काली मालिक’ कहकर संबोधित करने लगे।

सवर्णों की क्रूरता के प्रति मन में भय होने के कारण उनके अपने लोगों के बीच से इस यात्रा के प्रति विरोध के स्वर उभरे थे। लेकिन अय्यन काली ने इन स्वरों को अनसुना करके अपने अकेले के दम पर बैल गाड़ी पर की यात्रा जारी रखी। धनाढ्य सवर्णों ने अपने पाले हुए गुर्गों की शारीरिक शक्ति के बल पर इसे रोकने के प्रयत्न किए। उनके और उनके साथियों के साथ, सवर्णों के गुर्गों की टक्कर होती रही। इस संघर्ष के चलते दलितों ने राहों में अपने खून बहाए, इसके बावजूद अय्यनकाली अपनी जाति के लोगों के साथ अन्य दलित जाति के लोगों के भी आराध्य बन गए।

अत्यधिक साहस का प्रदर्शन करते हुए राहों पर स्वतन्त्र सवारी करने का अधिकार प्रकट करने के साथ गुलामी की जंजीरों में जकड़ी हुई एक जन समूह को उससे मुक्ति दिलाने के लिए प्रयुक्त ‘बैलगाड़ी’ इतिहास में दर्ज इस प्रकार का पहला वाहन है। इस एक घटना के साथ ही अय्यनकाली का नाम नवोत्थान संघर्ष के नायकों में शुमार हो गया। केरल के दलितों की उन्नति के लिए आजीवन संघर्ष करते रहने वाले महान समाज सुधारक होने के नाते महात्मा गॉंधी ने अय्यन काली से मुलाकात करने पर उन्हें ‘पुलाया राजा’ कहकर संबोधित किया था।‘मन्दिर प्रवेश की उद्घोषणा’ से संबन्धित 1937 में केरल के दौरे पर आए गॉंधी जी ने वेंगानूर जाकर उनसे मुलाकात की थी।

अवर्णों को अपने पैरों तले दबाए रखने के मकसद से उनकी आर्थिक तनाव को बढ़ाने के लिए तिरूवितॉंकूर के शासक उनके खिलाफ बर्बरता पूर्वक व्यवहार करते थे। अपनी आजीविका के लिए उपयोग में लाए जाने वाले प्रत्येक उपकरण के नाम पर अवर्ण जनता को कर देना पड़ता था। नारियल के पेड़ पर चढ़ने के लिए सीढ़ी एवं रस्सी के छल्ले के उपयोग किए जाते थे, इसलिए उन दोनों उपकरणों के नाम से कर वसूली होती थी। खेत में मजदूरी करने वालों के लिए उनके औज़ारों के नाम से कर लागू कर रखे थे। मछुआरों को ‘जाल कर’ देना पड़ता था। सबसे विचित्र एवं असंगत कर अवर्णों के अपने शरीर के अंगों के नाम पर वसूल किए जाने वाले कर थे।

अस्पृश्य माने गए दलितों को समााज में ऊँची जाति के ‘सवर्ण’ माने जाने वाले लोग बंधक मज़दूरों की तरह अपने खेत खलिहानों में काम कराते थे। जाति के नाम पर सामाज के द्वारा तिरस्कृत किए जाने के कारण नारकीय जीवन बिताने वाले ‘अवर्णों’ को आर्थिक तंगी के चलते और भी अधिक एवं भीषण कठिनइयों से होकर गुजरना पड़ रहा था। जहॉं ‘सवर्ण’ को अपनी ज़मीन तक के लिए सरकार को कर नहीं देना पड़ता था, वहॉं ‘अवर्ण‘ के विरूद्ध तिरूवितांकूर के शासकों ने सौ से भी अधिक असंगत कर लागू कर रखे थे। पैरों में चप्पल पहनने¸ धूप¬बारिश से बचने के लिए छाता ओढ़ने आदि की अनुमति अवर्णों को प्राप्त नहीं थी।

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इसके विरोध में सन् 1898¬99 के दौरान अय्यनकाली के नेतृत्व में खेतीहर मज़दूरों ने हड़ताल कर दिए। इसके तहत दलितों ने मज़दूरों को मनुष्य मानने से इनकार करने वाले धनाढ्यों के खोतों में मज़दूरी करनी बन्द कर दी। इस पर सवर्णों ने पहले तो स्वयं खेती करने की कोशिश की, फिर जब उसका कोई अच्छा नतीजा नहीं निकला तो मज़दूरों से बदला लेने के स्वरूप अपनी ज़मीनों को बिना खेती के बंजर छोड़ दिए। काम के बिना मज़दूरों की जिन्दगी अत्यधिक कष्टदायक हो गई।इसके बावजूद हड़ताल से पीछे हटने के लिए वे लोग तैयार नहीं हुए। आखिर में खाने के लिए अन्न की कमी महसूस करके सवर्णो को अवर्णों के सामने झुकना पड़ा। मजदूरों की करीब¬करीब सारी मॉंगों को मानकर सन् 1905 में उनके हक में फैसला लिया गया।इस हड़ताल ने पूरे केरल में जोश की एक नई लहर दौड़ा दी और आगे चलकर इसने खेतीहर मज़दूरों के हक की लड़ाई में ईंधन का काम किया।

अवर्ण जनता में स्त्री¬पुरूष भेद के बिना किसी को भी अपने शरीर के कमर से ऊपरी हिस्से को कपड़े से ढ़कने की अनुमति नहीं दी गई थी।स्त्रियों को घुटने से नीचे की ओर भी वस्त्र पहनने की अनुमति नहीं थी। अर्थात् घुटने के ऊपरी भाग से लेकर कमर तक के अपने शरीर के भाग ही औरतें कपड़ों से ढ़क सकती थी।विशेष तौर पर सोलह से पैन्तीस वर्ष की आयु के बीच की औरतों को अपने स्तन ढ़कने की अनुमति नहीं देना बहुत ही निन्दनीय एवं अप्रतिष्ठित संप्रदाय था। अवर्ण युवती का अपने कमर के ऊपरी हिस्से को कपड़े से ढ़कना सवर्ण अपने लिए उनके द्वारा दिखाए जाने वाला अनादर
का प्रदर्शन मानते थे। इसलिए जब कभी भी अवर्ण युवतियॉं घर से कहीं बाहर जाने का साहस करती तो उन्हें अपने स्तनों के प्रदर्शन करते हुए निकलने पड़ते थे।

खेतीहर मजदूरों के संघर्ष में प्राप्त विजय से मिली ऊर्जा लिए अय्यन काली ने अवर्ण स्त्रियों के विरूद्ध सवर्णों के इस अमानुषिक संप्रदाय का विरोध करने का निश्चय किया। उन्होंने अपनी जाति की स्त्रियों से स्तन ढ़कने के लिए पर्याप्त वस्त्र पहनने का आह्वान किया। इसके साथ ही उन्होंने गुलामी के चिन्ह् स्वरूप गले में पहनी हुई ‘पत्थर की माला तथा कान में पहने हुए लोहे के छल्ले’ उतारकर भेंकने के लिए भी कहा। अस्पृश्यता की पैरवी करने वाले सवर्णों ने इसे अवर्णों के अहंकार का दर्जा देकर अय्यन काली की बात मानने वाली स्त्रियों को दंड़ दिए। स्त्रियॉं यदि स्तनों को ढ़कते हुए वस्त्र
पहनी हुई हों तो सवर्ण उनके वस्त्रों को फाड़ देते। जो कोई भी इसका विरोध करती, उसके स्तनों को बेरहमी से काट देते। उनके पिता और भाइयों के सामने ही क्रूरता से उनकी पिटाई करते।

जब सवर्णों की इस प्रकार की क्रूरता पूर्वक प्रवृत्तियॉं हद पार कर गई तब अवर्ण जनता ने उनका डटकर मुकाबला किया।इस प्रकार तिरूवितॉंकूर के अनेक प्रदेश दंगाई क्षेत्रों में तबदील हो गए।जब दंगे ने भयानक रूप धारण कर लिए तब अय्यन काली के आह्वान पर दलित, कोल्लम नगर के ‘तोप का मैदान’ नामक मैदान में एकत्रित हुए।इस मैदान में आयोजित सम्मेलन के दौरान उन्होंने ‘पत्थर की माला और लोहे के छल्ले’ उतार फेंकने का आह्वान किए और साथ में सवर्णों से यह मॉंग भी की कि वे दलितों की जायज़ मॉंगों को अनसुनी न करें।उनकी बात सुनकर स्त्रियों ने अत्यधिक जौश के साथ ‘पत्थर की माला और लोहे के छल्ले’ उतारकर फेंक दिए।इसके तहत यह संघर्ष ‘पत्थर की माला संघर्ष‘ के नाम से इतिहास में दर्ज हैं।

वेदों के अध्ययन अवर्णों के लिए निषिद्ध था। विद्यालय जाकर पढ़ने की अनुमति अवर्ण विद्यार्थियों को प्राप्त नहीं थी। उन्हें उच्च शिक्षा प्राप्त करने के अवसर देना तो दूर, बुनियादी शिक्षा प्राप्त करने की अनुमति तक नहीं दी जाती थी। इस प्रकार अशिक्षित रह रहे अज्ञानियों को अपनी आवश्यकता के लिए ‘सवर्ण‘ पीढ़ियों से इस्तेमाल करते आ रहे थे। इस अज्ञानता की वजह से उनका सामूहिक स्तर दिन पर दिन गिरता ही चला जा रहा था।सरकारी नौकरी प्राप्त करने के बारे में सोचने तक की हिम्मत निरीह अवर्ण जनता नहीं कर पाती थी। राजा¬महाराजा अपने दरबारियों एवं उपदेशकों के रूप में सवर्णों को ही नियुक्त करते थे।राजा की सेना में सवर्णों को ही सैनिकों के रूप में ही शामिल किए जाते थे। इस प्रकार राज्य के प्रशासन कार्यों से अवर्णों को दूर रखे जाते थे।कला, साहित्य आदि क्षेत्र से भी अवर्णों को वंचित कर रखा था।इसके विरोध स्वरूप अय्यनकाली ने 1904 में अपने ही गॉंव वेंगानूर में अपने साथियों के साथ मिलकर दलितों के लिए एक विद्यालय आरंभ किया, लेकिन सवर्णो ने उसी रात को उसे जलाकर खाक कर दिया।

इसके विरोध स्वरूप भी अय्यन काली के आह्वान पर दलितों ने सवर्णों के लिए खेतों में मजदूरी करना बन्द करके हड़ता

ल का ऐलान कर दिया। अवर्णों को भी सवर्णों की तरह विद्यालय से विद्या आर्जित करने की अनुमति प्रदान कराना ही इस हड़ताल का लक्ष्य था। अवर्णों को अछूत मानते हुए उनकी परछाई से भी दूर रहने वाले सवर्ण लेकिन उन्हीं से अपने खेत¬खलिहाानें में मेहनत¬मजदूरी कराते थे। इसके अलावा अपने लिए धन की प्राप्ति के एक अन्य ज़रिए के रूप में वो लोग निसहाय अवर्णों से कर वसूली भी करते थे। अपना खून¬पसीना एक करके सवर्णों के लिए अन्न उत्पन्न करने वाले निरीह अवर्णों को लेकिन अपनी मेहनत के मेहनताना के रूप में घोर यातनाओं के अलावा कुछ भी नहीं मिलता था।अस्पृश्यता और तिरस्कार रूपी दो धारी तलवार उनके सिर पर हमेशा लटकी रहती थी। अय्यन काली जानते थे कि सवर्णों को अपने पिछले अनुभव से यह सीख मिल चुकी थी कि खेत¬खलिहाानें में मेहनत¬मजदूरी करने के लिए अवर्ण तैयार नहीं हुए तो उनके घरों में चूल्हे नहीं जलेंगे।

खाने के लिए अन्न की कमी महसूस करके प्रशासन ने मजबूरी में, समझौते के तौर पर दलित विद्यार्थी¬विद्यार्थिनियों को विद्यालय में प्रवेश की अनुमति दे दी। इसके बावजूद स्वाभाविक तौर पर दलित बच्चों को बाकी बच्चों के साथ बैठकर पढ़ने की अनुमति विद्यालय के सवर्ण अधिकारी नहीं दे रहे थे। परिणाम स्वरूप अय्यनकाली अपने साथियों के साथ मिलकर पन्चमी नामक एक दलित बालिका को नेय्याट्टिनकरा तालुका के ऊरूट्टम्बलम में स्थित बालिका विद्यालय ले गए और अन्य
छात्राओं के साथ उसे भी बैठा दिया। एक दलित बालिका के स्पर्श से विद्यालय अपवित्र हो गया कहकर सवर्णों ने उस विद्यालय को भी जलाकर खाक कर दिया।

इस घटना के मद्देनज़र अय्यन काली के मन में दलित बालक¬बालिकाओं के लिए एक अलग विद्यालय आरंभ करने के विचार ने जन्म लिया। उन्होंने इस संबन्ध में अंग्रजी अधिकारियों से मुलाकात करके निवेदन दिए और फलस्वरूप 1914 में उनके गॉंव के पुतुविलाकम में मलयालम विद्यालय आरंभ करने की अनुमति देते हुए सरकार ने उसकी व्यवस्था कर दी।1905 में अय्यनकाली qने दलित बच्चों को अक्षर ज्ञान से अवगत कराने के लिए जिस ‘कुड़िपल्लिक्कुड़म्’ (ऐसा विद्यालय जहॉं बच्चों को मात्र अक्षरों के ज्ञान कराए जाते हैं) आरंभ किया था, उसे ही सरकारी विद्यालय के रूप में पदोन्नत किया गया था।

अपनी 30 साल की उम्र में दलितों की उन्नति के लिए संघर्ष प्रारंभ करने वाले अय्यन काली 10 साल तक संघर्ष करते रहने के बाद मात्र 40 साल की उम्र में ही यक्ष्मा रोग से ग्रस्त हो गए। इसके बावजूद उनका संघर्ष बिल्कुल भी कम नहीं हुआ। अपने रोग की परवाह किए बिना वे लम्बे 48 वर्ष दलितों के लिए संघर्ष करते रहे। इस रोग के चलते 77 साल की उम्र तक पहुँचते¬पहुँचते उनकी सेहत इतनी बिगड़ गई कि बुद्धवार, 18 जून 1941 को दलितों के लिए रोग से संघर्ष करते हुए वे इस दुनिया से अलविदा कह गए।

उनकी स्मृति में उनके जन्म स्थल वेंगानूर में उनका स्मारक और उनके नाम से एक विद्यालय भी आज स्थित हैं। केरल की राजधानी तिरूवनन्तपुरम के वेल्लयम्बलम चौक पर नवम्बर 1980 को उनकी एक आदमकद भव्य मूर्ति की स्थापना की गई, जिसका अनावरण भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गॉंधी के द्वारा किया गया था। हर वर्ष 28 अगस्त को ‘अय्यन काली जयन्ती’ नाम से उनका जन्मदिन मनाया जाता है। उनकी जयन्ती के अवसर पर केरल में सार्वजनिक छट्टी रहती है।इस वर्ष उनकी जयन्ती के शुभ अवसर पर केरल के मुख्यमंत्री पिणराई विजयन ने एैलान किया कि तिरूवनन्तपुरम नगर के हृदय स्थान पर स्थित ऐतिहासिक ‘विक्टोरिया जूबली टाउन हॉल’ का महात्मा अय्यंकाली के नाम से पुन: नामकरण किया जाएगा। उन्हें श्रद्धांजली अर्पित करते हुए भारत सरकार के डाक विभाग के द्वारा 12 सितम्बर, 2002 को उनके नाम की डाक टिकट का विमोचन किया गया। इन सब बातों से यह ज्ञात होता है कि जाति, धर्म और राजनीति से परे इन महात्मा का नाम भारत वासियों के हृदय में चिरस्थाई हैं।

जन्म : अडूर, केरल
शिक्षा : हिन्दी एवं अंग्रेजी में एम.  ए. 
वरिष्ठ पत्रकार। 
प्रिन्ट मीड़िया : पत्रकारिता का शुभारंभ राजस्थान पत्रिका से। विश्वल मीडिया : ज़ी न्यूज़ एवं सहारा समय। सहारा समय के तिरुवनंतपुरम ब्यूरो चीफ रहते व्यवस्थापन से जुड़ी पत्रकारिता त्यागकर फ्रीलान्स पत्रकारिता से जुड़ गए और आज भी उसमें सक्रिय।

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